यूपी की मानसूनी बारिश का पैटर्न बदल रहा है। 8 साल पहले तक पूर्वांचल में ज्यादा बारिश होती थी। पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड में अक्सर बारिश कम होती थी। लेकिन, अब तस्वीर बदल गई है। महोबा, जालौन और बांदा जैसे कम बरसात वाले इलाकों में ‘बहुत भारी बारिश’ रिकॉर्ड हो रही है। यहां महीनेभर की बारिश का कोटा 2-4 दिन में ही पूरा हो रहा है। पूरे राज्य में एक समान बारिश का पैटर्न भी बदला है। इससे कुछ इलाकों में बाढ़ और कहीं सूखे के हालात बन रहे हैं। दैनिक भास्कर ने यूपी में 2019 से 2026 तक 8 साल के मानसूनी बारिश के आंकड़ों का एनालिसिस किया। इससे बारिश के पैटर्न में हो रहे 4 बड़े बदलाव नजर आए। सबसे बड़ा बदलाव पूर्वी और पश्चिमी यूपी की बारिश के अंतर में दिखाई दिया। पढ़िए ये रिपोर्ट… पहला बदलाव: 2022 के बाद बारिश का पैटर्न तेजी से बदला मानसूनी बारिश के पिछले 50 साल के आंकड़ों (LPA) से पता चलता है कि पूर्वी यूपी में पश्चिम के मुकाबले ज्यादा बारिश हो रही है। पूर्वी यूपी में औसतन 799.2 mm पानी बरसता रहा, पश्चिम में 672 mm बारिश हुई। लेकिन, पिछले 8 सालों में यह पैटर्न बदलता दिख रहा है। IMD के मुताबिक, 2019 में पूर्वी यूपी में औसत से 7% ज्यादा (852.4 mm) बारिश हुई थी। जबकि पश्चिमी यूपी में औसत से 20% कम (523.8 mm) पानी ही बरसा था। 2020 में जब पूर्वी यूपी में 2% कम पानी बरसा तो पश्चिमी यूपी में बारिश की कमी 32% थी। लेकिन, 2022 में दोनों इलाके लगभग बराबरी पर रहे। इसके बाद से कहानी पलटती गई। 2023 में पश्चिमी यूपी 696.2 mm के साथ सामान्य बारिश के करीब पहुंच गया, जबकि पूर्वी यूपी 567.3 mm (-29%) पर अटक गया। 2024 में दोनों हिस्सों की बारिश लगभग बराबर रही। 2025 में पश्चिमी यूपी में औसत से 12% ज्यादा पानी बरसा, जबकि पूर्वी यूपी में 17% कम। 2026 में पश्चिमी यूपी में 16% ज्यादा बारिश हुई, जबकि पूर्वी यूपी में सिर्फ 2% ज्यादा। इसे जिलेवार देखें तो तस्वीर थोड़ा और साफ होती है। पश्चिमी यूपी के 33 में से 12 जिलों में औसत से कम पानी बरसा, जबकि पूर्वी यूपी के 42 में से 25 जिलों में पानी की कमी है। दूसरा बदलाव: कम पानी वाले बुंदेलखंड में झमाझम बारिश सबसे ज्यादा बदलाव बुंदेलखंड में दिखाई देता है। महोबा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां मानसून सीजन में औसतन 597.9 mm बारिश होती है। 2019 में 518.2 mm बारिश हुई थी। जबकि 2026 में यहां 1127 mm बारिश हुई। यह औसत से 88% ज्यादा है। बांदा में औसत बारिश का आंकड़ा 767.1 mm का है। यहां इस साल 1348.4 mm बारिश हुई, जो सामान्य से 76% ज्यादा है। 2025 में भी 41% ज्यादा बारिश हुई थी। चित्रकूट में 1358.1 mm बारिश हुई, जो सामान्य से 73% ज्यादा रही। हमीरपुर भी इस बदलाव का उदाहरण है। यहां औसतन 708 mm बारिश होती है। 2026 में यहां 1307.7 mm बारिश हुई। यह सामान्य से 85% ज्यादा है। कुल मिलाकर जिस बुंदेलखंड की पहचान कम बारिश और सूखे के संकट से जुड़ती है, वहां अब औसत से बहुत ज्यादा बारिश हो रही है। 2022 से यह ट्रेंड साफ तौर पर नजर आता है। हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगा कि बुंदेलखंड का मौसम स्थायी रूप से बदल गया है। 8 साल का आंकड़ा जलवायु बदलने का पक्का सुबूत नहीं है। लेकिन, इतना जरूर दिखता है कि बारिश की कमी वाले इलाकों में भी अब कुछ सालों में बहुत ज्यादा बारिश हो रही है। तीसरा बदलाव: जून-जुलाई में बारिश घटी, अगस्त-सितंबर ने संभाला यूपी में मानसून की टाइमिंग यानी किस महीने में कितनी बारिश होती रही है, ये भी बदलता दिख रहा है। IMD के 2001-2020 के 20 साल की स्टडी में यूपी के लिए सामान्य पैटर्न यह था कि जुलाई में सबसे ज्यादा बारिश होती थी। औसतन करीब 34% मानसूनी बारिश जुलाई में और 31% अगस्त में होती रही है। लेकिन, 2019 से 2026 तक के आंकड़ों में अगस्त और सितंबर की हिस्सेदारी बढ़ती दिख रही है। 2019 में जून में सिर्फ 40.2 mm बारिश हुई। वहीं, जुलाई में 296.9 mm, अगस्त में 169.1 mm और सितंबर में 213.8 mm बारिश हुई। यानी साल की बारिश का बड़ा हिस्सा जुलाई के बाद आया। 2022 से यह बदलाव और साफ दिखाई देता है। इस साल जून-जुलाई में सिर्फ 193 mm बारिश हुई, जबकि अगस्त-सितंबर में 340.5 mm पानी बरसा। यानी करीब 64% बारिश आखिरी दो महीनों में हुई। 2023 में मानसून कोटे की आधी बारिश (52%) अगस्त-सितंबर में हुई। 2024 में यह आंकड़ा 60% तक पहुंच गया। 2026 में यह ट्रेंड और मजबूत हुआ। 31 जुलाई तक औसत से 27% कम बारिश हुई और अगस्त-सितंबर ने इसकी भरपाई की। सीजन खत्म होते-होते यूपी में औसत से 8% ज्यादा बारिश दर्ज हुई। इन 8 सालों में सिर्फ 2020 और 2025 में जून से सितंबर तक लगातार एक समान और अच्छी बारिश हुई। कुल जमा बात यह है कि मानसून के जून-जुलाई से अगस्त-सितंबर की ओर बढ़ने का संकेत दिख रहे हैं। लेकिन, बीच में 2020 और 2025 जैसे साल भी दिखते हैं। इसलिए अभी इसे स्थायी मानसूनी बदलाव कहना जल्दबाजी होगी। चौथा बदलाव: महीनेभर का कोटा 2-4 दिन में पूरा हो रहा यूपी में मानसूनी बारिश का तरीका भी बदल रहा है। बारिश के दिन घट रहे हैं, सूखे के बढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ जब बारिश होती है, तो कई बार कम समय में भारी मात्रा में पानी गिरता है। मतलब पूरे मानसून सीजन में जितने दिन बारिश होनी चाहिए, ऐसे दिन कम हो गए हैं। लेकिन, कुछ ही घंटों या 1-2 दिन के भीतर पूरे महीने के हिस्से की बारिश हो जाती है। उदाहरण के तौर पर- 2020 और 2021 में कई जिलों में औसतन 3 से 5 बार इतनी तेज बारिश हुई, जिससे वहां महीने की कुल बारिश का 30 से 50 % तक कोटा पूरा हो गया। 2022 में सितंबर की बारिश का 60% से ज्यादा हिस्सा 2-3 दिनों की भारी बारिश से पूरा हुआ। सितंबर, 2023 में 3-4 दिन ऐसे रहे, जब पश्चिमी यूपी और तराई इलाकों में 24 घंटे में 180 mm तक की भारी बारिश दर्ज की गई। 2024 और 2026 में पूर्वी और पश्चिमी यूपी में ऐसे कई दिन दर्ज किए गए, जब एक ही दिन में महीने का 30 से 40% कोटा पूरा हो गया। सितंबर, 2026 में 4-5 ऐसे दिन ऐसे रहे, जब 24 से 48 घंटे के भीतर 245 mm तक बारिश हुई। ऐतिहासिक रूप से पूर्वांचल भारी बारिश के लिए जाना जाता था। लेकिन, पिछले 8 सालों में पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों में भारी बारिश के दिन बढ़े हैं। बदलते पैटर्न की वजह से कागजों पर कुल बारिश के आंकड़े भले ही सामान्य या उससे ज्यादा (2026 में 800 mm पार) दिखते हों, लेकिन इससे जलभराव, भूजल रीचार्ज की कमी और फसलों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। ——————————- यह खबर भी पढ़ें… तीखी धूप में बाढ़, कहां से आया इतना पानी, ऊपरी इलाके से 3 दिन में बारिश का पानी लखनऊ पहुंचा लखनऊ में करीब 7 दिन से बारिश नहीं हुई है। पूरे प्रदेश से मानसून की विदाई हो चुकी है। हर दिन तीखी धूप में लोगों का पसीना छूट रहा है। लेकिन, लखनऊ के एक हिस्से में बाढ़ के गंभीर हालात हैं। फैजुल्लागंज इलाके में करीब 40 हजार घर बाढ़ की चपेट में हैं। लोगों के जेहन में सवाल है कि बिना बारिश आखिर गोमती में उफान क्यों? नदी में लगातार इतना पानी कहां से आ रहा? पूरी खबर पढ़ें…