गोवर्धन छोड़ राजस्थान पहुंचे श्रीनाथ:महाराणा का वचन- ठाकुरजी के लिए एक लाख सैनिक खून की आखिरी बूंद तक औरंगजेब से लड़ेंगे

300 साल से ज्यादा के मुगलिया इतिहास में बाबर के बाद औरंगजेब दूसरा सबसे क्रूर बादशाह हुआ। हिंदुस्तान के सैकड़ों छोटे-बड़े मंदिर तबाह करने के बाद उसकी नजर श्रीकृष्ण की लीलाभूमि पर थी। ऐसा कोई दिन न बीतता था, जब ब्रज का कोई न कोई मंदिर खंडित न होता हो। वृंदावन के लोग अपनी आंखों के सामने अपने ‘ठाकुर’ का स्थान उजड़ते देख रहे थे। इनमें कुछ ऐसे भी थे, जो जान की बाजी लगाकर अपने ‘नाथ’ के विग्रह बचाने में जुटे थे। दूसरे एपिसोड में आज पढ़िए, श्रीनाथ जी की गोवर्धन से नाथद्वारा तक की यात्रा। 2 साल, 4 महीने, 7 दिन का रोमांचक सफर… भगवान ने कैसे मेवाड़ की राजधानी उदयपुर की जगह सिहाड़ गांव में रहना चुना… कहानी से पहले ये जानना जरूरी है… रात का समय। हरिनाम कीर्तन से गूंजने वाले गोवर्धन के आसपास के गांवों में सन्नाटा था। हवाओं में खौफ था। गोवर्धननाथ जी (कैसे बने श्रीनाथ, सबसे नीचे स्लाइड में देखें) के सेवायत (पुजारी) सुकुमार तिलकायत दामोदर, उनके काका गोविंद, बालकृष्ण और वल्लभ महाराज गंभीर चर्चा कर रहे थे। वल्लभ महाराज ने कहा- “कई विग्रह तो पहले ही निकल चुके हैं। हमें भी कुछ करना चाहिए।” काका गोविंद परेशान थे। बुझी हुई आवाज में बोले- “ये इतना आसान नहीं है दामोदर। हर मोड़ पर खतरा है। मुगल फौज को भनक भी लगी तो सब गड़बड़ हो जाएगा।” बालकृष्ण ने धीरे से कहा- “कुछ लोग पकड़े गए हैं। उनके साथ क्या हुआ, सब जानते हैं। कहीं हम भी कहानी बनकर न रह जाएं।” इन चर्चाओं के बीच तिलकायत दामोदर चुप थे। सभी की नजरें एक साथ उनकी तरफ मुड़ीं। जैसे सभी पूछना चाह रहे हों- “आपकी राय…?” दामोदर जी ने सांस छोड़ते हुए कहा- “ठाकुर जी सुरक्षित रहें, इसके लिए विस्थापन ही सही। मुश्किलें तो आएंगी, लेकिन गोवर्धननाथ जी साथ हैं तो डर कैसा?” बालकृष्ण ने उत्सुकता से पूछा, “प्रभु बैलगाड़ी से जाएंगे क्या… मैं प्रबंध करूं?” काका गोविंद ने सुझाव दिया, “मंदिर के पड़ोस वाले ग्वाले के पास बैल हैं। हमें उसकी बैलगाड़ी मांगनी चाहिए।” बालकृष्ण और वल्लभ रात के सन्नाटे में ग्वाले के घर पहुंचे। दीये की टिमटिमाती रोशनी में उनके चेहरों पर चिंता साफ दिख रही थी। दोनों ने पूरी योजना ग्वाले को बताई। आखिर में वल्लभ ने कहा, “भइया, म्लेच्छों को इसकी कानों-कान खबर नहीं होनी चाहिए।” ग्वाले की आंख में आंसू थे। वो हाथ जोड़कर बोला- “महराज, लंका तक पुल बनाने के लिए गिलहरी ने अपने हिस्से के पत्थर जोड़े थे। आज गोवर्धननाथ जी लीला कर रहे हैं। मेरा बस चले तो मैं खुद बैलगाड़ी में जुतकर गोवर्धननाथ जी को यहां से ले चलूं। खैर, मैं न सही मेरे बैल ये काम करेंगे।” ग्वाले की बात सुनकर बालकृष्ण और वल्लभ में एक नई ताकत भर गई। दोनों ने पूरी बात जाकर दामोदर जी को बताई। उन्होंने कहा- “अब हमें देर नहीं करनी चाहिए। बैलगाड़ी तैयार करो।” गोवर्धन से निकलना… 10 अक्टूबर, 1669… शरद पूर्णिमा थी, लेकिन चंद्रमा की किरणें उदास मालूम हो रही थीं। द्वापर में यह रात राधा-कृष्ण के ‘महारास’ की साक्षी थी। वही रात आज कलियुग में गोवर्धननाथ का विस्थापन देख रही थी। दामोदर जी, काका गोविंद, बालकृष्ण और वल्लभ मंदिर पहुंचे। गोवर्धन पर्वत पर उजाला बिखरा हुआ था, लेकिन इन सबके मन में उदासी का अंधेरा था। शयन आरती हुई, भोग लगाया गया। दामोदर जी ने मन ही मन प्रार्थना की- “आपका ब्रज बंजर हो चला है प्रभु…। घंटे-घड़ियाल शांत हैं। म्लेच्छ हर जगह नजर गड़ाए बैठे हैं। कोई नहीं जानता कब, कौन अगला निशाना बन जाए। प्रभु, आपकी आज्ञा से हम आपके विग्रह को यहां से निकालना चाहते हैं, ताकि आस्था की ज्योति हमेशा जलती रहे। हमें विश्वास है, आप हमारे साथ हैं।” ठंडी और अलसाई रात में पेड़ों की पत्तियां पीली होकर गिर रही थीं। ऐसा लगता था, मानो ब्रज की सांसें टूट रही हों। उदास चांदनी में गोवर्धननाथ जी ब्रज से विदा ले रहे थे। बैलगाड़ी पर दो केसरिया ध्वज फहरा रहे थे। उसके पीछे दूसरी बैलगाड़ियों में सेवायत और कुछ अन्य भक्त बैठे थे। आंखों में आंसू और मन में एक ही धुन- ‘जय गोवर्धननाथ जी… जय-जय गोवर्धननाथ जी…।’ बैलगाड़ी धीरे-धीरे चलने लगी। ब्रज की गलियां पीछे छूट रही थीं, मानो यशोदा मइया टेर लगा रही हों- “जल्दी लौटना लल्ला…”, लेकिन बैलगाड़ी उस रास्ते पर चल पड़ी थी, जिसकी मंजिल तय नहीं थी। आगरा पहुंचने का संघर्ष… सुनसान जंगलों के बीच बैलगाड़ी चली जा रही थी। किसी को पता नहीं था कि प्रभु कहां विराजेंगे। रास्ते में तमाम रुकावटें आईं, लेकिन गोवर्धननाथ जी का भोग-राग नहीं रुका। सेवायतों को सिर्फ रात में आराम मिलता। जंगलों और वीरान रास्तों से गुजरते गोवर्धननाथ जी मुगल जासूसों की आंखों से दूर थे। फिर भी अनहोनी का डर हमेशा बना रहता। दामोदर जी हमेशा बेचैन रहते। रात में भी चैन न मिलता। बस गोवर्धननाथ जी की बैलगाड़ी के पास बैठकर गोविंद-गोविंद का जाप करते रहते। ऐसी ही एक रात वे ध्यान लगाए बैठे थे तभी कोई आहट हुई। पहले धीमी, फिर एकदम साफ… कुछ लोग उसी तरफ चले आ रहे थे। हर बीतते पल, आवाज तेज हो रही थी। दामोदर जी ने आसपास नजरें घुमाईं। दूर खेतों में मशालों की झिलमिलाहट साफ दिख रही थी। उन्होंने हड़बड़ाकर सभी को जगाया। सब एक ही आवाज में उठ बैठे। जैसे सैनिक नींद में भी सावधान रहते हैं। काका गोविंद ने कहा, “क्या हुआ दामोदर?” दामोदर जी बोले- “लगता है कुछ अनर्थ होने वाला है। आपको आवाजें सुनाई नहीं दे रहीं? जल्दी निकलना होगा यहां से…।” दामोदर जी बात पूरी करते उससे पहले ही बैलगाड़ी चल पड़ी। बालकृष्ण तेजी से गाड़ी हांक रहे थे। सबके माथे पर पसीना था। खुले आसमान में करोड़ों तारे जासूस की तरह आंख गड़ाए हुए थे। आवाजें लगातार तेज हो रही थीं। वल्लभ ने हड़बड़ाकर कहा- “मशालें बुझा दो। उन्हें भनक लग चुकी है।” भीड़ अभी भी पीछा कर रही थी। कुछ देर बाद भीड़ से आवाज आई- “रोको… गाड़ी रोको…।” बालकृष्ण और जोर से बैलगाड़ी हांकने लगे। दौड़ने की आवाज भी तेज होती गई। तभी एक सुर में उद्घोष उठा- “प्रभु गोवर्धननाथ की… जय, प्रभु गोवर्धननाथ की… जय।” काका गोविंद ने चौंककर कहा- “ये मुगल सैनिक नहीं हो सकते। उनकी जुबान पर ठाकुर जी का नाम कभी नहीं आ सकता।” दामोदर जी बोले- “शायद ये आसपास के ग्वाले और किसान हैं। मुगल सैनिकों के पास तो घोड़े भी होते हैं। वे होते तो अब-तक हमें पकड़ लिया होता। ये लोग तो भागते हुए ही आ रहे हैं।” बैलगाड़ी रोक दी गई। दामोदर जी की बात सही निकली। गांववालों को पता लग गया था कि गोवर्धननाथ जी उनके गांव से गुजर रहे हैं। गांववाले बैलगाड़ी के नजदीक आए। सबकी सांसें फूल रही थीं, लेकिन गोवर्धननाथ के दर्शन करके सबकी थकान उतर गई। लोग खुशी से फूले न समा रहे थे। गांव का एक बुजुर्ग बोला- “महराज, आपसे एक निवेदन है। हमारी इच्छा है कि आज मंगला आरती हमारे गांव में हो।” दामोदर जी मना न कर सके। मंगला आरती हुई। ठाकुर जी को भोग चढ़ा और बैलगाड़ी आगे बढ़ गई। सम-विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए गोवर्धननाथ जी का विग्रह आगरा पहुंचा। दीपावली के बाद अन्नकूट हुआ। आसपास के गांव में कुछ लोगों को पता चला। जिसके घर में जो था ठाकुरजी के लिए ले आया। प्रभु को भोग चढ़ा और सभी में बांटा गया। सब खुश थे, लेकिन दामोदर जी परेशान थे। मन में एक ही सवाल था- “आगरा तो मुगलों की छावनी जैसा है। क्या प्रभु यहां सुरक्षित हैं?” उन्होंने बालकृष्ण से कहा- “कल मंगला आरती के बाद हम यहां से निकल जाएंगे। आगरा सुरक्षित नहीं है।” आगरा में 16 दिन रुकने के बाद गोवर्धननाथ जी का काफिला फिर किसी अनजान मंजिल की ओर चल पड़ा। रास्ता मुश्किल था, लेकिन सेवायतों को सब सरल लगता। ठिठुरती रातें, घना कोहरा, सुनसान जंगलों के बीच से गोवर्धननाथ जी की बैलगाड़ी आगे बढ़ रही थी। कभी किसी गांव में दो-चार दिन, किसी पहाड़ी की तलहटी में हफ्ता-दस दिन के लिए सब रुकते। खाने-पीने का सामान इकट्ठा करके सभी फिर चल पड़ते। 8 महीने का सफर, कोटा पहुंचे… सर्दियां बीतीं, बसंत आया। हवाओं में सरसों के फूलों की महक थी। जंगलों में पलाश के बिखरे फूल यूं लगते मानो गोवर्धननाथ जी के आने की खबर सुनकर वनदेवी रास्ते में फूल बिछा गई हों। जगह बदलने के साथ मौसम भी बदल रहे थे। गर्मियां शुरू हुईं। जेठ-बैशाख की तपती दोपहर भी कृष्ण भक्तों का रास्ता न रोक पाई। आठ महीने का सफर करके गोवर्धननाथ जी राजस्थान में कोटा पहुंचे। बूंदी नरेश अनिरुद्ध सिंह को इसकी सूचना मिली। खबर सुनते ही उनकी आंखें चमक उठीं। नगर में मुनादी हुई- “गोवर्धननाथ जी कोटा पधारे हैं। कल महाराज उनके दर्शन करने जाएंगे। नगरवासी भी चल सकते हैं।” दिन चढ़ने तक अनिरुद्ध सिंह और नगरवासी कोटा पहुंच गए। सभी भावविभोर थे। भगवान ब्रज की धरती से खुद दर्शन देने आए थे। अनिरुद्ध सिंह ने सभी सेवायतों का हालचाल जानने के बाद पूछा- “महराज, कितने दिन का निवास है?” सब चुप थे। बालकृष्ण ने हंसते हुए कहा- “जब तक ठाकुर जी का मन यहां लगे।” राजा ने दामोदर जी से कहा- “महराज, सावन शुरू होने वाला है। ऐसे में यात्रा ठीक नहीं। बरसात के चार महीने ठाकुर जी को यहीं विराजमान कीजिए। ठाकुरजी यहीं चातुर्मास करें। हम तो सेवक हैं, जो बन पड़ेगा प्रभु की सेवा के लिए तैयार करेंगे।” दामोदर जी को राजा का प्रस्ताव ठीक लगा। वह हड़ौती राजपूतों का इलाका था। वहां मुगलों का खतरा भी कम था। तय हो गया कि भगवान कुछ महीने यहीं रहेंगे। मौसम बदलते ही यात्रा फिर शुरू हुई। सर्दियां आ चुकी थीं। कुनकुनी धूप में सफर करते और बर्फीली रातों में खुले आसमान के नीचे सूर्य देवता के निकलने का इंतजार होता। अलाव जलाकर सब उसके आसपास लेट जाते। ठीक से नींद न आती। सुबह ठिठुरन से पैर जमे होते, लेकिन भाव में कोई कमी नहीं थी। ध्येय वैसा ही अडिग, ‘प्रभु के लिए सुरक्षित जगह ढूंढ़ना…।’ महाराणा का वचन… दो महीने चलने के बाद प्रभु अजमेर के पास किशनगढ़ पहुंचे। वहां के राजा मानसिंह ने खूब आवभगत की। आसपास के इलाकों में राजपूत राजाओं का शासन था। फिर भी औरंगजेब का डर बना हुआ था। तीन महीने वहां रुकने के बाद सभी गोवर्धननाथ जी को लेकर मारवाड़ की ओर चल पड़े। राजस्थान की गर्मी में खून, पसीना बनकर बह रहा था। सभी नदी, नाले, तालाब सूखे पड़े थे। आसमान से आग बरसती थी। ऐसे में सभी सेवायत ठाकुर जी की सेवा में लगे रहते। चंवर डुलाकर प्रभु को गर्मी से बचाने की कोशिश करते। बरसात शुरू होने से पहले गोवर्धननाथ जी जोधपुर के करीब चांपासनी गांव पहुंचे। जोधपुर के महाराज जसवंत सिंह उस वक्त अपने ननिहाल में थे। ब्रज छोड़ने के दो साल बाद भी कोई ऐसी जगह नहीं मिली थी, जहां श्रीनाथ जी सुरक्षित हों। एक दिन सभी सेवायत बातचीत कर रहे थे। बालकृष्ण ने कहा- “हम किशनगढ़ में क्यों नहीं रुके?” वल्लभ ने कहा- “वहां के राजा मान सिंह मुगलों के साथ हैं।” काका गोविंद तुरंत काटते हुए बोले- “मान सिंह की पहचान पहले एक सनातन की है। मुगलों के साथ होते हुए भी उन्होंने खबर नहीं होने दी कि ठाकुर जी उनकी रियासत में हैं। मुगलों का वहां आना-जाना लगा रहता था, इसलिए वहां रुकना ठीक नहीं था।” वल्लभ ने निराशा होकर कहा- “ठाकुरजी सात साल के बालक हैं। कब तक हम एक बालक को लेकर इधर-उधर भटकते रहेंगे?” एक अन्य सेवायत बोला- “महाराज जसवंत सिंह जोधपुर में नहीं हैं। ठाकुर जी को ज्यादा दिन यहां रखना ठीक नहीं।” दामोदर जी ने गंभीर आवाज में कहा- “अब सिर्फ मेवाड़ के महाराणा राज सिंह से उम्मीद है।” फिर काका गोविंद की ओर देखकर बोले- “काका आप खुद जाकर महाराणा से बात कीजिए।” काका गोविंद, महाराणा राज सिंह के दरबार में पहुंचे और पूरी बात कही। महाराणा ने वचन दिया- “आप गोवर्धननाथ जी को लेकर उदयपुर आ जाइए। मैं वचन देता हूं, जब तक मैं और मेरे एक लाख सैनिकों के अंदर खून की एक भी बूंद बाकी रहेगी, म्लेच्छ ठाकुरजी को हाथ भी नहीं लगा पाएंगे।” मेवाड़ में गोवर्धननाथ जी का स्वागत… काका गोविंद ने चांपासनी लौटकर महाराणा की कही बात सभी को बताई। तिलकायत दामोदर पहली बार निश्चिंत लग रहे थे। विक्रम संवत 1728, कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रीनाथ जी चांपासनी से मेवाड़ की राजधानी उदयपुर की ओर चल दिए। पहाड़ी इलाके पार करते हुए गोवर्धननाथ जी मेवाड़ रियासत की सीमा, घाणेराव (अब पाली जिले में) के नजदीक पहुंचे। ठाकुरजी पहली बार मेवाड़ राज्य पधार रहे थे। यह खबर वहां के रावल गोपीनाथ के जरिए महाराणा राज सिंह तक पहुंची। महाराणा खुशी से भर गए। उन्होंने पूरे उत्साह से आदेश दिया- “सभी नागरिक गोवर्धननाथ जी के स्वागत में शामिल होंगे। 20 हजार धनुषधारी भील लड़ाके, 5 हजार घुड़सवार, एक हजार ऊंट और हाथी प्रभु की अगुआई के लिए घाणेराव भेजे जाएं।” पूरे शहर में हलचल मच गई। ढोल, नगाड़े, तुरही की आवाजें गूंज उठीं। सभी के चेहरे श्रद्धा और उत्साह से दमक रहे थे। हर गली, हर छत, हर रास्ता प्रभु के स्वागत में सजाया जा रहा था। महाराणा के भाई अरि सिंह, बेटे जय सिंह और भीम सिंह, महाराणा अमर सिंह के बेटे राणावत भाव सिंह घाणेराव पहुंचे। जैसे ही गोवर्धननाथ जी की बैलगाड़ी आती दिखी, लाखों की भीड़ जय-जयकार करने लगी। करताल और ढोल की लयबद्ध ताल आसमान में गूंज उठी। बैलगाड़ी करीब आई। तिलकायत दामोदर, काका गोविंद, बालकृष्ण और वल्लभ चंवर डुला रहे थे। लोग बैलगाड़ी के भीतर झांककर प्रभु के दर्शन करने की कोशिश कर रहे थे। ठाकुरजी की एक झलक पाने को सब आतुर थे। बैलगाड़ी धीरे-धीरे महाराणा के सामने पहुंची। महाराणा ने गोवर्धननाथ जी को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। ठाकुरजी को 51 तोपों की सलामी दी गई। महाराणा ने सोने के एक हजार सिक्के प्रभु को अर्पित किए। रात वहीं गुजारने के बाद सभी राजधानी उदयपुर की ओर चल पड़े। सिहाड़ गांव बना नाथद्वारा… महाराणा राज सिंह और अन्य लोग आगे चले गए। गोवर्धननाथ जी गांव-गांव अपने भक्तों को निहाल करते हुए बढ़ रहे थे। कुछ दिनों बाद गोवर्धननाथ जी राजसमंद से आगे सिहाड़ गांव पहुंचे। गावंवालों ने उत्साह और भक्ति से प्रभु का स्वागत किया। अगले दिन मंगला आरती के बाद बैलगाड़ी आगे बढ़ी। कुछ दूर चलते ही बैलगाड़ी का पहिया जमीन में धंस गया। काफी कोशिशों के बाद भी जब गाड़ी आगे नहीं बढ़ी तो बालकृष्ण ने हैरानी से कहा- “दो साल की यात्रा में कभी कोई संकट नहीं आया। भयंकर से भयंकर नदी-नाले पार करते चले आए। मगर यहां बैलगाड़ी ऐसे फंसी है कि निकलने का नाम नहीं ले रही।” दामोदर जी ने मुस्कुराते हुए कहा- “सब ठाकुर जी की लीला है। शायद उन्होंने अपने रहने की जगह चुन ली है।” पूरे गांव में बात फैल गई। ‘ठाकुर जी यहीं सिहाड़ गांव में विराजमान होंगे, उदयपुर नहीं जाएंगे।’ पूरा गांव खुशी से नाच उठा। ग्रह-नक्षत्र और शुभ मुहूर्त देखकर छोटा सा मंदिर बन गया। गोवर्धननाथ जी विराजमान हुए। दिन था फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की सप्तमी, विक्रम संवत 1728 (20 फरवरी, 1672)। 2 साल, 4 महीने और 7 दिन के बाद खुद गोवर्धननाथ जी ने सिहाड़ में रहना चुना था। महाराणा राज सिंह को खबर भेजी गई। उन्होंने भी हरि इच्छा के सामने सिर झुका दिया। महाराणा ने पूरे मेवाड़ में उत्सव मनाने का आदेश दिया। रियासत के सभी लोग खुश थे। उदयपुर में भी उत्सव था, लेकिन मन के किसी कोने में एक उदासी भी थी। गोवर्धननाथ जी उदयपुर नहीं आए। लोग महीनों से ठाकुर का इंतजार कर रहे थे, लेकिन निर्मोही ने फिर एक बार सभी को इंतजार करता छोड़ दिया। स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल ग्राफिक्स- सौरभ कुमार **** रेफरेंस सुधाकर उपाध्याय, वरिष्ठ सेवायत- श्रीनाथ मंदिर, नाथद्वारा। डॉ परेश नागर, राजपुरोहित- श्रीनाथ मंदिर, नाथद्वारा।​​ ​​​​​उमाबेन, अध्यक्ष- श्रीनाथ मंदिर, नाथद्वारा। महर्षि व्यास, सेवायत- श्रीनाथ मंदिर, नाथद्वारा। लक्ष्मी नारायण तिवारी, सचिव- ब्रज संस्कृति शोध संस्थान, वृंदावन। ब्रज विभव: संपादक गोपाल प्रसाद व्यास। श्रीनाथ जी की प्राकट्य वार्ता: गोस्वामी हरिहर राय। मथुरा-वृंदावन के वृहद हिंदू मंदिर: डॉ चंचल गोस्वामी। द कंट्रीब्यूशन ऑफ मेजर हिंदू टेंपल्स ऑफ मथुरा एंड वृंदावन: डॉ चंचल गोस्वामी। औरंगजेबनामा: संपादक डॉ अशोक कुमार सिंह। ब्रज के धर्म संप्रदायों का इतिहास: प्रभुदयाल मीतल। सनातन के संरक्षण में कछवाहों का योगदान: डॉ सुभाष शर्मा-जितेंद्र शेखावत। जयपुर इतिहास के जानकार- जितेंद्र शेखावत, संतोष शर्मा, प्रो देवेंद्र भगत (राजस्थान यूनिवर्सिटी) (श्रीनाथ जी के गोवर्धन से सिहाड़ पहुंचने तक की पूरी कहानी क्रमवार ढंग से किसी एक किताब में नहीं मिलती। भास्कर टीम ने कई दस्तावेजों और इतिहास के जानकारों से बात करने के बाद सभी कड़ियों को जोड़कर यह स्टोरी लिखी है। फिर भी घटनाओं के क्रम में कुछ अंतर हो सकता है। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है।)