मुलायम सिंह की बहू अपर्णा यादव अगला यूपी विधानसभा चुनाव लड़ सकती हैं। मैनपुरी के सैफई में उन्होंने कहा- तैयारी पूरी है, लेकिन मैनपुरी से चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं है। मैं किस विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ूंगी, इसका फैसला भाजपा करेगी। भाजपा सूत्रों के अनुसार, वह लखनऊ की 3 सीटों पर दावेदारी कर सकती हैं। लेकिन, भाजपा संगठन उन्हें किसी यादव बहुल सीट से उतारकर बड़ा राजनीतिक दांव चल सकती है। जिससे सपा के वोटबैंक में सेंध लगाई जा सके। ये इटावा, कन्नौज, या मैनपुरी के आसपास की विधानसभा सीट हो सकती है। अपर्णा के चुनावी मैदान में उतरने से भाजपा को कितना फायदा होगा? वो किन सीटों से दावा कर सकती हैं? 2017 में मिली हार के बाद उनकी जीत के कितने चांस हैं? आज की संडे बिग स्टोरी में पढ़िए… अपर्णा यादव को क्यों टिकट दे सकती है भाजपा मुलायम परिवार की छोटी बहू- अपर्णा यादव की राजनीति में सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू हैं। भाजपा में शामिल होने के दौरान यही संदेश दिया गया था कि सैफई परिवार की बहू भाजपा के साथ हैं। यादव परिवार के सदस्यों में उनके लिए सम्मान है। अपर्णा की यही पहचान राजनीति में उनकी सबसे ज्यादा मददगार है। यादव मतदाताओं में पहुंच- अपर्णा लंबे समय से परिवार के साथ पार्टी से जुड़ी थीं। 2015-16 के आसपास सपा की रैलियों के जरिए सक्रिय राजनीति में कदम रखा। भाजपा के कुछ पदाधिकारियों का मानना है कि सपा छोड़ने के बाद भी यादव मतदाताओं के बीच उनकी पहुंच बनी हुई है। वो भाजपा के लिए यादव मतदाताओं को लामबंद कर सकती हैं। पति प्रतीक की अचानक मौत से सहानुभूति- इसी साल मई में अपर्णा के पति प्रतीक यादव की 38 साल की उम्र में अचानक मौत हो गई थी। भाजपा के सभी बड़े नेता अपर्णा को सांत्वना देना पहुंचे थे। सीएम योगी भी घर जाकर परिवार से मिले थे। पति की अचानक मौत से उनके लिए पब्लिक में भी सहानुभूति का माहौल बना हुआ है। मजबूत महिला चेहरा- परिवार से अलग राजनीतिक राह चुनते हुए अपर्णा भाजपा में शामिल हुईं। राजनीति में अपना रास्ता खुद बनाया। भाजपा महिला वोटरों को ध्यान में रखते हुए अपर्णा के नाम पर विचार कर सकती है। लखनऊ की 3 सीटें, जहां से दावेदारी कर सकती हैं अपर्णा की सियासत लखनऊ के इर्द-गिर्द रही है। महिला आयोग के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलने के बाद भी वो लखनऊ में ज्यादा एक्टिव रहीं। इसलिए माना जा रहा है कि राजधानी की सीटों से वह दावेदारी कर सकती हैं। ऐसी 3 सीट मानी जा रही हैं- 1. लखनऊ मध्य- इस विधानसभा क्षेत्र में हजरतगंज, अमीनाबाद, कैसरबाग जैसे इलाके आते हैं। यहां यादव वोटर्स की अच्छी संख्या है। सपा-भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला होता है। यादव मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन मिलने पर अपर्णा के लिए समीकरण मजबूत हो सकते हैं। क्योंकि भाजपा का कोर वोटर उन्हें वोट करेगा ही। 2022 के चुनाव में सपा से रविदास महरोत्रा विधायक बने थे। 2017 में ब्रजेश पाठक जीते थे। 2. लखनऊ पूर्व- ये सीट परंपरागत रूप से आशुतोष टंडन की रही है। 2024 में उनके निधन के बाद भाजपा के ओपी श्रीवास्तव विधायक बने। यहां गोमतीनगर, इंदिरानगर जैसे इलाके आते हैं। जहां ज्यादातर वोटर बाहर से आकर बसा है। सीट पर ब्राह्मण, कायस्थ, वैश्य और राजपूत मिलाकर 50% से ज्यादा है। पिछले तीन दशकों से भाजपा की सुरक्षित सीट मानी जाती है। भाजपा अगर अपर्णा को यहां से टिकट देती है, तो उनके लिए जीत पक्की मानी जा सकती है। 3. लखनऊ पश्चिम- मुस्लिम और यादव वोटों की बहुलता के कारण ये क्षेत्र सपा का मजबूत माना जाता है। वहीं, कायस्थ, ब्राह्मण और वैश्य मतदाताओं के दम पर भाजपा कड़ा मुकाबला देती है। अभी यहां सपा के अरमान खान विधायक हैं। 2017 में भाजपा के सुरेश श्रीवास्तव ने यहां से जीत दर्ज की थी। अगर यादवों का एक हिस्सा उन्हें चुनता है, तो वो 2017 का इतिहास दोहराते हुए सीट भाजपा के खाते में ला सकती हैं। नए समीकरण- कैंट सीट छोड़ सकते हैं ब्रजेश पाठक लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार आलोक पाठक कहते हैं- अपर्णा ने अगर कहा है कि वो चुनाव लड़ेंगी, तो संकेत साफ है कि वे पार्टी नेताओं से पहले ही चर्चा कर चुकी हैं। खबर ये भी है कि वे लखनऊ कैंट से ही चुनाव लड़ सकती हैं। यहां के मौजूदा विधायक डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक लखनऊ पूर्व या फिर बख्शी का तालाब से चुनाव लड़ सकते हैं। इसलिए वह पिछले कुछ दिनों से भोजपुरी भी बोल रहे हैं, क्योंकि इन दोनों सीटों पर इस तरह की भाषा का प्रभाव है। अब सवाल अपर्णा का है। तो मैं बता दूं कि भाजपा ने कई बार जातिगत और हार-जीत के समीकरणों को दरकिनार करते हुए भी प्रत्याशी उतारे हैं और उन्हें जिताया है। टिकट की दौड़ में अपर्णा के सामने 3 मुश्किलें 1. महिला आयोग में कार्यकाल बढ़ा- अपर्णा यादव यूपी महिला आयोग की उपाध्यक्ष हैं। 2 अक्टूबर को उनका कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया गया। राजनीति के जानकार इसको संकेत की तरह ले रहे हैं कि पार्टी चाहती है, वे आयोग में अच्छा काम करती रहें। 2. चुनाव से पहले किसी सीट पर सक्रिय नहीं- अमूमन टिकट की दौड़ में शामिल चेहरे अपनी संभावित सीट पर सक्रिय हो जाते हैं। क्षेत्र में होने वाले आयोजन में शामिल होने से लेकर जनसंपर्क करने लगते हैं। लेकिन, अपर्णा किसी सीट पर एक्टिव नहीं हैं। 3. खुद का वोटबैंक नहीं- यादव परिवार से संबंध के अलावा अपर्णा का खुद का कोई वोटबैंक नहीं है। अपर्णा जिस सीट से भी दावा करती हैं, उन्हें भाजपा के कोर संगठन का सपोर्ट चाहिए होगा। तभी वे जीत सकती हैं। ‘अपर्णा ने संकेत दिया, वो परिवार के खिलाफ नहीं जाएंगी’ वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- लखनऊ में भाजपा के पास नेताओं की कोई कमी नहीं है। यहां की हर सीट पर 10-10 दावेदार पहले से हैं। कह सकते हैं कि यहां से अपर्णा को टिकट मिलना मुश्किल है। अपर्णा जब भाजपा में शामिल हुई थीं, तो कहा गया कि वह मुलायम परिवार को टारगेट करेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अभी मैनपुरी से चुनाव नहीं लड़ने की बात कही, यानी वह परिवार के खिलाफ नहीं जाएंगी। भाजपा में अपर्णा का सियासी सफर अपर्णा यादव 19 जनवरी 2022 को सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुई थीं। कहा था- मैं प्रधानमंत्री मोदी से प्रभावित रहती थी। उनके काम की प्रशंसा करती हूं। संभावना जताई गई कि अपर्णा को विधानसभा चुनाव- 2022 में टिकट दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी साल मुलायम सिंह यादव के निधन से खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ। सपा ने डिंपल यादव को प्रत्याशी बनाया। भाजपा की तरफ से अपर्णा यादव के नाम की चर्चा चली, लेकिन टिकट रघुराज शाक्य को मिला। कहा गया कि अपर्णा डिंपल के सामने चुनाव नहीं लड़ना चाहती थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी अपर्णा यादव को किसी सीट पर प्रत्याशी नहीं बनाया गया। इस पूरे चुनाव में उन्होंने भाजपा के लिए अलग-अलग सीट पर प्रचार किया। लोकसभा चुनाव के बाद सितंबर, 2024 में अपर्णा को यूपी राज्य महिला आयोग का उपाध्यक्ष बना दिया गया। अब उनका कार्यकाल भी 1 साल के लिए बढ़ा दिया गया है। ——————————- यह खबर भी पढ़ें- पूर्व IAS दिव्या मित्तल कहां से चुनाव लड़ेंगी, मिर्जापुर से ताल ठोकेंगी या राजा भैया के साथ जाएंगी पूर्व IAS ज्यादाारी दिव्या मित्तल राजनीति में कदम रखेंगी। राजा भैया के साथ वायरल तस्वीर और मिर्जापुर में अनुप्रिया पटेल से पुराने विवाद ने सियासी गलियारों में अटकलें तेज कर दी हैं। सपा-कांग्रेस की ओर से उन्हें पार्टी में शामिल होने का ऑफर भी मिल चुका है। इसके बावजूद वो किसी राजनीतिक दल में शामिल नहीं होना चाहतीं। इसके बाद लोगों के जेहन में 3 बड़े सवाल हैं। इनके जवाब सिलसिलेवार जानिए…