इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर बनकर तैयार हो चुका है। सावन की शिवरात्रि (11 अगस्त, 2026) को केदारेश्वर मंदिर पर ‘कुंभ अभिषेकम्’ का आयोजन होगा। अखिलेश, पत्नी डिंपल यादव के साथ खुद यहां पूजा करेंगे। उत्तराखंड के केदारनाथ धाम की तर्ज पर तैयार हो रहा यह मंदिर यमुना नदी के किनारे 50 बीघा क्षेत्र में फैला है। मंदिर में रामनवमी पर रामलला की मूर्ति स्थापित करके अखिलेश यादव ने एक बार फिर इसको चर्चा में ला दिया है। जानकार मानते हैं कि अखिलेश मंदिर के जरिए एंटी-हिंदू नरेटिव को कमजोर करना चाहते हैं। खुद को धार्मिक आस्था से जुड़ा नेता दिखाकर भाजपा की बढ़त को चुनौती देना चाहते हैं। पॉलिटिकल एक्सपर्ट कहते हैं- यूपी में पूरी राजनीति हिंदुत्व पर केंद्रित हो चुकी है। ऐसे में सभी दल हिंदुत्व की तरफ सॉफ्ट दिखने की कोशिश कर रहे हैं। सपा की कोशिश भी इसी डायरेक्शन में हो रही है। क्या साफ्ट हिंदुत्व की तरफ शिफ्ट होने में केदारेश्वर मंदिर मददगार साबित होगा? क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में इसका सियासी फायदा होगा? क्या अखिलेश चुनाव से पहले इमेज रि-ब्रांडिंग की कोशिश कर रहे हैं? इस रिपोर्ट में पढ़िए… पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों का ट्रेंड ऐसा रहा है कि सपा को यादव और मुस्लिम वोट मिलते रहे हैं। अखिलेश 9 साल से मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर हैं। वह जानते हैं कि गैर यादव OBC और सामान्य हिंदू वोटर के सपोर्ट के बिना वो 2027 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सकते। यूपी में अखिलेश की छवि कैसे एंटी हिंदू बनी, 3 पॉइंट में समझिए… एक्सपर्ट मानते हैं कि अखिलेश यादव पर मुस्लिम सपोर्टर की छवि एक दिन में नहीं बनी। ऐसा सपा की सोशल इंजीनियरिंग की वजह से हुआ। लंबे समय तक सपा मुस्लिम-यादव वोटबैंक पर टिकी रही। भाजपा ने भी इस नरेटिव को चुनाव कैंपेन के दौरान गढ़ना शुरू किया, सपा पर तुष्टिकरण के आरोप लगाए। 1993 का विधानसभा चुनाव से लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव तक ऐसा ही चल रहा है। भाजपा ने हर बार सपा के एकतरफा यादव-मुस्लिम को दिए जाने वाले समर्थन को प्रमुख मुद्दा बनाया है। 1. मुल्ला-मुलायम की छवि- 90 के दशक में जब राम मंदिर आंदोलन ने जोर पकड़ा। आडवाणी, जोशी और उमा भारती रथ लेकर निकले, तो मुलायम सिंह ने उनका विरोध किया था। मुलायम सिंह ने मुस्लिमों को भरोसा दिलाया कि उनके होते हुए बाबरी मस्जिद पर परिंदा पर नहीं मार सकता। कार सेवकों पर गोली चलाने के बाद उनकी छवि मुल्ला मुलायम की बन गई थी। इसके बाद से सपा को मुस्लिम वोट एकजुट मिलने लगे थे। 2. कैंडिडेट सिलेक्शन और टिकट वितरण- सपा की कई सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने की रणनीति रहती है। भले ये जिताऊ कैंडिडेट पर दांव लगाने की पॉलिटिक्स हो। लेकिन, मैसेज यही जाता है कि सपा कैंडिडेट डिक्लेयर करते वक्त एक खास वर्ग का ध्यान रखती है। 3. मुस्लिम वोट का एकजुट होना- यूपी में मुस्लिम वोट अक्सर “भाजपा को हराने वाले” उम्मीदवार की ओर जाता है। कई चुनावों में यह वोट सपा के पक्ष में एकजुट हुआ। अब समझते हैं कि क्या केदारेश्वर मंदिर अखिलेश की सॉफ्ट हिंदुत्व की छवि को मजबूत करने में मददगार होगा… 90 के दशक से पहले सियासत मुस्लिमों के इर्द-गिर्द, अब ऐसा नहीं
वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश बाजपेई कहते हैं- यूपी की पूरी राजनीति हिंदुत्व पर केंद्रित हो गई है। ऐसे में हिंदुत्व के प्रति सॉफ्ट दिखने की कोशिश हर दल कर रहा है। इसको सिर्फ सपा से जोड़कर देखना गलत होगा। 90 के दशक से पहले राजनीति मुस्लिमों के इर्द-गिर्द रहती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। रहा सवाल मंदिर का, तो इसमें अखिलेश यादव की आस्था हो सकती है। साथ ही खुद को सनातनी हिंदू दिखाने के लिए कहीं न कहीं राजनीति भी शामिल हो सकती है। अगर वो सियासी फायदे के लिए ऐसा कर रहे हैं, तो अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद अखिलेश वहां गए नहीं। उससे बनी धारणा को वो तोड़ देंगे। इसका उन्हें सियासी फायदा मिलेगा। मंदिर के जरिए गैर यादव OBC और सामान्य हिंदू वोटर्स में सेंधमारी
वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं- अब इटावा में मंदिर निर्माण से गैर यादव OBC और सामान्य हिंदू वोटर्स को साधने की कोशिश की जा रही है। मंदिर से इटावा के आसपास के छोटे शहर और ग्रामीण इलाकों का भावनात्मक कनेक्ट बढ़ना तय है। इस मंदिर को भाजपा के मुद्दों पर काउंटर पॉलिटिक्स की तरह देखा जा सकता है। योगी आदित्यनाथ की सरकार में मंदिर, धर्म और सांस्कृतिक मुद्दे प्रमुख रहते हैं। अखिलेश उसी पिच पर खेलकर मुकाबला करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि सपा पर मुस्लिमों का भरोसा रातों-रात बन गया। ऐसा मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में हुए कामों की वजह से बनता चला गया। अब अखिलेश उस विरासत को आगे बढ़ाते दिखते हैं। हालांकि अखिलेश के बारे में कहा जाता है कि वो मुस्लिमों के बारे में खुलकर बोलने से बचते हैं। CAA/NRC, अल्पसंख्यक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उनकी प्रतिक्रिया काफी लेट आई। भाजपा अक्सर सपा पर “तुष्टिकरण” का आरोप लगाती रही है। मंदिर निर्माण से यह धारणा बदलने का प्रयास किया जा रहा है। रामनवमी पर रामलला की मूर्ति लगाई
केदारेश्वर मंदिर का पूरा स्वरूप दिखने लगा है। मंदिर में रामलला की मूर्ति लगाई जा चुकी है। केदारनाथ धाम की तर्ज पर तैयार हो रहा यह मंदिर यमुना नदी के किनारे और लायन सफारी के सामने करीब 50 बीघा जमीन पर तैयार किया गया है। मंदिर का शिलान्यास अखिलेश यादव ने मार्च, 2021 में किया था। शुरू में 40-50 करोड़ रुपए खर्च होने की बात कही गई थी, लेकिन बाद में दायरा बढ़ता गया। मंदिर ट्रस्ट की देख-रेख में 100 से ज्यादा मजदूर और शिल्पकार बचे हुए काम पूरे कर रहे हैं। मुख्य संरचना, गर्भगृह, प्रवेश द्वार, नंदी की विशाल प्रतिमा और आसपास की संरचनाएं तैयार हैं। फिनिशिंग, रंग-रोगन, विद्युत व्यवस्था और सजावट का काम जुलाई, 2026 तक पूरे होने हैं। यहां श्रद्धालु आने लगे हैं, पूजा-पाठ भी हर रोज हो रहा है। विधानसभा चुनाव 2022 में सपा को मिली सीटों का गणित भी देख लीजिए —————————– यह खबर भी पढ़ें – ‘अखिलेश सांसद बनने के बाद कन्नौज नहीं आते’, असीम अरुण बोले- मुझे DM-SP ने 45 मिनट वेट कराया, मैंने उन्हें माफ किया कन्नौज में डीएम-एसपी के नहीं आने पर कार्यक्रम छोड़कर जाने वाले समाज कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण चर्चा में हैं। उन्होंने कहा – ये मेरी व्यक्तिगत बात नहीं है। मुझे 45 मिनट तक वेट करना पड़ा। वहां 100-200 लोगों को भी वेट करना पड़ा, रोज ही ऐसा होता है। पढ़िए पूरी खबर…
वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश बाजपेई कहते हैं- यूपी की पूरी राजनीति हिंदुत्व पर केंद्रित हो गई है। ऐसे में हिंदुत्व के प्रति सॉफ्ट दिखने की कोशिश हर दल कर रहा है। इसको सिर्फ सपा से जोड़कर देखना गलत होगा। 90 के दशक से पहले राजनीति मुस्लिमों के इर्द-गिर्द रहती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। रहा सवाल मंदिर का, तो इसमें अखिलेश यादव की आस्था हो सकती है। साथ ही खुद को सनातनी हिंदू दिखाने के लिए कहीं न कहीं राजनीति भी शामिल हो सकती है। अगर वो सियासी फायदे के लिए ऐसा कर रहे हैं, तो अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद अखिलेश वहां गए नहीं। उससे बनी धारणा को वो तोड़ देंगे। इसका उन्हें सियासी फायदा मिलेगा। मंदिर के जरिए गैर यादव OBC और सामान्य हिंदू वोटर्स में सेंधमारी
वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं- अब इटावा में मंदिर निर्माण से गैर यादव OBC और सामान्य हिंदू वोटर्स को साधने की कोशिश की जा रही है। मंदिर से इटावा के आसपास के छोटे शहर और ग्रामीण इलाकों का भावनात्मक कनेक्ट बढ़ना तय है। इस मंदिर को भाजपा के मुद्दों पर काउंटर पॉलिटिक्स की तरह देखा जा सकता है। योगी आदित्यनाथ की सरकार में मंदिर, धर्म और सांस्कृतिक मुद्दे प्रमुख रहते हैं। अखिलेश उसी पिच पर खेलकर मुकाबला करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि सपा पर मुस्लिमों का भरोसा रातों-रात बन गया। ऐसा मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में हुए कामों की वजह से बनता चला गया। अब अखिलेश उस विरासत को आगे बढ़ाते दिखते हैं। हालांकि अखिलेश के बारे में कहा जाता है कि वो मुस्लिमों के बारे में खुलकर बोलने से बचते हैं। CAA/NRC, अल्पसंख्यक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उनकी प्रतिक्रिया काफी लेट आई। भाजपा अक्सर सपा पर “तुष्टिकरण” का आरोप लगाती रही है। मंदिर निर्माण से यह धारणा बदलने का प्रयास किया जा रहा है। रामनवमी पर रामलला की मूर्ति लगाई
केदारेश्वर मंदिर का पूरा स्वरूप दिखने लगा है। मंदिर में रामलला की मूर्ति लगाई जा चुकी है। केदारनाथ धाम की तर्ज पर तैयार हो रहा यह मंदिर यमुना नदी के किनारे और लायन सफारी के सामने करीब 50 बीघा जमीन पर तैयार किया गया है। मंदिर का शिलान्यास अखिलेश यादव ने मार्च, 2021 में किया था। शुरू में 40-50 करोड़ रुपए खर्च होने की बात कही गई थी, लेकिन बाद में दायरा बढ़ता गया। मंदिर ट्रस्ट की देख-रेख में 100 से ज्यादा मजदूर और शिल्पकार बचे हुए काम पूरे कर रहे हैं। मुख्य संरचना, गर्भगृह, प्रवेश द्वार, नंदी की विशाल प्रतिमा और आसपास की संरचनाएं तैयार हैं। फिनिशिंग, रंग-रोगन, विद्युत व्यवस्था और सजावट का काम जुलाई, 2026 तक पूरे होने हैं। यहां श्रद्धालु आने लगे हैं, पूजा-पाठ भी हर रोज हो रहा है। विधानसभा चुनाव 2022 में सपा को मिली सीटों का गणित भी देख लीजिए —————————– यह खबर भी पढ़ें – ‘अखिलेश सांसद बनने के बाद कन्नौज नहीं आते’, असीम अरुण बोले- मुझे DM-SP ने 45 मिनट वेट कराया, मैंने उन्हें माफ किया कन्नौज में डीएम-एसपी के नहीं आने पर कार्यक्रम छोड़कर जाने वाले समाज कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण चर्चा में हैं। उन्होंने कहा – ये मेरी व्यक्तिगत बात नहीं है। मुझे 45 मिनट तक वेट करना पड़ा। वहां 100-200 लोगों को भी वेट करना पड़ा, रोज ही ऐसा होता है। पढ़िए पूरी खबर…