घर डूबा तो गांव के बाहर तंबू लगाकर रहने लगे:प्रशासन की 2 पूड़ियों से भर रहे पेट; अधिकारी बोलीं- जैसा आदेश, वैसी व्यवस्था

‘5 दिन से हम लोग गांव के बाहर यहीं तंबू लगाकर बच्चों के साथ रह रहे हैं। रोज सुबह-शाम 2 पूड़ी और सब्जी मिल जाती है। इतने में पेट नहीं भरता बाबू जी, लेकिन इतना ही मिलता है। हम तो बहुत कहते हैं कि और दे दीजिए, लेकिन दो पूड़ी से ज्यादा देते ही नहीं। कभी-कभी तो पूड़ी ही नहीं देते, सिर्फ चावल देकर चले जाते हैं।’ ये शब्द फतेहपुर जिले की किसनमती के हैं। किसनमती घर छोड़कर अपने 4 बच्चों के साथ गांव के बाहर तंबू बनाकर रह रही हैं। गांव के करीब 1 हजार लोग ऐसे ही तंबू बनाकर रह रहे हैं। बच्चों के स्कूल बंद कर दिए गए हैं। नौजवान काम पर जाने के बजाय परिवार को बाढ़ से सुरक्षित करने में लगे हैं। प्रशासन की तरफ से व्यवस्था की गई है, लेकिन वह सीमित है। दैनिक भास्कर की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति को देखा। लोगों से बात की। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… 70 साल से हर बार बाढ़ में तंबू में रहते हैं
फतेहपुर जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर ललौली गांव है। इसी का एक हिस्सा पलटूपुरवा का है। यहां करीब 2 हजार आबादी है। देश को आजाद हुए इतने साल हो गए, लेकिन यहां के लोग हर मानसून सीजन में घर में सो नहीं पाते। डर लगा रहता है कि कहीं बाढ़ का पानी गांव के बाहर वाली सड़क पर भर न जाए। ऐसा हो जाने पर गांव टापू में तब्दील हो जाता है। फिर बाहर निकलना बेहद कठिन हो जाता है। इस वक्त ललौली में यही स्थिति है। गांव के आधे लोग तंबू लगाकर रहने को मजबूर हैं। तंबुओं के बीच 5-6 बुजुर्ग साथियों के साथ बैठे रामकुमार निषाद कहते हैं- हम यह सब 70 साल से देख रहे हैं। हमारे बाबा-दादा भी यही देखकर चले गए। 300 मीटर का नाला है। इस पर डेढ़ फीट भी पानी आ गया तो रफ्तार इतनी तेज हो जाती है कि कोई पार नहीं कर सकता। बाढ़ आती है तो हम लोग गांव से निकलकर यहां चले आते हैं। खाने-पीने को कोई व्यवस्था नहीं होती। 5 फीट पानी से होकर यहां आए हैं
60 साल की जगरानी अपने जानवरों को लेकर तंबू लगाकर रह रही हैं। कहती हैं- 4 दिन से घर के बाहर यमुना का पानी भरा है। वहां हम नहीं जा सकते। जानवरों को वहां नहीं रख सकते, इसलिए सब कुछ लेकर चले आए। कल जानवरों के लिए अफसर लोग भूसा लेकर आए थे। जो आगे था उसे तो मिल गया, हम लोग छूट गए। घर से किसी तरह से भूसा लाते हैं या फिर यहीं भैंस को खुला छोड़ देते हैं। वह घास खा लेती है। पिछले साल और उसके पहले 1 साल पानी नहीं बढ़ा था, लेकिन इस बार फिर से बढ़ गया। ललौली गांव में करीब 200 तंबू लगे हैं। 60 साल की ननकी देवी प्रशासन और सरकार से बहुत खफा नजर आईं। कहती हैं- हमें सारी व्यवस्था चाहिए। गांव में रोड ऊपर बननी चाहिए। बीच में जो तालाब है, उसका भी किनारा ऊंचा करना चाहिए। बाढ़ में लाइट चली जाती है, अंधेरे में हम लोग रोटी बनाते हैं। हमारे पति बुड्ढे हो गए हैं, वह चल नहीं पाते। इसलिए गांव में ही पड़े हैं। ‘हमें 3 दिन से खाना ही नहीं मिला’
पिछले करीब 10 दिन से गांव के लोग परेशान हैं। गांव से निकलकर बाहर रह रहे हैं। प्रशासन अपनी तरफ से लोगों की मदद कर रहा है। भुल्ली देवी कहती हैं- जब भी बाढ़ आती है, हम लोग भागकर यहां आ जाते हैं। पन्नी तानकर तंबू बनाकर उसी में रहते हैं। जिनके पास पन्नी नहीं है, वह तो खुले आसमान के नीचे रहते हैं। हम अधिकारी से कहते हैं, लेकिन सुनवाई ही नहीं होती। हम तो यह भी कहते हैं कि खाना न दो, सड़क बनवा दो। खाने को लेकर सबसे ज्यादा शिकायतें मिल रहीं। 30 साल की लक्ष्मी निषाद कहती हैं- शुरुआत में तो खाना सही आया, लेकिन अब तो खाना भी बराबर नहीं देते। बाढ़ की स्थिति में हम लोगों को बहुत दिक्कत होती है। किसी को सांप काट ले, तो गांव से निकल नहीं सकता
यहां हमारी मुलाकात 40 साल की ममता निषाद से हुई। ममता अपने गांव की जागरूक महिला मानी जाती हैं। नेताओं और अधिकारियों से वही बात करती हैं। वह कहती हैं- 2002 में हमारी शादी हुई थी, तब से हम यही स्थिति देख रहे हैं। बारिश के मौसम में हर बार यही हालात होते हैं। गांव की स्थिति यह है कि बाढ़ के बीच किसी को सांप काट ले, तो वह गांव से निकल भी नहीं सकता। घर के बाहर नल लगा है, वहां से हम पानी नहीं ले सकते, क्योंकि वह डूब गया है। कोई भी सरकार और प्रधान काम नहीं करता। जैसे ही पानी भरता है, सबको भागना पड़ता है। ममता नेताओं के आश्वासनों से बेहद खफा नजर आईं। वह कहती हैं- हमारी मांग एक पुल की है। पुल बन जाए तो हमें भागना नहीं पड़ेगा। हम वोट देते हैं, इसलिए हमें हमारा हक तो चाहिए। अधिकारी बोलीं- जो पीड़ित नहीं वह भी पीड़ित बने हैं
बाढ़ के बीच लोगों का दर्द जानने के बाद हम एसडीएम अनामिका सिंह से मिले। वह कहती हैं- इस गांव में कुल 20-25 घर बाढ़ से प्रभावित हैं। हम लोग कोशिश करते हैं कि ये लोग ललौली इंटर कॉलेज चलें। हमारा राहत शिविर वहीं बना है। लेकिन ये लोग जाते नहीं, क्योंकि यहां से इन्हें अपना घर दिखता है। उस घर से इनका भावनात्मक लगाव है। हमने यह बात अधिकारियों से भी बताई। तो वहां से आदेश आया कि ये लोग जहां हैं, वहीं व्यवस्था कर दी जाए। इसलिए हम लोग राहत शिविर से तैयार भोजन यहां बंटवाते हैं। हमने कहा कि ज्यादातर लोगों की शिकायत है कि सिर्फ 2 पूड़ी और सब्जी मिल रही। अनामिका कहती हैं- ऐसा नहीं है। जितना मानक है, हम उतना दे रहे हैं। यहां खुली हुई व्यवस्था है। इसलिए जो पीड़ित नहीं हैं, वह भी यहां हैं। हम पहले पीड़ितों को खाना देते हैं और फिर जो बचता है वह बाकी लोगों को बांट देते हैं, क्योंकि सभी गरीब हैं। बाकी हमने यहां पीने के पानी की व्यवस्था, मेडिकल टीम की व्यवस्था की है। जो भी दिक्कत आती है उसका निदान करवाया जाता है। फिलहाल बाढ़ पीड़ित ये लोग जैसे-तैसे अपना जीवन काट रहे हैं। इनकी मांग है कि गांव में जाने वाले रास्ते को ऊंचा कर दिया जाए। खाने के लिए जो मदद मिल रही वह पर्याप्त की जाए। जानवरों के लिए चारे की भी व्यवस्था की जाए। —————————- ये खबर भी पढ़ें… यूपी के जिला अस्पताल बनेंगे प्राइवेट जैसे, कैंसर-हार्ट का इलाज होगा, काबिल डॉक्टर तैनात होंगे हार्ट की बीमारी और कैंसर का इलाज यूपी के जिला अस्पतालों में होने लगे। न्यूरोलॉजी, न्यूरो सर्जरी, आंखों का इलाज, हड्‌डी और घुटना प्रत्यारोपण जैसी सेवाएं मिलने लगें। तो जाहिर सी बात है कि लोगों को बहुत ज्यादा राहत मिलेगी। लेकिन, अब ऐसा होने वाला है। यूपी के जिला अस्पतालों का रांची मॉडल पर कायाकल्प करने की तैयारी है। जिला अस्पतालों में न सिर्फ डॉक्टरों की कमी दूर होगी, बल्कि सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर भी तैनात होंगे। हर तरह की जरूरी जांचों के लिए कहीं और भटकना नहीं पड़ेगा। आखिर क्या है रांची मॉडल? जिला अस्पतालों में इससे क्या बदलेगा? आम मरीजों को किस तरह की सुविधाएं मिलेंगी? पढ़िए पूरी खबर…