कानपुर के मौजूदा पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार की केंद्र में नियुक्ति हुए 1 महीना हो चुका है। इसके बावजूद अखिल कुमार का रिलीव न होना और कानपुर में नए कमिश्नर की तैनाती न होना चर्चा में है। अब महकमे में भी ये बहस शुरू हो गई है कि कानपुर के लिए कोई काबिल पुलिस अफसर सरकार को नहीं मिल रहा। ऐसे में जाे सवाल उठ रहे हैं, उनके जवाब तलाशने जरूरी हैं। सवाल है कि क्या सच में प्रदेश में काबिल पुलिस अफसरों की कमी है? सरकार को भरोसे वाले अफसर नहीं मिल रहे? क्या अखिलेश दुबे प्रकरण की वजह से इसमें देरी हो रही? क्या अखिल कुमार को डीजी बनने तक का इंतजार किया जा रहा? अक्सर विवादों में रहा कानपुर कमिश्नरेट
कानपुर में जब से कमिश्नरेट सिस्टम लागू हुआ, तब से यहां तैनात होने वाले अफसर किसी न किसी विवाद में जरूर रहे। 2021 में जब आयुक्त प्रणाली लागू हुई, तो असीम अरुण पहले पुलिस कमिश्नर बने। लेकिन, 2022 का जब विधानसभा चुनाव आया तो वे खुद भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने पुलिस सेवा से रिटायरमेंट ले लिया। पहले वह विधायक और फिर मंत्री बने। असीम अरुण की जगह विजय सिंह मीना को नया पुलिस कमिश्नर बनाया गया, लेकिन वो भी ज्यादा समय तक नहीं चल सके। कानपुर में हुए बवाल के बाद उन्हें हटा दिया गया। करीब साढ़े 7 महीने वे कानपुर के पुलिस कमिश्नर रहे। पहले उन्हें वेटिंग में भेजा गया, बाद में विशेष जांच और फिर पीटीसी सीतापुर भेज दिया गया। यानी उसके बाद से उनकी गाड़ी पटरी पर नहीं लौटी। उनकी जगह बीपी जोगदंड को भेजा गया। लेकिन, एक साल बाद ही उन्हें भी हटा दिया गया और बाद में वो रिटायर हो गए। बीपी जोगदंड के बाद आरके स्वर्णकार को पुलिस कमिश्नर बनाया गया, लेकिन वे भी अधिक समय तक नहीं चल सके। शिकायत के बाद उन्हें भी वहां से हटा दिया गया। स्वर्णकार के हटने के बाद जब अखिल कुमार को गोरखपुर एडीजी जोन के पद से स्थानांतरित कर कानपुर लाया गया, तो उन्हें विभाग के कील-कांटे दुरुस्त करने में समय लगा। चीजें सामान्य हुईं, तो अखिलेश दुबे का जिन्न बाहर आ गया। यह कानपुर पुलिस के गले की फांस बनता जा रहा है। अखिलेश दुबे प्रकरण तो नहीं बन रहा वजह? कानपुर में नए अफसर की तैनाती न होने को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। उनमें ये भी कहा जा रहा कि अखिलेश दुबे प्रकरण को समाप्त करने की जिम्मेदारी भी अखिल कुमार को दी गई है। इसकी वजह से अभी तक उन्हें केंद्र में नियुक्ति मिलने के बाद भी रिलीव नहीं किया गया है। दरअसल, अखिलेश दुबे के मामले को पुलिस अब शांत करना चाह रही है। कहा ये भी जा रहा है कि पुलिस ने अखिलेश दुबे के खिलाफ आ रही शिकायतों को लेना बंद कर दिया है। शुरुआत मुकदमों के बाद कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। जिन पुलिसकर्मियों का नाम सीधे तौर पर इस घटना में जुड़ा है, उनके खिलाफ भी कोई ऐसी कार्रवाई अब तक नहीं की गई, जो नजीर बने। पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह कहते हैं- अखिलेश दुबे प्रकरण की जांच के लिए प्रदेश स्तर पर अलग से जांच कमेटी बनाई जानी चाहिए। ये पता लगाया जाना चाहिए कि ये पुलिस और अपराधी के गठजोड़ के जो मामले लगातार सामने आ रहे हैं, उनसे कैसे निपटा जाए। केवल इंस्पेक्टर और सीओ को बलि का बकरा बनाने से कुछ नहीं होगा। उन अफसरों के नामों का भी खुलासा होना चाहिए, जो बड़ी रैंक के हैं। बड़े पदों पर बैठे हैं। ये कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले विकास दुबे के मामले में भी पुलिस और अपराधी के गठजोड़ की मिसाल देखी गई थी। महोबा में खनन व्यापारी की हत्या के बाद भी पुलिस और अपराधी के गठजोड़ की बात सामने आई थी। अतीक अहमद के प्रयागराज में हुए मर्डर केस में भी इसकी बानगी देखने को मिली थी। ऐसे में जरूरी है कि इस तरह के गठजोड़ की निष्पक्ष जांच की जाए। जहां तक अखिल कुमार के केंद्र में तैनाती होने के बाद भी जॉइन नहीं करने का सवाल है। इसमें अगर अफसर खुद नहीं जाना चाहता, तो केंद्र सरकार उसे ब्लैकलिस्ट कर सकती है। कमी काबिलियत की या भरोसे की?
यूपी में पुलिस कमिश्नर प्रणाली 2 तरह की काम कर रही है। प्रदेश में कुल 7 जिलों में पुलिस आयुक्त प्रणाली काम कर रही है। इसमें 4 में एडीजी रैंक के अफसर हैं, जबकि 3 जिलों में आईजी रैंक के अफसर पुलिस कमिश्नर की कमान संभाल रहे हैं। इसमें अधिकतर वही अफसर हैं, जिन पर सरकार को भरोसा है। मसलन नोएडा में जब पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हुई, तो उस समय एडीजी रैंक के आलोक सिंह को यहां कमिश्नर बनाया गया। 3 साल बाद जब उनका ट्रांसफर हुआ, तो लखनऊ रेंज की आईजी लक्ष्मी सिंह को पुलिस कमिश्नर बना दिया गया। 2 साल बाद उनका प्रमोशन हो गया, तो एडीजी के तौर पर भी उन्हें पुलिस कमिश्नर की कुर्सी पर बरकरार रखा गया। यानी लगभग 6 साल में केवल एक ही बदलाव नोएडा में हुआ। नोएडा के बाद बने कानपुर पुलिस कमिश्नरेट को अब तक 5 कमिश्नर मिल चुके हैं। छठे की तलाश की जा रही है। यानी नोएडा जैसे भरोसेमंद अफसर कानपुर को अब तक नहीं मिले। ऐसे में अगले पुलिस कमिश्नर की तलाश ठोक-बजा कर की जा रही है, जो हर से परिस्थितियों को समझ सके और मैनेज कर सके। वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं- प्रदेश में काबिल पुलिस अफसरों की कमी नहीं है। बहुत सारे ऐसे अफसर हैं, जो सिर्फ इस बात का दंश झेल रहे हैं कि वे पिछली सरकारों में अहम पोस्ट पर रहे। ऐसे में बात काबिलियत की नहीं, भरोसे की है। अगले महीने डीजी हो जाएंगे अखिल कुमार
कानपुर के मौजूदा पुलिस आयुक्त अखिल कुमार अगले महीने डीजी रैंक में प्रमोशन पा जाएंगे। अभय कुमार प्रसाद इस महीने के आखिर में रिटायर हो रहे हैं। ये भी कहा जा रहा है कि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने से पहले अखिल कुमार यूपी में डीजी रैंक में प्रमोशन लेकर जाना चाहते हैं। अगर ऐसा हुआ तो फिर 1 नवंबर से पहले उनका रिलीव होना मुश्किल ही रहेगा। अगर इससे पहले अखिल कुमार रिलीव होते हैं, तो इसी बैच के डीके ठाकुर 1 नवंबर को डीजी बन जाएंगे। केंद्र में इस पद पर हुई है तैनाती
अखिल कुमार की तैनाती 25 अगस्त, 2025 को केंद्र में डिजिटल इंडिया कॉर्पोरेशन में प्रबंध निदेशक (एमडी) और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के पद पर की गई है। यह सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन है। गृह विभाग ने 29 अगस्त को प्रदेश सरकार को पत्र भेजकर अखिल कुमार को तत्काल केंद्र सरकार के लिए रिलीव करने का आदेश भी दिया था। लेकिन, एक महीने बाद भी उनको रिलीव नहीं किया जा सका। बताया जा रहा है कि डीजीपी स्तर से रिलीविंग की प्रक्रिया एक महीने पहले ही शुरू भी कर दी गई थी। लेकिन, शासन स्तर पर उनकी रिलीविंग की डेट फिक्स नहीं हो सकी है। ————————— ये खबर भी पढ़ें… चंद्रशेखर की गर्लफ्रेंड बोलीं-मेरे पास ऐसे वीडियो, मुंह छिपाता फिरेगा, वह भाजपा का दलाल नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद पर उनकी एक्स गर्लफ्रेंड डॉ. रोहिणी घावरी ने कई सनसनीखेज आरोप लगाए। रोहिणी ने अपने सोशल मीडिया पेज पर 29 मिनट के वीडियो लाइव शेयर किया है। घावरी कहती हैं- चंद्रशेखर भाजपा का दलाल है। वह दलित-मुस्लिम की राजनीति करता है, जिससे बसपा को कमजोर किया जा सके। पढ़िए पूरी खबर…
कानपुर में जब से कमिश्नरेट सिस्टम लागू हुआ, तब से यहां तैनात होने वाले अफसर किसी न किसी विवाद में जरूर रहे। 2021 में जब आयुक्त प्रणाली लागू हुई, तो असीम अरुण पहले पुलिस कमिश्नर बने। लेकिन, 2022 का जब विधानसभा चुनाव आया तो वे खुद भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने पुलिस सेवा से रिटायरमेंट ले लिया। पहले वह विधायक और फिर मंत्री बने। असीम अरुण की जगह विजय सिंह मीना को नया पुलिस कमिश्नर बनाया गया, लेकिन वो भी ज्यादा समय तक नहीं चल सके। कानपुर में हुए बवाल के बाद उन्हें हटा दिया गया। करीब साढ़े 7 महीने वे कानपुर के पुलिस कमिश्नर रहे। पहले उन्हें वेटिंग में भेजा गया, बाद में विशेष जांच और फिर पीटीसी सीतापुर भेज दिया गया। यानी उसके बाद से उनकी गाड़ी पटरी पर नहीं लौटी। उनकी जगह बीपी जोगदंड को भेजा गया। लेकिन, एक साल बाद ही उन्हें भी हटा दिया गया और बाद में वो रिटायर हो गए। बीपी जोगदंड के बाद आरके स्वर्णकार को पुलिस कमिश्नर बनाया गया, लेकिन वे भी अधिक समय तक नहीं चल सके। शिकायत के बाद उन्हें भी वहां से हटा दिया गया। स्वर्णकार के हटने के बाद जब अखिल कुमार को गोरखपुर एडीजी जोन के पद से स्थानांतरित कर कानपुर लाया गया, तो उन्हें विभाग के कील-कांटे दुरुस्त करने में समय लगा। चीजें सामान्य हुईं, तो अखिलेश दुबे का जिन्न बाहर आ गया। यह कानपुर पुलिस के गले की फांस बनता जा रहा है। अखिलेश दुबे प्रकरण तो नहीं बन रहा वजह? कानपुर में नए अफसर की तैनाती न होने को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। उनमें ये भी कहा जा रहा कि अखिलेश दुबे प्रकरण को समाप्त करने की जिम्मेदारी भी अखिल कुमार को दी गई है। इसकी वजह से अभी तक उन्हें केंद्र में नियुक्ति मिलने के बाद भी रिलीव नहीं किया गया है। दरअसल, अखिलेश दुबे के मामले को पुलिस अब शांत करना चाह रही है। कहा ये भी जा रहा है कि पुलिस ने अखिलेश दुबे के खिलाफ आ रही शिकायतों को लेना बंद कर दिया है। शुरुआत मुकदमों के बाद कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। जिन पुलिसकर्मियों का नाम सीधे तौर पर इस घटना में जुड़ा है, उनके खिलाफ भी कोई ऐसी कार्रवाई अब तक नहीं की गई, जो नजीर बने। पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह कहते हैं- अखिलेश दुबे प्रकरण की जांच के लिए प्रदेश स्तर पर अलग से जांच कमेटी बनाई जानी चाहिए। ये पता लगाया जाना चाहिए कि ये पुलिस और अपराधी के गठजोड़ के जो मामले लगातार सामने आ रहे हैं, उनसे कैसे निपटा जाए। केवल इंस्पेक्टर और सीओ को बलि का बकरा बनाने से कुछ नहीं होगा। उन अफसरों के नामों का भी खुलासा होना चाहिए, जो बड़ी रैंक के हैं। बड़े पदों पर बैठे हैं। ये कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले विकास दुबे के मामले में भी पुलिस और अपराधी के गठजोड़ की मिसाल देखी गई थी। महोबा में खनन व्यापारी की हत्या के बाद भी पुलिस और अपराधी के गठजोड़ की बात सामने आई थी। अतीक अहमद के प्रयागराज में हुए मर्डर केस में भी इसकी बानगी देखने को मिली थी। ऐसे में जरूरी है कि इस तरह के गठजोड़ की निष्पक्ष जांच की जाए। जहां तक अखिल कुमार के केंद्र में तैनाती होने के बाद भी जॉइन नहीं करने का सवाल है। इसमें अगर अफसर खुद नहीं जाना चाहता, तो केंद्र सरकार उसे ब्लैकलिस्ट कर सकती है। कमी काबिलियत की या भरोसे की?
यूपी में पुलिस कमिश्नर प्रणाली 2 तरह की काम कर रही है। प्रदेश में कुल 7 जिलों में पुलिस आयुक्त प्रणाली काम कर रही है। इसमें 4 में एडीजी रैंक के अफसर हैं, जबकि 3 जिलों में आईजी रैंक के अफसर पुलिस कमिश्नर की कमान संभाल रहे हैं। इसमें अधिकतर वही अफसर हैं, जिन पर सरकार को भरोसा है। मसलन नोएडा में जब पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हुई, तो उस समय एडीजी रैंक के आलोक सिंह को यहां कमिश्नर बनाया गया। 3 साल बाद जब उनका ट्रांसफर हुआ, तो लखनऊ रेंज की आईजी लक्ष्मी सिंह को पुलिस कमिश्नर बना दिया गया। 2 साल बाद उनका प्रमोशन हो गया, तो एडीजी के तौर पर भी उन्हें पुलिस कमिश्नर की कुर्सी पर बरकरार रखा गया। यानी लगभग 6 साल में केवल एक ही बदलाव नोएडा में हुआ। नोएडा के बाद बने कानपुर पुलिस कमिश्नरेट को अब तक 5 कमिश्नर मिल चुके हैं। छठे की तलाश की जा रही है। यानी नोएडा जैसे भरोसेमंद अफसर कानपुर को अब तक नहीं मिले। ऐसे में अगले पुलिस कमिश्नर की तलाश ठोक-बजा कर की जा रही है, जो हर से परिस्थितियों को समझ सके और मैनेज कर सके। वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं- प्रदेश में काबिल पुलिस अफसरों की कमी नहीं है। बहुत सारे ऐसे अफसर हैं, जो सिर्फ इस बात का दंश झेल रहे हैं कि वे पिछली सरकारों में अहम पोस्ट पर रहे। ऐसे में बात काबिलियत की नहीं, भरोसे की है। अगले महीने डीजी हो जाएंगे अखिल कुमार
कानपुर के मौजूदा पुलिस आयुक्त अखिल कुमार अगले महीने डीजी रैंक में प्रमोशन पा जाएंगे। अभय कुमार प्रसाद इस महीने के आखिर में रिटायर हो रहे हैं। ये भी कहा जा रहा है कि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने से पहले अखिल कुमार यूपी में डीजी रैंक में प्रमोशन लेकर जाना चाहते हैं। अगर ऐसा हुआ तो फिर 1 नवंबर से पहले उनका रिलीव होना मुश्किल ही रहेगा। अगर इससे पहले अखिल कुमार रिलीव होते हैं, तो इसी बैच के डीके ठाकुर 1 नवंबर को डीजी बन जाएंगे। केंद्र में इस पद पर हुई है तैनाती
अखिल कुमार की तैनाती 25 अगस्त, 2025 को केंद्र में डिजिटल इंडिया कॉर्पोरेशन में प्रबंध निदेशक (एमडी) और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के पद पर की गई है। यह सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन है। गृह विभाग ने 29 अगस्त को प्रदेश सरकार को पत्र भेजकर अखिल कुमार को तत्काल केंद्र सरकार के लिए रिलीव करने का आदेश भी दिया था। लेकिन, एक महीने बाद भी उनको रिलीव नहीं किया जा सका। बताया जा रहा है कि डीजीपी स्तर से रिलीविंग की प्रक्रिया एक महीने पहले ही शुरू भी कर दी गई थी। लेकिन, शासन स्तर पर उनकी रिलीविंग की डेट फिक्स नहीं हो सकी है। ————————— ये खबर भी पढ़ें… चंद्रशेखर की गर्लफ्रेंड बोलीं-मेरे पास ऐसे वीडियो, मुंह छिपाता फिरेगा, वह भाजपा का दलाल नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद पर उनकी एक्स गर्लफ्रेंड डॉ. रोहिणी घावरी ने कई सनसनीखेज आरोप लगाए। रोहिणी ने अपने सोशल मीडिया पेज पर 29 मिनट के वीडियो लाइव शेयर किया है। घावरी कहती हैं- चंद्रशेखर भाजपा का दलाल है। वह दलित-मुस्लिम की राजनीति करता है, जिससे बसपा को कमजोर किया जा सके। पढ़िए पूरी खबर…