खूनी शादी- 5:पति के टुकड़े करके सेप्टिक टैंक में डाला; 4 महीने रिश्तेदारों को धोखा देती रही, अपने भाई की वजह से फंस गई

अब वो अकेला नहीं था। सुबह काम पर निकलता और शाम को घर लौटकर उससे दिनभर की बातें करता। नोक-झोंक, हंसी-मजाक और चाय की चुस्कियां… सब कुछ किसी फिल्म के जैसा था। कभी-कभी उसे काम के सिलसिले में बाहर रुकना पड़ जाता था। तब वो अकेली रह जाती थी। घर में ऐसा कोई नहीं था, जिससे बातचीत करके टाइमपास कर सके। ये शिकायत धीरे-धीरे मन की गांठ बनती चली गई। जब ये गांठ खुली तो सामने उसके शरीर के तीन टुकड़े पड़े थे… खूनी शादी के पांचवें एपिसोड में आज लखनऊ के शिवा और मधु की कहानी। अकेलेपन से निजात के लिए शुरू हुई बातचीत पति के मर्डर की वजह बनी। भाई की वजह से उसकी कातिल बहन पकड़ी गई… साल 2013, बलरामपुर का माहौल शिवा के लिए पहले ही भारी था। पिता की सड़क हादसे में मौत के बाद घर की जिम्मेदारियां अचानक उस पर आ गई थीं। मां सदमे से उबर नहीं पाई। उनकी मानसिक स्थिति खराब होने लगी थी। इन्हीं हालातों के बीच शिवा लखनऊ की एक कंपनी में सेल्स मार्केटिंग की नौकरी कर रहा था। काफी जद्दोजहद के बाद उसे बलरामपुर और आसपास का इलाका मिला था, ताकि वो मां के करीब रह सके। इसी दौरान लखनऊ की मधु अस्थाना से उसका रिश्ता तय हुआ। शादी जल्द ही हो गई। नई शुरुआत की उम्मीद दोनों की आंखों में थी। शादी के बाद शिवा मां और पत्नी को लेकर लखनऊ आ गया। मुंहबोले मामा जनक राज ने रहीमनगर में अपना घर उन्हें रहने के लिए दे दिया। छत मिल गई थी, नौकरी थी, साथ में जीवनसाथी थी। नई शादी की खुशबू, नए सपने और भविष्य को लेकर उम्मीदें थीं। सब कुछ ठीक लग रहा था, जैसे जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही हो। एक शाम शिवा ऑफिस से लौटा। मधु ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी तैयार हो रही थी। शिवा पीछे से गया। मुस्कुराते हुए बोला- “पता है मधु, जब से तुम मेरी जिंदगी में आई हो सब कुछ अपने-आप ठीक होने लगा है।” मधु शर्मा गई। नजरें झुकाकर बोली- “तुम भी ना… बेवजह ऐसी बातें करते रहते हो।” शिवा ने दोनों हाथों से उसके कंधे पकड़े और उसका चेहरा अपनी तरफ घुमाते हुए बोला- “बेवजह नहीं, दिल से कह रहा हूं।” अब शिवा अकेला नहीं था। शिवा को अब भी बलरामपुर जाना पड़ता था। वो सुबह काम पर निकलता और शाम को लौटकर मधु से दिनभर की बातें करता। नोक-झोंक, हंसी-मजाक और चाय की चुस्कियां… सब कुछ किसी फिल्म के जैसा लगता था। कभी-कभी शिवा को बलरामपुर में ही रुकना पड़ जाता था। तब मधु घर पर अकेली रह जाती था। सास की भी दिमागी हालत ठीक नहीं थी, जो उनसे ही बातचीत करके टाइमपास करे। ऐसे ही एक दिन शिवा बलरामपुर जाने की तैयारी कर रहा था। मधु उसे चुपचाप देखती रही। फिर धीरे से बोली- “तुम हर बार मुझे छोड़कर चले जाते हो।” शिवा ने अपना बैग ठीक करते हुए पूछा- “क्यों… क्या हुआ?” मधु उदास होकर बोली- “घर में अकेले रहना अच्छा नहीं लगता। सब सूना-सूना लगता है।” शिवा उसके पास गया। प्यार से उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर बोला- “लेकिन काम भी तो जरूरी है न… नहीं जाऊंगा तो घर कैसे चलेगा।” मधु कुछ नहीं बोली, बस चुपचाप नजरें फेर लीं, लेकिन ये शिकायत धीरे-धीरे मन की गांठ बनती चली गई। वक्त के साथ शिकायत बढ़ने लगी। बातों की कमी झगड़ों का कारण बनने लगी। इसी बीच मधु दो बार मां बनने वाली थी। उम्मीदें जगीं, लेकिन घर आई खुशियां चौखट से ही लौट गईं। दोनों बार डिलिवरी के वक्त बच्चे की मौत हो गई। मां बनने सपना टूटा तो मधु के भीतर का दर्द और गहरा होता चला गया। शिवा की मौसी का घर भी पास ही था। उन्होंने एक लड़का गोद लिया था, नाम था नीरज। एक दिन नीरज अचानक शिवा के घर पहुंचा। शिवा कमरे में मधु के साथ बैठा बातें कर रहा था। शिवा ने नीरज को देखा तो खुश होकर बोला- “अरे नीरज, बहुत दिन बाद दिखाई दिए। इधर भी चक्कर लगाया करो यार… और क्या हालचाल हैं?” नीरज मुस्कुराते हुए कमरे के अंदर आ गया। बोला- “हां दादा, सब बढ़िया है।” दोनों बातचीत करते रहे। मधु चाय बनाने चली गई। वो चाय बनाकर लाई तो शिवा ने मधु की तरफ देखकर कहा- “मधु, नीरज सिर्फ मेरा भाई नहीं, दोस्त भी है।” मधु ने मुस्कुराकर चाय का कप नीरज को पकड़ाया। चाय की चुस्की लेते हुए नीरज बोला- “वाह भाभी, चाय तो बहुत बढ़िया बनाई है आपने।” मधु शिकायती लहजे में बोली- “चलो, किसी को तो अच्छी लगी। आपके भइया तो कभी तारीफ ही नहीं करते।” नीरज, शिवा को छेड़ते हुए बोला- “इतनी अच्छी पत्नी मिली है दादा आपको, तारीफ तो बनती है।” कुछ देर हंसी-मजाक के बाद नीरज चला गया। दो दिन बाद नीरज फिर शिवा के घर आया। इस बार शिवा घर पर नहीं था। कमरे का दरवाजा खोला तो सामने मधु थी, अकेली। नीरज- “नमस्ते भाभी, कैसी हैं आप?”
मधु- “मैं ठीक हूं भइया, आप बताइए…।” नीरज कुर्सी पर बैठते हुए बोला- “दादा तो बाहर ही गए होंगे। अकेले रहना कितना खलता होगा आपको… मौसी का भी होना न होना बराबर ही है।” मधु ने बिना कुछ कहे बस सिर हिला दिया। दोनों बैठ गए। बातें लंबी होती चली गईं- घर, मोहल्ला, शिवा और अकेलापन। थोड़ी देर बाद नीरज बोला- “भाभी, ये मेरा नंबर रख लीजिए। कभी कुछ जरूरत पड़े तो बता दीजिएगा। या किसी से बातचीत करने का मन करे तो कॉल कर लीजिएगा।” मधु को नीरज की बातों से लगा, चलो कोई तो है जो उसे सुनता है। उसी रात मधु के नंबर पर एक कॉल आई। उधर से आवाज आई- “ भाभी मैं नीरज बोल रहा हूं।”
मधु- “हां, बताइए।” नीरज- “ये मेरा नंबर है, सोचा याद दिला दूं। पता नहीं आपने नंबर सेव किया होगा या नहीं।” मधु हंसते हुए बोली- “मैं सेव कर लेती हूं।” फोन कट गया। अब नीरज का शिवा के घर आना-जाना बढ़ने लगा। मधु को भी नीरज की बातें अच्छी लगने लगीं। वो भी अब उसके आने का इंतजार करने लगी थी। इधर कुछ दिन बीत गए, लेकिन नीरज नहीं आया। एक दिन मधु ने नीरज को फोन किया। “हैलो नीरज… बहुत दिन हो गए, इधर आए नहीं।” नीरज- “कुछ काम में फंसा था।” मधु थोड़ा झिझकते हुए बोली- “आज घर आ जाओ… अच्छा नहीं लग रहा।” थोड़ी देर बाद नीरज आ गया। मधु चाय लेकर आई और चुहल करते हुए बोली- “इतने दिन से कहां गायब थे नीरज बाबू…” नीरज चुप रहा। मधु ने फिर कहा- “क्या हुआ… ” नीरज ने अचानक मधु का हाथ थाम लिया और धीमी आवाज में बोला- “नहीं… बस… आप मुझे अच्छी लगने लगी हैं।” मधु ने हाथ छुड़ा लिया। फिर घबराते हुए बोला- “म… मतलब?” नीरज- “मुझे आप अच्छी लगने लगी है या शायद… आपसे प्यार हो गया है मुझे…।” कुछ देर के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया। दोनों चुप थे। थोड़ी देर बाद नीरज उठा और चला गया। उसके जाने के बाद मधु सोच में डूब गई- ‘उसे भी तो नीरज का आना, उसकी बातें… अच्छी लगने लगी थीं।’ तभी मधु का फोन बजा और उसका ध्यान बंटा। शिवा का फोन था। “मधु, आज मैं घर नहीं आ पाऊंगा। तुम अपना और मम्मी का ध्यान रखना।” शिवा की बात को सुनकर मधु को न गुस्सा आया और न ही उसने कोई शिकायत थी। उसका मन तो अब कहीं और भटक चुका था। कुछ देर बाद उसने हिम्मत करके नीरज को फोन किया। नीरज घर आया। मधु अलमारी से कुछ निकाल रही थी। इससे पहले कि वो कुछ कह पाती, नीरज ने उसे पीछे से अपने बाहों में जकड़ लिया। उस पल वक्त जैसे रुक गया। मधु सब कुछ भूल गई- डर, सही-गलत, दुनिया…। कमरे की लाइट बुझ गई और कहानी ने एक ऐसा मोड़ ले लिया, जहां से वापसी आसान नहीं थी। इधर, शिवा इन सब बातों से अनजान और बेखबर था। वो जब भी बाहर जाता मधु, नीरज को फोन करके बुला लेती और फिर आया वो दिन…। 16 अक्टूबर, 2016 करवाचौथ से तीन दिन पहले शिवा घर लौटा। मेन गेट खोलते ही बोला- “मधु…” कोई जवाब नहीं आया। शिवा ने बरामदे में जूते उतारे, बैग रखा और अंदर की ओर बढ़ा। तभी उसके बेडरूम से हल्की फुसफुसाहट की आवाज आई। शिवा कुछ देर रुक गया। उसने धीरे से दरवाजा खोलकर देखा और कुछ ही पल में उसकी दुनिया थम गई। मधु और नीरज एक साथ थे… उसके ही बेडरूम में। कुछ देर शिवा वहीं खड़ा रहा। फिर उसने झटके से कमरे का दरवाजा खोल दिया। मधु घबराकर पीछे हट गई और कांपती आवाज में बोली- “आप… आप गलत समझ रहे हैं।” शिवा ने गुस्से में मधु के मुंह पर दो-तीन तमाचे जड़ दिए। फिर बोला- “गलत… अपनी आंखों से देख रहा हूं मैं। मेरी पीठ पीछे तुम लोग ये सब…” फिर नीरज की तरफ गुस्से में देखते हुए बोला- “तू मेरे ही घर में, मेरी बीवी के साथ… ये सब कर रहा था। आज मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगा।” इतना कहकर शिवा ने नीरज की तरफ हाथ उठाया ही था कि नीरज ने शिवा को जोर से धक्का दे दिया। शिवा फर्श पर गिर पड़ा। नीरज के चेहरे पर अजीब सा डर था। मधु की तरफ देखकर बोला- “इसका काम तमाम करना पड़ेगा, वरना ये सबको बता देगा।” मधु ने भी हां में सिर हिलाया और शिवा की छाती पर चढ़कर बैठ गई। शिवा डर गया। वो बोला- “देखो, ऐसा मत करो… मधु तुम बात सुनो मेरी” लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। मधु जोर से शिवा का गला दबाने लगी। नीरज ने शिवा के पैर पकड़ लिए। कुछ ही पलों में शिवा की आवाज घुटने लगी। वो छटपटा रहा था। टूटती आवाज में मधु का नाम लेने की कोशिश कर रहा था- “मअअअ…” और फिर सन्नाटा, शिवा की लाश फर्श पर पड़ी थी। आवाज के नाम पर सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। कुछ देर बाद मधु बुदबुदाई- “मैंने… मैंने ये क्या कर दिया… अब… अब क्या करेंगे?” मधु को अब अपने किए पर पछतावा हो रहा था। वो बौखला सी गई थी। नीरज ने उसे संभाला और बोला- “लाश को ठिकाने लगाना होगा। अगर ऐसा नहीं किया तो जेल में सड़ना होगा।” कमरे का माहौल भारी था। शिवा की लाश फर्श पर पड़ी थी। इन सब बातों से अनजान शिवा की मां दूसरे कमरे में सो रही थी। दिमाग शांत करने के लिए मधु और नीरज घर से बाहर चले गए। करीब पांच घंटे बाद दोनों घर लौटे और लाश को ठिकाने लगाने का सोचने लगे। तभी नीरज ने कहा- “इसे सेप्टिक टैंक में डाल देते हैं, किसी को पता नहीं चलेगा।” मधु को ये आइडिया ठीक लगा, लेकिन पूरी लाश टैंक में नहीं डाल सकते थे। दोनों ने फैसला किया कि बॉडी के टुकड़े करने होंगे। नीरज ने पूछा- “बांका रखा है क्या?” मधु ने हां में सिर हिलाया और स्टोर रूम से बांका उठा लाई। दोनों कमरे में गए, बॉडी फर्श पर पड़ी थी। ‘मौसेरे भाई’ नीरज ने पहला वार शिवा की गर्दन पर किया। एक झटके में सिर, धड़ से अलग हो गया। इसके बाद कमर पर कई वार किए, तब कहीं जाकर निचला हिस्सा अलग हुआ। बॉडी के तीन टुकड़े हो चुके थे। सभी टुकड़े अलग-अलग पॉलिथीन में पैक किए। आधी रात से ज्यादा हो चुकी थी। नीरज कमरे से बाहर आया। सैप्टिक टैंक का ढक्कन सील नहीं था। नीरज ने धीरे से ढक्कन हटाया। मधु एक पॉलिथीन लेकर बाहर आई। उसमें शिवा का सिर था। नीरज ने उसके हाथ से पॉलिथीन ली और टैंक में डाल दी। बाकी दो टुकड़े नीरज उठाकर लाया और टैंक में डाल दिए। इसके बाद कमरे में फैले खून को दोनों ने मिलकर साफ किया। फिर नीरज अपने घर चला और मधु कमरे में जाकर सो गई। सब कुछ नॉर्मल दिनों की तरह चल रहा था। 19 अक्टूबर, करवाचौथ का दिन… मोहल्ले में चहल-पहल थी। हर घर में औरतें सज-संवर रही थीं। सबकी निगाहें आसमान पर टिकी थीं, लेकिन चांद था कि निकलने का नाम नहीं ले रहा था। मधु ने भी व्रत रखा था। लाल साड़ी, बिंदी, सिंदूर, पांव में महावर कुछ वैसा ही, जैसा एक सुहागन अपने पति की लंबी उम्र के लिए करती है। अचानक पटाखों की आवाज आने लगी। चांद निकल आया था। मधु ने पूजा की। सब कुछ नॉर्मल लग रहा था, जैसे कुछ हुआ ही न हो। दिन बीतने लगे… शिवा कई दिनों से ऑफिस नहीं पहुंचा। उसका फोन भी लगातार बंद आ रहा था। करीब एक महीने बाद, 10 नवंबर, 2016 मधु के पास उसके भाई मोहित का फोन आया। उसने पूछा- “दीदी… जीजा जी का फोन नहीं लग रहा है। कई दिन से कोशिश कर रहा हूं।” मधु ने आराम से जवाब दिया- “काम में बिजी होंगे या शायद नेटवर्क ही नहीं मिल रहा होगा।” मोहित- “लेकिन दीदी पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ। जीजा जी इतने दिन बिना बताए कहीं नहीं रहते।” मधु ने कुछ इधर-उधर की बात करके किसी तरह मोहित को समझा दिया। मोहित को कुछ ठीक नहीं लग रहा था। उसने तुरंत शिवा के मुंहबोले मामा जनकराज को फोन किया। वो लखनऊ के इंदिरानगर में रहते थे। “नमस्ते मामा जी, मोहित बोल रहा हूं…।” जनकराज- “हां मोहित, क्या हाल-चाल हैं?” मोहित- “मैं तो ठीक हूं मामा जी, लेकिन जीजा जी का कुछ पता नहीं चल रहा।” जनकराज- “क्या मतलब…?” मोहित- “वो कई दिन से घर नहीं लौटे हैं। ऑफिस भी नहीं गए, फोन भी बंद आ रहा है।” जनकराज- “अरे ये तो दिक्कत वाली बात है। मैं तो ट्रेन में हूं, राजस्थान जा रहा हूं। बांसवाड़ा में कुछ काम है। तुम ऐसा करो, तुरंत रिपोर्ट दर्ज कराओ।” मोहित- “ठीक है मामा जी… मैं दीदी को लेकर साथ थाने चला जाऊंगा।” इतना कहकर उसने फोन रख दिया। मोहित ने मधु को फोन करके पुलिस में शिकायत दर्ज कराने को कहा तो वो घबरा गई। उसने मोहित से कहा- “तुम्हें आने की जरूरत नहीं है। मैं खुद थाने चली जाऊंगी।” इसके बाद भी मधु दो दिन तक थाने नहीं गई। जब उसे लगा कि बिना कंप्लेंट किए बात नहीं बनेगी, तब 12 नवंबर को मंडियांव थाने पहुंची। वहां बताया कि उसका पति शिवा सक्सेना कई दिनों से लापता है। दरोगा ने लिखित शिकायत देने को कहा, जिससे FIR दर्ज हो सके। मधु ने लिखित शिकायत नहीं दी और घर लौट आई। मोहित और जनकराज को फोन करके कह दिया कि कंप्लेंट दे दी है। दिन गुजरने लगे। जब भी किसी का फोन आता, मधु यही कह देती कि पुलिस जांच कर रही है। इधर नीरज का भी घर में आना-जाना जारी था। दोनों ने मान लिया था कि मामला इसी तरह निपट जाएगा। आखिरकार तीन महीने बाद जनकराज राजस्थान से लौटे। अगले दिन रहीमनगर वाले मकान पर पहुंचे और मधु से पूरी जानकारी ली। जब उन्होंने कंप्लेंट की कॉपी मांगी तो मधु बोली, कॉपी तो है ही नहीं। जनकराज थाने पहुंचे। पता चला कि मधु ने शिवा की गुमशुदगी के बारे में बताया था, लेकिन लिखित शिकायत नहीं दी थी। आखिरकार, 25 फरवरी, 2017 को जनकराज ने शिवा की मिसिंग कंप्लेंट दर्ज कराई। पुलिस ने जांच की। शिवा का नंबर ट्रेस किया गया। पता चला शिवा कि आखिरी लोकेशन लखनऊ में ही थी। दरोगा नागेश मिश्रा ने मधु को थाने बुलाया, पूछताछ हुई। मधु की बातचीत से उन्हें कुछ शक हुआ। पड़ोसियों से पूछताछ हुई। एक ने बताया- “शिवा भइया तो कई महीने ने नहीं दिखे। करवाचौथ वाले दिन भाभी ने व्रत किया था, लेकिन भइया उस दिन भी नहीं थे।” पुलिस का शक बढ़ता जा रहा था। पति 4 महीने से गायब और मधु ने कोई कंप्लेंट ही नहीं कराई। पड़ोसियों ने नीरज के अक्सर घर आने की भी बात कही। पुलिस ने नीरज से पूछताछ की, लेकिन कोई अहम सुराग हाथ नहीं लगा। मधु के भाई मोहित को भी अपनी दीदी पर शक हो रहा था। वो जब भी उससे शिवा के बारे में पूछता था तो मधु यही कहती वो बाहर गया है। एक दिन वो मधु के घर पहुंचा। उसने बहन को पास में बैठाया और पूछा- “दीदी, सच-सच बताओ… आखिर हुआ क्या है?” मधु ने टालते हुए कहा- “मतलब… तुम कहना क्या चाह रहे हो?” मोहित- “अनजान मत बनो। तुम जानती हो मैं क्या पूछ रहा हूं। सच-सच बताओ जीजा कहां है?” मधु ने काफी देर इधर-उधर की बात की। जब उसे लगा कि वो घिर गई है तो बोली- “मैं सब बताती हूं, लेकिन तुम किसी से कहना मत। मैं और नीरज एक-दूसरे को पसंद करने लगे थे। एक दिन उन्होंने हम दोनों को साथ देख लिया और फिर…” मोहित सन्न रह गया। “क्याआआआ… तब लाश… लाश कहां है?”
मधु धीमी आवाज में बोली- “घर में ही है, सेप्टिक टैंक में…।”
फिर मोहित की तरफ उम्मीद के साथ देखते हुए बोली- “तुम मेरा साथ दोगे न भाई?” मोहित बिना कुछ बोले बाहर निकल गया। वो सीधे थाने पहुंचा और पूरी सच्चाई पुलिस को बता दी। मधु को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन नीरज फरार हो चुका था। पुलिस ने जब पहली बार उससे पूछताछ की थी तो उसे लग गया था कि आज नहीं तो कल सच बाहर आ ही जाएगा। वो इससे पहले ही कहीं गायब हो चुका था। मधु ने शुरुआती आनाकानी के बाद सब कबूल कर लिया। इसके बाद बारी आई लाश रिकवर करने की। पुलिस नगर निगम की टीम के साथ शिवा के घर पहुंची। मकान के बाहरी हिस्से में बना सेप्टिक टैंक खोला गया। मोहल्लेवाले छतों से झांककर देख रहे थे। शिवा की लाश के टुकड़े बरामद हुए। 4 महीने बाद बॉडी ‘लोथड़ों’ में बदल चुकी थी। साल 2023, लखनऊ सेशन कोर्ट ने फैसला सुनाया। मधु को उम्रकैद हुई। उस पर 35 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया, जबकि नीरज अब तक फरार है। *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल *** रेफरेंस जर्नलिस्ट- छोट लाल वर्मा, नवल कांत सिन्हा, आदित्य तिवारी भास्कर टीम ने सीनियर जर्नलिस्ट्स और केस से जुड़े जानकारों से बात करने के बाद सभी कड़ियों को जोड़कर ये स्टोरी लिखी है। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है।