यूपी में पेट दर्द-उल्टी से परेशान महिला चेकअप के लिए पहुंची तो डॉक्टरों के होश उड़ गए। महिला प्रेग्नेंट है, लेकिन बच्चा गर्भाशय की जगह लिवर में पल रहा है। ये केस डॉक्टरों के लिए भी हैरान करने वाला है। उनका दावा है कि इंट्राहेपेटिक एक्टोपिक प्रेग्नेंसी का शायद ये देश का पहला मामला है। क्या होती है इंट्राहेपेटिक एक्टोपिक प्रेग्नेंसी? महिला की जान को कितना खतरा है? अब तक दुनियाभर में कितने केस सामने आ चुके? पढ़िए भास्कर एक्सप्लेनर… सवाल-1: मेरठ में कैसे सामने आया इंट्राहेपेटिक एक्टोपिक प्रेग्नेंसी केस? जवाब: बुलंदशहर की रहने वाली 30 साल की महिला 2 महीने से पेट दर्द और उल्टी से परेशान थी। वह इलाज करवा रही थी, लेकिन आराम नहीं मिल रहा था। बुलंदशहर में डॉक्टरों ने महिला को एमआरआई एब्डोमेन टेस्ट कराने को कहा। एमआरआई एब्डोमेन टेस्ट एक इमेजिंग टेस्ट होता है। इसमें बिना चीर-फाड़ ही इमेजिंग टेस्ट किया जाता है। ऐसा पेट के अंदर के अंगों की बहुत ही साफ और डिटेल्ड फोटो लेने के लिए किया जाता है। महिला मेरठ के प्राइवेट इमेजिंग सेंटर में जांच कराने पहुंची। डॉक्टर ने जब जांच रिपोर्ट देखी, तो दंग रह गए। क्योंकि, महिला के यूटरस (गर्भाशय) में नहीं, बल्कि लिवर में 12 हफ्ते का भ्रूण पल रहा था। उसमें कार्डियक पल्सेशन (धड़कन) भी है। चेकअप करने वाले डॉक्टर केके गुप्ता ने रिपोर्ट देखकर बताया कि गर्भधारण यूटरस की जगह लिवर के दाहिने हिस्से में है। मेडिकल की भाषा में यह स्थिति इंट्राहेपेटिक एक्टोपिक प्रेग्नेंसी कहलाती है। इसके साथ ही डॉक्टर केके गुप्ता ने ये भी दावा किया कि देश में पहले इस तरह का कोई मामला होने की जानकारी नहीं मिली है। इस तरह का ये देश का शायद पहला मामला ही होगा। सवाल- 2: क्या होती है इंट्राहेपेटिक एक्टोपिक प्रेग्नेंसी? जवाब: प्रसूता एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ वंदना सिंह बताती हैं- प्रेग्नेंसी की स्थिति में भ्रूण गर्भाशय में पलता है। जब भ्रूण गर्भाशय की जगह शरीर के किसी और हिस्से में पलने लगे, तो उसे एक्टोपिक प्रेग्नेंसी कहते हैं। 97% मामलों में प्रेग्नेंसी फैलोपियन ट्यूब में होती है। लेकिन कुछ केस में यह पेट, ओवरी, या यहां तक कि लिवर में भी हो सकती है। जैसा इस महिला के साथ हुआ। सवाल- 3: सामान्य प्रेग्नेंसी और इंट्राहेपेटिक एक्टोपिक प्रेग्नेंसी में क्या फर्क है? जवाब: स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मीनाक्षी गुप्ता बताती हैं- सामान्य प्रेग्नेंसी में भ्रूण यूटरस की दीवार से चिपकता है। वहीं से उसका विकास होता है। यह नेचुरल और सुरक्षित प्रक्रिया मानी जाती है। वहीं, इंट्राहेपेटिक एक्टोपिक प्रेग्नेंसी में भ्रूण यूटरस में ना जाकर कहीं और पलने लगता है, जैसे लिवर या कहीं और। लिवर में ब्लड सर्कुलेशन तेजी से होता है, इसलिए उसे पोषण तो मिल जाता है। लेकिन जैसे-जैसे भ्रूण बढ़ता है, मां के लिए खतरा बढ़ता जाता है। अगर लिवर में भ्रूण बढ़ने लगे, तो उसे हटाने में हैवी ब्लीडिंग भी हो सकती है। ऐसे में समय रहते सटीक डायग्नोसिस और तत्काल सर्जरी ही इसका एकमात्र उपाय है। अधिकतर मामलों में भ्रूण को हटाया जाता है । प्लेसेंटा को वहीं छोड़कर दवाओं से सिकोड़ने की कोशिश की जाती है। सवाल- 4: अब तक इंट्राहेपेटिक एक्टोपिक प्रेग्नेंसी के कितने केस सामने आ चुके? जवाब: अब तक दुनियाभर में इंट्राहेपेटिक एक्टोपिक प्रेग्नेंसी यानी भ्रूण का लिवर में इंप्लांट होने के 8 मामले सामने आए हैं। ये बेहद दुर्लभ स्थिति है। मेरठ के डॉक्टर केके गुप्ता ने भी बताया कि लिटरेचर में दर्ज मामलों के अनुसार, दुनिया में अब तक केवल 8 ऐसे केस ही सामने आए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो चीन, नाइजीरिया, अमेरिका और यूरोप में ऐसे केस सामने आए थे। हालांकि वो शुरुआती अवस्था में ही पकड़ में आ गए थे। ऐसे में दवा से ही ये भ्रूण नष्ट हो गया था। लेकिन, अगर समय बढ़ गया तो इस अवस्था में मां और बच्चे दोनों के लिए बेहद जोखिम भरी स्थिति होती है। सवाल- 5: महिला की जान को कितना खतरा? डॉक्टरों के पास क्या रास्ता? जवाब: बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर के स्त्री एवं प्रसूता रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सुधीर गुप्ता बताते हैं- जब भ्रूण लिवर जैसे संवेदनशील अंग में इंप्लांट हो जाए, तो खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में महिला की जान पर सीधा खतरा मंडराने लगता है। जब लिवर से भ्रूण को हटाने की कोशिश होती है, तो भारी खून भी बहने लगता है। ये स्थिति जानलेवा हो सकती है। लिवर का टिशू बहुत संवेदनशील होता है, भ्रूण हटाते समय उसका नुकसान स्थायी भी हो सकता है। बहुत सावधानी से इसकी सर्जरी करनी होगी। अगर सावधानी बरती जाए और समय रहते सही इलाज हो जाए, तो महिला की जान बचाई जा सकती है। अगर समय रहते स्थिति की पहचान न हो और इलाज न मिले, तो लिवर फट सकता है। ————————– ये खबर भी पढ़ें… पहले हिचकी, फिर नाक से खून और टॉपर की मौत, बाराबंकी में 17 दिन में 2 बच्चों की मौत; क्या साइलेंट अटैक था, जिम्मेदार कौन? बाराबंकी के स्कूल में 10वीं की जिला टॉपर छात्रा की क्लास में हिचकी आई। कोई समझ पाता, उसके पहले नाक से खून आया। अस्पताल पहुंचने से पहले मौत हो गई। बाराबंकी में ही एक दूसरे स्कूल में 2 जुलाई को 12 साल के एक बच्चे की भी अचानक मौत हुई थी। आखिर इन दोनों बच्चों की मौत अचानक क्यों हुई? क्या साइलेंट कार्डियक अटैक आया था? यह हार्ट अटैक से कैसे अलग है? इसके पीछे की वजह क्या है? पढ़िए पूरी खबर…