क्या गानों से भी हटेंगे ठाकुर-ब्राह्मण और यादव:यूपी में कितना खतरनाक है जाति का जहर; चोटी काटकर पिटाई हो जाती है

यूपी सरकार ने जातीय भेदभाव रोकने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अब पुलिस रिकॉर्ड, नोटिस बोर्ड और गिरफ्तारी मेमो में आरोपी की जाति नहीं लिखी जाएगी, बल्कि पिता के साथ मां का नाम दर्ज होगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर जारी इस फैसले के तहत वाहनों पर जाति लिखने, स्टिकर-नारे लगाने और जाति आधारित रैलियों पर भी रोक रहेगी। ऐसे में सवाल ये है कि क्या नए आदेश के तहत जाति आधारित गानों और नारों पर भी रोक लगेगी? पुलिस रिकॉर्ड, गिरफ्तारी मेमो और नोटिस बोर्ड से जाति हटाने का क्या मतलब है? क्या इससे जातीय पहचान के आधार पर होने वाले भेदभाव में कमी आएगी? पुलिस और प्रशासन पर क्या असर होगा? पढ़िए इन सभी सवालों के जवाब भास्कर एक्सप्लेनर में…. पहले ये दो केस पढ़िए… केस 1- इटावा में जून- 2025 में भागवत कथा के दौरान हंगामा हो गया। दरअसल, कथावाचक ब्राह्मण न होकर यादव समुदाय के निकले। इस पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई। कथावाचक से मारपीट की गई। उनकी चोटी काटी और सिर मुंडवा दिया गया। एक महिला के पैरों में नाक रगड़वाई गई और घटना का वीडियो बनाया गया। अगले दिन ब्राह्मण कथावाचक को बुलाकर कथा करवाई गई। केस 2- 21 सितंबर- 2025 को बाराबंकी के मसौली थाना क्षेत्र के डफलियान गांव में अनुसूचित जाति के छात्र के साथ लाइब्रेरी में मारपीट की गई। उसे जातिसूचक गालियां दी गईं। गांव के रहने वाले उदयभान ने आरोप लगाया कि रोज की तरह वह लाइब्रेरी में पढ़ने गए थे। दोपहर करीब 2 बजे लंच टाइम में उनका टिफिन गलती से एक अन्य छात्र प्रद्युम्न शुक्ला के टिफिन से छू गया। इस पर प्रद्युम्न ने जातिसूचक टिप्पणी करते हुए उदयभान का टिफिन फेंक दिया। सवाल: क्या नए आदेश से जाति आधारित गानों प्रतिबंध लगेगा? जवाब: राजनीतिक विशेषज्ञ रतनमणि लाल बताते हैं, पुलिस और कानून से जुड़ी कुछ चीजों जैसे गाने को बैन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होता है। राज्य सरकार गानों पर बैन नहीं लगा सकती। लेकिन, बोर्ड, वाहनों और सार्वजनिक स्थानों पर जाति या पहचान दिखाने वाली सामग्री पर रोक लगाने का अधिकार राज्य के पास है। पिछले दिनों के मामलों जैसे यादव ब्रांड्स, छोरा जाट का ऐसी तमाम चीजों को देखते हुए यह कदम उठाया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य है, पहचान के आधार पर भेदभाव या प्रदर्शन न हो। यह अच्छी पहल है। इसलिए इस पर रोक लगाना उचित है। सवाल: पुलिस रिकॉर्ड, गिरफ्तारी मेमो और नोटिस बोर्ड से जाति हटाने का क्या मतलब? जवाब: रतनमणि लाल के अनुसार, इससे जातीय भेदभाव कम होगा। दरअसल, पुलिस और प्रशासनिक प्रक्रिया में जाति का जिक्र करने से समाज में भेदभाव या पक्षपात बढ़ने की आशंका रहती है। इसके अलावा सार्वजनिक नोटिस और मेमो में जाति लिखने से विवाद या तनाव बढ़ता है। यह कदम सार्वजनिक और प्रशासनिक दस्तावेजों से जाति आधारित पहचान को हटाकर निष्पक्षता और सामाजिक समानता बढ़ाने के लिए लिया गया है। पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह के अनुसार, 1861 से लागू पुलिस एक्ट के तहत पुलिस के दस्तावेज विशेष नियमों के अनुसार होते हैं। अपराधियों और संदिग्धों की हिस्ट्री शीट में 24 कॉलम होते हैं, जिसमें जाति का विवरण जरूरी है। विक्रम सिंह बताते हैं- पहले नोटिफाइड क्रिमिनल ट्राइब्स के लिए विशेष अध्ययन किया जाता था। लेकिन, अब नोटिफाइड क्रिमिनल ट्राइब्स का कॉन्सेप्ट खत्म हो चुका है। इसके बावजूद पुलिस दस्तावेजों में जाति दर्ज करना जरूरी माना जाता है। अगर आप रिसर्च कर रहे हैं या वैज्ञानिक सर्वे कर रहे हैं, तो जाति के बारे में जानना जरूरी है। वह कहते हैं- जेलों में एक ही बिरादरी के तमाम लोग भरे हैं। अगर डॉक्यूमेंटेशन नहीं करेंगे तो किस बिरादरी का कौन है, पहचानना मुश्किल होगा? इससे लोगों को ये कहने का मौका मिलेगा कि डॉक्यूमेंटेशन आपके पास है नहीं और हवा में बातें कर रहे है। इसमें सावधानी बरतने की जरूरत है। सवाल: आरोपी के माता-पिता दोनों के नाम दर्ज करने का नियम क्यों लाया गया? जवाब: आरोपी के माता-पिता दोनों के नाम दर्ज करने का नियम इस वजह से लाया गया है, जिससे व्यक्तिगत पहचान सिर्फ पिता के आधार पर न हो। ज्यादा पारदर्शिता और समानता बनी रहे। केवल पिता का नाम दर्ज करने से कभी-कभी पक्षपात या असमानता का खतरा रहता है। माता-पिता दोनों का नाम होने से डॉक्यूमेंट में व्यक्ति की सही पहचान हो पाती है। यह कदम जातीय या पारिवारिक आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को कम करने के लिए लिया गया है। रतनमणि लाल बताते हैं- आरोपी के माता-पिता दोनों के नाम दर्ज करने का नियम इसलिए भी लाया गया, क्योंकि ऐसा करने से आरोपी के माता-पिता के अलग-अलग जातियों के होने की स्थिति में किसी एक जाति को इंगित करने का कारण नहीं होगा। सवाल: यह आदेश देना क्यों जरूरी पड़ा? जवाब: यूपी सरकार का कहना है कि यह आदेश समानता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के साथ समाज में जातीय विभाजन को कम करने के उद्देश्य से लिया गया है। इसके तहत प्रशासनिक दस्तावेज और सार्वजनिक नोटिस में जाति का उल्लेख नहीं किया जाएगा। जिससे किसी भी तरह के भेदभाव और विवाद से बचा जा सके। पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह बताते है कि पुलिस अपनी तरफ से न जाति पूछती है, न ही पूछेगी। एससी-एसटी एक्ट में जाति पूछी और लिखी जाएगी। पहले से एफआईआर में जाति का जिक्र नहीं होता था। क्राइम रजिस्टर में उम्र, जाति, शिक्षा का एक कॉलम होता है। इस आदेश के मुख्य प्रावधान क्या हैं? 1- सोशल मीडिया पर जाति को बढ़ावा देने पर एक्शन
आदेश के मुताबिक, सोशल मीडिया पर जाति को बढ़ावा देने या किसी जाति की निंदा करने वालों पर भी कार्रवाई होगी। ऐसे पोस्ट करने वालों के खिलाफ पुलिस FIR दर्ज करेगी। सिर्फ उन्हीं मामलों में जाति दर्ज करने की अनुमति होगी, जहां कानूनी बाध्यता है- जैसे कि एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज केस। 2- जाति ​​​आधारित बोर्ड और बैनर भी हटेंगे
कस्बों और शहरों में लगे ऐसे बोर्ड, जिनमें किसी जाति का महिमामंडन किया गया हो, उन्हें तुरंत हटाया जाएगा। आगे से ऐसे बोर्ड लगाने पर सख्ती होगी। 3- गाड़ियों पर जाति लिखकर चलने पर चालान होगा
सड़कों पर कई बार गाड़ियों पर ‘जाट हूं’, ‘ठाकुर साहब’, ‘पंडित जी’ जैसे स्लोगन लिखे दिखते हैं। अब ऐसे वाहनों का मोटर व्हीकल एक्ट के तहत चालान होगा। पुलिस को आदेश है कि ऐसे सभी स्टिकर और नारे हटवाए जाएं। सवाल: समाज और राजनीति पर इसका असर क्या होगा? यूपी सरकार के आदेश के तहत यह फैसला समाज और राजनीति दोनों पर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे जातीय तनाव कम होगा, सामाजिक समानता बढ़ेगी। वहीं, राजनीतिक रूप से यह आदेश जातीय समीकरणों पर प्रभाव डाल सकता है। क्योंकि, कई राजनीतिक दल जातीय पहचान के आधार पर काम करते हैं। सवाल: पुलिस और प्रशासन पर क्या असर होगा? जवाब: विशेषज्ञ बताते हैं, प्रशासन और पुलिस को यह अतिरिक्त जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी कि वह किसी भी जाति आधारित सार्वजनिक प्रदर्शन को रोकें या हटाएं। इसके साथ ही ट्रांसपोर्ट विभाग पर भी काम बढ़ सकता है। पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह का कहना है कि इसका किसी पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन यह आदेश स्वागत योग्य है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… राजा भैया का बेटा बोला-पापा तो साथ रहना चाहते थे, मम्मा ने बिना बताए घर छोड़ा राजा भैया और उनकी पत्नी भानवी सिंह के बीच चल रहे विवाद में उनके बेटे शिवराज सिंह ने बड़ी बात कही है। बेटे ने कहा- दाऊ (राजा भैया) ने मम्मा (भानवी सिंह) के साथ एक छत के नीचे रहना स्वीकार किया। पढ़िए पूरी खबर…