“हमें उनकी निजी जिंदगी के बारे में ज्यादा तो जानकारी नहीं है, क्योंकि वह अब बहुत बड़े परिवार और बड़े शहर का हिस्सा हैं। लेकिन एक भाई होने के नाते इतना जरूर कहूंगा कि बचपन से ही वह बहुत तेज-तर्रार रही हैं। अगर पारिवारिक जीवन में कुछ उथल-पुथल चल भी रही है, तो हमें उम्मीद है कि वह मजबूती से खड़ी रहेंगी। अपर्णा सिर्फ एक बहू नहीं, बल्कि इस गांव की बेटी हैं और भविष्य की एक बड़ी नेत्री हैं।” यह कहना है उत्तरकाशी के गढ़बरसाली गांव के रहने वाले अनूप सिंह बिष्ट का, जो रिश्ते में अपर्णा यादव के बड़े भाई लगते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे रसूखदार ‘यादव परिवार’ की छोटी बहू और भाजपा नेता अपर्णा यादव और उनके पति प्रतीक यादव के बीच तलाक की खबरें इन दिनों सियासी गलियारों में तैर रही हैं। लखनऊ से सैकड़ों किलोमीटर दूर, उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के एक शांत से गांव ‘गढ़बरसाली’ (कुरा) में भी इन खबरों की आहट पहुंची है। यह अपर्णा यादव का पैतृक गांव है। वही गांव, जहां उनके पिता अरविंद सिंह बिष्ट का बचपन बीता और जहां की मिट्टी में अपर्णा का बचपन भी कभी खेला करता था। दैनिक भास्कर की टीम जब इस मुद्दे पर गांव वालों की नब्ज टटोलने पहुंची, तो वहां सन्नाटा भी था और दबी जुबान में चिंता भी। गांव के लोग अपनी ‘बेटी’ के निजी जीवन में चल रहे तूफ़ान से बहुत ज्यादा वाकिफ तो नहीं हैं, लेकिन एक कसक जरूर है कि जो रिश्ता मुलायम सिंह यादव जैसे बड़े नाम के साथ जुड़ा था, उसका इस तरह बिखरना दुखद है। अपर्णा की शादी पर गांव में मना था जश्न उत्तरकाशी मुख्यालय के नजदीक स्थित गढ़बरसाली गांव अपनी सादगी के लिए जाना जाता है। इसी गांव के एक पुराने, लेकिन रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखते हैं वरिष्ठ पत्रकार अरविंद सिंह बिष्ट। उनकी बेटी अपर्णा बिष्ट (अब यादव) की शादी जब मुलायम सिंह यादव के बेटे प्रतीक से हुई थी, तो पूरे क्षेत्र में एक जश्न का माहौल था। लोगों को लगा था कि लखनऊ की सत्ता का सीधा कनेक्शन अब उनके गांव से जुड़ गया है। लेकिन आज, जब तलाक की खबरें आ रही हैं, तो गांव के लोग संशय में हैं। अपर्णा के चचेरे भाई और पेशे से एडवोकेट अनूप सिंह बिष्ट कहते हैं, “देखिए, अपर्णा यादव का बचपन यहीं हमारे साथ बीता। वह छुट्टियों में अक्सर यहां आती थीं। हम साथ खेलते थे। वह शुरू से ही ‘ऑलराउंडर’ थीं। चाहे पढ़ाई हो, संगीत हो या ड्राइंग, हर चीज में वह अव्वल रहती थीं। राजनीति का शौक तो उन्हें बचपन से ही था।” अनूप आगे कहते हैं, “शादी के बाद वह अपने माता-पिता के साथ लखनऊ ही रहीं। उनके पिता अरविंद चाचा टाइम्स ऑफ इंडिया में बड़े पद पर रहे, इसलिए उनकी परवरिश वहीं के माहौल में हुई। ‘बड़े लोग हैं, बड़ी बातें हैं…’ गांव की एक छोटी सी दुकान चलाने वाले और रिश्ते में अपर्णा के भाई लगने वाले अनिल सिंह बिष्ट की प्रतिक्रिया में पहाड़ जैसा भोलापन और एक टीस दोनों झलकती है। वह कहते हैं, “हमें तो अखबारों और टीवी से ही पता चलता है कि क्या हो रहा है। वह बीच में एक बार आई थीं, जब हम उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा हुआ करते थे। तब यहां उनके घर में पाठ-पूजा थी। वह हेलिकॉप्टर से आई थीं। हम सब उनसे मिले थे, उनका व्यवहार बहुत अच्छा था। उन्होंने गांव के लोगों से बड़े प्रेम से मुलाकात की थी।” अनिल बिष्ट आगे कहते हैं, “अब देखिए, अब उत्तराखंड अलग राज्य है और वह यूपी की राजनीति में हैं। अगर वह उत्तराखंड आती तो शायद यहां का कुछ भला होता। रही बात उनके तलाक की, तो यह सुनकर अच्छा तो नहीं लगता। हमारे परिवार की बेटी हैं। जो हो रहा है, अगर सच है, तो दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन हम यहां गांव में बैठकर लखनऊ के फैसलों पर क्या ही कह सकते हैं।” वह घर, जो उनके आने की बाट जोहता है गांव में अरविंद सिंह बिष्ट का पैतृक मकान आज भी शान से खड़ा है, लेकिन उसमें सन्नाटा पसरा रहता है। इस घर की देखरेख के लिए एक केयरटेकर परिवार वहां रहता है। हरिद्वार के रहने वाले सोनू कश्यप और उनकी पत्नी पिछले एक साल से यहां चौकीदारी कर रहे हैं। सोनू कश्यप बताते हैं, “साहब, हम तो गरीब आदमी हैं। हमारे लिए तो यही बहुत बड़ी बात है कि अरविंद साहब और अपर्णा मैडम की वजह से हमारे बच्चों को रोटी मिल रही है। वह (अपर्णा) पिछली बार आई थीं जब चिन्यालीसौड़ में कोई कार्यक्रम था। वह बहुत कम समय के लिए आती हैं। कभी घंटा भर रुकती हैं, तो कभी एक दिन। लेकिन जब भी मिलती हैं, बहुत अच्छे से बात करती हैं। हमें और क्या चाहिए? हमारे लिए तो उनका आना और हमें रोजगार देना ही सबसे बड़ी सौगात है।” ‘विकास की उम्मीद और यादों का पुल’ गांव के बुजुर्ग और अपर्णा के चाचा धनबीर सिंह बिष्ट पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताते हैं कि कैसे अपर्णा के पिता ने गांव के लिए काम किया था। वह कहते हैं, “आज जो आप कुरा की रोड देख रहे हैं, जो कचडू देवता मंदिर से ऊपर गांव तक चार किलोमीटर आती है, यह अरविंद सिंह बिष्ट की ही देन है। उस समय मुलायम सिंह यादव जी जीवित थे और उनकी सरकार थी। अरविंद जी ने अपने रसूख का इस्तेमाल करके यह रोड पास करवाई थी।” धनबीर सिंह कहते हैं, “अब जब वह (अपर्णा) इतने बड़े पद पर हैं, तो उम्मीदें तो होती ही हैं। लेकिन सच तो यह है कि वह अब लखनऊ की हो गई हैं। यहां उनका आना-जाना कम है। उनके पिता अपनी इष्ट देवी के पूजन के लिए हर साल आते हैं, लेकिन अपर्णा अपनी व्यस्तताओं के कारण कम ही आ पाती हैं। तलाक की खबरों पर हम क्या बोलें? बड़े शहरों की हवा अलग होती है। हमें बस इतना पता है कि वह हमारे गांव का नाम रोशन कर रही हैं।” गांव की सड़क पर लगा वहीं, गांव के एक और बुजुर्ग और अधिवक्ता जगमोहन सिंह बिष्ट थोड़ा निराश भी नजर आते हैं। वह कहते हैं, “दूर के ढोल सुहाने होते हैं। मैंने उन्हें बचपन से देखा है, उनके पिता के साथ मेरे अच्छे संबंध रहे। वह लखनऊ में रहती थीं। जब बंशीलाल जी पर्वतीय विकास मंत्री थे, तब हमारी मुलाकात चारबाग में हुई थी। हमें उम्मीद थी कि वह इस क्षेत्र के लिए कुछ बड़ा करेंगी, कोई प्रोजेक्ट लाएंगी। लेकिन अब हमें अपने प्रधान से ही मतलब रखना पड़ता है, लखनऊ तो बहुत दूर की बात हो गई।” हालांकि, जगमोहन जी भी अंत में उम्मीद नहीं छोड़ते। वह कहते हैं, “वह पावर में हैं, अच्छे लेवल पर हैं। आज नहीं तो कल, वह जरूर कुछ करेंगी। अपनी जड़ों को कोई पूरी तरह नहीं भूलता।” दैनिक भास्कर की इस पड़ताल में एक बात जो सबसे प्रमुखता से उभरकर आई, वह यह है कि गढ़बरसाली गांव अपनी ‘हाई-प्रोफाइल बेटी’ के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा तो है, लेकिन एक व्यावहारिक दूरी भी बन चुकी है। ——————— ये खबर भी पढ़ें… टाइगर और सोनाक्षी की फैन हैं कुंभ की मोनालिसा:बोलीं- फिल्मों के लिए हिंदी पढ़ना-लिखना सीखा, मूवी हिट हुई तो बनवाऊंगी स्कूल प्रयागराज महाकुंभ 2025 में रुद्राक्ष की माला बेचकर सोशल मीडिया पर छा जाने वाली ‘वायरल गर्ल’ मोनालिसा की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। कभी मेले में श्रद्धालुओं को माला बेचकर अपना जीवन यापन करने वाली मोनालिसा अब बॉलीवुड में कदम रख चुकी हैं। वह जल्द ही फिल्म ‘द डायरी ऑफ मणिपुर’ में बतौर हीरोइन नजर आएंगी। (पढ़ें पूरी खबर)