यूपी की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) एक बार फिर अपनी पुरानी चमक लौटाने को बेताब नजर आ रही है। पार्टी सुप्रीमो मायावती, जो कभी यूपी की सत्ता की कुर्सी पर 4 बार विराजमान हो चुकी हैं, अब 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर जोर-शोर से तैयारी में जुट गई हैं। 9 अक्टूबर को बसपा संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर लखनऊ के कांशीराम स्मारक स्थल पर होने वाले ऐतिहासिक कार्यक्रम को मायावती अपनी ताकत दिखाने जा रही हैं। बसपा राजधानी में 3 लाख की भीड़ जुटाकर राजनीतिक दलों को साफ संदेश देने की तैयारी में है कि उसे यूपी की राजनीति से खारिज नहीं किया जा सकता। एनडीए और इंडिया गठबंधन की तरह बसपा भी एक मजबूत विकल्प रहेगी। भाईचारा कमेटी बना कर सोशल इंजीनियरिंग का दांव
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, मायावती इस कार्यक्रम के जरिए 2027 के चुनावी रणनीति का औपचारिक आगाज करेंगी। इसीलिए 2007 की तर्ज पर सोशल इंजीनियरिंग की बिसात बिछाने की कवायद तेज हो चुकी है। बसपा ने भाईचारा कमेटी का पुनर्गठन किया है। यह दलितों, पिछड़ों, ब्राह्मणों और मुस्लिमों को एकजुट करने का काम करेगी। प्रदेश के 90 फीसदी बूथ स्तर पर कमेटियां गठित हो चुकी हैं। अब मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद और वफादार नेताओं को मैदान में उतारने को तैयार हैं। पार्टी की रणनीति साफ है- चौपालों के जरिए जनता तक पहुंचना। तीनों मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल की तुलना करना। यह साबित करना कि मायावती का शासन ही सबसे बेहतर था। मायावती भी इस चौपाल कार्यक्रम में शामिल होंगी। 2007 की तर्ज पर चल रही तैयारी
2007 का विधानसभा चुनाव बसपा के लिए स्वर्णिम अध्याय रहा। मायावती ने ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के नारे के साथ दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का कमाल दिखाया था। बसपा ने 206 सीटें जीतीं और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। उस समय ब्राह्मण वोटरों की मदद से पार्टी ने सवर्णों को भी अपनी गोद में लिया। लेकिन, 2012 के बाद बसपा का ग्राफ लगातार गिरता गया। 2017 में 19 सीटें, 2022 में सिर्फ एक सीट और 2024 लोकसभा में 2.06 फीसदी वोट शेयर मिला। अब मायावती उसी फॉर्मूले को दोहराने को बेताब हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा की सक्रियता इसका जीता-जागता प्रमाण है। मिश्रा, जो बसपा के ब्राह्मण चेहरे हैं, फिर से ब्राह्मणों को जोड़ने की कवायद में जुटे हैं। हाल ही में हुई एक बैठक में उन्होंने कहा था- 2007 में ब्राह्मण भाइयों ने बसपा को समर्थन दिया था। वही एकजुटता फिर लानी होगी। मायावती ने भी पिछली बैठकों में जोर दिया कि ब्राह्मण, दलित, पिछड़े और मुस्लिमों का गठजोड़ ही बसपा की ताकत है। 2025 में बसपा ने MBCS (मोस्ट बैकवर्ड क्लासेस) पर फोकस बढ़ाया है। क्योंकि, दलित-मुस्लिम समीकरण से ज्यादा फायदा MBCS-दलित गठजोड़ से होगा। यूपी में दलित 21%, OBC 40% और मुस्लिम 19% हैं। अगर ये एकजुट हो जाएं, तो भाजपा और सपा का गणित बिगड़ सकता है। चौपाल कार्यक्रम में खुद शामिल होंगी मायावती
पार्टी सूत्र बताते हैं, कि मायावती जल्द ही फील्ड में उतरेंगी। चौपालों के जरिए वे गांव-गांव पहुंचेंगी। लोगों को बताएंगी कि 2007-2012 के उनके शासन में कानून का राज था। पुलिस-प्रशासन निरंकुश नहीं था, कोई भेदभाव नहीं होता था। विकास के नाम पर ताजमहल, लोहिया आवास, नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस-वे जैसे प्रोजेक्ट्स को गति दी। इसके उलट, योगी सरकार पर वे अत्याचार और भेदभाव के आरोप लगाती रहेंगी। 2017-2022 के सपा शासन को भी वे ‘गुंडाराज’ बताकर निशाना बनाएंगी। हर बूथ पर 20-30 युवाओं की कोर टीम सक्रिय रहेगी
बसपा की सबसे बड़ी ताकत रही है भाईचारा कमेटी। 2007 में इन्हीं कमेटियों ने OBC और दलितों को एक मंच पर लाकर चुनावी सफलता दिलाई थी। 2025 में भी बसपा ने इन्हें पुनर्जीवित किया है। प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने बताया कि भाईचारा कमेटियां अब बूथ स्तर तक मजबूत हो रही हैं। हाल ही में लखनऊ में हुई पिछड़ा वर्ग भाईचारा कमेटी की बैठक में 9 अक्टूबर के कार्यक्रम को ऐतिहासिक बनाने का संकल्प लिया गया। ये कमेटियां PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले का जवाब देने के लिए बनाई गई हैं। सपा के अखिलेश यादव PDA पर जोर दे रहे हैं। लेकिन, बसपा इसे ‘सर्वजन’ से जोड़कर ब्राह्मणों को भी शामिल कर रही है। पार्टी ने 75 जिलों में कमेटियां गठित की हैं। OBC, दलित और मुस्लिम नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है। एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा- भाईचारा कमेटियां अब डोर-टू-डोर कैंपेन चलाएंगी। हर बूथ पर 20-30 युवाओं की टीम होगी, जो कांशीराम के विचारों को फैलाएगी। दरअसल, 2025 के पंचायत चुनावों को बसपा 2027 की सीढ़ी मान रही है। मायावती ने हालिया बैठक में निर्देश दिए कि सदस्यता अभियान तेज करें। गांव-गांव जाकर वोटर लिस्ट तैयार हो। बूथ कमेटियों का 90% गठन हो चुका है, बाकी 10% 9 अक्टूबर के बाद पूरा होगा। बिहार चुनाव के बाद यूपी में सक्रिय होंगे आकाश आनंद
मायावती के भतीजे आकाश आनंद बसपा की नई उम्मीद हैं। पार्टी से दो बार निष्कासन के बाद लौटे आकाश और अधिक पावरफुल हो चुके हैं। अब वह पार्टी में अघोषित तौर पर नंबर-2 की हैसियत में आ चुके हैं। उन्हें मायावती ने पार्टी का नेशनल संयोजक बनाया है। बसपा में इस तरह का पद पहली बार बनाया है। अभी आकाश बिहार चुनावों के प्रभारी हैं। वहां रैली के जरिए पार्टी के पक्ष में लगातार माहौल बनाने में जुटे हैं। उन पर पार्टी के युवा विंग को मजबूत करने का जिम्मा है। सूत्र बताते हैं कि 9 अक्टूबर के कार्यक्रम में आकाश को प्रमुख भूमिका मिलेगी। बसपा के ज्यादातर नेता और कार्यकर्ता आकाश को ही मायावती का उत्तराधिकारी मानकर चल रहे हैं। बसपा 2027 में उन्हें बड़ी भूमिका में सामने ला सकती है। आकाश ने हाल ही में कहा कि “बहन जी के मार्गदर्शन में बसपा एक बार फिर सत्ता में लौटेगी।” उनकी युवा अपील दलित वोटरों को आकर्षित कर रही है। खासकर, चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी से सीधी टक्कर के बीच। बसपा की कोशिश 2024 में पार्टी से दूर जा चुके अपने कोर जाटव वोटरों को एकजुट करने की है। इसके लिए आकाश को आगे किया जा रहा है। आकाश के जरिए पार्टी से दूर जा चुके दलित युवाओं को फिर से पार्टी से जोड़ना है। सतीश चंद्र मिश्र के जरिए ब्राह्मण वोटरों को जोड़ने की कोशिश
बसपा में ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व सतीश चंद्र मिश्रा ही करते हैं। 2025 में उनकी सक्रियता बढ़ी है। 2007 की तर्ज पर जल्द ही उन्हें ब्राह्मण सम्मेलनों का आयोजन करने की जिम्मेदारी मिलने वाली है। भाजपा को सत्ता में लाने के लिए ब्राह्मण वोटरों ने साथ तो दिया, लेकिन उन्हें सही सम्मान नहीं मिला। सरकार में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ब्राह्मण चेहरे हैं। लेकिन उन्हें सरकार में वैसी हनक नहीं मिली, जितनी उम्मीद थी। सतीश चंद्र मिश्र भाजपा पर खुलकर ब्राह्मण समाज के शोषण का आरोप लगाते हैं। कहते हैं कि 2007 में ब्राह्मण वोटरों ने बसपा को 80 सीटें दिलाईं। अब मिश्रा MBCS को भी जोड़ रहे हैं। पार्टी ने ब्राह्मण आउटरीच के लिए 30 से ज्यादा सम्मेलन की रूपरेखा तय की है। ये कैंपेन अयोध्या से शुरू होकर मथुरा तक चलेगा। मिश्रा का मानना है कि दलित-ब्राह्मण बंधुत्व यूपी की राजनीति बदल देगा। सतीश चंद्र मिश्र 9 अक्टूबर के कार्यक्रम की तैयारियों के लिए जिस तरीके से सक्रिय हैं, इससे साफ है कि बसपा अब मैदान में अधिक ताकत के साथ दिखेगी। मैदान की क्षमता एक लाख, भीड़ जुटाने का लक्ष्य 3 लाख
9 अक्टूबर का कार्यक्रम बसपा के लिए मील का पत्थर होगा। कांशीराम स्मारक स्थल पर लाखों कार्यकर्ता जुटेंगे। इस मौके पर कार्यकर्ताओं को मायावती संबोधित भी करेंगी और 2027 मिशन लॉन्च करेंगी। लखनऊ और आसपास के जिलों के कार्यकर्ता 9 अक्टूबर को ही सीधे कार्यक्रम स्थल पहुंचेंगे। लेकिन, प्रदेश के अन्य जिलों के कार्यकर्ता 8 अक्टूबर को ही रमाबाई अंबेडकर मैदान में पहुंच जाएंगे। अगले दिन वहीं से वे कार्यक्रम स्थल पहुंचेंगे। वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम कहते हैं- बसपा का लक्ष्य साफ है। वह भीड़ जुटाकर बताना चाहती हैं कि बसपा अब भी मजबूत है। 2022 के विधानसभा चुनाव में कमजोर तैयारियों के बावजूद 12% वोट पाना इसका सबूत भी है। 8 अक्टूबर को ही बसपा के कार्यकर्ता रमाबाई अम्बेडकर मैदान को भर देंगे। अगले दिन कांशीराम स्मारक स्थल पर ये भीड़ पहुंचेगी। जाहिर सी बात है कि 1 लाख की क्षमता वाले मैदान में सभी को जगह नहीं मिलेगी। ऐसे में शहर की सड़कों पर बसपा का नीला झंडा लिए कार्यकर्ता ही दिखेंगे। यही मायावती दिखाना भी चाहती हैं। मार्च-2026 से बड़े नेताओं को सदस्यता दिलाने की तैयारी
बसपा से जुड़े एक बड़े नेता का दावा है कि पार्टी मार्च-2026 से दूसरे दलों के बड़े नेताओं को सदस्यता दिलाने की तैयारी में जुटी है। कई ऐसे नेता अभी से पार्टी के संपर्क में हैं। उन्हें इंतजार के लिए कहा गया है। इनमें ओबीसी समाज से आने वाले कई ऐसे नेता हैं, जो पहले में बसपा में रह चुके हैं। अभी अलग-थलग पड़े हैं। —————————– ये खबर भी पढ़ें… मायावती फिर कमाल कर पाएंगी?, आकाश की रीलॉन्चिंग, बुआ-भतीजे का नया प्लान; कांशीराम की पुण्यतिथि पर शक्ति प्रदर्शन बसपा सुप्रीमो मायावती ने 9 साल बाद 9 अक्टूबर को शक्ति प्रदर्शन करने वाली हैं। इसी दिन कांशीराम की 19वीं पुण्यतिथि (महापरिनिर्वाण दिवस) है। बसपा का खुद को साबित करने का पुराना हथियार रैली है। जब भी पार्टी को अपना दमखम दिखाना होता है, वह बड़े स्तर पर रैलियां करती है और भीड़ इकट्ठा करती है। ऐसे में सवाल है कि आखिर बसपा का प्लान क्या है? क्या ये 2007 की यादें ताजा करने की कोशिश है? क्या आकाश आनंद की वापसी के बाद की नई रणनीति है? क्या कांशीराम की नीतियों को बसपा लागू करने वाली है? क्या बुआ-भतीजे की जोड़ी कमाल दिखा पाएगी? एक्सपर्ट क्या मानते हैं? पढ़िए पूरी खबर…
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, मायावती इस कार्यक्रम के जरिए 2027 के चुनावी रणनीति का औपचारिक आगाज करेंगी। इसीलिए 2007 की तर्ज पर सोशल इंजीनियरिंग की बिसात बिछाने की कवायद तेज हो चुकी है। बसपा ने भाईचारा कमेटी का पुनर्गठन किया है। यह दलितों, पिछड़ों, ब्राह्मणों और मुस्लिमों को एकजुट करने का काम करेगी। प्रदेश के 90 फीसदी बूथ स्तर पर कमेटियां गठित हो चुकी हैं। अब मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद और वफादार नेताओं को मैदान में उतारने को तैयार हैं। पार्टी की रणनीति साफ है- चौपालों के जरिए जनता तक पहुंचना। तीनों मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल की तुलना करना। यह साबित करना कि मायावती का शासन ही सबसे बेहतर था। मायावती भी इस चौपाल कार्यक्रम में शामिल होंगी। 2007 की तर्ज पर चल रही तैयारी
2007 का विधानसभा चुनाव बसपा के लिए स्वर्णिम अध्याय रहा। मायावती ने ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के नारे के साथ दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का कमाल दिखाया था। बसपा ने 206 सीटें जीतीं और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। उस समय ब्राह्मण वोटरों की मदद से पार्टी ने सवर्णों को भी अपनी गोद में लिया। लेकिन, 2012 के बाद बसपा का ग्राफ लगातार गिरता गया। 2017 में 19 सीटें, 2022 में सिर्फ एक सीट और 2024 लोकसभा में 2.06 फीसदी वोट शेयर मिला। अब मायावती उसी फॉर्मूले को दोहराने को बेताब हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा की सक्रियता इसका जीता-जागता प्रमाण है। मिश्रा, जो बसपा के ब्राह्मण चेहरे हैं, फिर से ब्राह्मणों को जोड़ने की कवायद में जुटे हैं। हाल ही में हुई एक बैठक में उन्होंने कहा था- 2007 में ब्राह्मण भाइयों ने बसपा को समर्थन दिया था। वही एकजुटता फिर लानी होगी। मायावती ने भी पिछली बैठकों में जोर दिया कि ब्राह्मण, दलित, पिछड़े और मुस्लिमों का गठजोड़ ही बसपा की ताकत है। 2025 में बसपा ने MBCS (मोस्ट बैकवर्ड क्लासेस) पर फोकस बढ़ाया है। क्योंकि, दलित-मुस्लिम समीकरण से ज्यादा फायदा MBCS-दलित गठजोड़ से होगा। यूपी में दलित 21%, OBC 40% और मुस्लिम 19% हैं। अगर ये एकजुट हो जाएं, तो भाजपा और सपा का गणित बिगड़ सकता है। चौपाल कार्यक्रम में खुद शामिल होंगी मायावती
पार्टी सूत्र बताते हैं, कि मायावती जल्द ही फील्ड में उतरेंगी। चौपालों के जरिए वे गांव-गांव पहुंचेंगी। लोगों को बताएंगी कि 2007-2012 के उनके शासन में कानून का राज था। पुलिस-प्रशासन निरंकुश नहीं था, कोई भेदभाव नहीं होता था। विकास के नाम पर ताजमहल, लोहिया आवास, नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस-वे जैसे प्रोजेक्ट्स को गति दी। इसके उलट, योगी सरकार पर वे अत्याचार और भेदभाव के आरोप लगाती रहेंगी। 2017-2022 के सपा शासन को भी वे ‘गुंडाराज’ बताकर निशाना बनाएंगी। हर बूथ पर 20-30 युवाओं की कोर टीम सक्रिय रहेगी
बसपा की सबसे बड़ी ताकत रही है भाईचारा कमेटी। 2007 में इन्हीं कमेटियों ने OBC और दलितों को एक मंच पर लाकर चुनावी सफलता दिलाई थी। 2025 में भी बसपा ने इन्हें पुनर्जीवित किया है। प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने बताया कि भाईचारा कमेटियां अब बूथ स्तर तक मजबूत हो रही हैं। हाल ही में लखनऊ में हुई पिछड़ा वर्ग भाईचारा कमेटी की बैठक में 9 अक्टूबर के कार्यक्रम को ऐतिहासिक बनाने का संकल्प लिया गया। ये कमेटियां PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले का जवाब देने के लिए बनाई गई हैं। सपा के अखिलेश यादव PDA पर जोर दे रहे हैं। लेकिन, बसपा इसे ‘सर्वजन’ से जोड़कर ब्राह्मणों को भी शामिल कर रही है। पार्टी ने 75 जिलों में कमेटियां गठित की हैं। OBC, दलित और मुस्लिम नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है। एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा- भाईचारा कमेटियां अब डोर-टू-डोर कैंपेन चलाएंगी। हर बूथ पर 20-30 युवाओं की टीम होगी, जो कांशीराम के विचारों को फैलाएगी। दरअसल, 2025 के पंचायत चुनावों को बसपा 2027 की सीढ़ी मान रही है। मायावती ने हालिया बैठक में निर्देश दिए कि सदस्यता अभियान तेज करें। गांव-गांव जाकर वोटर लिस्ट तैयार हो। बूथ कमेटियों का 90% गठन हो चुका है, बाकी 10% 9 अक्टूबर के बाद पूरा होगा। बिहार चुनाव के बाद यूपी में सक्रिय होंगे आकाश आनंद
मायावती के भतीजे आकाश आनंद बसपा की नई उम्मीद हैं। पार्टी से दो बार निष्कासन के बाद लौटे आकाश और अधिक पावरफुल हो चुके हैं। अब वह पार्टी में अघोषित तौर पर नंबर-2 की हैसियत में आ चुके हैं। उन्हें मायावती ने पार्टी का नेशनल संयोजक बनाया है। बसपा में इस तरह का पद पहली बार बनाया है। अभी आकाश बिहार चुनावों के प्रभारी हैं। वहां रैली के जरिए पार्टी के पक्ष में लगातार माहौल बनाने में जुटे हैं। उन पर पार्टी के युवा विंग को मजबूत करने का जिम्मा है। सूत्र बताते हैं कि 9 अक्टूबर के कार्यक्रम में आकाश को प्रमुख भूमिका मिलेगी। बसपा के ज्यादातर नेता और कार्यकर्ता आकाश को ही मायावती का उत्तराधिकारी मानकर चल रहे हैं। बसपा 2027 में उन्हें बड़ी भूमिका में सामने ला सकती है। आकाश ने हाल ही में कहा कि “बहन जी के मार्गदर्शन में बसपा एक बार फिर सत्ता में लौटेगी।” उनकी युवा अपील दलित वोटरों को आकर्षित कर रही है। खासकर, चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी से सीधी टक्कर के बीच। बसपा की कोशिश 2024 में पार्टी से दूर जा चुके अपने कोर जाटव वोटरों को एकजुट करने की है। इसके लिए आकाश को आगे किया जा रहा है। आकाश के जरिए पार्टी से दूर जा चुके दलित युवाओं को फिर से पार्टी से जोड़ना है। सतीश चंद्र मिश्र के जरिए ब्राह्मण वोटरों को जोड़ने की कोशिश
बसपा में ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व सतीश चंद्र मिश्रा ही करते हैं। 2025 में उनकी सक्रियता बढ़ी है। 2007 की तर्ज पर जल्द ही उन्हें ब्राह्मण सम्मेलनों का आयोजन करने की जिम्मेदारी मिलने वाली है। भाजपा को सत्ता में लाने के लिए ब्राह्मण वोटरों ने साथ तो दिया, लेकिन उन्हें सही सम्मान नहीं मिला। सरकार में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ब्राह्मण चेहरे हैं। लेकिन उन्हें सरकार में वैसी हनक नहीं मिली, जितनी उम्मीद थी। सतीश चंद्र मिश्र भाजपा पर खुलकर ब्राह्मण समाज के शोषण का आरोप लगाते हैं। कहते हैं कि 2007 में ब्राह्मण वोटरों ने बसपा को 80 सीटें दिलाईं। अब मिश्रा MBCS को भी जोड़ रहे हैं। पार्टी ने ब्राह्मण आउटरीच के लिए 30 से ज्यादा सम्मेलन की रूपरेखा तय की है। ये कैंपेन अयोध्या से शुरू होकर मथुरा तक चलेगा। मिश्रा का मानना है कि दलित-ब्राह्मण बंधुत्व यूपी की राजनीति बदल देगा। सतीश चंद्र मिश्र 9 अक्टूबर के कार्यक्रम की तैयारियों के लिए जिस तरीके से सक्रिय हैं, इससे साफ है कि बसपा अब मैदान में अधिक ताकत के साथ दिखेगी। मैदान की क्षमता एक लाख, भीड़ जुटाने का लक्ष्य 3 लाख
9 अक्टूबर का कार्यक्रम बसपा के लिए मील का पत्थर होगा। कांशीराम स्मारक स्थल पर लाखों कार्यकर्ता जुटेंगे। इस मौके पर कार्यकर्ताओं को मायावती संबोधित भी करेंगी और 2027 मिशन लॉन्च करेंगी। लखनऊ और आसपास के जिलों के कार्यकर्ता 9 अक्टूबर को ही सीधे कार्यक्रम स्थल पहुंचेंगे। लेकिन, प्रदेश के अन्य जिलों के कार्यकर्ता 8 अक्टूबर को ही रमाबाई अंबेडकर मैदान में पहुंच जाएंगे। अगले दिन वहीं से वे कार्यक्रम स्थल पहुंचेंगे। वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम कहते हैं- बसपा का लक्ष्य साफ है। वह भीड़ जुटाकर बताना चाहती हैं कि बसपा अब भी मजबूत है। 2022 के विधानसभा चुनाव में कमजोर तैयारियों के बावजूद 12% वोट पाना इसका सबूत भी है। 8 अक्टूबर को ही बसपा के कार्यकर्ता रमाबाई अम्बेडकर मैदान को भर देंगे। अगले दिन कांशीराम स्मारक स्थल पर ये भीड़ पहुंचेगी। जाहिर सी बात है कि 1 लाख की क्षमता वाले मैदान में सभी को जगह नहीं मिलेगी। ऐसे में शहर की सड़कों पर बसपा का नीला झंडा लिए कार्यकर्ता ही दिखेंगे। यही मायावती दिखाना भी चाहती हैं। मार्च-2026 से बड़े नेताओं को सदस्यता दिलाने की तैयारी
बसपा से जुड़े एक बड़े नेता का दावा है कि पार्टी मार्च-2026 से दूसरे दलों के बड़े नेताओं को सदस्यता दिलाने की तैयारी में जुटी है। कई ऐसे नेता अभी से पार्टी के संपर्क में हैं। उन्हें इंतजार के लिए कहा गया है। इनमें ओबीसी समाज से आने वाले कई ऐसे नेता हैं, जो पहले में बसपा में रह चुके हैं। अभी अलग-थलग पड़े हैं। —————————– ये खबर भी पढ़ें… मायावती फिर कमाल कर पाएंगी?, आकाश की रीलॉन्चिंग, बुआ-भतीजे का नया प्लान; कांशीराम की पुण्यतिथि पर शक्ति प्रदर्शन बसपा सुप्रीमो मायावती ने 9 साल बाद 9 अक्टूबर को शक्ति प्रदर्शन करने वाली हैं। इसी दिन कांशीराम की 19वीं पुण्यतिथि (महापरिनिर्वाण दिवस) है। बसपा का खुद को साबित करने का पुराना हथियार रैली है। जब भी पार्टी को अपना दमखम दिखाना होता है, वह बड़े स्तर पर रैलियां करती है और भीड़ इकट्ठा करती है। ऐसे में सवाल है कि आखिर बसपा का प्लान क्या है? क्या ये 2007 की यादें ताजा करने की कोशिश है? क्या आकाश आनंद की वापसी के बाद की नई रणनीति है? क्या कांशीराम की नीतियों को बसपा लागू करने वाली है? क्या बुआ-भतीजे की जोड़ी कमाल दिखा पाएगी? एक्सपर्ट क्या मानते हैं? पढ़िए पूरी खबर…