‘लखनऊ में लोगों का अपनापन सबसे ज्यादा भावुक कर गया। जब छोटे-छोटे बच्चे फूल बरसा रहे थे, कह रहे थे कि हमें भी आपके जैसा बनना है तो लगा कि यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है। जब बाहर के मिशन के बाद इतना अपनत्व मिला, तो अपने देश के मिशन (गगनयान) के बाद के प्यार की कल्पना नहीं कर सकता। अंतरिक्ष से भारत को देखना गर्व का पल था। भारत की रोशनी सबसे अलग है। वहां से अपने देश में यूपी को मार्क किया। उसके बाद लखनऊ को ढूंढ़ रहा था। वह अलग तरह का अनुभव था। अब जब लखनऊ आया हूं, तो यहां का अनुभव और भी शानदार रहा।’ यह कहना है एस्ट्रोनॉट और भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर शुभांशु शुक्ला का। उन्होंने कहा- मैं बच्चों और युवाओं से कहना चाहता हूं कि सपनों से मत डरिए। सपने देखिए और उन्हें पूरा करने के लिए लगातार मेहनत कीजिए। मैंने भी बचपन में आसमान देखकर कहा था कि तारों तक जाऊंगा। आज वहां से लौटकर यही कह सकता हूं कि अगर आपमें साहस और धैर्य है, तो कोई मंजिल दूर नहीं। दैनिक भास्कर ने एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला खास बातचीत की। इसमें उन्होंने और भी कई बातें बताईं। पढ़िए पूरा इंटरव्यू… सवाल- जब आप भारत के ऊपर से गुजरे, तो क्या महसूस हुआ?
जवाब- भारत की धरती को ऊपर से देखना हर बार दिल को गर्व से भर देता था। चमकते शहर और हरे-भरे खेत देखकर यही लगता था कि मैं जिस मिट्टी से निकला हूं, उसी ने मुझे ये ताकत दी है। भारत की रोशनी अंतरिक्ष से भी सबसे अलग दिखती है। सवाल- क्या आपने अंतरिक्ष से लखनऊ को ढूंढने की कोशिश की?
जवाब- हां, कई बार कोशिश की। लेकिन, मानसून सीजन होने के कारण ऊपर से पूरा शहर साफ नजर नहीं आया। भारत की रोशनी सबसे अलग दिखी। वहां से मैंने अपने प्रदेश को मार्क किया, फिर लखनऊ को ढूंढ रहा था। यहां तो इसका असली प्यार पा गया। सवाल- लखनऊ लौटने पर आपके 5 दिन कैसे बीते?
जवाब- ये 5 दिन मेरे जीवन के सबसे यादगार रहे। डेढ़ साल बाद लौटा, तो लगा जैसे मां की गोद में लौट आया हूं। परिवार और दोस्तों से मुलाकात, बच्चों की मासूम खुशियां और शहरवासियों का गर्व ये सब मेरे लिए अमूल्य है। मुझे हर पल लगा कि मेरी असली ताकत यही शहर है। सवाल- बचपन में कहते थे कि तारों तक जाएंगे?
जवाब- यह एहसास मेरी जिंदगी का सबसे अनमोल तोहफा है। मेरा बचपन का ख्वाब अब हकीकत बन चुका है। ऐसा लग रहा है, जैसे हर संघर्ष और मेहनत इसी पल के लिए थी। तारों तक जाकर लौटना मेरे लिए जिंदगी भर की प्रेरणा बन गया है। सवाल- लखनऊ से निकलकर अंतरिक्ष तक के सफर में सबसे अहम क्या था?
जवाब- मेरी जो जर्नी रही है, उसमें एक ही चीज मैंने फॉलो किया है कि जीवन में जब कभी भी नई चुनौती आपके हाथ में आए तो उसे ‘न’ मत बोलिए। उस चुनौती को स्वीकार करिए और आगे बढिए। करते-करते आपको समझ में आएगा कि आप सही कर रहे या गलत। सवाल- अंतरिक्ष यात्रा के दौरान सबसे ज्यादा स्ट्रेंथ किस चीज से मिली?
जवाब- आस्था तो रहती है सभी में। कहीं-न-कहीं उसी से हमें स्ट्रेंथ भी मिलती है। मुझे अपनी टीम में आस्था थी। उन पर भरोसा था। ऐसे ही टीम को भी मेरे ऊपर आस्था थी। ये जो एक-दूसरे पर ट्रस्ट की भावना है, यही अहम है। यही आपको किसी काम में स्ट्रेंथ दिलाती है। सवाल- स्पेस स्टेशन का अनुभव आपके लिए कैसा रहा?
जवाब- स्पेस स्टेशन में पहुंचना जीवन का सबसे अद्भुत अनुभव था। वहां की तकनीक, अनुशासन और रिसर्च का वातावरण देखकर लगता था कि इंसानियत कितनी आगे बढ़ चुकी है। जीरो ग्रेविटी में रहना और काम करना बिल्कुल अलग दुनिया का हिस्सा बनने जैसा था। सवाल- आपने वहां किन प्रयोगों पर काम किया?
जवाब- हमारी टीम ने मेडिकल रिसर्च और टेक्नोलॉजी से जुड़े कई प्रयोग किए। दवाओं की संरचना, सैटेलाइट सिस्टम और ऊर्जा संग्रहण पर किए गए एक्सपेरिमेंट आने वाले समय में धरती और अंतरिक्ष दोनों के लिए अहम साबित होंगे। खासतौर पर स्वास्थ्य और ऊर्जा क्षेत्र में इनका बड़ा असर होगा। …………………………. संबंधित खबर पढ़िए लखनऊ से बेंगलुरु गए शुभांशु शुक्ला, अंतरिक्ष से लौटने के बाद 1 घंटे घर पर रहे इंडियन एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला लखनऊ एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गए हैं। शाम 4 बजे उनका बेंगलुरु के लिए फ्लाइट है। अंतरिक्ष से लौटने के बाद एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला शुक्रवार सुबह पहली बार लखनऊ में अपने घर पहुंचे थे। पत्नी कामना और 6 साल का बेटा कियांश भी उनके साथ थे। (पूरी खबर पढ़िए)
जवाब- भारत की धरती को ऊपर से देखना हर बार दिल को गर्व से भर देता था। चमकते शहर और हरे-भरे खेत देखकर यही लगता था कि मैं जिस मिट्टी से निकला हूं, उसी ने मुझे ये ताकत दी है। भारत की रोशनी अंतरिक्ष से भी सबसे अलग दिखती है। सवाल- क्या आपने अंतरिक्ष से लखनऊ को ढूंढने की कोशिश की?
जवाब- हां, कई बार कोशिश की। लेकिन, मानसून सीजन होने के कारण ऊपर से पूरा शहर साफ नजर नहीं आया। भारत की रोशनी सबसे अलग दिखी। वहां से मैंने अपने प्रदेश को मार्क किया, फिर लखनऊ को ढूंढ रहा था। यहां तो इसका असली प्यार पा गया। सवाल- लखनऊ लौटने पर आपके 5 दिन कैसे बीते?
जवाब- ये 5 दिन मेरे जीवन के सबसे यादगार रहे। डेढ़ साल बाद लौटा, तो लगा जैसे मां की गोद में लौट आया हूं। परिवार और दोस्तों से मुलाकात, बच्चों की मासूम खुशियां और शहरवासियों का गर्व ये सब मेरे लिए अमूल्य है। मुझे हर पल लगा कि मेरी असली ताकत यही शहर है। सवाल- बचपन में कहते थे कि तारों तक जाएंगे?
जवाब- यह एहसास मेरी जिंदगी का सबसे अनमोल तोहफा है। मेरा बचपन का ख्वाब अब हकीकत बन चुका है। ऐसा लग रहा है, जैसे हर संघर्ष और मेहनत इसी पल के लिए थी। तारों तक जाकर लौटना मेरे लिए जिंदगी भर की प्रेरणा बन गया है। सवाल- लखनऊ से निकलकर अंतरिक्ष तक के सफर में सबसे अहम क्या था?
जवाब- मेरी जो जर्नी रही है, उसमें एक ही चीज मैंने फॉलो किया है कि जीवन में जब कभी भी नई चुनौती आपके हाथ में आए तो उसे ‘न’ मत बोलिए। उस चुनौती को स्वीकार करिए और आगे बढिए। करते-करते आपको समझ में आएगा कि आप सही कर रहे या गलत। सवाल- अंतरिक्ष यात्रा के दौरान सबसे ज्यादा स्ट्रेंथ किस चीज से मिली?
जवाब- आस्था तो रहती है सभी में। कहीं-न-कहीं उसी से हमें स्ट्रेंथ भी मिलती है। मुझे अपनी टीम में आस्था थी। उन पर भरोसा था। ऐसे ही टीम को भी मेरे ऊपर आस्था थी। ये जो एक-दूसरे पर ट्रस्ट की भावना है, यही अहम है। यही आपको किसी काम में स्ट्रेंथ दिलाती है। सवाल- स्पेस स्टेशन का अनुभव आपके लिए कैसा रहा?
जवाब- स्पेस स्टेशन में पहुंचना जीवन का सबसे अद्भुत अनुभव था। वहां की तकनीक, अनुशासन और रिसर्च का वातावरण देखकर लगता था कि इंसानियत कितनी आगे बढ़ चुकी है। जीरो ग्रेविटी में रहना और काम करना बिल्कुल अलग दुनिया का हिस्सा बनने जैसा था। सवाल- आपने वहां किन प्रयोगों पर काम किया?
जवाब- हमारी टीम ने मेडिकल रिसर्च और टेक्नोलॉजी से जुड़े कई प्रयोग किए। दवाओं की संरचना, सैटेलाइट सिस्टम और ऊर्जा संग्रहण पर किए गए एक्सपेरिमेंट आने वाले समय में धरती और अंतरिक्ष दोनों के लिए अहम साबित होंगे। खासतौर पर स्वास्थ्य और ऊर्जा क्षेत्र में इनका बड़ा असर होगा। …………………………. संबंधित खबर पढ़िए लखनऊ से बेंगलुरु गए शुभांशु शुक्ला, अंतरिक्ष से लौटने के बाद 1 घंटे घर पर रहे इंडियन एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला लखनऊ एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गए हैं। शाम 4 बजे उनका बेंगलुरु के लिए फ्लाइट है। अंतरिक्ष से लौटने के बाद एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला शुक्रवार सुबह पहली बार लखनऊ में अपने घर पहुंचे थे। पत्नी कामना और 6 साल का बेटा कियांश भी उनके साथ थे। (पूरी खबर पढ़िए)