अप्रैल 2022, मुनीराज जी. को गाजियाबाद का SSP बनाया गया। चार्ज संभालते ही ऐसे सभी मामलों की फाइलें निकलवाईं, जो अनसुलझे रह गए थे। उन्हीं में एक फाइल निकली चंद्रवीर सिंह की… गुमशुदगी का मामला था। फाइल पढ़ी तो दिमाग की नसें फड़कने लगी। केस में कई सिरे नजर आए, हादसा… शराब के नशे में दोस्तों से झगड़ा, जमीन का खेल। जांच हुई तो पूरा मामला ही पलट गया। खूनी शादी के तीसरे एपिसोड में कहानी गाजियाबाद के चंद्रवीर और सविता की। 15 साल छोटी बीवी, देवर के प्यार में इतनी पागल हुई कि पति को ही मार दिया। सब ठीक चल रहा था। लोग भूल गए थे, लेकिन 4 साल बाद ऐसे खुला सच… साल 2003, गाजियाबाद का सिकरोड़ गांव। कुछ दिन की बीमारी के बाद चंद्रवीर सिंह की पत्नी की मौत हो गई। घर में अचानक सन्नाटा पसर गया। खेती-किसानी करने वाला चंद्रवीर दिनभर घर से बाहर रहने लगा। कभी देर-सबेर लौटते तो कभी खलिहान या चौपाल पर ही सो जाता। गांव में कानाफूसी शुरू हो गई- “औरत के बिना घर उजाड़ ही रहता है। अब देख लो चंद्रवीर की हालत…।” दोस्त-रिश्तेदार दूसरी शादी के लिए कहने लगे। एक दिन बड़े भाई भूरा सिंह ने चंद्रवीर से कहा- “अब तो गांव में भी बातें होने लगी हैं। ऐसे कब तक चलेगा चंद्रवीर?” चंद्रवीर चुप रहा। नजरें झुकी हुई थीं। भूरा सिंह ने फिर कहा- “घर सूना लगता है, दूसरी शादी कर लो।” चंद्रवीर पहले हिचकिचाया। फिर धीरे से बोला- “कुछ दिन से मैं भी यही सोच रहा हूं, भइया।” भूरा सिंह- “तो फिर देर नहीं करनी चाहिए। दो-एक लोगों ने पूछा था, मैं बात आगे बढ़ाता हूं।” साल 2004, चंद्रवीर की दूसरी शादी हो गई। पत्नी सविता की उम्र काफी कम थी। इस वजह से स्वभाव में थोड़ी चंचलता होना भी लाजिम था। नई दुल्हन के आने से घर में फिर रौनक लौट आई। चंद्रवीर खेत से लौटता तो सविता इंतजार कर रही होती। उसके आते ही चाय-पानी पूछती। एक-दूसरे की सलाह से घर-दुआर का काम चलने लगा। चंद्रवीर की जिंदगी दोबारा पटरी पर आ गई। साल 2006, चंद्रवीर खेत से लौटा तो आंगन में कुछ अलग ही हलचल थी। सविता बार-बार कमरे में जाती, फिर बाहर आती। उसके चेहरे पर अजीब सी चमक थी। चंद्रवीर ने पूछा- “क्या बात है, कुछ हुआ है क्या?” सविता ने पहले कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराती रही। फिर पास आकर धीरे से बोली- “एक बात कहूं…” चंद्रवीर हाथ-मुंह धो रहा था। उसने घूमकर सविता की तरफ देखा। “कहो न, ऐसी क्या बात है?” सविता ने उसकी तरफ देखा, फिर नजरें झुका लीं और धीरे से बोली- “आप पापा बनने वाले हैं।” चंद्रवीर ठिठक गया। थोड़ी देर कुछ बोल नहीं पाया। फिर धीरे से कहा- “सच कह रही हो?” सविता मुस्कुराई, साड़ी का मुंह के सामने लाते हुए बोली- “तो क्या झूठ बोल रही हूं। सोच रही थी कब बताऊं, कैसे बताऊं।” चंद्रवीर बेहद खुश था। भगवान ने उसका घर खुशी से भर दिया था। सविता इठलाते हुए बोली- “अब से ज्यादा देर इधर-उधर मत घूमना।” चंद्रवीर ने मुस्कुराकर कहा- “अब तो काम-धंधा बढ़ाना होगा। और मेहनत करनी पड़ेगी।” चंद्रवीर ने पहली बार महसूस किया कि अब उसका परिवार भी बढ़ रहा है। समय बीतता गया। साल 2013 में सविता दूसरी बार मां बनी। इस बार लड़का हुआ। सविता की जिंदगी पूरी तरह घर और बच्चों के इर्द-गिर्द घूमने लगी। चंद्रवीर खेतों में पहले से ज्यादा वक्त देने लगा। सुबह निकलता और देर शाम तक घर लौटता। साल 2016 में सविता को तीसरा बच्चा हुआ। लेकिन अब चंद्रवीर की आदतें बदलने लगी थीं। मेहनत और जिम्मेदारियों के तनाव में उसने शराब पीना शुरू कर दिया। पहले कभी-कभार, फिर रोजाना। शराब ने उसके स्वभाव में चिड़चिड़ापन भर दिया। कई बार नशे में सविता पर हाथ भी उठा देता। उस दिन चंद्रवीर नशे में धुत होकर देर रात घर लौटा। उससे ठीक से चला भी नहीं जा रहा था। चंद्रवीर ने दरवाजे की कुंडी खटकाई। दरवाजा खुला, सविता गुस्से में सामने खड़ी थी। “इतनी शराब पीकर मत आया करो। बच्चों के सामने अच्छा नहीं लगता।” चंद्रवीर ने घर में घुसते हुए तिरछी नजर डाली। बोला- “अब तू मुझे सिखाएगी?” सविता ने गुस्सा काबू करते हुए कहा- “सिखा नहीं रही हूं। बस समझा रही हूं। अब रोज का हो गया है ये सब…।” चंद्रवीर ठहाका मारकर हंसा। “अपनी कमाई का पीता हूं, तेरे बाप का क्या जाता है।” सविता थाली लाई और चंद्रवीर के सामने पटक दी। उसने घूरकर देखा, उसकी आवाज भारी हो गई। “ज्यादा दिमाग खराब हो रहा है तेरा… रां#% सा@।” सविता का धैर्य जवाब देने लगा था। वो भी तेज आवाज में बोली- “ए… गाली मत दे। दिनभर काम करूं, बच्चे संभालू, फिर तेरी गाली भी सुनूं?” चंद्रवीर ने पानी का गिलास एक ओर फेंक दिया, और चीखकर बोला- “गाली न दूं तो क्या आरती उतारूं तेरी? आदमी को सुकून से रोटी भी न खाने दे रही।” सविता- “आदमी को सुकून तब मिले जब इज्जत से घर आए। गिरता-पड़ता आएगा तो यही मिलेगा।” चंद्रवीर चारपाई से उठकर सविता के नजदीक आ गया। उसका मुंह दबाकर बोला- “बहुत जबान चलने लगी है तेरी…” सविता ने उसका हाथ झटक दिया और उसे धक्का देकर पीछे हटा दिया। अब चंद्रवीर का गुस्सा सातवें आसमान पर था। “हराम@#, कुति%… तेरी इतनी हिम्मत। तू मुझे धक्का देगी।” ताड़… ताड़… ताड़… सविता के मुंह पर तीन-चार थप्पड़ जड़ दिए और हांफता हुआ घर से बाहर चला गया। सविता वहीं कोने में पड़ी रोती रही। सविता अब पूरी तरह अकेली रहने लगी थी। घर की आवाजें चारदीवारी से बाहर जाने लगी थीं। चंद्रवीर का चचेरा भाई अरुण उससे 10 साल छोटा था। वो कभी-कभार मिलने या खेत-खलिहान के काम से घर आता रहता था। चंद्रवीर नशे का आदी हो चुका था। वो दिनभर बाहर रहने लगा। इस दौरान अरुण का आना-जाना कुछ बढ़ गया। शुरू में सब सामान्य था। देवर-भाभी खाली समय में बातचीत करते थे। सविता को लगने लगा कि कोई तो है उससे बात करने के लिए। एक शाम बच्चे घर के बाहर खेल रहे थे। सविता आंगन में कुछ काम कर रही थी। थोड़े-थोड़ी देर में बच्चों को देख भी लेती थी। अरुण सीधे आंगन में चला आया। चारपाई पर बैठते हुए बोला- “भाभी, बच्चे बड़े हो गए हैं।”
सविता ने उदास आवाज में कहा- “हां, और मैं बूढ़ी…।”
अरुण ने हैरानी से देखा- “ऐसा मत कहो।” सविता अपने काम में उलझी हुई थी। उसने पलटकर अरुण की तरफ देखा, बोली- “दिन कब निकल जाता है पता ही नहीं चलता। सुबह उठो, खाना बनाओ, बच्चे संभालो… फिर खाओ-बनाओ, सो जाओ। उस आदमी का कोई ठिकाना नहीं…। कब आएगा, नहीं आएगा, कुछ अता-पता नहीं…।” अरुण- “भाई साब अब रात को भी नहीं आते?” सविता कुछ नहीं बोली। अरुण भी चुप रहा, फिर बोला- “आपको बुरा लगता होगा।” सविता की आवाज तल्ख हो गई- “बुरा… अब आदत हो गई है। पहले डर लगता था, अब गुस्सा आता है।” अरुण ने धीरे से पूछा- “किस बात का डर, भाभी?”
सविता- “इस बात का कि बच्चों के सामने कुछ कर बैठेंगे।”
अरुण- “भाभी, मैं बड़े भाई साब से बात करूंगा। वो उन्हें समझाएंगे।” सविता ने तुरंत बात काट दी, बोली- “कितनी बार समझाया…। अब समझने की उमर निकल गई है।” अरुण ने धीरे से कहा- “आप कभी अपने बारे में नहीं सोचती?” सविता ने हंसकर कहा- “हम औरतों के पास अपने लिए सोचने का वक्त ही कहां है?” इसके बाद अरुण कुछ नहीं बोला। थोड़ी देर बैठा रहा, फिर उठकर घर चला गया। वक्त के साथ अरुण और सविता की बातचीत बढ़ती गई। सविता को उसका साथ अच्छा लगने लगा। साल 2017 आते-आते ये अपनापन सीमाएं लांघने लगा। दोनों एक-दूसरे को चाहने लगे। उधर चंद्रवीर सब देख-समझ रहा था। अरुण कई बार सविता से ऐसा मजाक करता जो चंद्रवीर को पसंद नहीं आता। दोनों का बदलता व्यवहार, हंसी-मजाक, अरुण का बार-बार घर आना शक की गांठ बांध रहा था। चंद्रवीर को लगने लगा था कि घर के भीतर कुछ ऐसा चल रहा है, जो उसकी नजरों से छिपाया जा रहा है। एक शाम चंद्रवीर जल्दी लौट आया। आंगन में पहुंचा तो कमरे में कुछ आहत महसूस हुई। उसके मन में उठ रहा शक सच में बदलने वाला था। उसने बिना कुछ सोचे-समझे कमरे का दरवाजा खोल दिया। सामने के हालात देखकर जैसे उसका दिमाग सुन्न हो गया। सविता और अरुण साथ थे, उसके ही बिस्तर पर। दोनों हड़बड़ा गए। कुछ पल के लिए चंद्रवीर सुन्न खड़ा रह गया। सविता अपने कपड़े सही करते हुए बोली- “सुनो, मैं समझाती हूं…” अरुण घबराकर एक कोने में सिमट गया लेकिन चंद्रवीर की आंखें लाल हो चुकी थीं। वो पागलों की तरह सविता पर टूट पड़ा। उसके बाल पकड़कर घसीटता हुआ आंगन में ले आया। “यही दिन देखने के लिए तुझे ब्याह के लाया था?” सविता रोते हुए बोली- “ऐसा कुछ नहीं है… तुम गलत समझ रहे हो।” चंद्रवीर ने खींचकर एक लात उसकी कमर पर मारी। “मा#@%द रं%$ मुझे पागल समझती है। मुझे कुछ दिखाई नहीं देता क्या।” सविता गिड़गिड़ाई- “बच्चों के सामने ये सब मत करो।” चंद्रवीर चिल्लाया- “अब इन्हीं के सामने होगा। घर की इज्जत मिट्टी में मिला दी।” सहमे हुए बच्चे आंगन के एक कोने में खड़े रो रहे थे। इस बीच मौका पाकर अरुण वहां से भाग निकला। चंद्रवीर ने सविता को खूब पीटा। लात, घूंसे, थप्पड़, जूते… मार-मारकर उसकी गत बिगाड़ दी। सविता अधमरी सी हो गई थी। चंद्रवीर हांफते हुए बोला- “सब खतम हो गया।” इसके बाद गालियां बकता हुआ घर से बाहर चला गया। सविता आंगन में पड़ी रोती रही। उस शाम के बाद घर बदल गया। चंद्रवीर का गुस्सा और कुंठा शराब में डूबने लगी। उसका पीना बढ़ता गया और घर का माहौल जहरीला होता चला गया। मारपीट बढ़ती गई। शराब के नशे में चंद्रवीर का गुस्सा बेलगाम होता जा रहा था। सविता को लगने लगा कि ये सब किसी हादसे पर खत्म होगा। यहीं से वो रात आई, जिसने सब कुछ बदल दिया। 8 सितंबर, 2018 उस रात चंद्रवीर कुछ ज्यादा ही नशे में था। वो लड़खड़ाते कदमों से घर लौटा और आते ही सविता से झगड़ने लगा। सविता की सब्र की सीमा अब जवाब दे चुकी थी। अगले दिन उसने अरुण को पूरी बात बताई। इतना सब होने के बावजूद उसने अरुण से मिलना नहीं छोड़ा था। दोनों ने चंद्रवीर को मारने का ठान लिया था। प्लान बनाया कि चंद्रवीर को शराब में कोई दवा मिलाकर बेहोश कर देंगे और कुएं में गिरा देंगे, लेकिन उस रात चंद्रवीर घर ही नहीं लौटा। पूरी रात खेत पर ही पड़ा रहा। प्लान फेल हो गया। दूसरा प्लान बना, तय हुआ कि जिस दिन चंद्रवीर ज्यादा पीकर लौटेगा, उस दिन देखेंगे। 20 दिन बाद वो रात भी आ गई। 28 सितंबर चंद्रवीर देर रात लौटा। पूरी तरह नशे में धुत था। आंगन में ही चारपाई पर लुढ़क गया। कुछ ही देर में खर्राटों की आवाज आने लगी। बच्चे को कमरे में सो रहे थे। सविता ने बाहर से कुंडी लगा दी और अरुण को फोन किया- “वो आ गया है। आते ही खटिया पर लुढ़क गया।” थोड़ी देर बाद छत पर आहट हुई। अरुण छत के रास्ते घर में घुसा। हाथ में कट्टा था। अरुण ने फुसफुसाकर कुछ कहा। सविता ने हां में सिर हिलाया। अरुण ने कट्टे का बट दोनों हाथों से पकड़ा और नली चंद्रवीर की तरफ कर दी। वो ट्रिगर दबाने ही वाला था कि सविता ने उसे रोक दिया। वो दौड़ते हुए अंदर गई और एक बाल्टी ले आई। जहां चंद्रवीर का सिर था, वहीं खटिया के ठीक नीचे बाल्टी रख दी। अरुण मुस्कुराया, बोला- “ये काम ठीक किया। खून जमीन पर नहीं गिरेगा। सुनो, इसके मुंह पर कपड़ा बांध दो।” सविता ने सवालिया निगाहों से उसकी तरफ देखा। अरुण बोला- “दिवाल पर छींटे नहीं जाएंगे।” सविता के हाथ कांप रहे थे, कहीं चंद्रवीर जाग गया तो…? उसने बच्चों के कपड़ों में से एक कपड़ा उठाया और चंद्रवीर के मुंह पर कपड़ा बांध दिया। जैसे ही उसने हाथ हटाया, एक तेज आवाज गूंजी। गोली सीधे माथे पर लगी। चंद्रवीर की मौके पर ही मौत हो गई। खून बाल्टी में गिरने लगा। करीब डेढ़ घंटे तक दोनों वहीं बैठे रहे। अब लाश को छिपाना था। रात गहरी हो चुकी थी। गांव में सन्नाटा पसरा था। अरुण ने धीमी आवाज में कहा- “सब तैयार है। मैंने पहले ही अपने यहां गड्ढा खोद लिया था। वहीं डाल देंगे इसे…।” अरुण के मां-बाप कुछ साल पहले ही मर चुके थे। वो अकेला रहता था। लाश को अरुण के घर ले जाने की बात सुनकर सविता डर गई। वो चौंककर बोली- “तुमने पहले ही सोच लिया था सब?” अरुण ने नजरें चुरा लीं। “सवाल पूछने का टेम नहीं है। जल्दी करो…।” गांव में पूरी तरह सन्नाटा था। कुत्ते भी सो चुके थे। दोनों ने चंद्रवीर की लाश उठाकर अरुण के घर ले गए। आंगन में गड्ढा खुला पड़ा था। अरुण फुसफुसाया- “जल्दी करो।”
सविता ने बाल्टी की तरफ देखा। “इसका क्या करें?”
अरुण- “सब इसी में डाल देंगे।” लाश को गड्ढे के पास रखते हुए सविता की नजर चंद्रवीर के हाथ पर गई। “रुको…।”
अरुण चौंका- “क्या हुआ?”
सविता कांपती आवाज में बोली- “कड़ा… इस पर उसका नाम लिखा है।” अरुण ने हाथ पकड़ा। दोनों ने पूरी जान लगा दी। कड़ा नहीं निकला। अरुण झुंझला गया। “ये फंस गया है…।” सविता चिढ़ गई थी, बोली- “हाथ ही काट दो।” अरुण ने बांका उठाया और एक झटके में काम हो गया। सविता ने आंखें बंद कर लीं। अरुण ने कटे हाथ को एक कपड़े में बांध लिया। बाकी शरीर गड्ढे में डाल दिया। ऊपर से नमक और दूसरी चीजें डालकर मिट्टी डाल दी। इसके बाद अरुण ने वो कपड़ा उठाया जिसमें हाथ था और बाहर चला गया। कुछ देर बाद वो लौटा। सविता ने पूछा- “उसका क्या किया…?” अरुण- “फेंक आया… केमिकल फैक्ट्री के पीछे।” गड्ढा भरा जा चुका था, फिर भी सविता की घबराहट कम नहीं हुई। उसने कहा- “बदबू आएगी…।” अरुण बोला- “मैं रोज अगरबत्तियां जला दूंगा, कोई बदबू नहीं आएगी।” कुछ दिन अगरबत्तियां जलीं। फिर वहां गाय-भैंस बंधने लगीं, ताकि गोबर और जानवरों की गंध में लगे। कुछ महीनों बाद उस कमरे को पक्का करवा दिया गया। वही कमरा नया बेडरूम बन गया। 29 सितंबर की शाम सविता ने चंद्रवीर के बड़े भाई भूरा सिंह को फोन लगाया। उधर से आवाज आई- “हैलो…।” सविता ने रुलाई और घबराहट भरी आवाज में बोली- “भाई साब, वो कल से लौटे नहीं हैं। खेत का कह कर गए थे।” भूरा सिंह चौंक गया- “क्या मतलब? आखिर कहां जा सकता है।” सविता फिर बोली- “सबेरे खेत पर जाकर देखा। इधर-उधर सबसे पूछा, कुछ पता नहीं चल रहा भाई साब।” भूरा- “ठीक है, मैं आता हूं। कहीं बैठ गया होगा, मिल जाएगा।” भूरा सबसे पहले खेतों की तरफ गया, मजदूरों से पूछा। किसी ने कहा- “कल शाम देखा था, बहुत पी रखी थी।” कोई बोला- “बाजार की तरफ गए थे।” भूरा बाजार भी गया। हर जगह पूछताछ की। कोई पुख्ता जवाब नहीं मिला। रात को चंद्रवीर के घर पहुंचा तो सविता आंगन में बैठी रो रही थी। बच्चे चुप थे। भूरा ने ढांढ़स बंधाया- “घबराओ मत, मिल जाएगा।” अगले कई दिन खोजबीन में निकल गए। भूरा ने रिश्तेदारों को खबर की। आसपास के गांवों में ढूंढ़ा लेकिन हर जगह से हाथ खाली। सविता हर दिन एक ही बात कहती- “भाई साब, मुझे डर लग रहा है। बच्चों का क्या होगा?” करीब एक हफ्ते की खोजबीन के बाद 5 अक्टूबर को भूरा सिंह नंदग्राम थाने पहुंचा। गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई। पुलिस ने आसपास पूछताछ की। “आखिरी बार कब देखे गए, किससे झगड़ा था, कहां जाते थे।” सविता से भी सवाल हुए। बात-बात पर वो रोने लग जाती। पूछताछ आगे बढ़ी तो सविता ने अचानक बात मोड़ दी। उसने कहा- “भाई साब से उन्होंने कई बार कहा था कि घर में दखल न दें। जमीन का झगड़ा भी था।” सिपाही ने नाम पूछा तो उसने बिना हिचक भूरा सिंह का नाम ले दिया। पुलिस ने बयान नोट किया। जांच चलती रही। इसी बीच एक और घटना हुई। जमीन के झगड़े में भूरा के बेटे ने उसको मार दिया। चंद्रवीर के मामले में जांच की रफ्तार धीमी पड़ गई। वक्त बीतता गया। आखिर में पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट लगा दी। केस बंद हो गया। सविता ने राहत की सांस ली। अब वो गांव के औरतों को अपना दुख सुनाती रहती। सब ढाढ़स बंधाते, सहानुभूति जताते। किसी को शक नहीं हुआ। अरुण का घर में आना-जाना रोज का हो गया। गांववालों को उनके रिश्ते की भनक तक नहीं लगी लेकिन बड़ी बेटी सब देख रही थी। एक दिन उसने मां से पूछ लिया- “मम्मी, अरुण चाचा रात में क्यों आते हैं?” सविता चौंक गई। आंखों में डर उतर आया। फिर संभालकर बोली- “ऐसे ही, भइया के काम से आते हैं।” बेटी ने फिर पूछा- “लेकिन मम्मी, वो तब आते हैं जब अंधेरा हो जाता है। दिन में तो नहीं आते।” सविता झुंझला गई। आवाज ऊंची हो गई, बोली- “बहुत सवाल पूछने लगी है आजकल। बच्चों को इतना नहीं बोलना चाहिए।” बेटी फिर भी नहीं रुकी, बोली- “पापा भी रात को खेत से आते थे। अब वो नहीं आते, अरुण चाचा आते हैं।” ये सुनते ही सविता का चेहरा तमतमा गया। उसके भीतर का डर गुस्से में बदल गया। उसने बेटी को कंधे से पकड़ा और आंखें तरेरकर बोली- “चुप कर, फिर से ऐसी बात की तो अच्छा नहीं होगा।” बेटी डर गई। उसकी आंखें भर आईं। फिर मासूमियत से बोली- “मैं तो बस पूछ रही थी मम्मी…।” कुछ देर बाद सविता को एहसास हुआ कि उसने कुछ गलत कर दिया है। उसने बेटी को सीने से लगाया, कहा- “अरुण तेरा चाचा है। उसका हक है कभी भी आने-जाने का। तेरे बाप के जाने के बाद उसी से तो सहारा है।” बेटी चुप हो गई। उस दिन के बाद उसने सवाल पूछना बंद कर दिया। फिर भी सविता पहले जैसी नहीं रही। बेटी के सवाल के बाद उसकी आंखों में अजीब सख्ती उतर आई थी। समय बीतता गया। 4 अप्रैल, 2022 मुनिराज जी. गाजियाबाद में नए एसएसपी बने। चार्ज लेते ही उन सभी मामलों की फाइलें निकलवाईं, जो सुलझ नहीं पाए थे। उन्हीं में एक फाइल थी चंद्रवीर सिंह की। गुमशुदगी का मामला क्राइम ब्रांच को सौंपा गया। केस का जिम्मा इंस्पेक्टर अब्दुर रहमान सिद्दीकी को मिला। रहमान ने पूरी फाइल पढ़ी। उन्हें केस में कई सिरे दिखाई पड़े, हादसा… शराब के नशे में दोस्तों से झगड़ा, भूरा सिंह से जमीन का मामला फिर उसका भी मर्डर। केस खुल चुका था। रहमान ने कुछ और खोजबीन की। शुरुआती जांच में सविता का व्यवहार कुछ अजीब लगा। उन्होंने सोचा चंद्रवीर के बच्चों से चुपचाप बात की जाए, शायद कोई सुराग मिले। चंद्रवीर की बड़ी बेटी शालिनी (बदला हुआ नाम) एक ब्यूटी पार्लर में काम करने लगी थी। एक दिन इंस्पेक्टर रहमान सादे कपड़ों में उस ब्यूटी पार्लर पहुंच गए। काम कर रही लड़कियों ने उन्हें देखा तो चौंक गई। इंस्पेक्टर बोले- “डरिए मत, मैं पुलिस से हूं। उससे कुछ बात करना चाहता हूं।” रहमान ने शालिनी की ओर इशारा किया। उसने नजरें झुका लीं, बोली- “मुझे कुछ नहीं पता।” उन्होंने नरमी से कहा- “तुम्हारे पापा के बारे में बात करनी है। जो पता हो, उतना बता दो।” शालिनी ने बात करने से इनकार कर दिया। कुछ दिन बाद वे फिर आए। उन्होंने बेहद नरमी से बात की, खूब समझाया- “तुम्हें किसी ने डराया है? देखो हम पता लगाना चाहते हैं, तुम्हारे पापा कहां हैं? मैं तुम्हारी मदद करने आया हूं।” बेटी की हिम्मत बढ़ीं। पापा के मिलने की एक उम्मीद दिखी। शालिनी ने बताना शुरू किया- “पापा अचानक गायब हुए थे, खेत गए थे।” इंस्पेक्टर रहमान- “शराब पीकर झगड़ा भी करते थे?”
शालिनी- “हां, मम्मी से अक्सर लड़ाई होती थी, मारते भी थे।”
रहमान- “फिर मम्मी क्या कहती थीं?” इस सवाल पर शालिनी चुप हो गई। फिर अचानक बोली- “पापा के जाने का मम्मी को कोई गम ही नहीं है। पापा जिस टाइम खेत से आते थे। अब उस टाइम अरुण चाचा आते हैं।” रहमान चौंक गए। उन्हें एक नया सुराग मिला था। हैरत से पूछा- “अरुण चाचा…?” शालिनी बोली- “हां… मुझे लगता है मम्मी ने ही कुछ किया है।” इसके बाद पुलिस ने अरुण पर निगरानी शुरू कर दी। वो कहां आता-जाता है, क्या करता है, किससे मिलता है। सारी जानकारी इकट्ठा की। फिर एक दिन उसे थाने बुलाया गया। इंस्पेक्टर ने पूछा- “तू चंद्रवीर के घर अब भी आता-जाता है?” अरुण ने हां में सिर हिलाया, बोला- “मेरा चचेरा भाई था। घर की बात है तो जिम्मेदारी उठानी होगी।” “वाह रे लछमन… इस चक्कर में तूने अब-तक शादी भी नहीं की।” ये सुनते ही अरुण सकपका गया। सवाल बढ़ते गए। उसकी आवाज डगमगाने लगी। शालिनी का बयान सामने रखा गया। आखिरकार अरुण टूट गया। उसने सविता के साथ अपना रिश्ता कुबूल लिया। दबाव बढ़ा तो ये भी बता दिया कि 2017 से दोनों का चक्कर चल रहा था। सविता को भी गिरफ्तार कर लिया गया। अरुण के घर की तलाशी हुई। जिस जगह चंद्रवीर की लाश दबाई गई थी, उस पर कमरा बन चुका था। खुदाई हुई तो इंसानी अस्थि-पंजर बरामद हुआ। DNA टेस्टिंग से साबित हो गया, कंकाल चंद्रवीर का है। वो बाल्टी भी मिली जिसमें चंद्रवीर का खून इकट्ठा किया था। वो कट्टा जिससे हत्या हुई और बांका जिससे चंद्रवीर का हाथ काटा था। गए। मामले में पुलिस चार्जशीट दायर कर चुकी है। फिलहाल मामला कोर्ट में है और ट्रायल चल रहा है। *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल *** रेफरेंस जर्नलिस्ट- आशुतोष गुप्ता, लोकेश राय, रोहित सिंह भास्कर टीम ने सीनियर जर्नलिस्ट्स, पुलिस, पीड़ितों और जानकारों से बात करने के बाद सभी कड़ियों को जोड़कर ये स्टोरी लिखी है। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है। ———————————————————- सीरीज की ये स्टोरीज भी पढ़ें… वो तड़प रही थी और पति फोन पर चीखें सुन रहा था; प्लान परफेक्ट था, एक टी-शर्ट से पकड़ा गया 27 जुलाई 2014, कानपुर। रात के करीब साढ़े बारह बजे थे। एक युवक बदहवास हाल में स्वरूपनगर थाने पहुंचा। आंसू थम नहीं रहे थे। आवाज में हकलाहट थी। उसने बताया- कुछ बाइक सवार उसकी पत्नी को कार समेत उठा ले गए। पूरी स्टोरी पढ़ें… हथौड़े से पति का सिर फोड़ा, बेटा जागा तो गला दबा दिया; मर्डर से पहले और बाद प्रेमी के साथ सोई 1 जनवरी 2016 की सुबह, गोरखपुर। एक औरत लगातार दरवाजा पीट रही थी। घर में रेनोवेशन का काम चल रहा था। आवाज मजदूरों तक पहुंची तो उन्होंने दरवाजा खोला। औरत गुस्से में पैर पटकते हुए, बगल के कमरे में गई। दरवाजा खोलते ही उसके होश उड़ गए। बिस्तर पर पति और 4 साल के बेटे की लाशें पड़ी थीं। पूरी स्टोरी पढ़ें…
सविता ने उदास आवाज में कहा- “हां, और मैं बूढ़ी…।”
अरुण ने हैरानी से देखा- “ऐसा मत कहो।” सविता अपने काम में उलझी हुई थी। उसने पलटकर अरुण की तरफ देखा, बोली- “दिन कब निकल जाता है पता ही नहीं चलता। सुबह उठो, खाना बनाओ, बच्चे संभालो… फिर खाओ-बनाओ, सो जाओ। उस आदमी का कोई ठिकाना नहीं…। कब आएगा, नहीं आएगा, कुछ अता-पता नहीं…।” अरुण- “भाई साब अब रात को भी नहीं आते?” सविता कुछ नहीं बोली। अरुण भी चुप रहा, फिर बोला- “आपको बुरा लगता होगा।” सविता की आवाज तल्ख हो गई- “बुरा… अब आदत हो गई है। पहले डर लगता था, अब गुस्सा आता है।” अरुण ने धीरे से पूछा- “किस बात का डर, भाभी?”
सविता- “इस बात का कि बच्चों के सामने कुछ कर बैठेंगे।”
अरुण- “भाभी, मैं बड़े भाई साब से बात करूंगा। वो उन्हें समझाएंगे।” सविता ने तुरंत बात काट दी, बोली- “कितनी बार समझाया…। अब समझने की उमर निकल गई है।” अरुण ने धीरे से कहा- “आप कभी अपने बारे में नहीं सोचती?” सविता ने हंसकर कहा- “हम औरतों के पास अपने लिए सोचने का वक्त ही कहां है?” इसके बाद अरुण कुछ नहीं बोला। थोड़ी देर बैठा रहा, फिर उठकर घर चला गया। वक्त के साथ अरुण और सविता की बातचीत बढ़ती गई। सविता को उसका साथ अच्छा लगने लगा। साल 2017 आते-आते ये अपनापन सीमाएं लांघने लगा। दोनों एक-दूसरे को चाहने लगे। उधर चंद्रवीर सब देख-समझ रहा था। अरुण कई बार सविता से ऐसा मजाक करता जो चंद्रवीर को पसंद नहीं आता। दोनों का बदलता व्यवहार, हंसी-मजाक, अरुण का बार-बार घर आना शक की गांठ बांध रहा था। चंद्रवीर को लगने लगा था कि घर के भीतर कुछ ऐसा चल रहा है, जो उसकी नजरों से छिपाया जा रहा है। एक शाम चंद्रवीर जल्दी लौट आया। आंगन में पहुंचा तो कमरे में कुछ आहत महसूस हुई। उसके मन में उठ रहा शक सच में बदलने वाला था। उसने बिना कुछ सोचे-समझे कमरे का दरवाजा खोल दिया। सामने के हालात देखकर जैसे उसका दिमाग सुन्न हो गया। सविता और अरुण साथ थे, उसके ही बिस्तर पर। दोनों हड़बड़ा गए। कुछ पल के लिए चंद्रवीर सुन्न खड़ा रह गया। सविता अपने कपड़े सही करते हुए बोली- “सुनो, मैं समझाती हूं…” अरुण घबराकर एक कोने में सिमट गया लेकिन चंद्रवीर की आंखें लाल हो चुकी थीं। वो पागलों की तरह सविता पर टूट पड़ा। उसके बाल पकड़कर घसीटता हुआ आंगन में ले आया। “यही दिन देखने के लिए तुझे ब्याह के लाया था?” सविता रोते हुए बोली- “ऐसा कुछ नहीं है… तुम गलत समझ रहे हो।” चंद्रवीर ने खींचकर एक लात उसकी कमर पर मारी। “मा#@%द रं%$ मुझे पागल समझती है। मुझे कुछ दिखाई नहीं देता क्या।” सविता गिड़गिड़ाई- “बच्चों के सामने ये सब मत करो।” चंद्रवीर चिल्लाया- “अब इन्हीं के सामने होगा। घर की इज्जत मिट्टी में मिला दी।” सहमे हुए बच्चे आंगन के एक कोने में खड़े रो रहे थे। इस बीच मौका पाकर अरुण वहां से भाग निकला। चंद्रवीर ने सविता को खूब पीटा। लात, घूंसे, थप्पड़, जूते… मार-मारकर उसकी गत बिगाड़ दी। सविता अधमरी सी हो गई थी। चंद्रवीर हांफते हुए बोला- “सब खतम हो गया।” इसके बाद गालियां बकता हुआ घर से बाहर चला गया। सविता आंगन में पड़ी रोती रही। उस शाम के बाद घर बदल गया। चंद्रवीर का गुस्सा और कुंठा शराब में डूबने लगी। उसका पीना बढ़ता गया और घर का माहौल जहरीला होता चला गया। मारपीट बढ़ती गई। शराब के नशे में चंद्रवीर का गुस्सा बेलगाम होता जा रहा था। सविता को लगने लगा कि ये सब किसी हादसे पर खत्म होगा। यहीं से वो रात आई, जिसने सब कुछ बदल दिया। 8 सितंबर, 2018 उस रात चंद्रवीर कुछ ज्यादा ही नशे में था। वो लड़खड़ाते कदमों से घर लौटा और आते ही सविता से झगड़ने लगा। सविता की सब्र की सीमा अब जवाब दे चुकी थी। अगले दिन उसने अरुण को पूरी बात बताई। इतना सब होने के बावजूद उसने अरुण से मिलना नहीं छोड़ा था। दोनों ने चंद्रवीर को मारने का ठान लिया था। प्लान बनाया कि चंद्रवीर को शराब में कोई दवा मिलाकर बेहोश कर देंगे और कुएं में गिरा देंगे, लेकिन उस रात चंद्रवीर घर ही नहीं लौटा। पूरी रात खेत पर ही पड़ा रहा। प्लान फेल हो गया। दूसरा प्लान बना, तय हुआ कि जिस दिन चंद्रवीर ज्यादा पीकर लौटेगा, उस दिन देखेंगे। 20 दिन बाद वो रात भी आ गई। 28 सितंबर चंद्रवीर देर रात लौटा। पूरी तरह नशे में धुत था। आंगन में ही चारपाई पर लुढ़क गया। कुछ ही देर में खर्राटों की आवाज आने लगी। बच्चे को कमरे में सो रहे थे। सविता ने बाहर से कुंडी लगा दी और अरुण को फोन किया- “वो आ गया है। आते ही खटिया पर लुढ़क गया।” थोड़ी देर बाद छत पर आहट हुई। अरुण छत के रास्ते घर में घुसा। हाथ में कट्टा था। अरुण ने फुसफुसाकर कुछ कहा। सविता ने हां में सिर हिलाया। अरुण ने कट्टे का बट दोनों हाथों से पकड़ा और नली चंद्रवीर की तरफ कर दी। वो ट्रिगर दबाने ही वाला था कि सविता ने उसे रोक दिया। वो दौड़ते हुए अंदर गई और एक बाल्टी ले आई। जहां चंद्रवीर का सिर था, वहीं खटिया के ठीक नीचे बाल्टी रख दी। अरुण मुस्कुराया, बोला- “ये काम ठीक किया। खून जमीन पर नहीं गिरेगा। सुनो, इसके मुंह पर कपड़ा बांध दो।” सविता ने सवालिया निगाहों से उसकी तरफ देखा। अरुण बोला- “दिवाल पर छींटे नहीं जाएंगे।” सविता के हाथ कांप रहे थे, कहीं चंद्रवीर जाग गया तो…? उसने बच्चों के कपड़ों में से एक कपड़ा उठाया और चंद्रवीर के मुंह पर कपड़ा बांध दिया। जैसे ही उसने हाथ हटाया, एक तेज आवाज गूंजी। गोली सीधे माथे पर लगी। चंद्रवीर की मौके पर ही मौत हो गई। खून बाल्टी में गिरने लगा। करीब डेढ़ घंटे तक दोनों वहीं बैठे रहे। अब लाश को छिपाना था। रात गहरी हो चुकी थी। गांव में सन्नाटा पसरा था। अरुण ने धीमी आवाज में कहा- “सब तैयार है। मैंने पहले ही अपने यहां गड्ढा खोद लिया था। वहीं डाल देंगे इसे…।” अरुण के मां-बाप कुछ साल पहले ही मर चुके थे। वो अकेला रहता था। लाश को अरुण के घर ले जाने की बात सुनकर सविता डर गई। वो चौंककर बोली- “तुमने पहले ही सोच लिया था सब?” अरुण ने नजरें चुरा लीं। “सवाल पूछने का टेम नहीं है। जल्दी करो…।” गांव में पूरी तरह सन्नाटा था। कुत्ते भी सो चुके थे। दोनों ने चंद्रवीर की लाश उठाकर अरुण के घर ले गए। आंगन में गड्ढा खुला पड़ा था। अरुण फुसफुसाया- “जल्दी करो।”
सविता ने बाल्टी की तरफ देखा। “इसका क्या करें?”
अरुण- “सब इसी में डाल देंगे।” लाश को गड्ढे के पास रखते हुए सविता की नजर चंद्रवीर के हाथ पर गई। “रुको…।”
अरुण चौंका- “क्या हुआ?”
सविता कांपती आवाज में बोली- “कड़ा… इस पर उसका नाम लिखा है।” अरुण ने हाथ पकड़ा। दोनों ने पूरी जान लगा दी। कड़ा नहीं निकला। अरुण झुंझला गया। “ये फंस गया है…।” सविता चिढ़ गई थी, बोली- “हाथ ही काट दो।” अरुण ने बांका उठाया और एक झटके में काम हो गया। सविता ने आंखें बंद कर लीं। अरुण ने कटे हाथ को एक कपड़े में बांध लिया। बाकी शरीर गड्ढे में डाल दिया। ऊपर से नमक और दूसरी चीजें डालकर मिट्टी डाल दी। इसके बाद अरुण ने वो कपड़ा उठाया जिसमें हाथ था और बाहर चला गया। कुछ देर बाद वो लौटा। सविता ने पूछा- “उसका क्या किया…?” अरुण- “फेंक आया… केमिकल फैक्ट्री के पीछे।” गड्ढा भरा जा चुका था, फिर भी सविता की घबराहट कम नहीं हुई। उसने कहा- “बदबू आएगी…।” अरुण बोला- “मैं रोज अगरबत्तियां जला दूंगा, कोई बदबू नहीं आएगी।” कुछ दिन अगरबत्तियां जलीं। फिर वहां गाय-भैंस बंधने लगीं, ताकि गोबर और जानवरों की गंध में लगे। कुछ महीनों बाद उस कमरे को पक्का करवा दिया गया। वही कमरा नया बेडरूम बन गया। 29 सितंबर की शाम सविता ने चंद्रवीर के बड़े भाई भूरा सिंह को फोन लगाया। उधर से आवाज आई- “हैलो…।” सविता ने रुलाई और घबराहट भरी आवाज में बोली- “भाई साब, वो कल से लौटे नहीं हैं। खेत का कह कर गए थे।” भूरा सिंह चौंक गया- “क्या मतलब? आखिर कहां जा सकता है।” सविता फिर बोली- “सबेरे खेत पर जाकर देखा। इधर-उधर सबसे पूछा, कुछ पता नहीं चल रहा भाई साब।” भूरा- “ठीक है, मैं आता हूं। कहीं बैठ गया होगा, मिल जाएगा।” भूरा सबसे पहले खेतों की तरफ गया, मजदूरों से पूछा। किसी ने कहा- “कल शाम देखा था, बहुत पी रखी थी।” कोई बोला- “बाजार की तरफ गए थे।” भूरा बाजार भी गया। हर जगह पूछताछ की। कोई पुख्ता जवाब नहीं मिला। रात को चंद्रवीर के घर पहुंचा तो सविता आंगन में बैठी रो रही थी। बच्चे चुप थे। भूरा ने ढांढ़स बंधाया- “घबराओ मत, मिल जाएगा।” अगले कई दिन खोजबीन में निकल गए। भूरा ने रिश्तेदारों को खबर की। आसपास के गांवों में ढूंढ़ा लेकिन हर जगह से हाथ खाली। सविता हर दिन एक ही बात कहती- “भाई साब, मुझे डर लग रहा है। बच्चों का क्या होगा?” करीब एक हफ्ते की खोजबीन के बाद 5 अक्टूबर को भूरा सिंह नंदग्राम थाने पहुंचा। गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई। पुलिस ने आसपास पूछताछ की। “आखिरी बार कब देखे गए, किससे झगड़ा था, कहां जाते थे।” सविता से भी सवाल हुए। बात-बात पर वो रोने लग जाती। पूछताछ आगे बढ़ी तो सविता ने अचानक बात मोड़ दी। उसने कहा- “भाई साब से उन्होंने कई बार कहा था कि घर में दखल न दें। जमीन का झगड़ा भी था।” सिपाही ने नाम पूछा तो उसने बिना हिचक भूरा सिंह का नाम ले दिया। पुलिस ने बयान नोट किया। जांच चलती रही। इसी बीच एक और घटना हुई। जमीन के झगड़े में भूरा के बेटे ने उसको मार दिया। चंद्रवीर के मामले में जांच की रफ्तार धीमी पड़ गई। वक्त बीतता गया। आखिर में पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट लगा दी। केस बंद हो गया। सविता ने राहत की सांस ली। अब वो गांव के औरतों को अपना दुख सुनाती रहती। सब ढाढ़स बंधाते, सहानुभूति जताते। किसी को शक नहीं हुआ। अरुण का घर में आना-जाना रोज का हो गया। गांववालों को उनके रिश्ते की भनक तक नहीं लगी लेकिन बड़ी बेटी सब देख रही थी। एक दिन उसने मां से पूछ लिया- “मम्मी, अरुण चाचा रात में क्यों आते हैं?” सविता चौंक गई। आंखों में डर उतर आया। फिर संभालकर बोली- “ऐसे ही, भइया के काम से आते हैं।” बेटी ने फिर पूछा- “लेकिन मम्मी, वो तब आते हैं जब अंधेरा हो जाता है। दिन में तो नहीं आते।” सविता झुंझला गई। आवाज ऊंची हो गई, बोली- “बहुत सवाल पूछने लगी है आजकल। बच्चों को इतना नहीं बोलना चाहिए।” बेटी फिर भी नहीं रुकी, बोली- “पापा भी रात को खेत से आते थे। अब वो नहीं आते, अरुण चाचा आते हैं।” ये सुनते ही सविता का चेहरा तमतमा गया। उसके भीतर का डर गुस्से में बदल गया। उसने बेटी को कंधे से पकड़ा और आंखें तरेरकर बोली- “चुप कर, फिर से ऐसी बात की तो अच्छा नहीं होगा।” बेटी डर गई। उसकी आंखें भर आईं। फिर मासूमियत से बोली- “मैं तो बस पूछ रही थी मम्मी…।” कुछ देर बाद सविता को एहसास हुआ कि उसने कुछ गलत कर दिया है। उसने बेटी को सीने से लगाया, कहा- “अरुण तेरा चाचा है। उसका हक है कभी भी आने-जाने का। तेरे बाप के जाने के बाद उसी से तो सहारा है।” बेटी चुप हो गई। उस दिन के बाद उसने सवाल पूछना बंद कर दिया। फिर भी सविता पहले जैसी नहीं रही। बेटी के सवाल के बाद उसकी आंखों में अजीब सख्ती उतर आई थी। समय बीतता गया। 4 अप्रैल, 2022 मुनिराज जी. गाजियाबाद में नए एसएसपी बने। चार्ज लेते ही उन सभी मामलों की फाइलें निकलवाईं, जो सुलझ नहीं पाए थे। उन्हीं में एक फाइल थी चंद्रवीर सिंह की। गुमशुदगी का मामला क्राइम ब्रांच को सौंपा गया। केस का जिम्मा इंस्पेक्टर अब्दुर रहमान सिद्दीकी को मिला। रहमान ने पूरी फाइल पढ़ी। उन्हें केस में कई सिरे दिखाई पड़े, हादसा… शराब के नशे में दोस्तों से झगड़ा, भूरा सिंह से जमीन का मामला फिर उसका भी मर्डर। केस खुल चुका था। रहमान ने कुछ और खोजबीन की। शुरुआती जांच में सविता का व्यवहार कुछ अजीब लगा। उन्होंने सोचा चंद्रवीर के बच्चों से चुपचाप बात की जाए, शायद कोई सुराग मिले। चंद्रवीर की बड़ी बेटी शालिनी (बदला हुआ नाम) एक ब्यूटी पार्लर में काम करने लगी थी। एक दिन इंस्पेक्टर रहमान सादे कपड़ों में उस ब्यूटी पार्लर पहुंच गए। काम कर रही लड़कियों ने उन्हें देखा तो चौंक गई। इंस्पेक्टर बोले- “डरिए मत, मैं पुलिस से हूं। उससे कुछ बात करना चाहता हूं।” रहमान ने शालिनी की ओर इशारा किया। उसने नजरें झुका लीं, बोली- “मुझे कुछ नहीं पता।” उन्होंने नरमी से कहा- “तुम्हारे पापा के बारे में बात करनी है। जो पता हो, उतना बता दो।” शालिनी ने बात करने से इनकार कर दिया। कुछ दिन बाद वे फिर आए। उन्होंने बेहद नरमी से बात की, खूब समझाया- “तुम्हें किसी ने डराया है? देखो हम पता लगाना चाहते हैं, तुम्हारे पापा कहां हैं? मैं तुम्हारी मदद करने आया हूं।” बेटी की हिम्मत बढ़ीं। पापा के मिलने की एक उम्मीद दिखी। शालिनी ने बताना शुरू किया- “पापा अचानक गायब हुए थे, खेत गए थे।” इंस्पेक्टर रहमान- “शराब पीकर झगड़ा भी करते थे?”
शालिनी- “हां, मम्मी से अक्सर लड़ाई होती थी, मारते भी थे।”
रहमान- “फिर मम्मी क्या कहती थीं?” इस सवाल पर शालिनी चुप हो गई। फिर अचानक बोली- “पापा के जाने का मम्मी को कोई गम ही नहीं है। पापा जिस टाइम खेत से आते थे। अब उस टाइम अरुण चाचा आते हैं।” रहमान चौंक गए। उन्हें एक नया सुराग मिला था। हैरत से पूछा- “अरुण चाचा…?” शालिनी बोली- “हां… मुझे लगता है मम्मी ने ही कुछ किया है।” इसके बाद पुलिस ने अरुण पर निगरानी शुरू कर दी। वो कहां आता-जाता है, क्या करता है, किससे मिलता है। सारी जानकारी इकट्ठा की। फिर एक दिन उसे थाने बुलाया गया। इंस्पेक्टर ने पूछा- “तू चंद्रवीर के घर अब भी आता-जाता है?” अरुण ने हां में सिर हिलाया, बोला- “मेरा चचेरा भाई था। घर की बात है तो जिम्मेदारी उठानी होगी।” “वाह रे लछमन… इस चक्कर में तूने अब-तक शादी भी नहीं की।” ये सुनते ही अरुण सकपका गया। सवाल बढ़ते गए। उसकी आवाज डगमगाने लगी। शालिनी का बयान सामने रखा गया। आखिरकार अरुण टूट गया। उसने सविता के साथ अपना रिश्ता कुबूल लिया। दबाव बढ़ा तो ये भी बता दिया कि 2017 से दोनों का चक्कर चल रहा था। सविता को भी गिरफ्तार कर लिया गया। अरुण के घर की तलाशी हुई। जिस जगह चंद्रवीर की लाश दबाई गई थी, उस पर कमरा बन चुका था। खुदाई हुई तो इंसानी अस्थि-पंजर बरामद हुआ। DNA टेस्टिंग से साबित हो गया, कंकाल चंद्रवीर का है। वो बाल्टी भी मिली जिसमें चंद्रवीर का खून इकट्ठा किया था। वो कट्टा जिससे हत्या हुई और बांका जिससे चंद्रवीर का हाथ काटा था। गए। मामले में पुलिस चार्जशीट दायर कर चुकी है। फिलहाल मामला कोर्ट में है और ट्रायल चल रहा है। *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल *** रेफरेंस जर्नलिस्ट- आशुतोष गुप्ता, लोकेश राय, रोहित सिंह भास्कर टीम ने सीनियर जर्नलिस्ट्स, पुलिस, पीड़ितों और जानकारों से बात करने के बाद सभी कड़ियों को जोड़कर ये स्टोरी लिखी है। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है। ———————————————————- सीरीज की ये स्टोरीज भी पढ़ें… वो तड़प रही थी और पति फोन पर चीखें सुन रहा था; प्लान परफेक्ट था, एक टी-शर्ट से पकड़ा गया 27 जुलाई 2014, कानपुर। रात के करीब साढ़े बारह बजे थे। एक युवक बदहवास हाल में स्वरूपनगर थाने पहुंचा। आंसू थम नहीं रहे थे। आवाज में हकलाहट थी। उसने बताया- कुछ बाइक सवार उसकी पत्नी को कार समेत उठा ले गए। पूरी स्टोरी पढ़ें… हथौड़े से पति का सिर फोड़ा, बेटा जागा तो गला दबा दिया; मर्डर से पहले और बाद प्रेमी के साथ सोई 1 जनवरी 2016 की सुबह, गोरखपुर। एक औरत लगातार दरवाजा पीट रही थी। घर में रेनोवेशन का काम चल रहा था। आवाज मजदूरों तक पहुंची तो उन्होंने दरवाजा खोला। औरत गुस्से में पैर पटकते हुए, बगल के कमरे में गई। दरवाजा खोलते ही उसके होश उड़ गए। बिस्तर पर पति और 4 साल के बेटे की लाशें पड़ी थीं। पूरी स्टोरी पढ़ें…