यूपी की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले फिर से गठबंधन की बिसात बिछने लगी है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कांशीराम की पुण्यतिथि पर भले ही बड़े दलों से दूरी का ऐलान कर दिया हो। लेकिन, बिहार चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बदले तेवरों ने सियासी चर्चाओं को नई हवा दे दी है। सवाल ये नहीं कि बसपा गठबंधन में जाएगी या नहीं। सवाल है कि अगर मायावती ने रुख बदला तो यूपी की सत्ता का गणित किस हद तक उलट-पलट सकता है। दैनिक भास्कर ने सपा, बसपा और कांग्रेस के नेताओं और राजनीतिक जानकारों से बात की। यह समझने की कोशिश की कि क्या बसपा को लेकर कांग्रेस और सपा की ओर से पर्दे के पीछे कोई सियासी बातचीत चल रही? सपा-बसपा साथ आए तो क्या राजनीतिक तस्वीर बनेगी? बसपा और कांग्रेस ने गठबंधन में 2027 विधानसभा का चुनाव लड़ा तो किसे नुकसान पहुंचाएंगे? अगर सपा-कांग्रेस के महागठबंधन में बसपा भी शामिल हुई तो भाजपा का चुनावी गणित कितना प्रभावित होगा? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… मायावती के ऐलान के बाद भी क्यों छिड़ी चर्चा
बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने 9 अक्टूबर, 2025 को कांशीराम की पुण्यतिथि पर लखनऊ में सभा की थी। इसमें ऐलान किया था कि बसपा भविष्य में किसी बड़े राजनीतिक दल से गठबंधन नहीं करेगी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी। हालांकि, उन्होंने समान विचारधारा वाले छोटे दलों से गठबंधन के विकल्प खुले रखे। राजनीति में किसी भी संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। बिहार चुनाव के नतीजों के बाद बसपा को लेकर कांग्रेस और सपा के सुर बदले नजर आ रहे। यूपी कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडे ने कहा कि अगर बसपा इंडिया ब्लॉक में शामिल होना चाहे, तो उसका स्वागत किया जाएगा। क्योंकि, राजनीति में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होतीं। अगले दिन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी इसी तरह का बयान दिया। कहा कि कांग्रेस वटवृक्ष है और अगर बसपा साथ आना चाहे, तो उसका स्वागत है। हालांकि, आखिरी फैसला शीर्ष नेतृत्व लेगा। सपा की ओर से देवरिया जिले के सलेमपुर से सांसद रमाशंकर राजभर ने भी कहा कि यदि बसपा पीडीए के साथ आती है, तो उसका स्वागत किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यूपी में भाजपा बनाम पीडीए की लड़ाई चल रही। इस लड़ाई में जो भी साथ आएगा, उसका स्वागत किया जाएगा। यूपी में भले ही बसपा और कांग्रेस के बीच कभी औपचारिक गठबंधन न रहा हो। लेकिन, 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बावजूद सपा और बसपा 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन कर चुके हैं। वहीं, सपा और कांग्रेस ने भी पिछला लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था। ऐसे में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर बनने वाले तीन संभावित गठबंधनों के सियासी समीकरणों को समझना जरूरी हो जाता है। यूपी में गठबंधन की 3 संभावनाएं बनेंगी इंडी गठबंधन में बसपा शामिल होती है, तो क्या बनेगा समीकरण
वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल के मुताबिक, पिछले एक साल से बसपा खुद को राजनीतिक तौर पर मजबूत करने की कोशिश कर रही। इसके तहत पार्टी ने संगठन में बदलाव किए हैं। भतीजे आकाश आनंद को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। बिहार चुनाव में बसपा को जहां एक सीट पर जीत मिली, वहीं 7 सीटों पर उसके प्रत्याशियों ने मजबूत चुनौती पेश की। बसपा यूपी में जहां अपने कोर वोटरों को सहेजने में जुटी है, वहीं मुस्लिम मतदाताओं को भी पार्टी से जोड़ने की कोशिशें तेज कर दी हैं। इसके लिए मुस्लिम भाईचारा कमेटी बनाई गई है। खुद मायावती यह संदेश देने में लगी हैं कि मुस्लिम समर्थन के बल पर भाजपा को हराने में बसपा ही निर्णायक भूमिका निभा सकती है। समाजवादी पार्टी को 2014, 2017, 2019, 2022 और 2024 के चुनावों में मुस्लिमों का भरपूर समर्थन मिला। इसके बावजूद भाजपा को सत्ता में आने से रोका नहीं जा सका। वहीं, 2007 में मुस्लिमों के लगभग एक चौथाई समर्थन के सहारे बसपा ने अपने दम पर सरकार बनाई थी। बसपा ने 9 अक्टूबर को कांशीराम की पुण्यतिथि पर लाखों की भीड़ जुटाकर यह भी जता दिया था कि उसे पूरी तरह से हाशिए पर नहीं डाला जा सकता। हाल के दिनों में मायावती ने भाजपा के प्रति बहुत अधिक कटुता भी नहीं दिखाई। इससे संकेत मिलते हैं कि वह सपा और कांग्रेस के साथ इंडी गठबंधन में शामिल होने का विकल्प खुला रख सकती हैं। हालांकि, बिहार में इंडी गठबंधन में शामिल आरजेडी, कांग्रेस सहित अन्य दलों के खराब प्रदर्शन ने यूपी में सपा और कांग्रेस की चिंता जरूर बढ़ा दी है। क्या बसपा इस गठबंधन में शामिल होगी?
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र दुबे 2019 के लोकसभा चुनाव का उदाहरण देते हैं। तब भाजपा को रोकने के लिए सपा, बसपा और रालोद के बीच महागठबंधन हुआ था। उस समय राजनीतिक और मीडिया हलकों में माना जा रहा था कि यह गठबंधन भाजपा को भारी नुकसान पहुंचाएगा, लेकिन नतीजे इसके बिल्कुल उलट आए। सपा अपने पारिवारिक गढ़ की केवल 5 लोकसभा सीटें ही जीत सकी, जबकि मायावती के नेतृत्व में बसपा के 10 सांसद लोकसभा पहुंचे। 2019 के लोकसभा चुनाव में यह भी सामने आया कि सपा-बसपा-रालोद के बीच औपचारिक गठबंधन तो हुआ, लेकिन कार्यकर्ताओं के स्तर पर दूरियां बनी रहीं। मौजूदा समय में गांवों में सपा और बसपा के कोर वोटरों के बीच टकराव की स्थिति और ज्यादा दिखाई देती है। यादव और कुर्मी जैसे ओबीसी समुदायों के राजनीतिक रूप से मजबूत होने के साथ ही उनकी तल्खी दलित समुदाय के साथ बढ़ती गई। असर यह हुआ कि 2019 में पहली बार यह देखने को मिला कि बसपा के वोट सपा की ओर ट्रांसफर नहीं हुए। जबकि, सपा के वोटों का ट्रांसफर बसपा की ओर हुआ था। ये हालात आज भी बड़े स्तर पर बदले नहीं हैं। 2019 में बसपा 38 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जबकि सपा 37 सीटों पर। रालोद 3 सीटों पर और अमेठी-रायबरेली की सीटों पर कांग्रेस को समर्थन दिया गया था। इससे साफ है कि सीट बंटवारे में बसपा कभी भी जूनियर पार्टी की भूमिका स्वीकार नहीं करेगी। भले ही उसे सीनियर दल का दर्जा न मिले, लेकिन कम से कम बराबरी की सीटों से कम पर बसपा समझौता करने को तैयार नहीं होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए सपा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का त्याग कर पाएगी? इसका जवाब फिलहाल ‘न’ ही नजर आता है। यानी सपा-बसपा-कांग्रेस के बीच महागठबंधन की संभावना बेहद कमजोर दिखती है। गठबंधन होने पर कितना फायदा और भाजपा को कितना नुकसान
सपा और बसपा के बीच पहली बार 1993 में गठबंधन हुआ था। उस समय यूपी की 425 विधानसभा सीटों में से बसपा ने 164 सीटों पर चुनाव लड़ा। 67 सीटें जीतीं, जबकि सपा ने 256 सीटों पर चुनाव लड़कर 109 सीटों पर जीत दर्ज की। उस दौर में दोनों दलों के वोट एक-दूसरे को प्रभावी रूप से ट्रांसफर हुए थे। बाबरी विध्वंस के बाद भी भाजपा बहुमत से दूर रह गई थी। हालांकि, यह गठबंधन 1995 में गेस्ट हाउस कांड के चलते टूट गया था। इसके 25 साल बाद 2019 में दोनों दल फिर साथ आए। लेकिन समय के साथ दोनों के कोर वोटरों के बीच पैदा हुई कटुता आज भी बरकरार है। जमीनी स्तर पर इस कटुता को खत्म करने के लिए तीनों दलों को चुनाव से काफी पहले गठबंधन करना होगा। इसके साथ ही कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल और भरोसा कायम करने पर गंभीरता से काम करना पड़ेगा। तभी यह गठबंधन मुस्लिम, दलित और यादव वोटबैंक के सहारे करीब 45 फीसदी वोट हासिल कर सकता है। क्या सपा-बसपा में गठबंधन की संभावना है?
बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल इस तरह की किसी भी संभावना को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि 9 अक्टूबर के कार्यक्रम में बसपा प्रमुख मायावती साफ कर चुकी हैं कि पार्टी किसी बड़े राजनीतिक दल से गठबंधन नहीं करेगी। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद भी मायावती ने कहा था कि गठबंधन से बसपा को कोई फायदा नहीं हुआ। बसपा उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी। हालांकि, समान विचारधारा वाले छोटे दलों के लिए पार्टी के दरवाजे खुले हैं। लेकिन, किसी भी तरह का फैसला केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष ही लेंगी। फिलहाल पार्टी संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है। वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल के मुताबिक, सपा और बसपा दोनों के लिए उत्तर प्रदेश सबसे अहम राज्य है। दोनों ही दल यहां सत्ता में रह चुके हैं। भले ही किसी तरह सीटों का तालमेल बन भी जाए, लेकिन सबसे बड़ा पेंच मुख्यमंत्री पद को लेकर फंसेगा। बसपा प्रमुख मायावती कभी भी सपा की जूनियर पार्टी बनकर यूपी की राजनीति करना पसंद नहीं करेंगी। वहीं, केवल भाजपा को हराने के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी छोड़ने को तैयार नहीं होंगे। ऐसे में सपा-बसपा के बीच गठबंधन की संभावना फिलहाल दूर-दूर तक नजर नहीं आती। सपा-बसपा में गठबंधन हुआ तो भाजपा को नुकसान?
राजनीतिक विश्लेषक 2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों का हवाला देते हैं। उस चुनाव में सपा को करीब 32 और बसपा को लगभग 13 फीसदी वोट मिले थे। अगर ये वोट पूरी तरह बरकरार रहते हैं, तो दोनों दल मिलकर करीब 45 फीसदी वोट हासिल कर सकते हैं। 2022 में भाजपा को करीब 41 फीसदी वोट मिले थे। इस लिहाज से देखें तो सपा-बसपा का गठबंधन भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि, राजनीति में गणित का फॉर्मूला हमेशा काम नहीं करता। परिस्थितियां तय करती हैं कि एक और एक का जोड़ 11 बनेगा या शून्य। वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र दुबे कहते हैं कि सपा और बसपा के बीच आज भी गहरी तल्खी है। उनके कोर वोटर यादव और दलित के बीच गांवों में टकराव की स्थिति दिखाई देती है। 2019 में गठबंधन के बावजूद आए नतीजों ने साफ कर दिया था कि अब यह कोई स्वाभाविक गठबंधन नहीं रह गया है। बसपा-कांग्रेस में गठबंधन की क्या संभावना है
वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल मानते हैं- बसपा-कांग्रेस गठबंधन की संभावना अपेक्षाकृत अधिक है। बिहार चुनाव के नतीजों के बाद जिस तरह कांग्रेस वहां राजद से दूरी बनाने की तैयारी कर रही है, उसका असर यूपी में भी दिख सकता है। बिहार में कमजोर प्रदर्शन के चलते सपा कांग्रेस को कम सीटें देना चाहती है। वहीं, कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले प्रदर्शन के आधार पर यूपी में 100 से 125 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा जता रही। ऐसे में कांग्रेस बसपा के साथ जाने का विकल्प तलाश सकती है। भले ही बसपा और कांग्रेस ने कभी यूपी में प्री-पोल गठबंधन नहीं किया हो, लेकिन सत्ता के दौर में दोनों के बीच समन्वय रहा है। 2007 में जब यूपी में बसपा की सरकार थी और केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए की सत्ता थी, तब दोनों दलों के बीच एक संतुलन बना रहा। कांग्रेस के साथ गठबंधन कर बसपा मुस्लिम वोटरों को अपने साथ जोड़ सकती है। जबकि, कांग्रेस का ओबीसी और सवर्ण वोटरों में भी प्रभाव माना जाता है। इसके अलावा 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए यूपी में खोने के लिए बहुत कुछ नहीं है। वह विधानसभा चुनाव से पहले अधिक से अधिक सीटों पर लड़कर संगठन मजबूत करना चाहेगी। ऐसे में बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ना कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषक सैयद कासिम के मुताबिक, बसपा-कांग्रेस गठबंधन से कांग्रेस को भले ही यूपी में सीमित फायदा मिले, लेकिन उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्यों में उसे बड़ा फायदा हो सकता है। वहां कांग्रेस इस गठबंधन के दम पर सत्ता की प्रमुख दावेदार बन सकती है। बसपा-कांग्रेस का गठबंधन होने से सपा को नुकसान
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र दुबे के अनुसार, बसपा-कांग्रेस गठबंधन से दोनों दलों को भले ही बड़ा फायदा न हो, लेकिन इसका सबसे ज्यादा नुकसान सपा को होगा। बसपा और कांग्रेस के साथ आने से दलित वोट इस गठबंधन के पक्ष में एकजुट होंगे। वहीं, मुस्लिम वोटों का भी बड़ा हिस्सा उनके साथ जा सकता है। इससे सपा का पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण कमजोर पड़ जाएगा और पार्टी एक बार फिर M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण तक सिमट कर रह सकती है। इस स्थिति में सपा के लिए यूपी की सत्ता तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाएगा। अगर 2022 के विधानसभा चुनाव को आधार मानें, तो उस समय बसपा को करीब 13 फीसदी और कांग्रेस को लगभग ढाई फीसदी वोट मिले थे। दोनों के साथ आने पर यह आंकड़ा 18 से 20 फीसदी तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में प्रदेश में त्रिकोणीय मुकाबला बनेगा। 2022 में भी कई सीटों पर सपा को बसपा के चलते हार का सामना करना पड़ा था। त्रिकोणीय लड़ाई की स्थिति में भाजपा को फायदा और सपा को सबसे ज्यादा नुकसान होने की संभावना रहेगी। अगर सपा-कांग्रेस का मौजूदा गठबंधन ही बना रहा तो क्या होगी तस्वीर
बसपा सुप्रीमो मायावती 9 अक्टूबर, 2025 को ही साफ कर चुकी हैं कि बसपा 2027 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी। उन्होंने सपा और भाजपा दोनों के साथ हुए पुराने गठबंधनों को असफल बताते हुए कहा था कि अकेले चुनाव लड़ने पर ही 2007 में बसपा को सफलता मिली थी। अगर बसपा अकेले चुनाव लड़ती है, तो इसका सीधा असर सपा-कांग्रेस के वोटों पर पड़ेगा। जिसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा के करीब 9 फीसदी वोट ने कई सीटों पर हार-जीत का अंतर तय किया था। सपा-कांग्रेस गठबंधन भले ही मजबूत बना रहे, लेकिन दलित वोटों का पूर्ण ट्रांसफर संभव नहीं दिखता। इस बीच भाजपा गैर-यादव ओबीसी, नॉन-जाटव दलित और महिला वोटरों को साधने की रणनीति पर फोकस कर रही है। ऐसे हालात में भाजपा को बढ़त जरूर मिलती दिखती है, लेकिन 10 साल की सत्ता के बाद उभरने वाली एंटी-इनकंबेंसी सपा के लिए भी एक अवसर बन सकती है। ———————— ये खबर भी पढ़ें- यूपी में नए साल में होंगे 3 चुनाव, मायावती, चंद्रशेखर और पंकज चौधरी के लिए कैसा रहेगा 2026? जानिए… 2026 की दस्तक के साथ प्रदेश ही नहीं, देश की निगाहें यूपी में 2027 पर होने वाले विधानसभा चुनाव पर रहेंगी। 2027 की परीक्षा से पहले यूपी में भाजपा, सपा, अपना दल (एस), रालोद, सुभासपा, निषाद पार्टी, कांग्रेस, जनसत्ता दल लोकतांत्रिक और बसपा को तीन-तीन बड़े चुनावों से गुजरना होगा। इसी साल सभी पार्टियां दल-बदल से गुजरेंगी। पढ़िए पूरी खबर…
बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने 9 अक्टूबर, 2025 को कांशीराम की पुण्यतिथि पर लखनऊ में सभा की थी। इसमें ऐलान किया था कि बसपा भविष्य में किसी बड़े राजनीतिक दल से गठबंधन नहीं करेगी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी। हालांकि, उन्होंने समान विचारधारा वाले छोटे दलों से गठबंधन के विकल्प खुले रखे। राजनीति में किसी भी संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। बिहार चुनाव के नतीजों के बाद बसपा को लेकर कांग्रेस और सपा के सुर बदले नजर आ रहे। यूपी कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडे ने कहा कि अगर बसपा इंडिया ब्लॉक में शामिल होना चाहे, तो उसका स्वागत किया जाएगा। क्योंकि, राजनीति में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होतीं। अगले दिन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी इसी तरह का बयान दिया। कहा कि कांग्रेस वटवृक्ष है और अगर बसपा साथ आना चाहे, तो उसका स्वागत है। हालांकि, आखिरी फैसला शीर्ष नेतृत्व लेगा। सपा की ओर से देवरिया जिले के सलेमपुर से सांसद रमाशंकर राजभर ने भी कहा कि यदि बसपा पीडीए के साथ आती है, तो उसका स्वागत किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यूपी में भाजपा बनाम पीडीए की लड़ाई चल रही। इस लड़ाई में जो भी साथ आएगा, उसका स्वागत किया जाएगा। यूपी में भले ही बसपा और कांग्रेस के बीच कभी औपचारिक गठबंधन न रहा हो। लेकिन, 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बावजूद सपा और बसपा 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन कर चुके हैं। वहीं, सपा और कांग्रेस ने भी पिछला लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था। ऐसे में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर बनने वाले तीन संभावित गठबंधनों के सियासी समीकरणों को समझना जरूरी हो जाता है। यूपी में गठबंधन की 3 संभावनाएं बनेंगी इंडी गठबंधन में बसपा शामिल होती है, तो क्या बनेगा समीकरण
वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल के मुताबिक, पिछले एक साल से बसपा खुद को राजनीतिक तौर पर मजबूत करने की कोशिश कर रही। इसके तहत पार्टी ने संगठन में बदलाव किए हैं। भतीजे आकाश आनंद को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। बिहार चुनाव में बसपा को जहां एक सीट पर जीत मिली, वहीं 7 सीटों पर उसके प्रत्याशियों ने मजबूत चुनौती पेश की। बसपा यूपी में जहां अपने कोर वोटरों को सहेजने में जुटी है, वहीं मुस्लिम मतदाताओं को भी पार्टी से जोड़ने की कोशिशें तेज कर दी हैं। इसके लिए मुस्लिम भाईचारा कमेटी बनाई गई है। खुद मायावती यह संदेश देने में लगी हैं कि मुस्लिम समर्थन के बल पर भाजपा को हराने में बसपा ही निर्णायक भूमिका निभा सकती है। समाजवादी पार्टी को 2014, 2017, 2019, 2022 और 2024 के चुनावों में मुस्लिमों का भरपूर समर्थन मिला। इसके बावजूद भाजपा को सत्ता में आने से रोका नहीं जा सका। वहीं, 2007 में मुस्लिमों के लगभग एक चौथाई समर्थन के सहारे बसपा ने अपने दम पर सरकार बनाई थी। बसपा ने 9 अक्टूबर को कांशीराम की पुण्यतिथि पर लाखों की भीड़ जुटाकर यह भी जता दिया था कि उसे पूरी तरह से हाशिए पर नहीं डाला जा सकता। हाल के दिनों में मायावती ने भाजपा के प्रति बहुत अधिक कटुता भी नहीं दिखाई। इससे संकेत मिलते हैं कि वह सपा और कांग्रेस के साथ इंडी गठबंधन में शामिल होने का विकल्प खुला रख सकती हैं। हालांकि, बिहार में इंडी गठबंधन में शामिल आरजेडी, कांग्रेस सहित अन्य दलों के खराब प्रदर्शन ने यूपी में सपा और कांग्रेस की चिंता जरूर बढ़ा दी है। क्या बसपा इस गठबंधन में शामिल होगी?
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र दुबे 2019 के लोकसभा चुनाव का उदाहरण देते हैं। तब भाजपा को रोकने के लिए सपा, बसपा और रालोद के बीच महागठबंधन हुआ था। उस समय राजनीतिक और मीडिया हलकों में माना जा रहा था कि यह गठबंधन भाजपा को भारी नुकसान पहुंचाएगा, लेकिन नतीजे इसके बिल्कुल उलट आए। सपा अपने पारिवारिक गढ़ की केवल 5 लोकसभा सीटें ही जीत सकी, जबकि मायावती के नेतृत्व में बसपा के 10 सांसद लोकसभा पहुंचे। 2019 के लोकसभा चुनाव में यह भी सामने आया कि सपा-बसपा-रालोद के बीच औपचारिक गठबंधन तो हुआ, लेकिन कार्यकर्ताओं के स्तर पर दूरियां बनी रहीं। मौजूदा समय में गांवों में सपा और बसपा के कोर वोटरों के बीच टकराव की स्थिति और ज्यादा दिखाई देती है। यादव और कुर्मी जैसे ओबीसी समुदायों के राजनीतिक रूप से मजबूत होने के साथ ही उनकी तल्खी दलित समुदाय के साथ बढ़ती गई। असर यह हुआ कि 2019 में पहली बार यह देखने को मिला कि बसपा के वोट सपा की ओर ट्रांसफर नहीं हुए। जबकि, सपा के वोटों का ट्रांसफर बसपा की ओर हुआ था। ये हालात आज भी बड़े स्तर पर बदले नहीं हैं। 2019 में बसपा 38 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जबकि सपा 37 सीटों पर। रालोद 3 सीटों पर और अमेठी-रायबरेली की सीटों पर कांग्रेस को समर्थन दिया गया था। इससे साफ है कि सीट बंटवारे में बसपा कभी भी जूनियर पार्टी की भूमिका स्वीकार नहीं करेगी। भले ही उसे सीनियर दल का दर्जा न मिले, लेकिन कम से कम बराबरी की सीटों से कम पर बसपा समझौता करने को तैयार नहीं होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए सपा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का त्याग कर पाएगी? इसका जवाब फिलहाल ‘न’ ही नजर आता है। यानी सपा-बसपा-कांग्रेस के बीच महागठबंधन की संभावना बेहद कमजोर दिखती है। गठबंधन होने पर कितना फायदा और भाजपा को कितना नुकसान
सपा और बसपा के बीच पहली बार 1993 में गठबंधन हुआ था। उस समय यूपी की 425 विधानसभा सीटों में से बसपा ने 164 सीटों पर चुनाव लड़ा। 67 सीटें जीतीं, जबकि सपा ने 256 सीटों पर चुनाव लड़कर 109 सीटों पर जीत दर्ज की। उस दौर में दोनों दलों के वोट एक-दूसरे को प्रभावी रूप से ट्रांसफर हुए थे। बाबरी विध्वंस के बाद भी भाजपा बहुमत से दूर रह गई थी। हालांकि, यह गठबंधन 1995 में गेस्ट हाउस कांड के चलते टूट गया था। इसके 25 साल बाद 2019 में दोनों दल फिर साथ आए। लेकिन समय के साथ दोनों के कोर वोटरों के बीच पैदा हुई कटुता आज भी बरकरार है। जमीनी स्तर पर इस कटुता को खत्म करने के लिए तीनों दलों को चुनाव से काफी पहले गठबंधन करना होगा। इसके साथ ही कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल और भरोसा कायम करने पर गंभीरता से काम करना पड़ेगा। तभी यह गठबंधन मुस्लिम, दलित और यादव वोटबैंक के सहारे करीब 45 फीसदी वोट हासिल कर सकता है। क्या सपा-बसपा में गठबंधन की संभावना है?
बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल इस तरह की किसी भी संभावना को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि 9 अक्टूबर के कार्यक्रम में बसपा प्रमुख मायावती साफ कर चुकी हैं कि पार्टी किसी बड़े राजनीतिक दल से गठबंधन नहीं करेगी। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद भी मायावती ने कहा था कि गठबंधन से बसपा को कोई फायदा नहीं हुआ। बसपा उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी। हालांकि, समान विचारधारा वाले छोटे दलों के लिए पार्टी के दरवाजे खुले हैं। लेकिन, किसी भी तरह का फैसला केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष ही लेंगी। फिलहाल पार्टी संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है। वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल के मुताबिक, सपा और बसपा दोनों के लिए उत्तर प्रदेश सबसे अहम राज्य है। दोनों ही दल यहां सत्ता में रह चुके हैं। भले ही किसी तरह सीटों का तालमेल बन भी जाए, लेकिन सबसे बड़ा पेंच मुख्यमंत्री पद को लेकर फंसेगा। बसपा प्रमुख मायावती कभी भी सपा की जूनियर पार्टी बनकर यूपी की राजनीति करना पसंद नहीं करेंगी। वहीं, केवल भाजपा को हराने के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी छोड़ने को तैयार नहीं होंगे। ऐसे में सपा-बसपा के बीच गठबंधन की संभावना फिलहाल दूर-दूर तक नजर नहीं आती। सपा-बसपा में गठबंधन हुआ तो भाजपा को नुकसान?
राजनीतिक विश्लेषक 2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों का हवाला देते हैं। उस चुनाव में सपा को करीब 32 और बसपा को लगभग 13 फीसदी वोट मिले थे। अगर ये वोट पूरी तरह बरकरार रहते हैं, तो दोनों दल मिलकर करीब 45 फीसदी वोट हासिल कर सकते हैं। 2022 में भाजपा को करीब 41 फीसदी वोट मिले थे। इस लिहाज से देखें तो सपा-बसपा का गठबंधन भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि, राजनीति में गणित का फॉर्मूला हमेशा काम नहीं करता। परिस्थितियां तय करती हैं कि एक और एक का जोड़ 11 बनेगा या शून्य। वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र दुबे कहते हैं कि सपा और बसपा के बीच आज भी गहरी तल्खी है। उनके कोर वोटर यादव और दलित के बीच गांवों में टकराव की स्थिति दिखाई देती है। 2019 में गठबंधन के बावजूद आए नतीजों ने साफ कर दिया था कि अब यह कोई स्वाभाविक गठबंधन नहीं रह गया है। बसपा-कांग्रेस में गठबंधन की क्या संभावना है
वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल मानते हैं- बसपा-कांग्रेस गठबंधन की संभावना अपेक्षाकृत अधिक है। बिहार चुनाव के नतीजों के बाद जिस तरह कांग्रेस वहां राजद से दूरी बनाने की तैयारी कर रही है, उसका असर यूपी में भी दिख सकता है। बिहार में कमजोर प्रदर्शन के चलते सपा कांग्रेस को कम सीटें देना चाहती है। वहीं, कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले प्रदर्शन के आधार पर यूपी में 100 से 125 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा जता रही। ऐसे में कांग्रेस बसपा के साथ जाने का विकल्प तलाश सकती है। भले ही बसपा और कांग्रेस ने कभी यूपी में प्री-पोल गठबंधन नहीं किया हो, लेकिन सत्ता के दौर में दोनों के बीच समन्वय रहा है। 2007 में जब यूपी में बसपा की सरकार थी और केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए की सत्ता थी, तब दोनों दलों के बीच एक संतुलन बना रहा। कांग्रेस के साथ गठबंधन कर बसपा मुस्लिम वोटरों को अपने साथ जोड़ सकती है। जबकि, कांग्रेस का ओबीसी और सवर्ण वोटरों में भी प्रभाव माना जाता है। इसके अलावा 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए यूपी में खोने के लिए बहुत कुछ नहीं है। वह विधानसभा चुनाव से पहले अधिक से अधिक सीटों पर लड़कर संगठन मजबूत करना चाहेगी। ऐसे में बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ना कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषक सैयद कासिम के मुताबिक, बसपा-कांग्रेस गठबंधन से कांग्रेस को भले ही यूपी में सीमित फायदा मिले, लेकिन उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्यों में उसे बड़ा फायदा हो सकता है। वहां कांग्रेस इस गठबंधन के दम पर सत्ता की प्रमुख दावेदार बन सकती है। बसपा-कांग्रेस का गठबंधन होने से सपा को नुकसान
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र दुबे के अनुसार, बसपा-कांग्रेस गठबंधन से दोनों दलों को भले ही बड़ा फायदा न हो, लेकिन इसका सबसे ज्यादा नुकसान सपा को होगा। बसपा और कांग्रेस के साथ आने से दलित वोट इस गठबंधन के पक्ष में एकजुट होंगे। वहीं, मुस्लिम वोटों का भी बड़ा हिस्सा उनके साथ जा सकता है। इससे सपा का पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण कमजोर पड़ जाएगा और पार्टी एक बार फिर M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण तक सिमट कर रह सकती है। इस स्थिति में सपा के लिए यूपी की सत्ता तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाएगा। अगर 2022 के विधानसभा चुनाव को आधार मानें, तो उस समय बसपा को करीब 13 फीसदी और कांग्रेस को लगभग ढाई फीसदी वोट मिले थे। दोनों के साथ आने पर यह आंकड़ा 18 से 20 फीसदी तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में प्रदेश में त्रिकोणीय मुकाबला बनेगा। 2022 में भी कई सीटों पर सपा को बसपा के चलते हार का सामना करना पड़ा था। त्रिकोणीय लड़ाई की स्थिति में भाजपा को फायदा और सपा को सबसे ज्यादा नुकसान होने की संभावना रहेगी। अगर सपा-कांग्रेस का मौजूदा गठबंधन ही बना रहा तो क्या होगी तस्वीर
बसपा सुप्रीमो मायावती 9 अक्टूबर, 2025 को ही साफ कर चुकी हैं कि बसपा 2027 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी। उन्होंने सपा और भाजपा दोनों के साथ हुए पुराने गठबंधनों को असफल बताते हुए कहा था कि अकेले चुनाव लड़ने पर ही 2007 में बसपा को सफलता मिली थी। अगर बसपा अकेले चुनाव लड़ती है, तो इसका सीधा असर सपा-कांग्रेस के वोटों पर पड़ेगा। जिसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा के करीब 9 फीसदी वोट ने कई सीटों पर हार-जीत का अंतर तय किया था। सपा-कांग्रेस गठबंधन भले ही मजबूत बना रहे, लेकिन दलित वोटों का पूर्ण ट्रांसफर संभव नहीं दिखता। इस बीच भाजपा गैर-यादव ओबीसी, नॉन-जाटव दलित और महिला वोटरों को साधने की रणनीति पर फोकस कर रही है। ऐसे हालात में भाजपा को बढ़त जरूर मिलती दिखती है, लेकिन 10 साल की सत्ता के बाद उभरने वाली एंटी-इनकंबेंसी सपा के लिए भी एक अवसर बन सकती है। ———————— ये खबर भी पढ़ें- यूपी में नए साल में होंगे 3 चुनाव, मायावती, चंद्रशेखर और पंकज चौधरी के लिए कैसा रहेगा 2026? जानिए… 2026 की दस्तक के साथ प्रदेश ही नहीं, देश की निगाहें यूपी में 2027 पर होने वाले विधानसभा चुनाव पर रहेंगी। 2027 की परीक्षा से पहले यूपी में भाजपा, सपा, अपना दल (एस), रालोद, सुभासपा, निषाद पार्टी, कांग्रेस, जनसत्ता दल लोकतांत्रिक और बसपा को तीन-तीन बड़े चुनावों से गुजरना होगा। इसी साल सभी पार्टियां दल-बदल से गुजरेंगी। पढ़िए पूरी खबर…