बांके बिहारी का 160 साल पुराना खजाना खुलेगा:हीरे-पन्नों से जड़े हार, सोने के कलश में सिक्के; VIDEO में तहखाने का रास्ता देखिए

बांके बिहारी मंदिर में ‘ठाकुरजी’ का 160 साल पुराना खजाना खोला जाएगा। हर कोई जानना चाहता है कि इस खजाने में क्या है? मंदिर में खजाना जिस कमरे में रखा है, उसके कपाट यूं तो 54 साल पहले खुले थे। यहां सोने-चांदी के जेवर, सोने के कलश और चांदी के सिक्के रखे हैं। इनकी वेल्युएशन कितनी है? इसका कभी सर्वे नहीं हुआ। अनुमान है कि ये कई सौ करोड़ के हो सकते हैं। अब सवाल उठता है कि खजाने को खोलने की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 9 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में हाई पावर मैनेजमेंट कमेटी बना दी। इसके सदस्य 4 मीटिंग कर चुके हैं। उन्होंने तय किया कि मंदिर के गर्भगृह के बराबर बने इस कमरे को खोला जाए। खजाने की लिस्टिंग और वीडियोग्राफी भी होगी। इसके बाद पूरे खजाने को वैसे ही कमरे में दोबारा रखकर कपाट सील कर दिया जाएगा। इसकी लिस्ट कमेटी के सामने रखी जाएगी। तब तय होगा कि आगे क्या करना है। इससे यह पता लग जाएगा कि मंदिर के पास आखिर कितनी संपत्ति है। बांके बिहारी मंदिर में खजाना कहां रखा है? इसमें क्या-क्या है? ये आखिरी बार किन हालात में खोला गया था? ये जानने के लिए दैनिक भास्कर टीम बांके बिहारी मंदिर पहुंची। पढ़िए रिपोर्ट… सेवायत बोले- ये 160 साल पहले तैयार किया गया
मंदिर जाने के लिए मुख्य गली में स्वामी हरिदास जी का एक मंदिर है, यहां हमको मंदिर के सेवायत प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी मिले। हमने पूछा- गोस्वामी जी, उस कमरे में क्या है? वह मुस्कुराते हुए बोले- ये कोई सामान्य कमरा नहीं, इसे तोषखाना कहते हैं यानी भगवान का खजाना। ये कमरा कोई अलग से नहीं बनवाया गया। ये 160 साल पहले बना था, जब मंदिर को तैयार किया गया था। यह तोषखाना ठीक वहां है, जहां बांके बिहारी विराजमान हैं। सीधे शब्दों में गर्भगृह में उनके सिंहासन के ठीक नीचे स्थित है। इसे बहुत कम लोगों ने अंदर से देखा होगा। क्योंकि, जब इसको 54 साल पहले खोला गया, उस वक्त मेरे पूर्वज आचार्य ललित बल्लभ गोस्वामी भी थे। उन्होंने इसके बारे में मुझे जो कुछ बताया, वही मैं आपको बता रहा। चांदी के शेषनाग, जिनके कई मुख थे
हमने पूछा- आपके पूर्वजों ने ये तो बताया होगा कि इस खजाने में क्या-क्या है? वह कहते हैं- साल 1864 में वैष्णव परंपरानुसार इस मंदिर को बनवाया गया। उस वक्त गर्भगृह श्री बांके बिहारी के सिंहासन के ठीक नीचे तहखाने में तोषखाना बनवाया गया। जब इसे आखिरी बार खोला गया था, तब इसमें एक चांदी के शेषनाग देखे गए थे, उनके कई मुख थे। सोने के कलश थे, इसमें नवरत्न भरे हुए थे। इसके अलावा गोस्वामी श्रीरूपानन्दजी महाराज, मोहन लालजी महाराज को समर्पित श्रद्धांजलि उल्लेख पत्र भी रखे हुए थे। 23 साल पहले खोलने की कोशिश हुई
हमने पूछा – क्या कभी इस खजाने को खोलने का प्रयास हुआ है? बल्लभ गोस्वामी कहते हैं- नहीं ऐसा नहीं है, मंदिर के सेवायतों ने ही इसको खोलने का प्रयास किया है। कुछ भक्त भी इसमें शामिल थे, कोर्ट तक मामला पहुंचा, मगर खजाना नहीं खुला। ये 2002 की बात है, मंदिर के तत्कालीन रिसीवर वीरेंद्र कुमार त्यागी को कई सेवायतों ने लिखकर दिया कि एक बार खजाना खोलना चाहिए। आवेदन पर सेवायतों के साइन भी थे। फिर 2004 में मंदिर प्रशासन ने गोस्वामियों के निवेदन पर दोबारा खजाना का कमरा खोलने के लिए कानूनी प्रयास किए, मगर वह सफल नहीं हुए। खजाने का एक हिस्सा SBI की ब्रांच में रखा
हमने पूछा- फिर ये 54 साल पहले कैसे खुला था? वह कहते हैं- ये 1971 की बात है। तब मंदिर प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष प्यारेलाल गोयल की अगुआई में उस कमरे के कपाट खोले गए थे, जिसमें खजाना रखा है। इस खजाने से कीमती आभूषण आदि निकालकर एक लिस्ट बनाई गई। पूरे सामान को एक बक्से में सील लगाकर बंद किया गया। हमने पूछा- फिर खजाने के उस हिस्से का क्या हुआ? वह कहते हैं- उसको मथुरा में भूतेश्वर की स्टेट बैंक की शाखा के लॉकर में सुरक्षित जमा कर दिया गया था। लिस्ट की एक कॉपी समिति के सभी 7 सदस्यों को मिली थी। इसके बाद आज तक उस बक्से को वापस लाने के प्रयास ही नहीं किए गए। मंदिर की जमा पूंजी की पूजा करके खजाने की शुरुआत हुई
हमने पूछा- खजाना बनाने की जरूरत ही क्यों पड़ी? बल्लभ गोस्वामी कहते हैं – मंदिर को बनवाते वक्त जो कुछ भी जमा पूंजी बची थी, उसकी पूजा करके खजाने की तरह स्थापित किया गया था। इसके बाद विंध्याचल राजघराने की बहुरानी बांके बिहारी के दर्शन करने आईं। वह ठाकुरजी की छटा देखकर ऐसा मोहित हुईं कि उन्होंने खुद पहन हुआ मयूर आकृति का हार अर्पित कर दिया। इस पर पन्ने लगे हुए थे। इसी तरह से, समय-समय पर यहां आने वाले राजा महाराजाओं ने कई चांदी-सोने के सिक्कों से भरे कलश, आभूषण यहां दान में दिए। खासकर भरतपुर, करौली, ग्वालियर रियासतों ने समय-समय पर दान दिए। इसके अभिलेख भी खजाने में रखे हुए हैं। गर्भगृह से दाएं तरफ कपाट, फिर सीढ़ियां
खजाना जिस कमरे में रखा है, वो कमरा कितना बड़ा है? कैसा दिखता है? बल्लभ गोस्वामी ने कहा- यह करीब 20×30 का कमरा है। इसमें जाने के लिए, जहां बांके बिहारी विराजमान हैं, उनके दाहिने हाथ की ओर बने दरवाजे से करीब 12 से 15 सीढ़ी उतरने के बाद बाएं ओर की तरफ ठाकुरजी के सिंहासन के एकदम बीचोंबीच एक कमरे तक पहुंचते हैं, यहीं पर वो खजाना रखा है। अंग्रेजों के समय 2 बार चोरियां हुई
क्या कभी खजाने की चोरी भी हुई है? उन्होंने बताया- ये ब्रिटिश शासनकाल की बात है। 1926 और 1936 में 2 बार चोरियां भी हुईं थीं। उस वक्त की पुलिस ने जांच की थी। अंग्रेजों के थानों में FIR भी लिखी गई। जांच के बाद 4 लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई, उन्हें जेल भेजा गया था। तब खजाने से क्या चोरी हुआ, ये हमारे पूर्वज भी ठीक से नहीं बता सके थे। चोरी के बाद गोस्वामी समाज ने तहखाने का मुख्य द्वार बंद करके सामान डालने के लिए एक छोटा सा मुहाना बना दिया था। लेकिन, 1971 में कोर्ट के आदेश पर खजाने के दरवाजे के ताले पर सील लगा दी गई, जो आज तक बंद है। ……….
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