राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज मथुरा-वृंदावन में रहेंगी। 7 घंटे के दौरे में वह बांके बिहारी मंदिर, निधि वन और श्रीकृष्ण जन्मभूमि पहुंचेंगी। मगर सबसे ज्यादा चर्चा में 1 ऐसा मंदिर है, जिसे मथुरा आने वाले टूरिस्ट भी ठीक से नहीं जानते। यह है श्रीकुब्जा कृष्ण मंदिर। जो बांके बिहारी मंदिर से सिर्फ 12km दूर है। हकीकत ये है कि ब्रजवासी भी ठीक से इस मंदिर के बारे में नहीं जानते। अब राष्ट्रपति के अचानक मंदिर आने के प्लान के बाद यह मंदिर सुर्खियों में है। इसे और करीब से जानने के लिए दैनिक भास्कर टीम श्रीकुब्जा कृष्ण मंदिर पहुंची। पढ़िए रिपोर्ट… मंदिर संवारा जा रहा, रोड तैयार की जा रही
श्रीकुब्जा कृष्ण मंदिर चर्चा में तब आया, जब राष्ट्रपति के मथुरा आने से पहले अधिकारियों के पास प्रोटोकॉल पहुंचा। सबसे पहले अफसरों ने इस मंदिर की लोकेशन तलाशी। बाद में सामने आया कि यह मंदिर शहर का दिल कहे जाने वाले होलीगेट से सिर्फ 500 मीटर दूर अंतापाडा में है। होली गेट से जब हम अंतापाडा पहुंचे, वहां रेलवे लाइन से पहले दाएं हाथ पर एक छोटा सा गेट दिखाई पड़ा। इसके ऊपर लिखा है- श्रीकुब्जा कृष्ण मंदिर। इस गेट पर अभी नया पेंट कराया गया था। दीवारों पर श्रीकृष्ण की लीलाएं उकेरी गई थीं। इस मंदिर तक एक संकरी रोड आती है, इस पर इंटरलॉकिंग बिछाने का काम चल रहा था। मंदिर के बगल में खंडहर है, जहां मजदूर मलबा हटाते दिखे। 3 फीट का एंट्री गेट, फिर 11 सीढ़ियों से पहुंचे मंदिर
यह सारी व्यवस्थाएं समझते हुए हम एंट्री गेट की तरफ बढ़े। सिर्फ 3 फीट चौड़े गेट से एंट्री के बाद हमें सामने 11 सीढ़ियां दिखीं। इस पर चढ़कर हम मंदिर कैंपस में पहुंचे। एक लॉबी और उसके दांयीं तरफ मंदिर के अंदर प्रवेश मिलता है। सामने गर्भगृह में श्रीकृष्ण विराजमान हैं। उनके साथ स्थापित मूर्ति को पहले हम राधारानी से जोड़कर देखते हैं। मगर पुजारी बताते हैं कि ये राधा रानी नहीं, बल्कि कंस की दासी कुब्जा हैं। मंदिर का रखरखाव 2 दुकानों के किराए से हो रहा
यहां पूजा करते हुए हमारी मुलाकात पुजारी आशीष चतुर्वेदी से हुई। हमने पूछा- आप यहां कितने सालों से पूजा कर रहे? पुजारी कहते हैं- हमारा परिवार पीढ़ियों से इस मंदिर की पूजा करता आ रहा है। मंदिर की देखभाल कैसे होती है? इस सवाल पर पुजारी कहते हैं- मंदिर परिसर के बाहर 2 दुकान हैं, जिनके किराए से यहां का खर्च चलता है। इस मंदिर में इक्का-दुक्का भक्त ही आते हैं। इसलिए दान वगैरह नहीं मिल पाता। हमने पूछा- इस वक्त तो मंदिर की मरम्मत हो रही है? रंग रोगन भी नया हुआ है? पुजारी बोले- मंदिर अभी तक टूटा-फूटा था, लेकिन भगवान की कृपा हुई तो इसके दिन भी बदल गए। अब पढ़िए, ये मंदिर क्यों खास है मान्यता- यहां दर्शन करने वालों के स्किन रोग दूर होते हैं…
हमने इस मंदिर से जुड़ी मान्यता पर सवाल पूछे। पुजारी आशीष चतुर्वेदी कहते हैं- द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण जब कंस से युद्ध करने मथुरा आए, तब कुब्जा इसी स्थान पर उनसे मिली थीं। कुब्जा के लिए कहा जाता है कि वह कंस की दासी थी, लेकिन वह भक्ति भगवान नारायण की करती थीं। कुब्जा को चर्म रोग भी था। उसे देखते ही भगवान ने उसके पैर पर पैर रखा और ठोड़ी पर हाथ रखकर उसे सीधा खड़ा कर दिया। श्रीकृष्ण के स्पर्श से कुब्जा सुंदर स्त्री बन गई। उसका रोग भी दूर हो गया। तभी से भगवान इस मंदिर में कुब्जा के साथ विराजमान हो गए। भक्तों के बीच मान्यता है कि इस मंदिर में चर्म (स्किन) रोग वाले अगर दर्शन करते हैं, तो उन्हें रोगों से मुक्ति मिलती है। अब लोगों की बात राजेश बोले- कुछ वीडियो पोस्ट होने के बाद भक्त आने लगे
शहर के ठीक बीच में स्थित इस मंदिर के आसपास मिश्रित आबादी है। यहां करीब 15 हजार लोग रहते हैं। इसमें सबसे ज्यादा ब्राह्मण-यादव जाति के लोग हैं। इसके बाद प्रजापति और कुशवाहा बिरादरी के लोग हैं। बाकी धर्म और जाति के लोग भी यहां बसे हुए हैं। यहीं के रहने वाले राजेश यादव कहते हैं- इस इलाके की स्थिति बहुत खराब रही है। यहां कभी सफाई नहीं होती है। एक बार सड़क बन गई, तो दोबारा किसी ने इस क्षेत्र की तरफ देखने की जहमत तक नहीं उठाई। राजेश कहते हैं- इस मंदिर को सिर्फ यहां पर रहने वाले लोग ही जानते थे। लोग भी इस मंदिर में कम ही आते-जाते थे। मगर पिछले कुछ महीनों में यहां भक्त आने लगे हैं, क्योंकि सोशल मीडिया पर मंदिर के कुछ वीडियो पोस्ट हुए थे। 72 साल की महिला बोलीं- पहली बार मंदिर की मरम्मत हुई
हमारी मुलाकात 72 साल की लौंगश्री देवी से हुई। वह कहती हैं- यहां एक इमली का पेड़ था, उसी के पास मंदिर था। लेकिन समय के साथ सब उजड़ गया था। अब जितना काम मंदिर संवारने के लिए हो रहा है। इतना होश संभालने के बाद कभी होते नहीं देखा। भगवान के लिए हर दिन दूध की सेवा करने वाली 60 वर्षीय कुसुम यादव बताती हैं- यहां जो कुछ परदेशी आते हैं, उनको चारा बेच देती हूं। मैं रात को भगवान के लिए दूध का भोग लगाने आती हूं। यहीं के रहने वाले कालीचरण बताते हैं- पहले की स्थिति बहुत बुरी थी। इस मंदिर में कोई नहीं जाता था। अभी 5-6 महीने से यह फेमस हो गया है। यहां आवारा जानवर बैठे दिखते थे, दोपहर 11 बजे के बाद कोई आता-जाता नहीं था। घरों की दीवारें भगवा पेंट हुई, लोग खुश
मथुरा के परिक्रमा मार्ग में बने इस मंदिर के रास्ते में दोनों तरफ की दीवारों पर मकानों को भगवा रंग से पोतकर उन पर आकर्षक चित्रकारी भी की जा रही है। जिन-जिन क्षेत्रों में काम किया जा रहा है। उस क्षेत्र के लोग राष्ट्रपति के आगमन से खासे खुश नजर आ रहे हैं। उनका मानना है कि अगर राष्ट्रपति नहीं आती तो उनके नारकीय क्षेत्र की दशा कभी नहीं सुधरती। BJP महानगर अध्यक्ष बोले- सोशल मीडिया से राष्ट्रपति को मंदिर का पता चला होगा
इस मंदिर में राष्ट्रपति क्यों आ रही है? ये सवाल हमने BJP महानगर अध्यक्ष हरिशंकर राजू यादव से पूछा। वह कहते हैं- यह मंदिर मेरे घर के पास में है। यह बहुत पौराणिक मंदिर है। इसकी पौराणिकता की जानकारी राष्ट्रपति को सोशल मीडिया से हुई होगी। इसलिए शायद वह यहां आ रही होंगी, बाकी ये सिर्फ एक संयोग ही है। ………………
यह भी पढ़ें : बांके बिहारी का 160 साल पुराना खजाना खुलेगा:हीरे-पन्नों से जड़े हार, सोने के कलश में सिक्के; VIDEO में तहखाने का रास्ता देखिए बांके बिहारी मंदिर में ‘ठाकुरजी’ का 160 साल पुराना खजाना खोला जाएगा। हर कोई जानना चाहता है कि इस खजाने में क्या है? मंदिर में खजाना जिस कमरे में रखा है, उसके कपाट यूं तो 54 साल पहले खुले थे। यहां सोने-चांदी के जेवर, सोने के कलश और चांदी के सिक्के रखे हैं। इनकी वेल्युएशन कितनी है? इसका कभी सर्वे नहीं हुआ। अनुमान है कि ये कई सौ करोड़ के हो सकते हैं। पढ़िए पूरी खबर…
श्रीकुब्जा कृष्ण मंदिर चर्चा में तब आया, जब राष्ट्रपति के मथुरा आने से पहले अधिकारियों के पास प्रोटोकॉल पहुंचा। सबसे पहले अफसरों ने इस मंदिर की लोकेशन तलाशी। बाद में सामने आया कि यह मंदिर शहर का दिल कहे जाने वाले होलीगेट से सिर्फ 500 मीटर दूर अंतापाडा में है। होली गेट से जब हम अंतापाडा पहुंचे, वहां रेलवे लाइन से पहले दाएं हाथ पर एक छोटा सा गेट दिखाई पड़ा। इसके ऊपर लिखा है- श्रीकुब्जा कृष्ण मंदिर। इस गेट पर अभी नया पेंट कराया गया था। दीवारों पर श्रीकृष्ण की लीलाएं उकेरी गई थीं। इस मंदिर तक एक संकरी रोड आती है, इस पर इंटरलॉकिंग बिछाने का काम चल रहा था। मंदिर के बगल में खंडहर है, जहां मजदूर मलबा हटाते दिखे। 3 फीट का एंट्री गेट, फिर 11 सीढ़ियों से पहुंचे मंदिर
यह सारी व्यवस्थाएं समझते हुए हम एंट्री गेट की तरफ बढ़े। सिर्फ 3 फीट चौड़े गेट से एंट्री के बाद हमें सामने 11 सीढ़ियां दिखीं। इस पर चढ़कर हम मंदिर कैंपस में पहुंचे। एक लॉबी और उसके दांयीं तरफ मंदिर के अंदर प्रवेश मिलता है। सामने गर्भगृह में श्रीकृष्ण विराजमान हैं। उनके साथ स्थापित मूर्ति को पहले हम राधारानी से जोड़कर देखते हैं। मगर पुजारी बताते हैं कि ये राधा रानी नहीं, बल्कि कंस की दासी कुब्जा हैं। मंदिर का रखरखाव 2 दुकानों के किराए से हो रहा
यहां पूजा करते हुए हमारी मुलाकात पुजारी आशीष चतुर्वेदी से हुई। हमने पूछा- आप यहां कितने सालों से पूजा कर रहे? पुजारी कहते हैं- हमारा परिवार पीढ़ियों से इस मंदिर की पूजा करता आ रहा है। मंदिर की देखभाल कैसे होती है? इस सवाल पर पुजारी कहते हैं- मंदिर परिसर के बाहर 2 दुकान हैं, जिनके किराए से यहां का खर्च चलता है। इस मंदिर में इक्का-दुक्का भक्त ही आते हैं। इसलिए दान वगैरह नहीं मिल पाता। हमने पूछा- इस वक्त तो मंदिर की मरम्मत हो रही है? रंग रोगन भी नया हुआ है? पुजारी बोले- मंदिर अभी तक टूटा-फूटा था, लेकिन भगवान की कृपा हुई तो इसके दिन भी बदल गए। अब पढ़िए, ये मंदिर क्यों खास है मान्यता- यहां दर्शन करने वालों के स्किन रोग दूर होते हैं…
हमने इस मंदिर से जुड़ी मान्यता पर सवाल पूछे। पुजारी आशीष चतुर्वेदी कहते हैं- द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण जब कंस से युद्ध करने मथुरा आए, तब कुब्जा इसी स्थान पर उनसे मिली थीं। कुब्जा के लिए कहा जाता है कि वह कंस की दासी थी, लेकिन वह भक्ति भगवान नारायण की करती थीं। कुब्जा को चर्म रोग भी था। उसे देखते ही भगवान ने उसके पैर पर पैर रखा और ठोड़ी पर हाथ रखकर उसे सीधा खड़ा कर दिया। श्रीकृष्ण के स्पर्श से कुब्जा सुंदर स्त्री बन गई। उसका रोग भी दूर हो गया। तभी से भगवान इस मंदिर में कुब्जा के साथ विराजमान हो गए। भक्तों के बीच मान्यता है कि इस मंदिर में चर्म (स्किन) रोग वाले अगर दर्शन करते हैं, तो उन्हें रोगों से मुक्ति मिलती है। अब लोगों की बात राजेश बोले- कुछ वीडियो पोस्ट होने के बाद भक्त आने लगे
शहर के ठीक बीच में स्थित इस मंदिर के आसपास मिश्रित आबादी है। यहां करीब 15 हजार लोग रहते हैं। इसमें सबसे ज्यादा ब्राह्मण-यादव जाति के लोग हैं। इसके बाद प्रजापति और कुशवाहा बिरादरी के लोग हैं। बाकी धर्म और जाति के लोग भी यहां बसे हुए हैं। यहीं के रहने वाले राजेश यादव कहते हैं- इस इलाके की स्थिति बहुत खराब रही है। यहां कभी सफाई नहीं होती है। एक बार सड़क बन गई, तो दोबारा किसी ने इस क्षेत्र की तरफ देखने की जहमत तक नहीं उठाई। राजेश कहते हैं- इस मंदिर को सिर्फ यहां पर रहने वाले लोग ही जानते थे। लोग भी इस मंदिर में कम ही आते-जाते थे। मगर पिछले कुछ महीनों में यहां भक्त आने लगे हैं, क्योंकि सोशल मीडिया पर मंदिर के कुछ वीडियो पोस्ट हुए थे। 72 साल की महिला बोलीं- पहली बार मंदिर की मरम्मत हुई
हमारी मुलाकात 72 साल की लौंगश्री देवी से हुई। वह कहती हैं- यहां एक इमली का पेड़ था, उसी के पास मंदिर था। लेकिन समय के साथ सब उजड़ गया था। अब जितना काम मंदिर संवारने के लिए हो रहा है। इतना होश संभालने के बाद कभी होते नहीं देखा। भगवान के लिए हर दिन दूध की सेवा करने वाली 60 वर्षीय कुसुम यादव बताती हैं- यहां जो कुछ परदेशी आते हैं, उनको चारा बेच देती हूं। मैं रात को भगवान के लिए दूध का भोग लगाने आती हूं। यहीं के रहने वाले कालीचरण बताते हैं- पहले की स्थिति बहुत बुरी थी। इस मंदिर में कोई नहीं जाता था। अभी 5-6 महीने से यह फेमस हो गया है। यहां आवारा जानवर बैठे दिखते थे, दोपहर 11 बजे के बाद कोई आता-जाता नहीं था। घरों की दीवारें भगवा पेंट हुई, लोग खुश
मथुरा के परिक्रमा मार्ग में बने इस मंदिर के रास्ते में दोनों तरफ की दीवारों पर मकानों को भगवा रंग से पोतकर उन पर आकर्षक चित्रकारी भी की जा रही है। जिन-जिन क्षेत्रों में काम किया जा रहा है। उस क्षेत्र के लोग राष्ट्रपति के आगमन से खासे खुश नजर आ रहे हैं। उनका मानना है कि अगर राष्ट्रपति नहीं आती तो उनके नारकीय क्षेत्र की दशा कभी नहीं सुधरती। BJP महानगर अध्यक्ष बोले- सोशल मीडिया से राष्ट्रपति को मंदिर का पता चला होगा
इस मंदिर में राष्ट्रपति क्यों आ रही है? ये सवाल हमने BJP महानगर अध्यक्ष हरिशंकर राजू यादव से पूछा। वह कहते हैं- यह मंदिर मेरे घर के पास में है। यह बहुत पौराणिक मंदिर है। इसकी पौराणिकता की जानकारी राष्ट्रपति को सोशल मीडिया से हुई होगी। इसलिए शायद वह यहां आ रही होंगी, बाकी ये सिर्फ एक संयोग ही है। ………………
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