वृंदावन बांके बिहारी मंदिर और उससे जुड़े कॉरिडोर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने आदेश दिया है कि मंदिर प्रबंधन और वृंदावन कॉरिडोर से जुड़ी सभी याचिकाओं की सुनवाई अब एक ही पीठ करेगी। मंदिर की तरफ से कोर्ट गए गोस्वामियों को उस समय झटका लगा, जब उनके वकील को खारिज की गई याचिका को दोबारा उठाने पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी का सामना करना पड़ा। दरअसल, बुधवार को इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश बी. आर गवाई, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ कर रही थी। गोस्वामी पक्ष के वकील ने मामले को फिर से उठाने की कोशिश की। मगर पीठ ने सख्त लहजे में उन्हें डांटते हुए कहा- कल ही आपने यह मामला न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ के सामने उठाया था। अब दोबारा यही गेम खेने की कोशिश मत करो! कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वकीलों ने इस मामले को किसी अन्य पीठ के सामने फिर से उठाया तो उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट ने कहा- मंदिर के सभी मामलों को एक ही पीठ सुनेगी दरअसल, याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में कई आवेदनों को मूल याचिका के साथ टैग करने का अनुरोध किया, तो जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने टोका और कहा कि मंगलवार को भी आपने यही याचिका हमारी पीठ के सामने रखी थी और हमने उसे खारिज कर दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश सरकार के बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन अध्यादेश से उत्पन्न सभी मामलों को मिलाकर अब एक ही पीठ के सामने रखा जाएगा, ताकि सुनवाई में स्पष्टता और एकरूपता बनी रहे। कोर्ट ने पूछा था- सरकार ने कितने मंदिरों को नियंत्रण में लिया इससे पहले 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई करते हुए मंदिर की मैनेजमेंट कमेटी की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल से पूछा था- सरकार ने, राज्य ने, कितने सैकड़ों मंदिरों का नियंत्रण अपने हाथ में लिया है? उन्हें जो भी दान मिल रहा हो… बेहतर होगा कि आप वहां जाएं और पता करें। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जो उत्तर प्रदेश श्री बांके बिहारी जी मंदिर न्यास अध्यादेश-2025 के खिलाफ दायर की गई है। मथुरा स्थित ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर की प्रबंधन समिति ने एडवोकेट तन्वी दुबे के जरिए यह याचिका दायर की थी। याचिका में इस अध्यादेश को चुनौती दी गई है जिसमें मंदिर के प्रशासन का नियंत्रण राज्य सरकार को सौंप दिया गया है। जब कोर्ट को बताया गया कि मंदिर से संबंधित एक अन्य आवेदन एक अलग पीठ के पास लंबित है, तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों मामलों को एकल पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के आदेश की जरूरत है। सुनवाई की शुरुआत में बेंच ने सवाल किया कि याचिकाकर्ता इलाहाबाद हाईकोर्ट के बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट क्यों आए? कपिल सिब्बल ने पूरा विवाद बताते हुए कहा कि राज्य सरकार एक निजी धार्मिक संस्थान का प्रबंधन अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रही है।उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार को एक कॉरिडोर (गलियारा) परियोजना के पुनर्विकास के लिए मंदिर निधि के 300 करोड़ रुपए का उपयोग करने की अनुमति दी है, इस फैसले को वर्तमान में चुनौती दी जा रही है। संबंधित मामले में मंदिर के श्रद्धालु देवेंद्र गोस्वामी ने सुप्रीम कोर्ट के 15 मई के आदेश को वापस लेने का अनुरोध करते हुए एक आवेदन दायर किया है, जिसमें तर्क दिया गया है कि यह आदेश मंदिर की प्रबंधन समिति का पक्ष सुने बिना पारित किया गया था। सेवायत रजत गोस्वामी और 350 सदस्यों वाली मंदिर प्रबंधन समिति की याचिका में कहा गया है कि राज्य का आचरण दुर्भावनापूर्ण था क्योंकि पांच एकड़ भूमि के अधिग्रहण के लिए मंदिर निधि के उपयोग से संबंधित मुद्दे पर हाईकोर्ट आठ नवंबर, 2023 को पहले ही निर्णय दे चुका है और उसने राज्य को भूमि अधिग्रहण के लिए मंदिर निधि का उपयोग करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। समिति ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के आठ नवंबर, 2023 के आदेश के खिलाफ अपील दायर नहीं की है और इसके बजाय उसने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित याचिका में पक्षकार बनाए जाने के लिए आवेदन किया है। याचिका में कहा गया है- विशेष अनुमति याचिका गिरिराज सेवा समिति के चुनावों से संबंधित एक बिल्कुल अलग मुद्दे से संबंधित थी, जो बांके बिहारी जी महाराज मंदिर से बिल्कुल अलग मुद्दा है। सर्वोच्च न्यायालय ने 15 मई, 2025 के आदेश में अन्य बातों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश राज्य को मंदिर के धन का उपयोग करके पांच एकड़ भूमि अधिग्रहण करने की अनुमति देने का निर्देश दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के 15 मई के आदेश के खिलाफ एक आवेदन दायर किया गया, जिसका मुख्य आधार यह था कि न तो मंदिर और न ही सेवायतों को वर्तमान विवाद में कभी पक्षकार बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 15 मई को राज्य की ओर से दायर पक्षकार बनाए जाने के एक आवेदन को स्वीकार कर लिया और मथुरा में ‘श्री बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर’ को विकसित करने की उत्तर प्रदेश सरकार की योजना का मार्ग प्रशस्त कर दिया, जिससे बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को लाभ होगा। इसने राज्य की इस याचिका को स्वीकार कर लिया कि बांके बिहारी मंदिर के धन का उपयोग केवल मंदिर के चारों ओर पांच एकड़ भूमि खरीदने के लिए किया जाए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिर और ‘कॉरिडोर’ के विकास के लिए अधिग्रहित की जाने वाली भूमि देवता या ट्रस्ट के नाम पर होनी चाहिए।
…………… ये भी पढ़ें : 500 करोड़ के बांके बिहारी कॉरिडोर को SC की मंजूरी:पैसा मंदिर के खजाने से लिया जाएगा, भगवान के नाम पर होगी जमीन बांके बिहारी मंदिर के खजाने से कॉरिडोर बनाए जाने का रास्ता साफ हो गया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कॉरिडोर बनाने की मंजूरी दे दी। अब 5 एकड़ में भव्य कॉरिडोर बनाया जाएगा। कोर्ट ने यूपी सरकार को मंदिर के 500 करोड़ रुपए से कॉरिडोर के लिए मंदिर के पास 5 एकड़ जमीन अधिगृहीत करने की इजाजत दी। साथ ही शर्त लगाई कि अधिगृहीत भूमि भगवान के नाम पर पंजीकृत होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को भी संशोधित किया। हाईकोर्ट ने मंदिर के आसपास की भूमि को सरकारी धन का उपयोग करके खरीदने पर रोक लगा दी थी। पढ़िए पूरी खबर…
…………… ये भी पढ़ें : 500 करोड़ के बांके बिहारी कॉरिडोर को SC की मंजूरी:पैसा मंदिर के खजाने से लिया जाएगा, भगवान के नाम पर होगी जमीन बांके बिहारी मंदिर के खजाने से कॉरिडोर बनाए जाने का रास्ता साफ हो गया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कॉरिडोर बनाने की मंजूरी दे दी। अब 5 एकड़ में भव्य कॉरिडोर बनाया जाएगा। कोर्ट ने यूपी सरकार को मंदिर के 500 करोड़ रुपए से कॉरिडोर के लिए मंदिर के पास 5 एकड़ जमीन अधिगृहीत करने की इजाजत दी। साथ ही शर्त लगाई कि अधिगृहीत भूमि भगवान के नाम पर पंजीकृत होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को भी संशोधित किया। हाईकोर्ट ने मंदिर के आसपास की भूमि को सरकारी धन का उपयोग करके खरीदने पर रोक लगा दी थी। पढ़िए पूरी खबर…