गाजीपुर में सीधे नदी में बहा रहे लाशें:गंगा और शिव की नगरी में नहाने लायक नहीं पानी, ओझला, अस्सी और वरुणा बनीं नाला

गंगा गंगोत्री से निकल कर बंगाल की खाड़ी में समुद्र में समाती है। ऐसे में सवाल है कि उनका निवास स्थान कहां है? पुराण में खुद मां गंगा इस प्रश्न का जवाब देते हुए कहती हैं- जहां विंध्य पर्वत से गंगा का मिलन होता है, वहीं पर मैं निवास करती हूं। यूपी में मिर्जापुर जिले की यही पहचान है। लेकिन, हम लोग उनके निवास स्थल को भी कचरे से पाट रहे हैं। वाराणसी में तो गंगा इतनी प्रदूषित हो चुकी हैं कि उनका जल नहाने लायक भी नहीं बचा है। मणिकर्णिका घाट पर दिन-रात जलते शवों का अधजला हिस्सा इसी गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। गाजीपुर में तो कुछ गांव के लोग अपनों की मृत्यु के बाद सीधे गंगा में प्रवाहित कर देते हैं। जबकि बिहार बॉर्डर से पहले बलिया में गंगा का जलस्तर इतना कम हो चुका है कि लोग पैदल पार कर जा रहे थे। गंगा यात्रा के पार्ट-4 में आपने बिजनौर से प्रयागराज तक गंगा के विविध और बिगड़ते स्वरूप को देखा। यात्रा के आखिरी पड़ाव में आज करीब 320 किलोमीटर प्रयागराज से बलिया के सफर पर चलते हैं… प्रयागराज से 120 किमी की यात्रा कर हम मिर्जापुर पहुंचे
मिर्जापुर को गंगा का निवास स्थान माना जाता है। विंध्याचल धाम बनने के बाद से यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। हम यहां पहुंचे, तो मंदिर में दर्शनार्थियों की लंबी लाइन लगी थी। खैर, हम यहां से सीधे नीचे की सीढ़ियों से होते हुए गंगा घाट तक पहुंचे। वहां हमारी मुलाकात गंगा आरती के संस्थापक रामानंद तिवारी से हुई। उन्होंने गंगा और विंध्याचल से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताओं के बारे में बताया। गयाघाट पर श्रीराम ने पिता दशरथ का किया था पिंडदान
रामानंद तिवारी बताते हैं- विंध्याचल से 5 किमी आगे प्रयागराज की ओर कर्णावती नदी का गंगा में संगम होता है। यहां अमावस्या के दिन स्नान करने से ब्रह्महत्या जैसा पाप भी धुल जाता है। बड़ी संख्या में लोग यहां अमावस्या पर नहाने आते हैं। शिवपुर के पास गयाघाट है। इसे श्रीराम घाट के रूप में भी जाना जाता है। भगवान राम पिता दशरथ का पिंडदान करने यहीं पर आए थे। आज भी मान्यता है कि गया से पहले पिंडदान यहीं पर किया जाता है। श्रीराम, सीता और हनुमान के पैरों के निशान यहां आज भी मौजूद हैं। यहीं पर भगवान राम ने रामेश्वरम शिवलिंग की स्थापना की थी। ये रामेश्वरम शिवलिंग की प्रतिकृति में है। विंध्याचल मंदिर के पीछे गंगा नदी के बीच में हमें एक शिवलिंग दिखा। रामानंद तिवारी ने बताया कि ये शिवलिंग काफी प्राचीन समय से स्थापित है। कोई भी 365 दिन लगातार इस शिवलिंग का अभिषेक नहीं कर पाता। बारिश के 4 महीनों में ये नदी में डूबे रहते हैं। नाविक चंद्रिका उर्फ कल्लू ने बताया कि विध्यांचल मंदिर के पास गंगा के तट पर एक किमी की लंबाई में नया घाट का निर्माण चल रहा है। इस निर्माणाधीन घाट के बगल में ही एक नाला बहता दिखा, जो कस्बे का कचरा समेटे गंगा में मिलता है। विंध्याचल में गंगा घाट की सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंचे, तो एक प्राचीन शिव मंदिर में हमारी मुलाकात 97 साल के संत जमुना दास से हुई। चेहरे की झुर्रियां उनकी अवस्था बयां कर रही थीं। वे रामायण का पाठ कर रहे थे। गंगा की बदहाली पर सवाल किया, तो बोले- वर्तमान सरकार में कुछ काम तो हुआ है। बदलाव भी दिख रहा। लेकिन, स्थानीय लोग जानबूझ कर गंदगी करते हैं। गंगा में शौच तक कर देते हैं। फूल-माला और कूड़ा-करकट डालते हैं। हमारे कहे में कोई है नहीं, कोई पूछने वाला भी नहीं है। एक नदी, जो अपने नाम की तरह ओझल हो चुकी है
विंध्याचल से हम आगे मिर्जापुर शहर की ओर बढ़ चले। करीब 10 किमी आगे ओझला पुल मिला। ये ओझला नदी पर बना है। 300 साल पहले इस पुल को मिर्जापुर के ही रूई व्यापारी पुरुषोत्तम रामगिरि ने बनवाया था। चार मंजिला इस पुल के बीच वाले तल से सड़क निकली है। नीचे के तल और ऊपर के तल में हाल और कमरे बने हैं। सबसे नीचे के तल में सुरंग भी बनी थी, जिसे अब सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया है। पहले के जमाने में लोगों के ठहरने के लिए इस अद्भुत कारीगरी वाले सराय-पुल का निर्माण कराया गया था। फिलहाल हम ओझला नदी की बात कर रहे हैं। जिस नदी को पार करके लोग मिर्जापुर शहर में प्रवेश करते थे, वो नदी अपनी अंतिम सांसें गिन रही है। ओझला नदी मीरजापुर में गंगा से संगम करती थी। इसी कारण उनका नाम ओझला पड़ा। वे गंगा में समाहित होकर ओझल हो जाती हैं। लेकिन, वर्तमान में ये नदी सूख चुकी है। शहर का सीवरेज और गंदगी के चलते ये नदी अब तालाब बन चुकी है। गंगा से 500 मीटर की दूरी पर इस नदी के थोड़े से बचे जल में जलकुंभी फैल चुकी है। दुख इस बात का है कि इस नदी को पुनर्जीवित करने का कोई भी प्रयास भी नहीं हो रहा। विंध्य की पहाड़ी से निकली ये नदी मिर्जापुर तक बहती है। इस नदी को पुण्यजल अथवा ओझल के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि जिस प्रकार सभी यज्ञों में अश्वमेघ यज्ञ और सभी पर्वतों में हिमालय पर्वत प्रसिद्ध है। उसी तरह सभी तीर्थों में ओझला नदी सबसे प्रमुख मानी जाती है। इस नदी का जल गंगा नदी के जल के समान ही पवित्र माना जाता है। यह जगह देवी काली का मंदिर, महालक्ष्मी, महासरस्वती और तराकेश्‍वर महादेव के मंदिर से घिरी हुई है। जहां कभी जहाज के लगते थे लंगर, वहां शहर का सीवेज गिर रहा
ओझला पुल से हम मिर्जापुर शहर पहुंचे। यहां से सट कर यहां गंगा बहती हैं। यहां मां गंगा की दयनीय दशा दिखी। हम शहर के प्रमुख घाट में शामिल नार पहुंचे। यहां हमारे सहयोगी बने नाविक राजेश कुमार चौधरी। 55 साल के राजेश कुमार चौधरी घाट के किनारे ही रहते हैं। वे नई पीढ़ी के बच्चों को तैराकी भी सिखाते हैं। लेकिन, गंगा में मिल रही गंदगी से वे भी व्यथित दिखे। नाव से ही वे हमें खंदवा नाले तक ले गए। मिर्जापुर शहर का 60 फीसदी नालों का सीवेज यहीं पर गंगा में बहाया जाता है। खंदवा वो जगह है, जहां प्राचीन समय में जहाज का लंगर लगता था। तब नदियों के माध्यम से ही आवागमन या व्यापार होता था। हर घाट के नीचे से गंगा में शहर का नाला बहाया जा रहा
खंदवा के बाद हम वापस नार घाट होते हुए शहर के सबसे खूबसूरत पक्का घाट पहुंचे। इसे सेठानी घाट भी कहते हैं। नार घाट में भी हमें सीढ़ियों के नीचे से शहर का नाला दिखा, जो सीधे गंगा में प्रवाहित हो रहा था। इसी तरह का नजारा पक्का घाट में भी दिखा। एक तरफ घाट की खूबसूरती दिख रही थी, तो उसकी चमक फीकी करने के लिए घाट के नीचे से ही बदबूदार नाले की गंदगी गंगा को मैली करती दिखी। चुनार में भी कस्बे की गंदगी गंगा में बहती दिखी
मिर्जापुर से हम 25 किमी दूर चुनार होते हुए वाराणसी के लिए निकले। चुनार का किला गंगा से सटकर बना है। चुनार कस्बे की पूरी गंदगी नालों के जरिए गंगा में प्रवाहित हो रही है। यहां भी कोई एसटीपी नहीं दिखा। चुनार में बने गंगा पुल के एक ओर घाट पर जाली लगाकर बत्तख पाले जा रहे हैं। नदी के बीच कई जगह टीले और दूर तक रेत नजर आ रहे थे। किले की दीवार के पास नाविक मछलियों का शिकार कर रहे थे। यहां बताया गया कि किले के पास ही गंगा की गहराई है, आगे नदी छिछली हो गई हैं। अभी चुनार से ही हल्दिया तक गंगा में जलमार्ग की यात्रा शुरू हुई है। चुनार से प्रयागराज के बीच में मिर्जापुर में नदी के बीच चट्‌टानों के चलते जलमार्ग का संचालन संभव नहीं हो पाया है। ऋषि दुर्वासा के आश्रम से निकली अस्सी को काशी में नाला बना दिया
चुनार से हम शिव की नगरी के रूप में विख्यात काशी पहुंचे। दुनिया की सबसे प्राचीनतम काशी नगरी को अपने अल्हड़पन के लिए जाना जाता है। जिस गंगा पर काशीवासी कभी इतराते थे, आज वो गंगा मां प्रदूषण से कराह रही हैं। काशी में ही अस्सी और वरुणा नाम की दो नदियों का संगम होता था। अस्सी नदी और गंगा नदी के संगम के चलते ही अस्सी घाट नाम पड़ा। इस पौराणिक नदी का उद्गम प्रयागराज में ऋषि दुर्वासा के आश्रम से हुआ है। अस्सी नदी में वाराणसी शहर का सीवेज बहाया जा रहा है। वर्तमान में इस नदी की पहचान खोकर नाला बन चुकी है। अस्सी नदी की 5 धाराएं थीं, जो इसे पानीदार बनाती थीं। नासिरपुर आईटीआई के पास, सुंदरपुर सट्‌टी के पास, दो ब्रांच इंद्रानगर में मिलती थीं। एक धारा कर्मदेश्वर मंदिर के ताल से निकल कर अस्सी में मिलती थी। आगे अस्सी अपना पूरा जल गंगा में समाहित कर देती थी। सीवेज से कम क्षमता के एसटीपी बनाए, नतीजा पूरी गंदगी गंगा में जा रही
रविदास घाट नगवां में नाले को टैप्ड कर पंप के जरिए भगवानपुर 50 एमएलडी क्षमता के एसटीपी तक ले जाया जाता है। लेकिन, नाले के सीवेज की मात्रा काफी अधिक है। इसके लिए रविदास पार्क के पास ही 100 एमएलडी क्षमता का अस्थाई ट्रीटमेंट प्लांट लगाया गया है। ये सब इंतजाम नाकाफी दिखा। सीवेज की क्षमता से कम ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता है। इसका नतीजा ये है कि नाले का सीवेज सीधे गंगा में प्रवाहित हो रहा है। यहां गंगा का जल सड़क कर बदबू मार रहा है। पास में ही बड़े-बड़े जहाज लंगर डाले हैं। पर इस घाट पर गंदगी के चलते कोई आता तक नहीं। फूलपुर से निकली वरुणा का हाल भी अस्सी जैसा
यही हाल वरुणा नदी का भी दिखा। इस नदी का उद्गम फूलपुर के मैलहन से हुआ है। ये काशी में आदि केशवर घाट पर गंगा से संगम करती है। लगभग 120 एमएलडी का सीवेज सीधे गंगा में प्रवाहित हो रहा है। फूलपुर से भदोही तक इस नदी में जल न के बराबर है। भदोही में इसमें सीवरेज और मोरवा नदी का जल मिलता है। मोरवा नदी में कालीन इंडस्ट्री का जल छोड़ा जाता है। बीच में इस नदी में भद्रकाली के पास बसुहीं नदी भी मिलती है। ये नदी जौनपुर के पास से निकली है। काशी में इस नदी में शहर का 50 फीसदी से अधिक सीवेज बहाया जा रहा है। दोनों नदियों की गंदगी से काशी में गंगा का जल भी बुरी तरह से प्रदूषित हो चुका है। इतना कि इसमें नहाना भी खतरनाक है। अस्सी-वरुणा को लेकर एनजीटी में दायर है याचिका
अस्सी और वरुणा को लेकर एनजीटी में एक याचिका भी लगी है। एक केस हाईकोर्ट में भी काशी शहर के जयराम शरण ने लगा रखा है। दोनों नदियों के फिर से पुनर्जनन के लिए काशी के कपिंद्र तिवारी लगातार प्रयासरत हैं। दोनों नदियों को लेकर लोगों में जनजागरूकता के लिए उन्होंने आरती शुरू की है। साथ ही दोनों नदियों के प्रवाह क्षेत्र में किए गए अतिक्रमण हटाने की भी लगातार मांग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि वाराणसी का मतलब ही वरुणा और अस्सी है। इसी से गंगा जी पूर्ण होती हैं। अस्सी नदी को सरकारी रिकॉर्ड में नाला घोषित कर दिया गया है। एनजीटी ने दोनों नदियों के लिए एक कार्ययोजना बनाकर जिला प्रशासन को सौंपा है। अब प्रशासन को इस पर काम करना है। वो घाट जहां नहीं बुझती चिता, अधजले शव प्रवाहित कर देते हैं गंगा में
अस्सी-वरुणा की व्यथा देखकर हम आगे वाराणसी के घाट पर पहुंचे। यहां एक लाइन से अलग-अलग नाम से घाट ही घाट बने हैं। कहीं गंगा आरती हो रही थी, तो कहीं क्रिकेट के चौके-छक्के लग रहे थे। घाट पर बड़ी संख्या में सैलानी पहुंचे थे। कोई गंगा में आस्था की डुबकी लगाकर खुद को धन्य कर रहा था, तो कई ऐसे सैलानी भी दिखे, जो जहाज, नाव और स्टीमर से काशी के घाट की सुंदरता देखने निकले थे। हम हरिश्चंद्र घाट पहुंचे। यहां लोग अपनों के शव का दाह संस्कार करने पहुंचे हैं। अलग-अलग शव जल रहे थे। आखिरी में अधजले हिस्से को मां गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। ये क्रम लगातार चलता रहता है। चिता की राख और जल चुकी लकड़ियों की राख को भी गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। यहां से आगे हम मणिकर्णिका घाट पहुंचे। पास में ही बाबा विश्वनाथ का कॉरिडोर भी दिखा। मणिकर्णिका घाट की मान्यता है कि यहां शव जलाने वाले की आत्मा को शिव के चरणों में मोक्ष मिल जाता है। बड़ी संख्या में यहां चिताएं जलती हुई दिखीं। इस घाट के बारे में कहा जाता है कि यहां कभी चिता की आग ठंडी नहीं पड़ती है। 24 घंटे कोई न कोई शव यहां जलाने के लिए पहुंचता रहता है। हरिश्चंद्र घाट की तरह यहां भी वहीं नजारा दिखा। आखिर में जलने से बचे शव के अधजले हिस्से को लोग गंगा में राख और जली हुई लकड़ियों के कोयले की अंगार के साथ प्रवाहित करते दिखे। अलग-अलग घाटों पर छोटी-छोटी कई नालियां दिखीं, जो लोगों के शौच और मूत्र आदि को सीधे गंगा में छोड़ रही थीं। मणिकर्णिका घाट पर हमारी मुलाकात गुलशन कपूर से हुई। उन्होंने बताया कि ये काशी है, जहां मरना भी मोक्ष माना जाता है। अनादि काल से लोग परिजनों की मुक्ति और मोक्ष के लिए उनके शव जलाने लाते हैं। यहां औसतन रोज 60 से 70 चिताएं जलती हैं। मानव शरीर पंचतत्व से बना और इसी में विलीन हो जाता है। शव जलने के बाद जो पिंड बचता है, उसे ही गंगा में प्रवाहित करते हैं। वो गंगा के जल जीवों का आहार बन जाता है। काशी को दो रानियों ने बसाया, शहर के लोग तो अब गंगा में नहाते तक नहीं
काशी घाट पर ही मुझे तुलसी मानस मंदिर के प्रबंधक त्रिलोचन शर्मा मिले। कहा- गंगा में अंग्रेजों के समय से नाले गिर रहे हैं। काशी शहर राजघाट से बसना शुरू हुआ था। 18वीं शताब्दी में रानी अहिल्याबाई होल्कर और बंगाल की रानी भवानी ने इस शहर को बसाया है। अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिरों और घाटों पर काम किया। वहीं, रानी भवानी ने मंदिर और घाटों के साथ भवन निर्माण भी कराया था। आज भी उनके बनाए 365 मकान खंडहर हालत में मौजूद हैं। उन्होंने बंगाली समुदाय को रहने के लिए दिया था। लेकिन, बंगाल समाज ने ये कहते हुए लेने से मना कर दिया कि काशी में कोई कुछ लेने नहीं देने आता है। इसी वजह से काशी गंगा किनारे बस गया। त्रिलोचन शर्मा बताते हैं- गंगोत्री से गंगा झरने के रूप में आती थी, तो उसमें पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन घुल जाता था। इसके साथ ही हिमालय के खनिज इस जल को औषधि बना देते थे। गंगा में बैक्टीरिया फेस होते हैं, जो इसकी गंदगी को खुद खा जाते हैं। लेकिन, खतरनाक रसायन से ये बैक्टीरिया भी मर रहे हैं। गंगा की दोनों टांगों को बांधों और बैराजों से काट दिया गया। गंगा की रेत के नीचे अंतर-धाराओं से पानी आता था। भूजल गिरने से अंतर-धाराओं में आर्सेनिक आदि घुलकर भूजल को भी प्रभावित कर रहे हैं। आज तो गंगा में नहाने आने वाले को चर्मरोग और डायरिया का खतरा बना हुआ है। पहले इस घाट के 1 किमी के दायरे में रहने वाले रोज गंगा में नहाने आते थे। आज यहां कोई स्थानीय निवासी नहाने नहीं आता। घाट पर जो भीड़ दिख रही है, वो तीर्थयात्री हैं जो श्रद्धावश यहां आ रहे हैं। दूसरे वे नाविक हैं, जिनका घाट ही जीवन है। गंगाजल में आज की तारीख में निरोगी भी नहा ले तो बेमौत मरेगा। गंगा में अब नाली वाले कीड़े दिखने लगे हैं। सच्चाई ये है कि आज गंगा अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। महंत बोले- काशी में गंगा का जल नहाने लायक भी नहीं
काशी के घाटों की गंदगी और दुर्दशा देखकर हम संकटमोचक मंदिर के महंत प्रो. वीएन मिश्रा के पास पहुंचे। बीएचयू आईटीआई में प्रोफेसर एवं संकटमोचक फाउंडेशन चला रहे प्रोफेसर मिश्रा के पिता भी गंगा को निर्मल बनाए रखने के लिए लगातार सक्रिय हैं। प्रोफेसर मिश्रा ने गंगा के प्रदूषण पर कहा- हर शहर के प्रदूषण का तरीका अलग है। कानपुर में औद्योगिक और सीवेज दोनों तरह के कचरे गंगा में मिलते हैं। बनारस में 95 फीसदी सीवेज के निस्तारण से गंगा में दिक्कत है। जहां तक औद्योगिक कचरे की बात है, तो इसके लिए सख्त नियम बने हैं। 3-4 स्टेज में उन्हें एसटीपी लगाना होता है। मतलब साफ करके ही वे गंगा में पानी प्रवाहित करेंगे। इस पर कार्रवाई का भी प्रावधान है। जबकि नगर निगम के अधीन चल रहे सीवेज एसटीपी को लेकर कोई सख्त नियम नहीं। ये निगम की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि सीवेज सीधे गंगा में न हो। बनारस में 33 नाले अस्सी से लेकर वरुणा तक गिरते थे। आज उनकी संख्या जरूर कम हुई, लेकिन उन्हें डायवर्ट करके दूसरे में जोड़ दिया गया है। सबसे पहले सारे नाले के डिस्चार्ज पॉइंट को बंद करिए। नदी से दूर कीजिए। उसे उस लेवल तक ट्रीट कीजिए, जिससे रि-यूज किया जा सके। अगर ये नहीं कर सकते हैं तो नदी के डाउन स्ट्रीम में उसे डिस्चार्ज कीजिए। बनारस की बात करें तो ये 5 किमी के दायरे में अस्सी और वरुणा के बीच बसा है। ये हिस्सा बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसका धार्मिक महत्व है। हमारे पास एक डाटा है, जिसके अनुसार 40 से 50 हजार लोग आज भी प्रतिदिन गंगा में स्नान करते हैं। आचमन करते हैं। जब आचमन की बात आएगी तो गंगा का जल पोर्टेबल वाटर क्वालिटी वाला होना चाहिए। नमामि गंगे से जुड़े लोगों का दावा है कि यदि सारे एक्शन प्लान लागू हो गए तो हम गंगा को क्लास बी की नदी बना देंगे। मतलब गंगा को स्नान योग्य ही बना पाएंगे। स्नान योग्य जल का मतलब है कि उसमें फीकल कोलीफॉर्म लेवल काउंट प्रति 100 एमएल 500, बीओडी लेवल 3 मिलीग्राम प्रति लीटर और डिचार्ज ऑक्सीजन 5 मिलीग्राम से ऊपर होना चाहिए। लेकिन, हकीकत ये है कि बनारस में अस्सी और वरुणा नदी तो पूरी तरह से सीवेज बन चुके हैं। गंगा गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक 116 ऐसे शहरों से प्रवाह करती है। इसमें बड़े शहर हरिद्वार, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी और पटना है, जिनकी आबादी 20 से 30 लाख है। सबसे अधिक दिक्कत ऐसे शहरों में है, जो सीवेज सिटी हैं। बनारस तो ब्रिटिश समय से ही सीवेज सिटी है। उस समय एसटीपी का कॉन्सेप्ट नहीं था। तब पूरा सीवेज कलेक्ट कर डाउन स्ट्रीम में गंगा में छोड़ देते थे। राजीव गांधी के शासन में 1986 में जब गंगा एक्शन प्लान लागू हुआ तो इसकी शुरुआत बनारस से हुई। तय ये हुआ था कि ये सफल रहा तो दूसरे बड़े शहरों में भी इसे लागू किया जाएगा। जब काफी पैसा खर्च हो गया तो लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि गंगा पूरी तरह से साफ हो गई। 1992 में हमने गंगा नदी के हेल्थ की मॉनिटरिंग के लिए रिसर्च लैब बनाया। संकटमोचक फाउंडेशन की ओर से इसे लगातार संचालित किया जा रहा है। 22 मई को गंगा जल की जो रिपोर्ट आई है, उसके मुताबिक नगवा में बीओडी की मात्रा 44.2 थी, जो 3 से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। वहीं फीकल कोलीफॉर्म की 100 एमएल प्रति संख्या 2500 की बजाय 3.90 करोड़ थी। इसी तरह वरुणा में बीओडी की मात्रा 60 और फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा प्रति 100 एमएल 6.60 करोड़ था। तुलसी घाट पर बीओडी 6.2 और फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा 73 हजार। शिवालय घाट पर बीओडी 4 और फीकल कोलीफॉर्म 51 हजार, आरपी घाट पर बीओडी 3.2 तो फीकल कोलीफॉर्म 22 हजार, तेलिया नाला के पास बीओडी 4.8 और फीकल कोलीफॉर्म 39 हजार, खिरकी नाला के पास बीओडी 3.8 और फीकल कोलीफॉर्म 13 हजार था। मतलब साफ है कि आज की तारीख में वाराणसी में गंगा नहाने लायक भी नहीं बची हैं। पहले चरण में जो एएसपी (Activated Sludge Process) बना था। इसमें फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया रिमूव करने की टेक्नोलॉजी नहीं है। आज जो एसटीपी में एसबीआर टेक्नोलॉजी यूज कर रहे हैं। इसमें सिर्फ जमीन कम लगती है, लेकिन टेक्नोलॉजी वही पुरानी है। संकटमोचक फाउंडेशन ने वाराणसी नगर निगम और सरकार के साथ मिलकर एक्शन प्लान बनाया है। इसमें अमेरिका में प्रयोग हो रही सबसे एडवांस टेक्नोलॉजी को लागू करना था। ये टेक्नोलॉजी बनारस के मौसम के हिसाब से सूट भी करेगा। इसमें माइक्रो लेवल तक सारे प्रोसेसिंग होंगे। अभी का सीवेज ट्रीटमेंट टेक्नोलॉजी काफी खर्च वाला है। फीकेल कोलीफॉर्म भी रिमूव नहीं कर पाता है। केवल अस्सी के सीवेज का उदाहरण ले लें। उसमें करीब 80 एमएलडी सीवेज आता है। जबकि पंप की क्षमता 50 एमएलडी है। ऐसे में सीवेज गंगा में ही जाएगा। रमना में इसके लिए अप स्ट्रीम में एसटीपी बना है। जबकि डाउन स्ट्रीम में होता तो ग्रेविटी से सीवेज चला जाता। अभी पंप चलेगा तो सीवेज जाएगा, नहीं ताे गंगा में बहा दिया जाएगा। गंगा तो मां हैं। ब्लू वाटर बॉडी है। गंगा के प्रति आदर भाव है। हम स्नान करते हैं। आचमन भी करते हैं। दुनिया में कई ऐसी टेक्नोलॉजी, उनका यूज करना चाहिए। गंगा को फ्लश टॉयलेट की तरह नहीं यूज करना चाहिए। सीवेज को ट्रीटमेंट कर एग्रीकल्चर में यूज कीजिए या फिर डाउन स्ट्रीम में इसे डिस्चार्ज कीजिए, जिससे ग्राउंड लेवल मेंटेन रहे। गाजीपुर में कई गांवों में सीधे शव को गंगा में प्रवाहित करने की प्रथा
वाराणसी से हम गाजीपुर जिले के सैदरपुर तहसील पहुंचे। यहां रजवारी गांव के पास गोमती और गंगा का संगम होता है। गोमती की नदी एकदम साफ दिखीं। हम कस्बे के रंगमहल मंदिर पहुंचे। यहां एक नाला सीधे गंगा में गिर रहा है। पास में जलकुंभी फैल चुकी है। रंगमहल मंदिर के पुजारी विजय पांडे कहते हैं कि गंगा की गंदगी देखकर दुख होता है। रंगमहल से हम श्यामदास मंदिर घाट पहुंचे। ये सैदपुर का प्रमुख घाट है। सभी धार्मिक आयोजन इसी घाट पर होते हैं। यहां एक बड़ा नाला दिखा, जो कस्बे की गंदगी समेटे हुए गंगा में मिलता है। यहां हमारी मुलाकात विशाल जनसेवा संघ के सदस्य विमल सिंह और उनकी टीम से हुई। वे एक महीने से सैदपुर में एसटीपी लगाने की मांग को लेकर आंदोलन छेड़े हुए हैं। कहते हैं कि गंगा के घाटों पर धरना-प्रदर्शन और जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन सौंप चुके हैं। गंगा निर्मल हो, इसके लिए हस्ताक्षर अभियान भी चला रहे हैं। श्यामदास मंदिर घाट पर ही हमें वीरू निषाद मिले। फिर वे नाव से नदी के बीच धारा तक ले गए। वहां एक शव दिखाया। जिसे सीधे गंगा में प्रवाहित किया गया था। बताया कि आसपास के कई गांवों में किसी की मृत्यु होने पर लोग पत्थर बांधकर शव को सीधे गंगा में प्रवाहित कर देते हैं। महीने में 15-20 लाशों इस तरह गंगा में प्रवाहित किया जाता है। अफीम फैक्ट्री के पास गाजीपुर का सबसे बड़ा नाला गंगा में मिल रहा
सैदपुर से हम गाजीपुर पहुंचे। यहां अफीम फैक्ट्री के पास गंगा में शहर की गंदगी नाले के रूप में मिलती है। फैक्ट्री का पानी भी इसी नाले से गंगा में मिलता है। कई बार ये पानी पीकर मवेशी और जानवर तक मदहोश हो जाते हैं। यहां घाट पर दूर तक गंदगी और जलकुंभी दिखी। घाट पर कई लोग मछली मारते हुए भी दिखे। इनके बीच महातम यादव मिले, जो सीधे गंगा जल का आचमन करने पहुंचे थे। मेरे सवाल पर कि इतनी गंदगी देखकर कैसे जल पीने का मन करता है? बोले- मां गंगा के प्रति आस्था है। श्रद्धा से जल पी लेता हूं। हालांकि गंदगी देखकर मन व्यथित तो होता है। वह जल भरकर शिव को अभिषेक करने ले जा रहे थे। घाघरा-संगम से पहले बलिया में छिछली हो गई गंगा
गाजीपुर से हम यात्रा के आखिरी पड़ाव बलिया के शिवरामपुर घाट पहुंचे। शहर से करीब 15 किमी दूर यहां गंगा बहती हैं। अब ग्रीन एक्सप्रेस-वे भी यहीं से निकल रहा है, जो आगे जाकर पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे से जुड़ जाएगा। बलिया के बाद गंगा बिहार में प्रवेश करती है, जहां घाघरा नदी भी आकर मिलती है। लेकिन, बलिया में गंगा का प्रवाह काफी कमजोर दिखा। यहां गंगा का जल स्तर कहीं-कहीं घुटने तक और कुछ जगह कमर तक ही है। लोग पैदल ही नदी को पार करते दिखे। घाट पर जगह-जगह पॉलिथीन और कचरा बिखरा हुआ दिखा। तट पर जल में भी ये कचरे दिखे। घाट पर हमें पूर्वांचल उद्योग व्यापार मंडल के प्रदीप कुमार वर्मा मिले। बोले कि नमामि गंगे के तहत केंद्र सरकार 2014 से योजना चला रही है। रविवार के दिन हम लोग भी गंगा की सफाई करने आते हैं। गंगा को कम से कम प्रदूषित किया जाए। गंगोत्री से बलिया आते-आते गंगा का प्रवाह बलिया में कम रह जाता है। कामेश्वर चैरिटेबल ट्रस्ट के सदस्य संतोष तिवारी ने दो टूक कहा कि जब तक टिहरी बांध से बिजली बनाना सरकार बंद नहीं करेगी, गंगा का निर्मल होना मुश्किल होगा। टेहरी से लेकर कई जगह बांध बनाकर हमने मां गंगा के प्रवाह को बांध दिया है। अफवाह में लाेगाें ने गांगेय डॉल्फिन मार डाले
बलिया में गंगा घाट पर पहले बड़ी संख्या में डॉल्फिन थीं। फेडरेशन ऑफ आल इंडिया व्यापार मंडल के प्रदेश उपाध्यक्ष रजनीकांत सिंह के मुताबिक यहां गंगा नदी की गहराई कम हो गई। डॉल्फिन को तैरने में परेशानी होती है। यहां कुछ लोगों के डूबने से मौत हुई तो ये अफवाह फैल गई कि डॉल्फिन ने डुबो दिया। इसकी वजह से कई लोगों ने उन्हें मार डाला। अब लोगों को जागरूक कर रहे हैं। गंगा-घाघरा संगम पर लगता है ददरी का मेला
बलिया से आगे गंगा-घाघरा पर हर साल कार्तिक पूर्णिमा को मेला भरता है, जो एक महीने तक चलता है। रजनीकांत सिंह इसकी पौराणिक कहानी बताते हैं। बलिया महर्षि भृगु की तपोस्थली थी। उन्होंने ही यहां के लोगों को खेती-बाड़ी करना सिखाया था। गंगा में एक बार पानी कम हो गया तो लोग उनके पास गए। तब महर्षि भृगु ने शिष्य दरदन मुनि को अयोध्या भेजा और सरयू को बलिया लाने के लिए कहा। जिस दिन सरयू बलिया में गंगा से संगम की, वो दिन कार्तिक पूर्णिमा का था। वो नजारा देखने लाखों लोग एकत्र हो गए थे, तभी से ये मेला लगता है। सहयोग- तुषार राय, नितिन अवस्थी, आशुतोष पांडे, पुष्पेंद्र तिवारी —————————- ये खबर भी पढ़ें… यूपी में गंगा को मैली कर रही काली नदी, इत्र नगरी में सीवेज, औद्योगिक कचरा और केमिकल बढ़ा रहे प्रदूषण, पार्ट-3 कन्नौज शहर से 15 किलोमीटर दूर है मेहंदीघाट। एक तरफ शव जल रहे, दूसरी तरफ काली नदी और गंगा के संगम पर लोग स्नान कर रहे। गंगा स्नान कर रहे लोगों के चेहरे के भाव बता रहे हैं कि मजबूरी में उन्हें ऐसा करना पड़ रहा। दरअसल, काली नदी, जो कभी नागिन की तरह लहराती थी, कालिंदी बनकर गंगा को गले लगाती थी। आज नाले की तरह सिसक रही है। यहां काली नदी का काला, बदबूदार जल और गंगा की मटमैली धारा एक-दूसरे से लिपटते हैं। मानो दोनों अपनी व्यथा साझा कर रही हों। पढ़ें पूरी खबर