बाघ-तेंदुए 13 साल में 476 लोगों को खा गए:यूपी में गन्ने के खेतों को बनाया घर; एक्सपर्ट बोले- कोरोना में छोड़ दिया था जंगल

तारीख- 10 सितंबर, जगह- लखीमपुर खिरी का सहिजनी-मझरा गांव दोनों गांवों के बीच में गन्ने की लहलहाती फसल। पूर्व प्रधान प्रकाश चंद्र गन्ने का खेत देखने जाते हैं। तभी खेत से सरसराहट की आवाज आई। कुछ समझ पाते, तभी सामने तेंदुआ खड़ा था। भागने से पहले ही तेंदुआ झपट पड़ा और चेहरे पर पंजा मार दिया। चीख सुनकर आसपास के किसान दौड़े, तो जान बची। तलाशी ली गई, तो अंदर दो शावक मिले। यह पहली घटना नहीं थी। लखीमपुर खीरी, बिजनौर और पीलीभीत में इंसानों पर हर साल 200 से ज्यादा हमले गन्ने के खेत में छिपे तेंदुए और बाघ कर रहे हैं। तराई बेल्ट के बिजनौर, पीलीभीत और लखीमपुर खीरी में सबसे ज्यादा गन्ने की खेती है। यही फसल अब उन किसानों के लिए सिरदर्द बन गई है। तेंदुए बौर बाघ जंगलों से निकलकर एक बार गन्ने के खेतों में आए, तो फिर हमेशा के लिए यहीं के होकर रह गए। खेतों में शावकों को जन्म दिया। इस तरह इनका कुनबा बढ़ता गया। स्थिति यह है कि आज खेतों में बाघ और तेंदुए दिख रहे हैं। इन्हें नाम भी दिया गया है- शुगर केन टाइगर और तेंदुए। इस बार संडे बिग स्टोरी में कहानी बाघ-तेंदुआ की पसंदीदा जगह गन्ने का खेत। क्यों इनके लिए ये फेवरेट है? कैसे इनकी संख्या बढ़ी? एक्सपर्ट क्या मानते हैं? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… अब ये केस ये भी जानिए… लखीमपुर खीरी में गोविंदपुर फॉर्म है। यहां के रहने वाले सरजीत सिंह का घर खेतों से सटा है। घर के ठीक पीछे गन्ने के घने खेत हैं। सरजीत बताते हैं- 26 अप्रैल को खेतों में कुछ सरसराहट की आवाज हुई। अचानक तेंदुआ निकालकर घर के अंदर घुस आया। उसने सीधे मुझ पर हमला बोल दिया। मेरे चीखने-चिल्लाने की आवाज सुनकर घरवाले बाहर निकले, तो तेंदुआ मुझे छोड़कर वापस खेतों में घुस गया। इस हमले में मुझे हाथ में चोटें आईं। सरजीत कहते हैं कि मेडिकल जांच रिपोर्ट में डॉक्टरों ने यह लिखकर नहीं दिया कि मुझ पर अटैक तेंदुए ने किया है। इस वजह से जिला प्रशासन की तरफ से मुझे कोई भी मुआवजा नहीं मिल पाया। गोविंदपुर फॉर्म के ही रहने वाले बलविंदर सिंह बताते हैं- एक दिन में खेतों पर काम कर रहा था। तभी गन्ने के खेत से निकले तेंदुए में मुझ पर हमला कर दिया। मेरे शोर मचाने पर तेंदुआ मुझे छोड़कर भाग निकला। लेकिन थोड़ी ही दूर पर उसने दूसरे किसान पर हमला कर दिया। बलविंदर के अनुसार, गन्ने के खेतों में तेंदुए अक्सर दिखाई दे जाते हैं। इसलिए हमें बेहद सावधानी से खेतों पर जाना पड़ता है। हम कोशिश करते हैं कि खेतों पर समूह में काम करें, जिससे अगर तेंदुआ हमला भी करें तो उसे निपटा जा सके। 13 साल में 3 गुना ज्यादा मौत, घायलों की संख्या 5 गुना बढ़ी
पिछले 13 साल में वन्य जीवों के हमलों में 476 लोगों ने अपनी जान गंवाई है। इसमें सबसे ज्यादा मौतें तेंदुओं और बाघों के हमले से हुई हैं। 13 साल पहले (2012-13) जानवरों के हमले में 22 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 42 लोग घायल हुए थे। 2024 से मई, 2025 तक जानवरों के हमले में 60 लोगों ने जान गंवाई, वहीं 200 से ज्यादा घायल हुए। अकेले बिजनौर में तेंदुआ इस महीने 4 बच्चों की जान ले चुका है। लोग बोले- तेंदुआ रोजाना हमले कर रहा
बिजनौर में उत्तराखंड बॉर्डर पर है भागुवाला। इससे सटा है रामदास वाली गांव। यहां बीते दिनों तेंदुए के हमले में 1 बच्चे की मौत हो गई थी। इस गांव के राजकुमार मौजूदा हालात बताते हैं- दहशत इतनी है कि लोग चारा काटने के लिए जंगल नहीं जा रहे। लोगों को शौच जाने की भी दिक्कत हो रही है। क्योंकि, अभी भी किसान परिवार के लोग शौच करने जंगलों में ही जाते हैं। फसल कटने के लिए तैयार है। तेंदुआ इस वक्त इतना आदमखोर हो चुका है कि रोजाना किसी न किसी पर हमला कर रहा। ऐसे में लोग रातों को सो भी नहीं पा रहे। घर के 2 सदस्य सोते हैं, तो दो जागते हैं। अब एक्सपर्ट की बात बोले- कोरोना में इंसान घरों में घुसा, वन्य जीव जंगल छोड़ खेतों में आए
बाघ और लैपर्ड का कुनबा आबादी में क्यों और कैसे बढ़ रहा? इस पर हमने वन्य जीव विशेषज्ञ डॉ. आरके सिंह से बात की। डॉ. सिंह अब तक 200 से ज्यादा लैपर्ड-बाघ, हाथी और अन्य वन्य जीवों का रेस्क्यू कर चुके हैं। वो बताते हैं- कोरोना महामारी के वक्त इंसान घरों के अंदर घुसा था। खेत-जंगल खाली हो गए थे। ऐसे में वन्य जीव जंगलों से बाहर निकलकर धीरे-धीरे आबादी की तरफ आने शुरू हुए। सामान्य तौर पर वन्य जीव मनुष्यों से डरते हैं। लेकिन, जब उन्हें खेतों में कोई मनुष्य नहीं दिखा, तो यहीं शरण ले ली। वन्य जीवों को खेतों की जिंदगी और आसान दिखी। जंगलों की तरह यहां किसी तरह का कोई कंपटीशन नहीं था। उन्हें भोजन के लिए पर्याप्त मात्रा में नीलगाय, जंगली सूअर, पाड़ा, खरगोश और मोर जैसे पशु-पक्षी आसानी से मिल गए। जंगलों में शिकार करने के बाद भोजन खाने के लिए भी वन्य जीवों में कंपटीशन होता है, वैसा खेतों में नहीं था। इसलिए इन्हें खेत रास आ गए। मेटिंग प्रक्रिया भी जंगलों की अपेक्षा खेतों में आसान थी। कोरोना पीरियड में लैपर्ड-टाइगर के जो बच्चे पैदा हुए, वो अब इन 3-4 साल में खूब बड़े हो गए हैं। इस तरह इन वन्य जीवों की खेतों में जेनरेशन बढ़ती चली गई। जब जेनरेशन बड़ी हुई तो उन्होंने अपना अलग साम्राज्य ढूंढना शुरू किया और जंगल से बाहर नया ठिकाना बनाते गए। बिजनौर से सबसे ज्यादा तेंदुए रेस्क्यू
डॉ. आरके सिंह ने साल 2023-24 में बिजनौर जिले के नगीना, धामपुर, नजीबाबाद, अफजलगढ़ क्षेत्र से बहुत ज्यादा तेंदुए रेस्क्यू किए हैं। वो कहते हैं- वन्य जीवों को अपने रहने के लिए वनस्पति बहुत पसंद है। चूंकि ईख (गन्ना) की ऊंचाई ज्यादा होती है। ये वनस्पति इतनी घनी होती है कि कोई अंदर आसानी से कुछ देख नहीं पाता। इसीलिए तेंदुए या बाघ सबसे ज्यादा अपना सुरक्षित ठिकाना खेतों में ही बनाते हैं। यही वजह है कि वन विभाग भी सबसे ज्यादा पिंजरे गन्ने के खेतों में लगाता है। यूपी में 205 बाघ, 848 तेंदुए वन्य जीवों का डेटा जुटाने के लिए वन विभाग हर 4 साल पर इनकी गिनती कराता है। साल- 2018 में जहां यूपी में 173 बाघ थे, वो 2022 में बढ़कर 205 हो गए। वहीं, तेंदुओं की संख्या 848 पाई गई है। हालांकि, ये डेटा सिर्फ वन्य क्षेत्रों की गणना पर आधारित होता है। इसमें वो वन्य जीव शामिल नहीं होते, जो खेतों में घूम रहे होते हैं। ऐसे में लोग वन विभाग की इस गणना पर सवाल भी उठाते हैं। लोगों के अनुसार, बिजनौर जिले में ही तेंदुओं की संख्या कई सौ पार है। वन विभाग क्या कर रहा? खेतों में पिंजरे लगवाए, लोगों को मुखौटे बांटे
बिजनौर, लखीमपुर खीरी और पीलीभीत जिले में जहां-जहां तेंदुआ और बाघ के पदचिह्न पाए गए हैं, उस आधार पर वन विभाग ने प्रभावित एरिया में पिंजरे रखवा दिए हैं। ज्यादातर जगहों पर पिंजरों में उनके लिए शिकार ही नहीं रखा गया है। ऐसे में तेंदुए-बाघ पिंजरे के अंदर कैसे आएंगे, ये बड़ा सवाल है। वन विभाग प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को मुखौटे बांट रहा है। दरअसल, ये मुखौटे मनुष्य जैसे हैं। खेतों में इन्हें जगह-जगह डंडे के ऊपर बांधकर टांग दिए जाएं तो ऐसा लगेगा, जैसे कोई मनुष्य खड़ा हो। वन विभाग का मानना है कि ये मुखौटे देखकर तेंदुए-बाघ उसे मनुष्य समझकर भाग जाएंगे। अकेले बिजनौर में वन विभाग ने करीब 110 पिंजरे जगह-जगह लगाए हैं। इसके अलावा 36 ब्लिंकिंग लाइटें लगाई हैं। अब तक तकरीबन 10 हजार मुखौटे भी बांटे गए हैं। कुल मिलाकर वन विभाग इन्हें पकड़ने का प्रयास तो कर रहा है, लेकिन संख्या इतनी ज्यादा है कि ये हाथ नहीं आ रहे। ऐसे में लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है। ————————- ये खबर भी पढ़ें… बिजनौर में तेंदुए ने 14 दिन में 4 को मारा, उत्तराखंड बॉर्डर से सटे 50 गांवों में खौफ यूपी के बिजनौर में तेंदुओं का खौफ है। 14 दिन के भीतर 3 बच्चों समेत 4 लोगों को मौत की नींद सुला चुका है। दर्जनों लोगों पर हमला हो चुका है। नजीबाबाद क्षेत्र के करीब 40 किलोमीटर के दायरे में 50 से ज्यादा गांवों के लोग दहशत के साये में जी रहे हैं। कई गांव में तेंदुए देखे जा रहे हैं। हमने उत्तराखंड के 2 बॉर्डर कोटद्वार और भागुवाला से सटे इलाकों में प्रभावित गांवों का दौरा किया। जिन्होंने अपनों को खोया, उनका दर्द जाना। पढ़िए पूरी खबर…