बहराइच में भेड़िए ने एक हफ्ते में 4 हमले किए। इसमें 2 बच्चियों की मौत और दो महिलाएं गंभीर घायल हो गईं। इन महिलाओं की भी मौत तय थी, लेकिन समय रहते बचाव में लोग पहुंचे और बचा लिया। अब स्थिति यह हो गई कि पूरे क्षेत्र में लोगों के मन में डर बैठ गया है। शाम होते ही लोग अपने बच्चों को घरों में कैद कर दे रहे हैं। गांव के पुरुष लाठियां लेकर रात-रातभर पहरा दे रहे हैं। आखिर भेड़ियों का हमला दोबारा कैसे शुरू हुआ, इसके पीछे की वजह क्या है, हमले के पीछे का पैटर्न एक जैसा कैसे है, लड़कियां-महिलाएं ही क्यों शिकार हो रहीं? इन सवालों का जवाब हमने कुछ विशेषज्ञों से समझने की कोशिश की है। पहले घटना के पैटर्न को समझिए… 4 घटनाएं, सभी में महिलाएं निशाने पर
बहराइच की महसी तहसील। इस तहसील के अंतर्गत कुल 235 गांव आते हैं। इसमें 100 गांव ऐसे हैं जो घाघरा नदी के किनारे बसे हैं। नदी इन गांवों से 2 से 4 किलोमीटर की दूरी पर बहती है। यहां नदी के किनारों पर सियार और भेड़िए अपनी मांद बनाकर रहते हुए नजर आते रहे हैं। लेकिन जैसे ही नदी में बाढ़ आती है, कटान शुरू होती है। इन जंगली जानवरों की मांद भी खत्म हो जाती है। इसके बाद ये जानवर अपना ठिकाना गांव के पास खोजते हैं, पूरे इलाके में गन्ने के खूब खेत हैं, तो वही इनके अस्थायी घर बन जाते हैं। गांव के किनारे वाले घर निशाने पर
बहराइच में जंगली जानवर के इस हमले में कुछ समानताएं नजर आती हैं। ये सभी घर गांव के एक छोर पर थे। या तो शुरू में या फिर बाद में। जहां इनका घर था, वहां से 20 से 50 मीटर की दूरी पर खेत शुरू हो जाते हैं। इन खेतों में गन्ने की फसल लगी हुई है। रात में जो घटनाएं हुई हैं, उस वक्त यहां रोशनी नहीं थी। भेड़िया गन्ने के खेत में घात लगाकर बैठा रहा, उसे जैसे ही मौका मिला वह बाहर निकला और झपट्टा मारकर हमला किया और उठाकर ले गया। बच्चियों की दोनों लाशें घर से 300 से 500 मीटर के बीच मिली हैं। हमने हमलों के पैटर्न को लेकर कतर्निया घाट वन्य प्रभाग में वाइल्ड लाइफ पर पिछले 20 सालों से काम कर रहे जंग बहादुर सिंह उर्फ जंग हिन्दुस्तानी से बात की। वह कहते हैं, भेड़िए शिकार के लिए उन जगहों को चुनते हैं जो उनके लिए सेफ हो। इसलिए वह अक्सर गांव से अलग बने घर या फिर गांव के ही एकदम किनारे बने घर को निशाना बनाते हैं। इन घरों में रहने वालों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। जहां तक बात महिला और बच्चियों पर हमले की है, वह इसलिए क्योंकि घर पर अक्सर यह मिल जाती हैं। पानी-भोजन की तलाश में जब भेड़िए गांव की तरफ आते हैं तब घर पर महिलाएं नजर आती हैं। बच्चियां भी अक्सर घर पर ही दिखती हैं, इसलिए भेड़िए इन्हें शिकार बनाते हैं। हालांकि भेड़ियों के हमलों में पिछले साल लड़कों की भी मौत हुई थी, कुछ पुरुषों पर भी हमला किया था। इस साल हमले का इलाका बदला है
साल 2024 में जुलाई से अगस्त के बीच भेड़ियों ने अकेले महसी इलाके में 20 से ज्यादा हमले किए। इसमें 9 लोगों की मौत हुई थी। कुल 6 भेड़िए पकड़े गए थे। 35 गांव दो महीने तक सहमे रहे थे। इस साल इन 35 गांव में भेड़ियों का कोई हमला नहीं हुआ है। अभी जो हमला हो रहा, वह महसी और कैसरगंज तहसील का बॉर्डर इलाका है। यानी पिछले साल के घटनास्थल से करीब 40 किलोमीटर दूर। जंग बहादुर सिंह कहते हैं, भेड़िए अपने परिवार के साथ 10 हजार स्क्वायर किलोमीटर के एरिया में घूम सकते हैं और वह लगातार घूमते भी रहते हैं। इनका अपना पूरा परिवार होता है। इन हमलों के पीछे बदलता हुआ मौसम बड़ी वजह है। दुनिया में जो परिवर्तन हो रहा है उसका असर भेड़ियों के ऊपर पड़ रहा। बहराइच में कटान की वजह से इनका घर चला गया। इसलिए यह गांव की तरफ आए। भोजन की व्यवस्था के लिए गांव में घुसे और फिर जो नजर आया उसे उठाकर ले गए। महसी की तरफ से भेड़िया आने का दावा
मंझारा तौकली गांव की आबादी करीब 40 हजार है। इस गांव में अब तक जंगली जानवर ने दो बार हमला किया है। गांव के ही पूर्व प्रधान सतगुरू प्रसाद से हमारी बात हुई। वह कहते हैं, हमारे गांव से 3 किलोमीटर दूर महसी की सीमा है। पहले उस इलाके में भेड़िए का आतंक रहा है, उधर से ही आए नजर आते हैं। बाकी यह पूरा इलाका ही कटान क्षेत्र है। घाघरा नदी में जैसे ही पानी बढ़ता है, सारे जानवर बाहर आ जाते हैं। लोग मुख्य रूप से गन्ने की ही खेती करते हैं, इसलिए इन खेतों में भेड़िए और तेंदुए आकर रहने लगते हैं। सतगुरु इन घटनाओं के पीछे उजाले का न होना भी एक वजह मानते हैं। वह कहते हैं, प्रधान और बाकी जनप्रतिनिधियों को इस क्षेत्र के हर गांव में उचित लाइट की व्यवस्था करवानी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है, अंधेरे की वजह से घटनाएं हो रही हैं। शंका बढ़ रही है, जनता डरकर रातभर जाग रही है। बाकी प्रशासन अपने स्तर पर ठीक काम कर रहा है। 3-4 जगहों पर पिंजरा और जाल लगाया गया है। वन विभाग के लोग लगातार राउंड पर हैं। अगर भेड़िए ने मारना शुरू कर दिया तो पकड़ना ही विकल्प
ज्ञान प्रकाश सिंह 5 साल पहले बहराइच के डीएफओ हुआ करते थे। इस वक्त वह रिटायर हो चुके हैं। हमने भेड़ियों के हमलों को लेकर उनसे बात की। वह कहते हैं- जिस वक्त हम थे, तब हमला नहीं होता था, लेकिन पिछले दो सालों से हमला लगातार बढ़ रहा। असल में ये जिन हिस्सों में हो रहा, वह घाघरा और सरयू नदी के बीच का हिस्सा है। यहीं नदी के किनारे भेड़ियों की मांद हुआ करती थी। भेड़िए अपने पूरे परिवार के साथ रहते थे, यहीं से वह कभी खरगोश तो कभी गिलहरी पकड़कर खाते रहे हैं। ये अक्सर 2 से 4 किलो के बीच का शिकार करते हैं। ज्ञान प्रकाश सिंह कहते हैं, अगर किसी भेड़िए ने किसी बच्चे का शिकार कर लिया तो ये समझिए की उसके मुंह में खून लग गया और अब वह लगातार शिकार करेगा। क्योंकि उसे उसके प्राकृतिक शिकार जैसे खरगोश, गिलहरी को पकड़ने में मेहनत लगेगी।, खोजना भी होगा। लेकिन अगर उसने किसी इंसानी बस्ती में किसी बच्चे का शिकार कर लिया तब उसे यह पता हो जाता है कि यहां तो शिकार आसानी से मिल जाता है। फिर वह बार-बार बस्तियों में घुसने की कोशिश करेगा। वन विभाग लोगों को जागरूक करने में लगा
बहराइच में जंगली जानवर के इन हमलों के बीच वन विभाग सक्रिय है। 7 अलग-अलग टीमें लगाई गई हैं। इसमें 50 से ज्यादा लोग हैं। प्रभावित हिस्सों में थर्मल ड्रोन उड़ाए जा रहे हैं। वन विभाग की तरफ से पंपलेट गांव में चिपकाए गए हैं। इसके अलावा लाउड स्पीकर से गाड़ियां गांव-गांव में लोगों को जंगली जानवर से बचने के तरीके बता रही हैं। जहां से भी सूचना मिल रही, वहां तुरंत ही मौजूदा डीएफओ रामसिंह यादव अपनी टीम के साथ पहुंच रहे हैं। एक जो सबसे बड़ी दुविधा आ रही वह ये कि अब तक किसी भी व्यक्ति के पास भेड़िए या फिर तेंदुए की तस्वीर नहीं है। किसी कैमरे में वह रिकॉर्ड भी नहीं हुआ है। इसलिए यह क्लियर कह पाना कि यह किस जानवर का हमला है, संभव नहीं है। गांव के लोग भी दो भागों में बंटे हुए हैं, वह कभी भेड़िया बताते हैं तो कभी तेंदुए की आशंका जताते हैं। चूंकि इस पूरे इलाके में भेड़िए का आतंक रहा है, पकड़े भी गए हैं इसलिए अब तय यही मानकर चला जा रहा कि हमलावर भेड़िया ही है। …………………….. यह खबर भी पढ़िए:- खाना खा रही बच्ची को भेड़िया उठा ले गया:एक पैर गायब, हाथ-पीठ का मांस भी खा गया; बहराइच में लोग घरों में कैद 4 साल की ज्योति घर के बाहर बैठकर खाना खा रही थी। तभी उसने मां से और दाल मांगा। मां दाल लाने करीब 20 मीटर आगे गई। तभी भेड़िया आया और उसने खाना खा रही ज्योति का मुंह अपने जबड़े में दबाया और उठाकर खेत की तरफ भागा। पास लेटे दादा चिल्लाए, लेकिन भेड़िए ने नहीं छोड़ा। तुरंत ही गांव के 30-35 लोग जुट गए। गन्ने के खेतों की तरफ दौड़े।पढ़िए पूरी खबर…
बहराइच की महसी तहसील। इस तहसील के अंतर्गत कुल 235 गांव आते हैं। इसमें 100 गांव ऐसे हैं जो घाघरा नदी के किनारे बसे हैं। नदी इन गांवों से 2 से 4 किलोमीटर की दूरी पर बहती है। यहां नदी के किनारों पर सियार और भेड़िए अपनी मांद बनाकर रहते हुए नजर आते रहे हैं। लेकिन जैसे ही नदी में बाढ़ आती है, कटान शुरू होती है। इन जंगली जानवरों की मांद भी खत्म हो जाती है। इसके बाद ये जानवर अपना ठिकाना गांव के पास खोजते हैं, पूरे इलाके में गन्ने के खूब खेत हैं, तो वही इनके अस्थायी घर बन जाते हैं। गांव के किनारे वाले घर निशाने पर
बहराइच में जंगली जानवर के इस हमले में कुछ समानताएं नजर आती हैं। ये सभी घर गांव के एक छोर पर थे। या तो शुरू में या फिर बाद में। जहां इनका घर था, वहां से 20 से 50 मीटर की दूरी पर खेत शुरू हो जाते हैं। इन खेतों में गन्ने की फसल लगी हुई है। रात में जो घटनाएं हुई हैं, उस वक्त यहां रोशनी नहीं थी। भेड़िया गन्ने के खेत में घात लगाकर बैठा रहा, उसे जैसे ही मौका मिला वह बाहर निकला और झपट्टा मारकर हमला किया और उठाकर ले गया। बच्चियों की दोनों लाशें घर से 300 से 500 मीटर के बीच मिली हैं। हमने हमलों के पैटर्न को लेकर कतर्निया घाट वन्य प्रभाग में वाइल्ड लाइफ पर पिछले 20 सालों से काम कर रहे जंग बहादुर सिंह उर्फ जंग हिन्दुस्तानी से बात की। वह कहते हैं, भेड़िए शिकार के लिए उन जगहों को चुनते हैं जो उनके लिए सेफ हो। इसलिए वह अक्सर गांव से अलग बने घर या फिर गांव के ही एकदम किनारे बने घर को निशाना बनाते हैं। इन घरों में रहने वालों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। जहां तक बात महिला और बच्चियों पर हमले की है, वह इसलिए क्योंकि घर पर अक्सर यह मिल जाती हैं। पानी-भोजन की तलाश में जब भेड़िए गांव की तरफ आते हैं तब घर पर महिलाएं नजर आती हैं। बच्चियां भी अक्सर घर पर ही दिखती हैं, इसलिए भेड़िए इन्हें शिकार बनाते हैं। हालांकि भेड़ियों के हमलों में पिछले साल लड़कों की भी मौत हुई थी, कुछ पुरुषों पर भी हमला किया था। इस साल हमले का इलाका बदला है
साल 2024 में जुलाई से अगस्त के बीच भेड़ियों ने अकेले महसी इलाके में 20 से ज्यादा हमले किए। इसमें 9 लोगों की मौत हुई थी। कुल 6 भेड़िए पकड़े गए थे। 35 गांव दो महीने तक सहमे रहे थे। इस साल इन 35 गांव में भेड़ियों का कोई हमला नहीं हुआ है। अभी जो हमला हो रहा, वह महसी और कैसरगंज तहसील का बॉर्डर इलाका है। यानी पिछले साल के घटनास्थल से करीब 40 किलोमीटर दूर। जंग बहादुर सिंह कहते हैं, भेड़िए अपने परिवार के साथ 10 हजार स्क्वायर किलोमीटर के एरिया में घूम सकते हैं और वह लगातार घूमते भी रहते हैं। इनका अपना पूरा परिवार होता है। इन हमलों के पीछे बदलता हुआ मौसम बड़ी वजह है। दुनिया में जो परिवर्तन हो रहा है उसका असर भेड़ियों के ऊपर पड़ रहा। बहराइच में कटान की वजह से इनका घर चला गया। इसलिए यह गांव की तरफ आए। भोजन की व्यवस्था के लिए गांव में घुसे और फिर जो नजर आया उसे उठाकर ले गए। महसी की तरफ से भेड़िया आने का दावा
मंझारा तौकली गांव की आबादी करीब 40 हजार है। इस गांव में अब तक जंगली जानवर ने दो बार हमला किया है। गांव के ही पूर्व प्रधान सतगुरू प्रसाद से हमारी बात हुई। वह कहते हैं, हमारे गांव से 3 किलोमीटर दूर महसी की सीमा है। पहले उस इलाके में भेड़िए का आतंक रहा है, उधर से ही आए नजर आते हैं। बाकी यह पूरा इलाका ही कटान क्षेत्र है। घाघरा नदी में जैसे ही पानी बढ़ता है, सारे जानवर बाहर आ जाते हैं। लोग मुख्य रूप से गन्ने की ही खेती करते हैं, इसलिए इन खेतों में भेड़िए और तेंदुए आकर रहने लगते हैं। सतगुरु इन घटनाओं के पीछे उजाले का न होना भी एक वजह मानते हैं। वह कहते हैं, प्रधान और बाकी जनप्रतिनिधियों को इस क्षेत्र के हर गांव में उचित लाइट की व्यवस्था करवानी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है, अंधेरे की वजह से घटनाएं हो रही हैं। शंका बढ़ रही है, जनता डरकर रातभर जाग रही है। बाकी प्रशासन अपने स्तर पर ठीक काम कर रहा है। 3-4 जगहों पर पिंजरा और जाल लगाया गया है। वन विभाग के लोग लगातार राउंड पर हैं। अगर भेड़िए ने मारना शुरू कर दिया तो पकड़ना ही विकल्प
ज्ञान प्रकाश सिंह 5 साल पहले बहराइच के डीएफओ हुआ करते थे। इस वक्त वह रिटायर हो चुके हैं। हमने भेड़ियों के हमलों को लेकर उनसे बात की। वह कहते हैं- जिस वक्त हम थे, तब हमला नहीं होता था, लेकिन पिछले दो सालों से हमला लगातार बढ़ रहा। असल में ये जिन हिस्सों में हो रहा, वह घाघरा और सरयू नदी के बीच का हिस्सा है। यहीं नदी के किनारे भेड़ियों की मांद हुआ करती थी। भेड़िए अपने पूरे परिवार के साथ रहते थे, यहीं से वह कभी खरगोश तो कभी गिलहरी पकड़कर खाते रहे हैं। ये अक्सर 2 से 4 किलो के बीच का शिकार करते हैं। ज्ञान प्रकाश सिंह कहते हैं, अगर किसी भेड़िए ने किसी बच्चे का शिकार कर लिया तो ये समझिए की उसके मुंह में खून लग गया और अब वह लगातार शिकार करेगा। क्योंकि उसे उसके प्राकृतिक शिकार जैसे खरगोश, गिलहरी को पकड़ने में मेहनत लगेगी।, खोजना भी होगा। लेकिन अगर उसने किसी इंसानी बस्ती में किसी बच्चे का शिकार कर लिया तब उसे यह पता हो जाता है कि यहां तो शिकार आसानी से मिल जाता है। फिर वह बार-बार बस्तियों में घुसने की कोशिश करेगा। वन विभाग लोगों को जागरूक करने में लगा
बहराइच में जंगली जानवर के इन हमलों के बीच वन विभाग सक्रिय है। 7 अलग-अलग टीमें लगाई गई हैं। इसमें 50 से ज्यादा लोग हैं। प्रभावित हिस्सों में थर्मल ड्रोन उड़ाए जा रहे हैं। वन विभाग की तरफ से पंपलेट गांव में चिपकाए गए हैं। इसके अलावा लाउड स्पीकर से गाड़ियां गांव-गांव में लोगों को जंगली जानवर से बचने के तरीके बता रही हैं। जहां से भी सूचना मिल रही, वहां तुरंत ही मौजूदा डीएफओ रामसिंह यादव अपनी टीम के साथ पहुंच रहे हैं। एक जो सबसे बड़ी दुविधा आ रही वह ये कि अब तक किसी भी व्यक्ति के पास भेड़िए या फिर तेंदुए की तस्वीर नहीं है। किसी कैमरे में वह रिकॉर्ड भी नहीं हुआ है। इसलिए यह क्लियर कह पाना कि यह किस जानवर का हमला है, संभव नहीं है। गांव के लोग भी दो भागों में बंटे हुए हैं, वह कभी भेड़िया बताते हैं तो कभी तेंदुए की आशंका जताते हैं। चूंकि इस पूरे इलाके में भेड़िए का आतंक रहा है, पकड़े भी गए हैं इसलिए अब तय यही मानकर चला जा रहा कि हमलावर भेड़िया ही है। …………………….. यह खबर भी पढ़िए:- खाना खा रही बच्ची को भेड़िया उठा ले गया:एक पैर गायब, हाथ-पीठ का मांस भी खा गया; बहराइच में लोग घरों में कैद 4 साल की ज्योति घर के बाहर बैठकर खाना खा रही थी। तभी उसने मां से और दाल मांगा। मां दाल लाने करीब 20 मीटर आगे गई। तभी भेड़िया आया और उसने खाना खा रही ज्योति का मुंह अपने जबड़े में दबाया और उठाकर खेत की तरफ भागा। पास लेटे दादा चिल्लाए, लेकिन भेड़िए ने नहीं छोड़ा। तुरंत ही गांव के 30-35 लोग जुट गए। गन्ने के खेतों की तरफ दौड़े।पढ़िए पूरी खबर…