माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुए विवाद ने सनातन समाज से लेकर सियासत तक को दो फाड़ कर दिया है। पालकी में गंगा स्नान की जिद, पुलिस के साथ झड़प और फिर बटुकों की पिटाई ने यूपी की सियासत में उबाल ला दिया है। शंकराचार्य का अनशन और मेला प्रशासन की ओर से शंकराचार्य पदवी पर सवाल उठाते हुए दो नोटिस, अब सिर्फ भीड़ प्रबंधन का नहीं रहा, बल्कि धार्मिक सम्मान, प्रशासनिक सख्ती और राजनीतिक खेल का बड़ा केंद्र बन गया है। 7 दिन से यूपी की सियासत भी उबल रही है। इस बार संडे बिग स्टोरी में पढ़िए क्या यह विवाद सिर्फ एक संत और मेला नियमों का टकराव है? क्या शंकराचार्य का पद सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होने के बावजूद ‘शंकराचार्य’ कहलाना सही है? क्या सरकार की छवि को नुकसान पहुंच रहा? विपक्ष को राजनीतिक माइलेज मिल रहा? पहले पढ़िए विवाद… 18 जनवरी को मौनी अमावस्या पर त्रिवेणी स्नान के लिए जाते समय अविमुक्तेश्वरानंद और उनके श्रद्धालुओं का पुलिस-प्रशासन से टकराव हो गया था। पुलिस-प्रशासन का दावा है कि लाखों की भीड़ में अविमुक्तेश्वरानंद पालकी सहित जाने पर अड़े थे, जिससे मेला में अव्यवस्था फैलने का खतरा था। वहीं, अविमुक्तेश्वरानंद का दावा है कि पुलिस-प्रशासन ने उनका अपमान किया। उनके समर्थकों, खासकर बटुकों की चोटी खींचकर पिटाई की गई और उन्हें स्नान करने से रोक दिया गया। तब से अविमुक्तेश्वरानंद घटनास्थल पर ही अनशन पर बैठे हैं। राजनीति के जानकारों का कहना है कि अगर मेला प्रशासन इसे सही ढंग से हैंडल करता तो यह विवाद आगे ही नहीं बढ़ता। लड़ाई पुलिस-प्रशासन और सरकार बनाम अविमुक्तेश्वरानंद
अब यह लड़ाई पुलिस-प्रशासन बनाम अविमुक्तेश्वरानंद की जगह सरकार बनाम अविमुक्तेश्वरानंद की हो गई है। हमने सरकार में बैठे कुछ उच्च पदस्थ अधिकारियों से बात की। समझा कि आखिर सरकार इस मामले का हल क्यों नहीं कर रही? नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि सरकार अपने रुख पर कायम है। वह अपने कदम किसी भी कीमत पर पीछे नहीं खींचने के मूड में नहीं। यही कारण है कि पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता से लेकर खुद यूपी सीएम योगी के बयानों में भी यह साफ दिख रहा। खुद यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार को हरियाणा के एक कार्यक्रम में बिना नाम लिए अविमुक्तेश्वरानंद की कालनेमि से तुलना करते हुए तंज कसा। सरकार के स्तर पर तय किया गया है कि पूरा विवाद मेला प्रशासन और अविमुक्तेश्वरानंद के बीच का था। लेकिन, इसे जानबूझकर सरकार को बदनाम करने के लिए आधार बनाया गया है। सरकार ने तय किया है कि अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला नियमों का उल्लंघन किया है। उन्हें दी गई नोटिस और उसके जवाब के आधार पर आगे की कार्रवाई मेला प्रशासन ही करेगा। सरकार के स्तर पर न तो कोई बयान जारी किया जाएगा और न ही सफाई पेश की जाएगी। इस मामले को जिस तरीके से कांग्रेस-सपा राजनीतिक रंग दे रहे हैं, उसे भी प्रवक्ताओं के माध्यम से साबित करने की कोशिश होगी कि यह पूरा विवाद धार्मिक नहीं, राजनीतिक है। अविमुक्तेश्वरानंद राजनीतिक दलों के मोहरे बन चुके हैं। यही कारण है कि प्रशासन अब तक अविमुक्तेश्वरानंद को दो नोटिस जारी कर चुका है, जो साफ दर्शाता है कि प्रशासन भी अपने स्टैंड पर अडिग है। अविमुक्तेश्वरानंद को माफी से कम पर कुछ भी मंजूर नहीं
उधर, घटना के बाद से अनशन पर बैठे अविमुक्तेश्वरानंद खेमा भी साफ कर चुका है कि जब तक प्रशासन या सरकार की ओर से इस पूरे प्रकरण में माफी नहीं मांगी जाती, तब तक वे अपने कदम पीछे नहीं हटाएंगे। शुक्रवार को उन्हें तेज बुखार ने जकड़ लिया है। फिर भी वे अपने फैसले से पीछे नहीं हटते दिख रहे हैं। अविमुक्तेश्वरानंद खेमे से जुड़े एक सूत्र का दावा है कि कुछ संतों की ओर से समझौते की कोशिश की गई थी, लेकिन शंकराचार्य का पद सनातन में बहुत ही प्रतिष्ठित और सम्मानित है। ऐसे में यदि अविमुक्तेश्वरानंद अपने कदम पीछे करते हैं, तो यह संदेश जाएगा कि सनातन कमजोर पड़ गया। खुद अविमुक्तेश्वरानंद कह चुके हैं कि 2015 में सपा सरकार ने उन पर लाठीचार्ज कराया था, लेकिन बाद में सरकार ने माफी मांगी तो मैंने उन्हें माफ कर दिया। इसी तरह इस बार भी यदि प्रशासन और सरकार अपनी गलती के लिए माफी मांगें और ससम्मान मुझे स्नान के लिए जाने दें, तो मैं अनशन छोड़ने को तैयार हूं। सरकार से टकराव नया नहीं सरकारें, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से क्यों खफा हैं? यह जानने के लिए बैकग्राउंड में जाना जरूरी है। दरअसल, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के दो प्रमुख मुद्दे हैं। पहला- गोमाता को राष्ट्रमाता का दर्जा घोषित करना। दूसरा- गोहत्या करने वालों पर कठोर दंड का प्रावधान। इन दोनों मांगों को लेकर उनका आंदोलन कई साल से जारी है। इसे लेकर वे 10-11 मार्च को दिल्ली में एक बड़ा कार्यक्रम करने जा रहे हैं। इस सम्मेलन में देशभर के प्रमुख धर्माचार्यों से ये पूछा जाएगा कि क्या उन्होंने किसी राजनीतिक दल को आशीर्वाद दे रखा है। अगर आशीर्वाद दे रखा है, तो वो दल गोरक्षा के मुद्दे पर चुप क्यों हैं? कार्यक्रम में चारों पीठ के शंकराचार्य सहित देशभर के साधु-संन्यासी बुलाए गए हैं। मेरठ में कुछ दिन पहले आए अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा था- गोरक्षा के मुद्दे पर किसी भी राजनीतिक दल ने हमें खुलकर समर्थन नहीं दिया। इसके बाद बिहार में हमने गोरक्षकों से चुनाव लड़ने को कहा। ऐसे 198 गोरक्षक/प्रत्याशी बिहार का विधानसभा चुनाव लड़े। इन्हें 5 लाख 86 हजार 13 वोट मिले। यानी एक विधानसभा क्षेत्र से औसत तीन हजार वोट गोरक्षा के नाम पर मिले। अगर इतने पर भी राजनीतिक दल गोरक्षा के लिए कोई कदम नहीं उठाते, तो हम पश्चिम बंगाल और यूपी के विधानसभा चुनाव में भी गोरक्षकों से चुनाव लड़ने के लिए कहेंगे। अविमुक्तेश्वरानंद को राजनीतिक समर्थन भी मिल रहा
अविमुक्तेश्वरानंद को सपा-कांग्रेस की ओर से राजनीतिक समर्थन मिल रहा है। खुद अखिलेश यादव ने फोन कर उनसे बात की है। सपा इस पूरे प्रकरण को सनातन के अपमान से जोड़कर प्रचारित कर रही है और भाजपा को इसके लिए दोषी बता रही है। नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडे भी माघ मेले में स्नान के दौरान उनसे मुलाकात करने गए थे। इसके अलावा माघ मेले में मौजूद सपा से प्रयागराज उत्तरी से प्रत्याशी रह चुके संदीप यादव भी लगातार समर्थन में हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के साथ ही प्रयागराज के सांसद उज्ज्वल रमण सिंह भी अपने पिता रेवती रमण के साथ अविमुक्तेश्वरानंद से मुलाकात कर चुके हैं। कांग्रेस भी लगातार उनके समर्थन में सक्रिय है और बयान दे रही। पहली बार विपक्ष को भाजपा पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाने का मौका मिला है, जिसे वे भुना रहे हैं। संघ और विहिप का स्टैंड- वेट एंड वॉच
विश्व हिंदू परिषद का मानना है कि माघ मेले में इस तरह का विवाद नहीं होना चाहिए था। नियम और कानून सभी के लिए समान हैं। अगर पालकी पर बैठकर संगम तक जाने पर पाबंदी है, तो शंकराचार्य को उसका पालन करना चाहिए था। लेकिन, बटुकों की चोटी खींचने और मारपीट की घटना निंदनीय है। इस तरह की घटनाओं से हिंदुओं की एकता कमजोर होती है। संघ की ओर से भी अब तक इस मामले में कोई बयान नहीं आया है। इसकी वजह यह भी है कि इस पूरे प्रकरण को लेकर संत से लेकर सनातन में आस्था रखने वाले भी बंटे हुए नजर आ रहे। एक बड़ा वर्ग जहां इस विवाद के लिए अविमुक्तेश्वरानंद को दोषी मान रहा, वहीं दूसरा वर्ग पुलिस-प्रशासन के हठ को इस विवाद की वजह बता रहा। एक बड़ा वर्ग मानता है कि एक संत होने के नाते अविमुक्तेश्वरानंद को व्यवस्था का पालन करना चाहिए था। अगर प्रशासन ने पालकी में सवार होकर जाने की अनुमति नहीं दी थी, तो पैदल जाते। विभिन्न पीठ और मठों के संत और महंत भी इस मुद्दे पर उनकी आलोचना कर रहे हैं। हालांकि, इस पूरे मामले में बटुकों की चोटी पकड़कर खींचना और मारपीट के प्रकरण पर सभी एकमत हैं। इसकी निंदा के साथ मारपीट में शामिल पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। सरकार को सिर्फ छवि की चिंता सता रही
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि पहले वाराणसी में मणिकर्णिका घाट पर देवी अहिल्याबाई की मूर्ति तोड़ने का विवाद, फिर प्रयागराज माघ मेले में अविमुक्तेश्वरानंद का अपमान किए जाने के लगातार दो प्रकरणों से सरकार की छवि को धक्का लगा है। पहली बार विपक्ष को भाजपा पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाने का मौका मिला है। दोनों ही प्रकरणों में जिस तरीके से सामान्य लोगों की प्रतिक्रिया आ रही है, उससे भी सरकार की चिंता बढ़नी लाजमी है। सनातन समाज का एक बड़ा वर्ग शंकराचार्य को रोकने और बटुकों की चोटी पकड़कर खींचने को अनुचित बता रहा है। खुद सीएम योगी की छवि फायर ब्रांड हिंदुत्व की है, लेकिन इन घटनाओं से उनकी छवि को भी नुकसान पहुंचा है। यही सरकार की मुख्य चिंता है। यही कारण है कि एक तरफ जहां सीएम योगी इस मामले में सख्त स्टैंड लिए हुए हैं, वहीं उनके साथी डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने संतुलित प्रतिक्रिया देकर इस मसले को खत्म करने का आग्रह किया है। गुरुवार को केशव प्रसाद मौर्य ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पूज्य शंकराचार्य जी के चरणों में प्रणाम करते हुए आग्रह करते हैं कि स्नान करें। किसी भी पूजनीय संत, शंकराचार्य का अनादर करने का प्रावधान नहीं है। यदि किसी ने ऐसा किया होगा, तो जांच कर कार्रवाई करेंगे। केशव का यह बयान हिंदुत्व वोट बैंक को साधने वाला बताया जा रहा है। फिर सुलह का क्या रास्ता होगा? जानकार मानते हैं कि सरकार और अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच बात इतनी बिगड़ गई है कि इसमें अब उच्च स्तर (आरएसएस और भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व) के दखल से ही बात बनेगी। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर भाजपा और संघ में शुरू से ही एक आम धारणा बनी हुई है कि वे विरोध में बोलते हैं। लेकिन इस प्रकरण को लेकर जिस तरीके से विपक्ष भाजपा को हिंदू विरोधी प्रचारित करने में जुटा है, उसे लेकर संघ और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जरूर चिंतित है। यही कारण है कि उसके स्तर से कोई पहल हो सकती है। अब वो दो बड़े मामले, जिसमें अविमुक्तेश्वरानंद फंसे 1– वाराणसी गंगा में मूर्ति विसर्जन को लेकर खाई थीं लाठियां साल- 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण का हवाला देते हुए गंगा नदी में मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाई थी। साधु-संत और आयोजन समिति से जुड़े लोग गणेश मूर्ति गंगा में विसर्जित करने पर ही अड़े थे। वहीं, प्रशासन ने इसके लिए वैकल्पिक कुंड की व्यवस्था की थी। साधु-संत जब पीछे नहीं हटे और 30 घंटे तक प्रदर्शन करते रहे, तब पुलिस ने रात में लाठीचार्ज कर दिया था। इसमें अविमुक्तेश्वरानंद समेत कई लोग घायल हो गए थे। बाद में क्या हुआ? पुलिस ने जबरन मूर्तियों का विसर्जन लक्ष्मी कुंड में करा दिया। इतने पर भी अविमुक्तेश्वरानंद शांत नहीं हुए। उन्होंने पूरी काशी में पुलिस लाठीचार्ज के खिलाफ परिक्रमा की। उन दिनों यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। ये बात जोर-शोर से उछली कि वाराणसी में साधु-संतों पर सपा सरकार ने लाठीचार्ज कराया है। इससे सपा को नुकसान हुआ। अविमुक्तेश्वरानंद अब ये तक कहते हैं कि उस प्रकरण के बाद यूपी से सपा सरकार चली गई थी। 2– शंकराचार्य के पट्टाभिषेक पर विवाद, SC में मामला ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती 11 सितंबर, 2022 को ब्रह्मलीन हो गए थे। 12 सितंबर, 2022 को उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का पट्टाभिषेक हो गया। स्वरूपानंद सरस्वती के दूसरे शिष्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने पट्टाभिषेक रोकने के लिए अदालत में एक अपील दायर की। अक्टूबर, 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने ज्योतिष्पीठ के नए शंकराचार्य के रूप में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी थी। जस्टिस बीआर गवई और बीवी नागरत्ना की बेंच ने ये आदेश तब दिया, जब पुरी के गोवर्धन मठ के शंकराचार्य ने एक हलफनामा दायर किया। जिसमें कहा गया कि उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद को नए शंकराचार्य के रूप में नियुक्त करने का समर्थन नहीं किया। उसी वक्त संन्यासी अखाड़े ने भी उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था। बाद में क्या हुआ? सुप्रीम कोर्ट में साल-2022 से यह केस चल रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती तभी से अपने नाम के साथ शंकराचार्य शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाल ही में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज मेला प्राधिकरण को एक नोटिस का जवाब दिया है। इसमें उन्होंने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया, जिसमें मुझे शंकराचार्य पद पर बने रहने से रोका गया हो। अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ से कई राज्यपालों समेत सरकारों/प्रमुख जनप्रतिनिधियों के वो लेटर दिखाए गए, जिनमें उन्हें शंकराचार्य लिखा कया गया है। 22 जनवरी को ही यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अपने बयान में उन्हें पूज्य शंकराचार्य नाम से संबोधित किया। अब जानिए, इस विवाद पर बड़े संत क्या कहते हैं स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी बोले– अविमुक्तेश्वरानंद ही दोषी श्रीमत परमहंस आश्रम टीकरमाफी महा प्रबंधक स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी कहते हैं कि आज तक कोई भी शंकराचार्य पालकी के साथ संगम स्नान करने नहीं गया है। गंगा तो मां है, मां की गोद में पालकी लेकर नहीं जाया करते। जब सरकार ने माघ मेले के नियम बनाए हैं, तो उनका पालन करना चाहिए था। अनुमति लेकर ही जुलूस या यात्रा निकालनी चाहिए। जहां तक शंकराचार्य की बात है, तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य नहीं हैं, उनका मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। हालांकि, बटुकों के साथ मारपीट करना और उनकी चोटी खींचना गलत था। इसके लिए भी अविमुक्तेश्वरानंद ही दोषी हैं। उन्होंने ही बटुकों को आगे कर विवाद को बढ़ावा दिया। उनके गुरु स्वरूपानंद महाराज श्रद्धा के केंद्र थे, उनके शिष्य होकर भी खुद को कलंकित कर रहे हैं। अफसर गलत, मैं अविमुक्तेश्वरानंद के साथ
डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद ने कहा कि वह 100 प्रतिशत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के साथ हैं। उनके मुताबिक, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रयागराज के पुलिस और प्रशासनिक अफसरों के खिलाफ अपने सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे को बिना वजह अपने ऊपर ले लिया है, जबकि पूरे प्रकरण में गलती अफसरों की है। ————————– ये खबर भी पढ़ें… जिस चोटी को पकड़कर प्रयागराज पुलिस ने पीटा…उसका महत्व क्या? मौनी अमावस्या पर संगम स्नान के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों से कथित बदसलूकी और मारपीट का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। शिष्यों का आरोप है कि पुलिस ने न सिर्फ शंकराचार्य का राजदंड छीना, बल्कि कुछ बटुकों को शिखा (चोटी) पकड़कर घसीटा। उन्हें कमरे में बंद किया और मारपीट की। पढ़िए पूरी खबर…
अब यह लड़ाई पुलिस-प्रशासन बनाम अविमुक्तेश्वरानंद की जगह सरकार बनाम अविमुक्तेश्वरानंद की हो गई है। हमने सरकार में बैठे कुछ उच्च पदस्थ अधिकारियों से बात की। समझा कि आखिर सरकार इस मामले का हल क्यों नहीं कर रही? नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि सरकार अपने रुख पर कायम है। वह अपने कदम किसी भी कीमत पर पीछे नहीं खींचने के मूड में नहीं। यही कारण है कि पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता से लेकर खुद यूपी सीएम योगी के बयानों में भी यह साफ दिख रहा। खुद यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार को हरियाणा के एक कार्यक्रम में बिना नाम लिए अविमुक्तेश्वरानंद की कालनेमि से तुलना करते हुए तंज कसा। सरकार के स्तर पर तय किया गया है कि पूरा विवाद मेला प्रशासन और अविमुक्तेश्वरानंद के बीच का था। लेकिन, इसे जानबूझकर सरकार को बदनाम करने के लिए आधार बनाया गया है। सरकार ने तय किया है कि अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला नियमों का उल्लंघन किया है। उन्हें दी गई नोटिस और उसके जवाब के आधार पर आगे की कार्रवाई मेला प्रशासन ही करेगा। सरकार के स्तर पर न तो कोई बयान जारी किया जाएगा और न ही सफाई पेश की जाएगी। इस मामले को जिस तरीके से कांग्रेस-सपा राजनीतिक रंग दे रहे हैं, उसे भी प्रवक्ताओं के माध्यम से साबित करने की कोशिश होगी कि यह पूरा विवाद धार्मिक नहीं, राजनीतिक है। अविमुक्तेश्वरानंद राजनीतिक दलों के मोहरे बन चुके हैं। यही कारण है कि प्रशासन अब तक अविमुक्तेश्वरानंद को दो नोटिस जारी कर चुका है, जो साफ दर्शाता है कि प्रशासन भी अपने स्टैंड पर अडिग है। अविमुक्तेश्वरानंद को माफी से कम पर कुछ भी मंजूर नहीं
उधर, घटना के बाद से अनशन पर बैठे अविमुक्तेश्वरानंद खेमा भी साफ कर चुका है कि जब तक प्रशासन या सरकार की ओर से इस पूरे प्रकरण में माफी नहीं मांगी जाती, तब तक वे अपने कदम पीछे नहीं हटाएंगे। शुक्रवार को उन्हें तेज बुखार ने जकड़ लिया है। फिर भी वे अपने फैसले से पीछे नहीं हटते दिख रहे हैं। अविमुक्तेश्वरानंद खेमे से जुड़े एक सूत्र का दावा है कि कुछ संतों की ओर से समझौते की कोशिश की गई थी, लेकिन शंकराचार्य का पद सनातन में बहुत ही प्रतिष्ठित और सम्मानित है। ऐसे में यदि अविमुक्तेश्वरानंद अपने कदम पीछे करते हैं, तो यह संदेश जाएगा कि सनातन कमजोर पड़ गया। खुद अविमुक्तेश्वरानंद कह चुके हैं कि 2015 में सपा सरकार ने उन पर लाठीचार्ज कराया था, लेकिन बाद में सरकार ने माफी मांगी तो मैंने उन्हें माफ कर दिया। इसी तरह इस बार भी यदि प्रशासन और सरकार अपनी गलती के लिए माफी मांगें और ससम्मान मुझे स्नान के लिए जाने दें, तो मैं अनशन छोड़ने को तैयार हूं। सरकार से टकराव नया नहीं सरकारें, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से क्यों खफा हैं? यह जानने के लिए बैकग्राउंड में जाना जरूरी है। दरअसल, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के दो प्रमुख मुद्दे हैं। पहला- गोमाता को राष्ट्रमाता का दर्जा घोषित करना। दूसरा- गोहत्या करने वालों पर कठोर दंड का प्रावधान। इन दोनों मांगों को लेकर उनका आंदोलन कई साल से जारी है। इसे लेकर वे 10-11 मार्च को दिल्ली में एक बड़ा कार्यक्रम करने जा रहे हैं। इस सम्मेलन में देशभर के प्रमुख धर्माचार्यों से ये पूछा जाएगा कि क्या उन्होंने किसी राजनीतिक दल को आशीर्वाद दे रखा है। अगर आशीर्वाद दे रखा है, तो वो दल गोरक्षा के मुद्दे पर चुप क्यों हैं? कार्यक्रम में चारों पीठ के शंकराचार्य सहित देशभर के साधु-संन्यासी बुलाए गए हैं। मेरठ में कुछ दिन पहले आए अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा था- गोरक्षा के मुद्दे पर किसी भी राजनीतिक दल ने हमें खुलकर समर्थन नहीं दिया। इसके बाद बिहार में हमने गोरक्षकों से चुनाव लड़ने को कहा। ऐसे 198 गोरक्षक/प्रत्याशी बिहार का विधानसभा चुनाव लड़े। इन्हें 5 लाख 86 हजार 13 वोट मिले। यानी एक विधानसभा क्षेत्र से औसत तीन हजार वोट गोरक्षा के नाम पर मिले। अगर इतने पर भी राजनीतिक दल गोरक्षा के लिए कोई कदम नहीं उठाते, तो हम पश्चिम बंगाल और यूपी के विधानसभा चुनाव में भी गोरक्षकों से चुनाव लड़ने के लिए कहेंगे। अविमुक्तेश्वरानंद को राजनीतिक समर्थन भी मिल रहा
अविमुक्तेश्वरानंद को सपा-कांग्रेस की ओर से राजनीतिक समर्थन मिल रहा है। खुद अखिलेश यादव ने फोन कर उनसे बात की है। सपा इस पूरे प्रकरण को सनातन के अपमान से जोड़कर प्रचारित कर रही है और भाजपा को इसके लिए दोषी बता रही है। नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडे भी माघ मेले में स्नान के दौरान उनसे मुलाकात करने गए थे। इसके अलावा माघ मेले में मौजूद सपा से प्रयागराज उत्तरी से प्रत्याशी रह चुके संदीप यादव भी लगातार समर्थन में हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के साथ ही प्रयागराज के सांसद उज्ज्वल रमण सिंह भी अपने पिता रेवती रमण के साथ अविमुक्तेश्वरानंद से मुलाकात कर चुके हैं। कांग्रेस भी लगातार उनके समर्थन में सक्रिय है और बयान दे रही। पहली बार विपक्ष को भाजपा पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाने का मौका मिला है, जिसे वे भुना रहे हैं। संघ और विहिप का स्टैंड- वेट एंड वॉच
विश्व हिंदू परिषद का मानना है कि माघ मेले में इस तरह का विवाद नहीं होना चाहिए था। नियम और कानून सभी के लिए समान हैं। अगर पालकी पर बैठकर संगम तक जाने पर पाबंदी है, तो शंकराचार्य को उसका पालन करना चाहिए था। लेकिन, बटुकों की चोटी खींचने और मारपीट की घटना निंदनीय है। इस तरह की घटनाओं से हिंदुओं की एकता कमजोर होती है। संघ की ओर से भी अब तक इस मामले में कोई बयान नहीं आया है। इसकी वजह यह भी है कि इस पूरे प्रकरण को लेकर संत से लेकर सनातन में आस्था रखने वाले भी बंटे हुए नजर आ रहे। एक बड़ा वर्ग जहां इस विवाद के लिए अविमुक्तेश्वरानंद को दोषी मान रहा, वहीं दूसरा वर्ग पुलिस-प्रशासन के हठ को इस विवाद की वजह बता रहा। एक बड़ा वर्ग मानता है कि एक संत होने के नाते अविमुक्तेश्वरानंद को व्यवस्था का पालन करना चाहिए था। अगर प्रशासन ने पालकी में सवार होकर जाने की अनुमति नहीं दी थी, तो पैदल जाते। विभिन्न पीठ और मठों के संत और महंत भी इस मुद्दे पर उनकी आलोचना कर रहे हैं। हालांकि, इस पूरे मामले में बटुकों की चोटी पकड़कर खींचना और मारपीट के प्रकरण पर सभी एकमत हैं। इसकी निंदा के साथ मारपीट में शामिल पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। सरकार को सिर्फ छवि की चिंता सता रही
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि पहले वाराणसी में मणिकर्णिका घाट पर देवी अहिल्याबाई की मूर्ति तोड़ने का विवाद, फिर प्रयागराज माघ मेले में अविमुक्तेश्वरानंद का अपमान किए जाने के लगातार दो प्रकरणों से सरकार की छवि को धक्का लगा है। पहली बार विपक्ष को भाजपा पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाने का मौका मिला है। दोनों ही प्रकरणों में जिस तरीके से सामान्य लोगों की प्रतिक्रिया आ रही है, उससे भी सरकार की चिंता बढ़नी लाजमी है। सनातन समाज का एक बड़ा वर्ग शंकराचार्य को रोकने और बटुकों की चोटी पकड़कर खींचने को अनुचित बता रहा है। खुद सीएम योगी की छवि फायर ब्रांड हिंदुत्व की है, लेकिन इन घटनाओं से उनकी छवि को भी नुकसान पहुंचा है। यही सरकार की मुख्य चिंता है। यही कारण है कि एक तरफ जहां सीएम योगी इस मामले में सख्त स्टैंड लिए हुए हैं, वहीं उनके साथी डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने संतुलित प्रतिक्रिया देकर इस मसले को खत्म करने का आग्रह किया है। गुरुवार को केशव प्रसाद मौर्य ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पूज्य शंकराचार्य जी के चरणों में प्रणाम करते हुए आग्रह करते हैं कि स्नान करें। किसी भी पूजनीय संत, शंकराचार्य का अनादर करने का प्रावधान नहीं है। यदि किसी ने ऐसा किया होगा, तो जांच कर कार्रवाई करेंगे। केशव का यह बयान हिंदुत्व वोट बैंक को साधने वाला बताया जा रहा है। फिर सुलह का क्या रास्ता होगा? जानकार मानते हैं कि सरकार और अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच बात इतनी बिगड़ गई है कि इसमें अब उच्च स्तर (आरएसएस और भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व) के दखल से ही बात बनेगी। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर भाजपा और संघ में शुरू से ही एक आम धारणा बनी हुई है कि वे विरोध में बोलते हैं। लेकिन इस प्रकरण को लेकर जिस तरीके से विपक्ष भाजपा को हिंदू विरोधी प्रचारित करने में जुटा है, उसे लेकर संघ और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जरूर चिंतित है। यही कारण है कि उसके स्तर से कोई पहल हो सकती है। अब वो दो बड़े मामले, जिसमें अविमुक्तेश्वरानंद फंसे 1– वाराणसी गंगा में मूर्ति विसर्जन को लेकर खाई थीं लाठियां साल- 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण का हवाला देते हुए गंगा नदी में मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाई थी। साधु-संत और आयोजन समिति से जुड़े लोग गणेश मूर्ति गंगा में विसर्जित करने पर ही अड़े थे। वहीं, प्रशासन ने इसके लिए वैकल्पिक कुंड की व्यवस्था की थी। साधु-संत जब पीछे नहीं हटे और 30 घंटे तक प्रदर्शन करते रहे, तब पुलिस ने रात में लाठीचार्ज कर दिया था। इसमें अविमुक्तेश्वरानंद समेत कई लोग घायल हो गए थे। बाद में क्या हुआ? पुलिस ने जबरन मूर्तियों का विसर्जन लक्ष्मी कुंड में करा दिया। इतने पर भी अविमुक्तेश्वरानंद शांत नहीं हुए। उन्होंने पूरी काशी में पुलिस लाठीचार्ज के खिलाफ परिक्रमा की। उन दिनों यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। ये बात जोर-शोर से उछली कि वाराणसी में साधु-संतों पर सपा सरकार ने लाठीचार्ज कराया है। इससे सपा को नुकसान हुआ। अविमुक्तेश्वरानंद अब ये तक कहते हैं कि उस प्रकरण के बाद यूपी से सपा सरकार चली गई थी। 2– शंकराचार्य के पट्टाभिषेक पर विवाद, SC में मामला ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती 11 सितंबर, 2022 को ब्रह्मलीन हो गए थे। 12 सितंबर, 2022 को उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का पट्टाभिषेक हो गया। स्वरूपानंद सरस्वती के दूसरे शिष्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने पट्टाभिषेक रोकने के लिए अदालत में एक अपील दायर की। अक्टूबर, 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने ज्योतिष्पीठ के नए शंकराचार्य के रूप में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी थी। जस्टिस बीआर गवई और बीवी नागरत्ना की बेंच ने ये आदेश तब दिया, जब पुरी के गोवर्धन मठ के शंकराचार्य ने एक हलफनामा दायर किया। जिसमें कहा गया कि उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद को नए शंकराचार्य के रूप में नियुक्त करने का समर्थन नहीं किया। उसी वक्त संन्यासी अखाड़े ने भी उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था। बाद में क्या हुआ? सुप्रीम कोर्ट में साल-2022 से यह केस चल रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती तभी से अपने नाम के साथ शंकराचार्य शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाल ही में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज मेला प्राधिकरण को एक नोटिस का जवाब दिया है। इसमें उन्होंने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया, जिसमें मुझे शंकराचार्य पद पर बने रहने से रोका गया हो। अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ से कई राज्यपालों समेत सरकारों/प्रमुख जनप्रतिनिधियों के वो लेटर दिखाए गए, जिनमें उन्हें शंकराचार्य लिखा कया गया है। 22 जनवरी को ही यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अपने बयान में उन्हें पूज्य शंकराचार्य नाम से संबोधित किया। अब जानिए, इस विवाद पर बड़े संत क्या कहते हैं स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी बोले– अविमुक्तेश्वरानंद ही दोषी श्रीमत परमहंस आश्रम टीकरमाफी महा प्रबंधक स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी कहते हैं कि आज तक कोई भी शंकराचार्य पालकी के साथ संगम स्नान करने नहीं गया है। गंगा तो मां है, मां की गोद में पालकी लेकर नहीं जाया करते। जब सरकार ने माघ मेले के नियम बनाए हैं, तो उनका पालन करना चाहिए था। अनुमति लेकर ही जुलूस या यात्रा निकालनी चाहिए। जहां तक शंकराचार्य की बात है, तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य नहीं हैं, उनका मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। हालांकि, बटुकों के साथ मारपीट करना और उनकी चोटी खींचना गलत था। इसके लिए भी अविमुक्तेश्वरानंद ही दोषी हैं। उन्होंने ही बटुकों को आगे कर विवाद को बढ़ावा दिया। उनके गुरु स्वरूपानंद महाराज श्रद्धा के केंद्र थे, उनके शिष्य होकर भी खुद को कलंकित कर रहे हैं। अफसर गलत, मैं अविमुक्तेश्वरानंद के साथ
डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद ने कहा कि वह 100 प्रतिशत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के साथ हैं। उनके मुताबिक, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रयागराज के पुलिस और प्रशासनिक अफसरों के खिलाफ अपने सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे को बिना वजह अपने ऊपर ले लिया है, जबकि पूरे प्रकरण में गलती अफसरों की है। ————————– ये खबर भी पढ़ें… जिस चोटी को पकड़कर प्रयागराज पुलिस ने पीटा…उसका महत्व क्या? मौनी अमावस्या पर संगम स्नान के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों से कथित बदसलूकी और मारपीट का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। शिष्यों का आरोप है कि पुलिस ने न सिर्फ शंकराचार्य का राजदंड छीना, बल्कि कुछ बटुकों को शिखा (चोटी) पकड़कर घसीटा। उन्हें कमरे में बंद किया और मारपीट की। पढ़िए पूरी खबर…