गोमती में 28 किमी के दायरे में 50% ऑक्सीजन घटा:40 जलीय जीव लुप्त, पानी छूने लायक नहीं; अब आई योगी की अविरल योजना

लखनऊ की जीवनरेखा मानी जाने वाली गोमती नदी का पानी अफसरों की लापरवाही से धीरे–धीरे जहरीला हो चुका है। लखनऊ में 28 किलोमीटर तक बहने वाली गोमती का पानी आचमन तो दूर छूने लायक भी नहीं बचा है। नदी में पाए जाने वाले 56 प्रकार के जलीय जीवों में से 40 विलुप्त हो चुके हैं। नदी में घुलित ऑक्सीजन का स्तर सामान्य से 50% से ज्यादा गिर चुका है, जो किसी भी नदी की सेहत के लिए गंभीर संकेत है। इस बदतर हालात के बीच योगी सरकार ने गोमती को अविरल और स्वच्छ बनाने के लिए कैबिनेट में प्रस्ताव पास किया है। परियोजना के लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार की गई है। इसके पहले भी गोमती को अवरिल बनाने की कई योजनाएं बनीं। उन पर काम भी हुआ, लेकिन नदी साफ नहीं हुई। योजनाएं क्यों नहीं कारगर हुईं? इसमें क्या बाधाएं आईं? नई योजना उन बाधाओं को पार करके कैसे कारगर हो पाएगी? इन सवालों का जवाब तलाशने दैनिक भास्कर टीम ग्राउंड जीरो पर गई। स्वच्छ गोमती की मुहिम चला रहे लोगों से बातचीत की। जिम्मेदार अफसरों से सवाल किए। जवाब मिला कि घरेलू, कामर्शियल और औद्योगिक कचरा गोमती नदी को मुख्य रूप से गंदा कर रहा है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट सही से नहीं चल रहे हैं। नालों को दूषित पानी सीधे नदी में गिर रहा है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का संचालन, मॉनिटरिंग स्टेशन और रिवर फ्रंट बनाकर नदी को साफ किया जाएगा। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… पहले जानते हैं गोमती नदी के बारे में… गोमती नदी पीलीभीत के माधव टांडा से निकलती है। करीब 900 किलोमीटर का सफर तय कर गाजीपुर में गंगा नदी से मिल जाती है। लखनऊ में इसका प्रवेश सीतापुर रोड के पास होता है। 90 के दशक तक यह नदी लखनऊवासियों के लिए आस्था की प्रतीक थी। गोमतीनगर, राजाजीपुरम, हैदरगंज, त्रिवेणी नगर और चौक जैसे इलाकों में लोग इसके किनारे धार्मिक अनुष्ठान करते थे। पिकनिक मनाते थे। अब जानते हैं क्या कहती है NGT और UPPCB की रिपोर्ट? ‘C’ कैटेगरी में पहुंचा गोमती के पानी का गुणवत्ता साल-2024 की नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की ऑब्जर्वेशन को देखें तो लखनऊ में गोमती नदी के पानी की गुणवत्ता ‘C’ कैटेगरी में है। इसका मतलब है कि इसका पानी न तो पीने लायक है और न ही सिंचाई लायक है। उत्तर प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (UPPCB) की रिपोर्ट के अनुसार, बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) की मात्रा मानक से तीन गुना ज्यादा पाई गई। गोमती के पानी में टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड (TDS) का स्तर 700 मिलीग्राम प्रति लीटर (mg/L) से ऊपर जा चुका है, जबकि सुरक्षित सीमा 500 mg/L है। नदी में ऑक्सीजन और प्रदूषण की साइंस को समझिए… DO और BOD क्या है? गोमती नदी की बिगड़ती हालत को समझने के लिए जरूरी है कि हम उसके पानी में मौजूद ऑक्सीजन और प्रदूषण के बीच के संबंध को समझें। नदी में मौजूद घुलित ऑक्सीजन (DO) और जैविक ऑक्सीजन मांग (BOD) दो ऐसे वैज्ञानिक मानक हैं जो किसी भी नदी के जल की सेहत का वास्तविक स्थिति को बताते हैं। 1– घुलित ऑक्सीजन: घुलित ऑक्सीजन वह ऑक्सीजन होती है जो पानी में घुली रहती है, जो मछलियों, कछुओं, जल कीड़ों और अन्य जलीय जीवों द्वारा सांस लेने के लिए जरूरी होती है। यह ऑक्सीजन हवा से पानी में मिलती है या फिर पानी के भीतर मौजूद जलीय पौधे प्रकाश संश्लेषण के जरिए इसे छोड़ते हैं। आमतौर पर किसी स्वच्छ और स्वस्थ नदी में DO का स्तर 6 से 8 मिलीग्राम प्रति लीटर (mg/L) होना चाहिए। अगर यह स्तर 3 mg/L से नीचे चला जाए, तो जलीय जीवन के लिए खतरे की घंटी मानी जाती है। गोमती नदी की बात करें तो लखनऊ खंड में कुड़िया घाट, गऊ घाट के साथ ही कई स्थानों पर यह स्तर 2 mg/L से भी नीचे दर्ज किया गया है। यानी ऑक्सीजन की मात्रा 50 फीसदी से ज्यादा कम हो गया है, जो स्पष्ट रूप से दिखाता है कि यह नदी अब ‘डेड जोन’ में प्रवेश कर चुकी है, जहां अधिकांश जीव नहीं रह सकते हैं। 2– जैविक ऑक्सीजन मांग BOD का मतलब होता है जैविक ऑक्सीजन मांग, यानी पानी में मौजूद जैविक गंदगी को सड़ाने के लिए बैक्टीरिया द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली ऑक्सीजन की मात्रा। जब नदी में घरेलू सीवर, मल-मूत्र, होटल वेस्ट या औद्योगिक कचरा गिरता है, तो ये पदार्थ पानी में घुल जाते हैं। उन्हें नष्ट करने के लिए बैक्टीरिया सक्रिय हो जाते हैं। ये बैक्टीरिया इन जैविक पदार्थों को तोड़ने की प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन खपत करते हैं। इससे पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा तेजी से घटती है। यदि पानी में BOD का स्तर अधिक होता है, तो इसका मतलब है कि पानी में बहुत अधिक जैविक गंदगी मौजूद है और ऑक्सीजन की मांग बहुत अधिक है। नहाने लायक भी नहीं बचा पानी स्वच्छ पानी में BOD सामान्यतः 2 से 3 mg/L के बीच होता है। 5 mg/L से ऊपर का स्तर चिंताजनक होता है। गोमती का BOD 10 mg/L से ऊपर का है। यानी गोमती नदी का पानी न पीने लायक है, न नहाने लायक। इसका सीधा असर नदी के लाइफ पर होता है। सबसे पहले मछलियां और जल कीड़े मरने लगते हैं। फिर पानी में दुर्गंध, झाग और शैवाल बढ़ने लगते हैं, जिसे यूट्रोफिकेशन कहते हैं। इससे नदी मृतप्राय हो जाती है। विशेषज्ञ डॉ. नीरज रंजन बताते है कि, “नदी का सबसे बड़ा स्वास्थ्य संकेतक उसका DO होता है, अगर यह स्तर 3 mg/L से कम चला जाए, तो नदी में जीवन असंभव हो जाता है।” जब तक गोमती के पानी से गंदगी (BOD) कम नहीं होगी और ऑक्सीजन (DO) बढ़ेगी नहीं, तब तक इसे दोबारा जीवनदायिनी नदी के रूप में देखना मुश्किल होगा। अभी की स्थिति में गोमती सिर्फ नाम की नदी है, असल में वह एक जहरीला नाला बन चुकी है। जानिए गोमती नदी को फिर से अवरिल बनाने के लिए सरकार का क्या है मास्टर प्लान… गोमती के पुनर्जीवन का इस तरह खींचा गया है खाका सिंचाई विभाग से जुड़े एक बड़े अधिकारी ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि गोमती नदी को फिर से अविरल और स्वच्छ बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने एक नई रणनीति तैयार की है, जिसका विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार हुआ है। इस रिपोर्ट को हाल ही में योगी सरकार की कैबिनेट से भी स्वीकृति मिल चुकी है। योजना का उद्देश्य सिर्फ नदी की सफाई करना नहीं है, बल्कि उसे दोबारा जीवनदायिनी बनाना है। इसके तहत मुख्य रूप से 5 काम होंगे। अब पढ़िए इस योजना का बजट और अलग–अलग विभागों की क्या भूमिका होगी? 1700 करोड़ के बजट से होगा काम उत्तर प्रदेश सरकार ने गोमती पुनर्जीवन परियोजना के लिए कुल ₹1100 करोड़ का बजट निर्धारित किया है। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार से लगभग ₹600 करोड़ की राशि की मांग की गई है, जो कि राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और अन्य शहरी पुनर्विकास योजनाओं के तहत उपलब्ध कराई जा सकती है। यह बजट सिर्फ निर्माण कार्यों के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय तक संचालन, निगरानी और रखरखाव के लिए भी निर्धारित किया गया है। इसके लिए 5 विभागों को जिम्मेदारी दी गई है। अब पढ़िए जिम्मेदारों ने जो कहा… लखनऊ में गोमती नदी पर बनाए गए आर्ट सैंपलिंग पॉइंट उत्तर प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के सचिव संजीव सिंह ने बताया कि गोमती नदी पर हमने 8 सैंपलिंग पॉइंट बनाए हैं। रेगुलर बेसिस पर सैंपलिंग की जाती है। उसकी टेस्ट रिपोर्ट हम वेबसाइट पर पब्लिक करते हैं। उनके टेस्ट रिजल्ट में कैटिगराइजेशन भी किया जाता है कि वाटर क्वालिटी किस कैटेगरी की है। अफसरों के आने पर चलते हैं एसटीपी लखनऊ पर्यावरण सेवा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणजीत सिंह 7 सालों से गोमती नदी की सफाई कर रहे हैं। उन्होंने कहा– मैं पिछले 7 सालों से हर रविवार को गोमती की सफाई के कार्य करता हूं। हर रविवार को सुबह 6:00 बजे गोमती नदी के तट पर पहुंचते हैं। 100 लोग मिलकर सफाई अभियान करते हैं। अभी भी सरकार की तरफ से जो प्रयास किया जा रहे हैं उसमें सफलता नहीं है। इसका कारण शहर के गंदे नाले हैं, जिनका पानी बिना ट्रीट किए नदी में गिरता है। ——————– यह खबर भी पढ़िए… छांगुर बाबा 70 दिन होटल में गर्लफ्रेंड के साथ रहा:लखनऊ में नसरीन-नीतू बनकर रही, सिर्फ खाना लेने निकलती; 14 करोड़ विदेश से आए ATS ने धर्मांतरण गैंग के सरगना जमालुद्दीन उर्फ छांगुर बाबा और उसकी महिला मित्र नसरीन को लखनऊ से गिरफ्तार किया। दोनों विकास नगर के स्टार रूम्स होटल में 70 दिन से पति-पत्नी की तरह रहते थे। यहीं से हिंदुओं का धर्मांतरण और लव जिहाद करवाते थे। बाबा ने नसरीन, उसके पति और बच्चे का भी धर्मांतरण…पूरी खबर पढ़ें