दुबे के झूठे गैंगरेप के शिकार पांच लोगों का दर्द…:एयरफोर्स कर्मी समेत 5 को फंसाया, दो एसीपी-केडीएम कर्मी समेत 6 के खिलाफ जांच

कानपुर में अखिलेश दुबे गैंग की ओर से दर्ज कराए गए एक ऐसे गैंगरेप का मामला सामने आया है, जिसमें गैंगरेप में फंसे पांचों आरोपी एक दूसरे को जानते तक नहीं है। एक आरोपी तो एयरफोर्स में तैनाती के दौरान वारदात वाले दिन कानपुर से 2 हजार KM दूर असम डिब्रूगढ़ के चाबुआ एयरबेस कैंप में था। जबकि दूसरा तिहाड़ जेल में था। सभी आरोपी अपनी बेगुनाही का सुबूत देते रहे और चीखते-चिल्लाते रहे, सरकारी दस्तावेजों को दिखया, लेकिन पुलिस ने किसी की एक नहीं सुनी। दुबे सिंडीकेट के दबाव में पांचों आरोपियों को गैंगरेप में अरेस्ट करके जेल भेज दिया था। अब दुबे पर एक्शन होने के बाद पांचों आरोपियों की ने पुलिस कमिश्नर से मिलकर मामले में दो एसीपी, केडीए कर्मी समेत 6 आरोपियों के खिलाफ खिलाफ तहरीर देते हुए आरोपियों पर एक्शन की मांग की है। आखिर इन पांचों आरोपियों को रेप केस दर्ज होने से लेकर जेल जाने तक क्या-क्या संघर्ष करना पड़ा। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… पहले जानिए क्या था मामला
नरवल थाना क्षेत्र में रहने वाली एक दलित युवती ने 17 जून 2023 को उन्नाव के अजगैन निवासी फरीद उर्फ रवि के खिलाफ रेप की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। लेकिन मजिस्ट्रेट बयान के दौरान युवती ने 8 दिसंबर 2021 को गैंगरेप का आरोप लगाते हुए बिधनू के जरकला निवासी एयरफोर्स के जवान संजीत कुमार, कछियाना हरबंशमोहाल निवासी मनीष बाजपेई, नर्वल के पोस्ट सेमरझाल टौंस गांव में रहने वाले मयंक कुमार और बर्रा-8 निवासी सुरजीत सिंह राजावत के खिलाफ गैंगरेप का आरोप लगाते हुए सभी का नाम FIR में बढ़वा दिया। इसके बाद पुलिस ने इन सभी को अरेस्ट कर लिया। एयरफोर्स में तैनात संजीत चिल्लाते रहे कि मैं असम में ऑन ड्यूटी था, मनीष बाजपेई ने बताया कि मैं वारदात वाले दिन तिहाड़ जेल में बंद था। इसके साथ ही अन्य आरोपी मयंक और सुरजीत भी अपनी बेगुनाही का सबूत देते रहे, लेकिन मामले की जांच कर रहे तत्कालीन एसीपी कलक्टर गंज निशंक शर्मा ने पांचों आरोपियों को अरेस्ट कराकर जेल भेज दिया। पुलिस ने किसी की बेगुनाही का कोई साक्ष्य नहीं देखा। इन सभी आरोपियों ने कोर्ट में अपनी बेगुनाही का सबूत दिया, एयरफोर्स कर्मी संजीत ने असम के डिब्रूगढ़ एयरबेस में ऑनड्यूटी होने का दस्तावेज दिया। इसके बाद इसी को आधार बनाते हुए इन सभी आरोपियों को ढाई महीने बाद कोर्ट से जमानत मिल सकी। हाईकोर्ट ने केस में प्रोसीडिंग स्टे का आदेश दिया है। लेकिन पुलिस ने किसी साक्ष्य को जांच में शामिल नहीं किया। अब दुबे सिंडीकेट के खिलाफ कानपुर पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार ने एक्शन लिया तो पांचों आरोपियों ने हिम्मत जुटाकर पुलिस कमिश्नर को तहरीर दी है। इन लोगों के खिलाफ दी तहरीर
केस में फंसे आरोपियों ने अब मामले में दुबे के करीबी तत्कालीन एसीपी कलक्टर गंज, दुबे के साथ कंपनी बनाकर कारोबार में फंसे उन्नाव में तैनात रहे एसीपी, जांच में फंसे दुबे के नजदीकी केडीए कर्मचारी, कर्मचारी नेता का अधिवक्ता बेटा, रेप की झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने वाली युवती और हिस्ट्रीशीटर के खिलाफ तहरीर दी है। पुलिस कमिश्नर ने मामले की एसआईटी को जांच का आदेश दिया है। केस में फंसे आरोपियों ने इतने साक्ष्य दिए हैं कि प्राथमिक जांच में ही पूरा मामला झूठा लग रहा है। जल्द ही इस मामले में पुलिस एफआईआर दर्ज कर सकती है। एक ही FIR में दुबे सिंडीकेट के अहम लोग आरोपी हैं। मेरे पति देश सेवा कर रहे थे, पुलिस ने झूठे गैंगरेप में जेल भेजा
एयरफोर्स के जवान की पत्नी राधा ने बताया- एफआईआर में जिस समय की वारदात दिखाई गई है, उस समय मेरे पति कानपुर से 2 हजार KM दूर असम के डिब्रूगढ़ चाबुआ एयरबेस में तैनात थे। हम लोग अपने साक्ष्य देते रहे, लेकिन तत्कालीन एसीपी कलक्टर गंज निशंक शर्मा ने कुछ देखा ही नहीं और मेरे पति को अरेस्ट करके जेल भेज दिया। यह बताते-बताते राधा फफक पड़ीं, उन्होंने बताया कि हमारे मान प्रतिष्ठा को ही समाज में इस झूठे केस ने खत्म कर दिया। हमारी ससुराल वाले ही हम लोगों को गलत निगाह से देखते हैं। सभी हम लोगों को गलत निगाह से देखते हैं। अब हम लोगों को न्याय मिलना चाहिए। हमारे गांव के नजदीकी लड़की ने मुझसे 5 लाख रुपए की डिमांड की थी, मांग पूरी नहीं होने पर शातिर ने मेरे भाई और पति को झूठे रेप केस में फंसाकर जेल भिजवा दिया। हम रोते रहे गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन पुलिस ने एक नहीं सुनी।

अखिलेश दुबे गैंग ने ये झूठा रेप केस दर्ज कराया था। दो महीने जेल में रहना पड़ा, कोर्ट ने साक्ष्यों और दस्तावेज को देखा तो राहत दी और दो महीने बाद बेल मिली तब जेल से बाहर आ सके। अखिलेश दुबे गैंग से युवती जुड़ी हुई है। इससे पहले भी कई लोगों के खिलाफ झूठा रेप केस दर्ज करवाकर जेल भिजवा चुकी है। सिंडीकेट भारतीय न्याय प्रणालि से खिलवाड़ कर रहा था
कछियाना मोहाल घंटाघर निवासी मनीष बाजपेई ने बताया- उनके क्षेत्र का दबंग हिस्ट्रीशीटर पिंकू सैनी उर्फ सुरेश कुमार सैनी से प्रॉपर्टी विवाद चल रहा था। पिंकू सैनी उन्नाव में तैनात रहे एसीपी व दुबे सिंडीकेट से जुड़ा था। अपने प्रॉपर्टी विवाद की रंजिश में एसीपी के जरिए मेरा भी गैंगरेप की जांच में नाम खुलवा दिया। क्योंकि वो हिस्ट्रीशीटर एसीपी का चेला था और दुबे सिंडीकेट से जुड़ा है। हिस्ट्रीशीटर का कब्जा खाली कराए जाने पर रंजिश रखने लगा। विवाद पर उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई थी। कई बार हिस्ट्रीशीटर के खिलाफ तहरीर दी, लेकिन दुबे सिंडीकेट से जुड़ा होने के चलते उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हो रही थी। जिस दिन रेप की घटना दिखाई जा रही है। मैंने बताया कि जिस दिन की वारदात दिखाई गई है उस दिन मैं एक चोरी के केस में तिहाड़ जेल में बंद था। यह जानकारी होने के बाद एसीपी और जांच कर रहे पुलिस कर्मियों ने 8 को 18 फरवरी बना दिया और मुझे अरेस्ट करके जेल भेज दिया। मैं इस लड़की को अपनी 35 साल के उम्र में कभी देखा ही नहीं। सबसे खास बात ये है कि गैंगरेप के पांचों आरोपी एक-दूसरे को जानते तक नहीं हैं। हम पांचों को निर्दोष फंसाकर जेल भिजवाया गया था। ये जो भी सिंडीकेट है, बहुत खतरनाक है। ये भारतीय न्याय प्रणालि से खिलवाड़ कर रहा था। मेरी पत्नी और बच्चा इस घटना में फंसने के बाद बहुत परेशान हुए। मेरी बहन ने रेप में फंसने के बाद राखी बांधना तक बंद कर दिया है। इस सिंडीकेट ने न जाने कितने लोगों का जीवन तबाह किया है। सामाजिक और आर्थिक रूप से इस झूठे मुकदमें ने हम लोगों को तबाह कर दिया। मैं हरियाणा में था, लेकिन पुलिस ने बगैर जांच जेल भेजा
मेरा नाम मयंक है, मैं तो सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि ये गैंग बहुत खतरनाक है। जब की वारदात दिखाई गई है मैं हरियाणा में था। तीन महीने तक मैं हरियाणा में था। मैंने तत्कालीन एसीपी को पूरे मामले की जानकारी दी। मैंने कहा कि मेरी कॉल डिटेल और लोकेशन समेत अन्य तथ्यों की जांच होनी चाहिए। मेरे खिलाफ झूठा मुकदमा लिखाया गया है। लेकिन एसीपी ने हम लोगों की एक नहीं सुनी और हम लोगों को अरेस्ट करके जेल भेज दिया गया। मेरी छवि खराब हुई और धन सब बर्बाद हो गया। अब उम्मीद है कि पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार हम लोगों को न्याय दिलाएंगे और आरोपियों को जेल भेजा जाएगा। अखिलेश दुबे का सिंडीकेट बहुत मजबूत है। हम लोग अपने साक्ष्य दिखाते रहे, लेकिन पुलिस ने एक नहीं सुनी। अखिलेश दुबे के एक इशारे पर हम सभी को अरेस्ट करके जेल भेज दिया गया। घोटाले का खुलासा करने पर केडीए कर्मी ने गैंगरेप में फंसाया
पुलिस कमिश्नर ने दुबे सिंडीकेट के खिलाफ एक्शन लिया तो हम लोग आगे आकर अपनी शिकायत दर्ज कराई है। हमने केडीए का एक बड़ा 10 करोड़ का घोटाला खोला था। इस वजह से ही बिल्डर के लिए दुबे सिंडीकेट ने बिल्डर को बचाने के लिए मुझे झूठे रेप केस में फंसाया। हम लोगों की जमनात इसलिए हो गई और बेगुनाह इसलिए साबित कर सके कि एयरफोर्स कर्मी के ऑनड्यूटी होने के साक्ष्य थे। मेरी बेटी और पत्नी परिवार के लोग बार-बार पूछते थे कि रेप में जेल क्यों भेजा गया। मैं अपनी पत्नी और बच्चों के सामने आंख मिलाकर बात नहीं कर पा रहा था, लेकिन अब उम्मीद जागी है कि हम लोग बेगुनाह साबित होंगे और आरोपी जेल जाएंगे। तत्कालीन एसीपी ने मुझे बुलाया और झूठे मुकदमे में अरेस्ट करके जेल भेज दिया। अब जानिए अखिलेश दुबे के बारे में एक ऐसा वकील, जिसने कभी कोर्ट में नहीं की बहस
अखिलेश दुबे एक ऐसा वकील है, जिसने कभी कोर्ट में खड़े होकर किसी केस में बहस नहीं की। उसके दरबार में खुद की कोर्ट लगती थी और दुबे ही फैसला सुनाता था। वह सिर्फ अपने दफ्तर में बैठकर पुलिस अफसरों के लिए उनकी जांचों की लिखा-पढ़ी करता था। बड़े-बड़े केस की लिखा-पढ़ी दुबे के दफ्तर में होती थी। इसी का फायदा उठाकर वह लोगों के नाम निकालने और जोड़ने का काम करता था। इसी डर की वजह से बीते 3 दशक से उसकी कानपुर में बादशाहत कायम थी। कोई उससे मोर्चा लेने की स्थिति में नहीं था। काले कारनामों को छिपाने के लिए शुरू किया था न्यूज चैनल
अखिलेश दुबे ने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए सबसे पहले एक न्यूज चैनल शुरू किया था। इसके बाद वकीलों का सिंडीकेट बनाया। फिर इसमें कई पुलिस अफसरों को शामिल किया। कानपुर में स्कूल, गेस्ट हाउस, शॉपिंग मॉल और जमीनों के कारोबार में बड़े-बड़े बिल्डर उसके साथ जुड़ते चले गए। दुबे का सिंडीकेट इतना मजबूत था कि उसकी बिल्डिंग पर केडीए से लेकर कोई भी विभाग आपत्ति नहीं करता था। कमिश्नर का दफ्तर हो या डीएम ऑफिस, केडीए, नगर निगम और पुलिस महकमे से लेकर हर विभाग में उसका मजबूत सिंडीकेट फैला था। उसके एक आदेश पर बड़े से बड़ा काम हो जाता था। मेरठ से भागकर आया था कानपुर
अखिलेश दुबे मूलरूप से कन्नौज के गुरसहायगंज का रहने वाला है। उसके पिता सेंट्रल एक्साइज में कॉन्स्टेबल थे। मेरठ में तैनात थे। वहां रहने के दौरान अखिलेश दुबे की सुनील भाटी गैंग से भिड़ंत हो गई। इसके बाद वह भागकर कानपुर आ गया। बात 1985 की है। अखिलेश दुबे किदवई नगर में किराए का कमरा लेकर रहने लगा। दीप सिनेमा के बाहर साइकिल स्टैंड चलाता था। इस दौरान मादक पदार्थ तस्कर मिश्री जायसवाल की पुड़िया (मादक पदार्थ) बेचने लगा। धीरे-धीरे आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो गया। ——————————– ये खबर भी पढ़िए- वकील अखिलेश दुबे ने मेरी गंदी किताबें छपवाकर बंटवाईं, मंडप से उठवाने की कोशिश की मुझे शादी के मंडप से उठवाने का प्रयास किया। मेरे खिलाफ अश्लील किताबें छपवा कर बंटवा दीं। झूठी शिकायत की, मेरे होटल खरीदने के बाद वो रंगदारी के चक्कर में मेरे पीछे पड़ गया था। औरतें अमूमन क्या करती हैं या तो आत्महत्या कर लेती हैं या तो सरेंडर। दो ही विकल्प हैं, लेकिन जब से भाजपा सरकार आई है, तब से कानून व्यवस्था बेहतर हुई है। यह कहना है कानपुर की प्रज्ञा त्रिवेदी का। उन्होंने बताया कि एक होटल मालकिन होने के बाद भी आखिर अखिलेश दुबे ने किस कदर उनकी जिंदगी को नरक बना दिया था। पढ़ें पूरी खबर