मायावती जोर से चिल्लाईं- आप हरिजन कहकर जलील कर रहे…:यही तेवर देखकर कांशीराम ने चुना; 70वें जन्मदिन पर पढ़िए बहनजी के अनसुने किस्से

दिल्ली का इंदरपुरी इलाका। एक छोटा-सा खस्ताहाल मकान। दिसंबर, 1977 की एक सर्द रात थी। अचानक रात 11 बजे किसी ने घर की कुंडी खटखटाई। घर के मालिक प्रभुदास ने दरवाजा खोला, तो देखा कि बाहर मुड़े-तुड़े कपड़ों में गले में मफलर डाले, लगभग गंजा हो चला एक अधेड़ शख्स खड़ा था। उस अधेड़ ने अपना परिचय दिया- ‘मैं बामसेफ का अध्यक्ष हूं…आपकी बेटी को पुणे में एक भाषण देने के लिए आमंत्रित करने आया हूं।’ ये शख्स कोई और नहीं, कांशीराम थे। जो प्रभुदास की छठी संतान मायावती के संबंध में बात कर रहे थे। इस एक मुलाकात ने मायावती की जिंदगी बदल दी। IAS बनने का सपना देखने वाली ये लड़की आगे चलकर देश के सबसे बड़े सूबे यूपी की 4 बार सीएम बनीं। समर्थक उन्हें प्यार से ‘बहनजी’ कहकर बुलाते हैं। आज मायावती का 70वां जन्मदिन है। इस मौके पर दैनिक भास्कर में पढ़िए उनकी जिंदगी के कुछ अनोखे किस्से… पहले पढ़ते हैं मायावती की किस बात से कांशीराम प्रभावित हुए हुआ ये कि एक दिन पहले दिल्ली के कान्सटीट्यूशन क्लब में 21 साल की मायावती ने उस समय के स्वास्थ्य मंत्री राज नारायण पर जबरदस्त हमला बोला था। राज नारायण अपने भाषण में दलितों को बार-बार ‘हरिजन’ कहकर संबोधित कर रहे थे। इसके बाद जब मायावती मंच पर पहुंची तो जोर से चिल्लाईं, ‘आप हमें ‘हरिजन’ कह कर अपमानित कर रहे हैं।’ मायावती के तीखे तेवरों की चर्चा अगले दिन दिल्ली के अखबारों की बड़ी-बड़ी हेडलाइन बनकर छपी थी। यही खबर पढ़कर कांशीराम उनके घर पहुंचे। आईएएस की तैयारी में जुटी मायावती के घर बिजली नहीं थी। वह लालटेन की रोशनी में पढ़ रही थीं। कांशीराम की जीवनी कांशीराम ‘द लीडर ऑफ दलित्स’ में बद्री नारायण लिखते हैं, ‘कांशीराम ने मायावती से पहला सवाल पूछा कि वो क्या करना चाहती हैं? मायावती ने कहा कि वो आईएएस बनना चाहती हैं, ताकि अपने समुदाय के लोगों की सेवा कर सकें।’ कांशीराम ने कहा- तुम आईएएस बनकर क्या करोगी? मैं तुम्हें एक ऐसा नेता बना सकता हूं, जिसके पीछे एक नहीं कई ‘कलेक्टरों’ की लाइन लगी रहेगी। तुम सही मायने में तब अपने लोगों की सेवा कर पाओगी। मायावती की समझ में तुरंत आ गया कि उनका भविष्य कहां है? हालांकि उनके पिता इसके सख्त खिलाफ थे। वे नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी आईएएस की तैयारी छोड़कर कांशीराम के आंदोलन में शामिल हो और उनके साथ घूमे। मायावती अपनी आत्मकथा ‘बहुजन आंदोलन की राह में मेरी जीवन संघर्ष गाथा’ में लिखती हैं कि एक दिन उनके पिता उन पर चिल्लाए। कहने लगे- तुम कांशीराम से मिलना बंद करो और आईएएस की तैयारी फिर से शुरू करो, वरना तुरंत मेरा घर छोड़ दो। मायावती ने अपने पिता की बात नहीं मानी। उन्होंने अपना घर छोड़ दिया और पार्टी ऑफिस में आकर रहने लगीं। उनकी जीवनी लिखने वाले अजय बोस अपनी किताब ‘बहनजी- ए पॉलिटिकल बायोग्राफी’ में लिखते हैं, ‘मायावती ने स्कूल अध्यापिका के तौर पर मिलने वाले वेतन के पैसों को उठाया, जिन्हें जोड़ रखा था। एक सूटकेस में कुछ कपड़े भरे और उस घर से बाहर आ गईं। एक लड़की का घर छोड़कर अकेले रहना उस समय बड़ी बात थी। मायावती असल में किराए का कमरा लेकर रहना चाहती थीं, लेकिन इसके लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे। इसलिए पार्टी ऑफिस में रहना उनकी मजबूरी थी। उनके और कांशीराम के बीच बहुत ही अच्छी ‘केमिस्ट्री’ थी। दोनों ने मिलकर बहुजन आंदोलन को आगे बढ़ाया और फिर 1984 बहुजन समाज पार्टी की नींव रखी। संघर्ष के दिनों में दलित मूवमेंट को आगे बढ़ाने के लिए कांशीराम के साथ मायावती कई-कई किमी साइकिल से यात्रा करती थीं। मायावती बचपन से दृढ़ और बहादुर थीं
मायावती का जन्म 15 जनवरी, 1956 में दिल्ली में हुआ था। उनके पिता प्रभुदास गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) के पैतृक गांव बादलपुर में एक डाकघर कर्मचारी थे। वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। मायावती की मां का नाम रामरती था। मायावती 9 भाई-बहनों में छठे नंबर पर हैं। मायावती ने बीए करने के बाद दिल्ली के कालिंदी कॉलेज से एलएलबी और बाद में बीएड किया। राजनीति में आने से पहले वह दिल्ली के एक स्कूल में टीचर के रूप में काम करती थीं। उनके बचपन का एक किस्सा बहुत मशहूर है। मायावती 5वीं में पढ़ रही थीं। उनके भाई सुभाष को जन्मे 2 दिन ही हुए थे। अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। पिता प्रभुदास किसी काम के चलते बाहर गए हुए थे और मां इस स्थिति में नहीं थीं कि बेटे को अस्पताल ले जाएं। सबसे पास का सरकारी अस्पताल 7 किमी दूर था। तब मायावती अपने भाई को अकेले ही कंधे पर उठाकर पैदल अस्पताल के लिए निकल पड़ी थीं। छोटी-सी उम्र की एक बच्ची अपने भाई को कंधे पर लेकर जब अस्पताल पहुंची, तो डॉक्टरों को भी आश्चर्य हुआ। उन्होंने सुभाष का इलाज किया और कुछ घंटों बाद मायावती अपने भाई को लेकर घर वापस आ गईं। मायावती के भाई सुभाष की मौत 2016 में हुई थी। 40 साल पुराना मायावती का भाषण…जब जनता मुरीद हुई
14 अप्रैल, 1984 को कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी बना ली। मायावती की उस वक्त पार्टी में नंबर-2 की पोजिशन थी। पार्टी के विस्तार के लिए शुरू किए गए जन जागरण अभियान की कमान मायावती संभाल रही थीं। वह हर दिन कभी पैदल, तो कभी साइकिल से कई-कई रैलियां करती थीं। 1986 में 30 साल की मायावती एक सभा को संबोधित करने हरिद्वार पहुंचीं। उस वक्त हरिद्वार यूपी का ही हिस्सा था। वहां उन्होंने जो भाषण दिया, वह इतना ऐतिहासिक था कि सारे दलित और पिछड़ा वर्ग एकजुट हो गए। नतीजा ये रहा कि वह 1989 का लोकसभा चुनाव जीत गईं। बसपा का वोट शेयर बीजेपी से ज्यादा हो गया। मायावती ने मंच पर से ही जनता से एक-एक कर पांच सवाल पूछे, फिर अपने ही अंदाज में उसके जवाब दिए। अजय बोस अपनी किताब में लिखते हैं- मायावती जनता से मुखातिब होकर पूछती हैं कि क्या आप लोग मुझे ऐसे दलित व्यक्ति का नाम बता सकते हैं, जो पिछले 40 सालों में कांग्रेस सरकार की आर्थिक योजनाओं के कारण फला-फूला हो? जनता चुप रही। फिर मायावती खुद उसका जवाब देते हुए कहती हैं- तो तुम मानते हो कि कांग्रेस ने दलितों को मूर्ख बनाया? जनता हां में जोर से जवाब देती है, ‘हां, कांग्रेस ने हम सबको मूर्ख बनाया।’ मायावती ने इसके बाद दूसरा सवाल पूछा, ‘1952 के पहले चुनाव के बाद से हर चुनाव में कांग्रेस के 95% वोट दलितों के होते हैं और सिर्फ 5% वोट ब्राह्मणों के। लेकिन कांग्रेस शासित राज्यों में या फिर केंद्र में 5% दलित मंत्री होते हैं और 55% ब्राह्मण मंत्री। देश के 22 राज्यों के मुख्यमंत्रियों में एक भी दलित नहीं है। तुम्हारे ख्याल से ऐसा क्यों हैं? भीड़ चिल्लाते हुए बोली, ‘आप ठीक कहती हैं, कांग्रेस ने हमें मूर्ख बनाया।’ मायावती जोश से भर चुकी भीड़ के सामने फिर कहती हैं- हम सब जानते हैं कि ये ऊंची जाति के मनुवादी नहीं चाहते कि दलित अच्छा खाए, अच्छे कपड़े पहने और अच्छा काम करे। तो क्या कोई ऐसी मशीन राज्य में या केंद्र में ऐसी बनाई जा सकती है जो इन ऊंची जाति वाले लोगों और मंत्रियों का हृदय परिवर्तन कर दे। भीड़ चिल्लाकर कहती है, नहीं, यह नामुमकिन है, वे हमसे नफरत करते हैं, वे कभी हमारी भलाई नहीं चाहेंगे। मायावती चौथा सवाल पूछती हैं कि दलितों को आरक्षण देने वाले बाबा साहेब किसी मनुवादी संगठन में शामिल होते तो क्या कुछ कर पाते? भीड़ से जवाब आता है कि कभी नहीं। वे लोग बाबा साहेब अंबेडकर को कभी भी ऐसा नहीं करने देते। फिर मायावती आखिरी सवाल दागती हैं- क्या आप नहीं चाहते कि दमन और शोषण झेल रहे दलितों के लिए अलग पार्टी बनाई जाए? मायावती पूरी रौ में आ चुकी होती हैं। फिर कहती हैं- क्या तुम लोग यह नहीं चाहते कि दमन और शोषण के शिकार 85% लोग मिलकर अपनी अलग पार्टी बनाएं? मायावती के इस आखिरी सवाल के बाद जनता नारा लगाना शुरू कर देती है… कांशीराम तुम संघर्ष करो, हम सब तुम्हारे साथ हैं। मायावती तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। मायावती के इस भाषण का कमाल था कि दलित तेजी से बसपा से जुड़ने लगे। वह बसपा के विस्तार में जुट गईं। 15 अगस्त, 1987 को दिल्ली की जामा मस्जिद पर वह पार्टी के भाईचारा बनाओ कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचीं। बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज उन्हें सुनने पहुंचा था। मायावती कहती हैं कि आजादी से पहले देश में 33% मुस्लिमों के पास नौकरी थी, आज महज 2% नौकरी रह गई है। इस भाषण का प्रभाव कुछ ऐसा हुआ कि मुस्लिम वोटर कांग्रेस से दूर होते चले गए। नतीजा ये रहा कि बसपा को 1989 के लोकसभा चुनाव में 10% वोट मिले। यह भाजपा को मिले वोट शेयर से 2.5% ज्यादा था। मायावती ने पहला चुनाव 84 में लड़ा, लेकिन हार गईं। 1985 में बिजनौर सीट पर हुए उपचुनाव फिर मैदान में उतरी। उनका मुकाबला कांग्रेस प्रत्याशी जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमारी से था। मायावती ये चुनाव भी हार गईं। 4 साल बाद वे 1989 में बिजनौर से ही चुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा में पहुंची थीं। फिर 1998, 1999 और 2004 में लगातार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुईं। यही नहीं, 1999 में वह बहुजन समाज पार्टी (बसपा) संसदीय दल की नेता भी बनीं। मायावती 1994 में राज्यसभा के लिए पहली बार निर्वाचित हुईं। वो कांड जिसके चलते मायावती ने साड़ी पहननी छोड़ी
रामजन्मभूमि आंदोलन के बाद मुलायम सिंह यादव ने 1992 में समाजवादी पार्टी नाम से नई पार्टी बनाई। भाजपा बाबरी विध्वंस के चलते जनसमर्थन के उफान पर थी। सपा ने भाजपा को टक्कर देने के लिए बसपा से गठबंधन किया। रिजल्ट आया तो सपा 109 और बसपा 67 सीटें जीतने में कामयाब रही। भाजपा 177 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन सत्ता के लिए बहुमत नहीं जुटा पाई। मुलायम सिंह ने कांग्रेस समेत दूसरे छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बना ली। मायावती गठबंधन की सरकार पर बारीक नजर बनाए हुए थीं। वह सरकार के निर्णयों में पूरा दखल देती थीं। 1995 में यूपी पंचायत चुनाव में सपा को बड़ी जीत मिली। 50 जिलों में से 30 पर सपा का परचम फहरा। 9 जिलों में भाजपा, पांच पर कांग्रेस और बसपा को सिर्फ एक सीट ही मिली। यहीं से मुलायम सिंह यादव बसपा के विधायकों को अपने खेमे में करने की कोशिश करने लगे। उधर, भाजपा इस गठबंधन को तोड़ने के लिए बसपा पर डोरे डाल रही थी। 23 मई, 1995 को मुलायम सिंह यादव ने अस्पताल में भर्ती कांशीराम से बात करनी चाही, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, उसी रात कांशीराम ने भाजपा के लालजी टंडन से फोन पर गठबंधन को लेकर बात की। जब मायावती अस्पताल पहुंचीं, तो उनसे कांशीराम ने पूछा कि क्या वो सीएम बनेंगी? 1 जून, 1995 को मायावती लखनऊ पहुंचीं और गठबंधन टूटने का ऐलान कर दिया। इसके अगले दिन ही गेस्ट हाउस कांड के रूप में यूपी की सियासत का सबसे काला अध्याय लिखा गया। 2 जून, 1995 को लखनऊ के मीराबाई स्टेट गेस्ट हाउस में मायावती बसपा के विधायकों के साथ मीटिंग कर रही थीं। समर्थन वापस लेने से मुलायम सिंह यादव के समर्थकों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। अजय बोस अपनी किताब में लिखते हैं- सैकड़ों की संख्या में सपा के कार्यकर्ता और विधायक गेस्ट हाउस में घुस आए। कुछ बसपा विधायकों को जबरन अपने साथ ले गए। कई विधायकों के साथ मारपीट तक करने लगे। मायावती ने भीड़ से बचने के लिए खुद को एक कमरे में बंद कर लिया। मायावती को गेस्ट हाउस कांड से बचाने वालों में पुलिस अफसर विजय भूषण और सुभाष सिंह बघेल की बड़ी भूमिका थी। इन्होंने ही उन्मादी सपा कार्यकर्ताओं को पीछे खिसकने पर मजबूर किया। मीडियाकर्मियों की मौजूदगी भी सपा कार्यकर्ताओं की राह में रोड़ा बन गई थी। बाद में वहां भाजपा के विधायक भी पहुंच गए। इनमें ब्रह्मदत्त द्विवेदी की बड़ी भूमिका बताई जाती है। मायावती ने ताउम्र उन्हें अपना बड़ा भाई माना और कभी भी उनकी सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारा। खैर, हम कहानी में आगे बढ़ते हैं। देर रात जब गेस्ट हाउस में भारी पुलिस फोर्स पहुंची, तो माहौल पूरी तरह से शांत हुआ। तब मायावती को बाहर निकाला गया। मायावती अपनी आत्मकथा ‘मेरा संघर्षमय जीवन एवं बहुजन समाज मूवमेंट का सफरनामा’ में लिखती हैं कि ‘मुलायम सिंह का आपराधिक चरित्र उस समय सामने आया, जब उन्होंने अपने बाहुबल का इस्तेमाल करते हुए न सिर्फ हमारे विधायकों का अपहरण करने की कोशिश की, बल्कि मुझे मारने का भी प्रयास किया। उसी रात भाजपा के समर्थन से राज्यपाल ने यूपी की पहली दलित सीएम के तौर मायावती को शपथ दिलाई। इस तरह 3 जून, 1995 से 18 अक्टूबर, 1995 तक वह प्रदेश की पहली दलित सीएम बनीं। भाजपा के ही समर्थन से वह दूसरी बार 21 मार्च, 1997 को, तीसरी बार 3 मई, 2002 में सीएम बनीं। राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग कर मायावती ने 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा को अकेले बहुमत दिलवा दिया। इस तरह वह 12 मई, 2007 को चौथी बार खुद की पार्टी की बहुमत के साथ सीएम बनीं। लंबे बालों वाली मायावती ने क्यों कराए शॉर्ट हेयर
मायावती ने जब राजनीति शुरू की तो उनके लंबे बाल हुआ करते थे। यहां तक कि जब पहली बार लोकसभा में पहुंचीं, तब भी वह बाल लंबे रखती थीं। पर 90 के दशक के अंत में मायावती एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहुंचीं तो उनकी हेयर स्टाइल बदली हुई थी। लंबे बालों की जगह शॉर्ट हेयर कट में वह मीडिया के सामने पहुंची थीं। बाद में ये खबर की सुर्खियां भी बनी। पोनी टेल बांधने वाली मायावती को शॉर्ट हेयर स्टाइल में देखना बहुत से लोगों के लिए अचंभे का विषय था, क्योंकि उस दौर में शॉर्ट हेयर फैशन माना जाता था। कुछ दिनों बाद मायावती ने एक इंटरव्यू में खुद इसका रहस्य खोला था। बताया था कि ‘एक दिन में कई कार्यक्रमों में जाना पड़ता है। बड़े बालों की वजह से कई बार कंघी करने में समय खराब होता था। इसलिए मैंने अपना टाइम बचाने के लिए बालों को कटवाना ही बेहतर समझा। जब 1 वोट से गिरवाई वाजपेयी की सरकार
मायावती के मिजाज के बारे में भविष्यवाणी करना बहुत कठिन है। बात 17 अप्रैल, 1999 की है। जयललिता के समर्थन वापसी के चलते तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से लोकसभा में विश्वास मत हासिल करने के लिए कहा। सरकार आश्वस्त थी, क्योंकि चौटाला एनडीए खेमे में वापस आने का ऐलान कर चुके थे। मायावती की तरफ से संकेत मिले थे कि उनकी पार्टी मतदान में भाग नहीं लेगी। उस दिन संसद भवन के पोर्टिको में जब अटल बिहारी वाजपेयी अपनी कार में बैठ रहे थे तो पीछे आ रही मायावती ने चिल्ला कर कहा था ‘आपको चिंता करने की जरूरत नहीं।’ मतदान से कुछ समय पहले, संसदीय कार्यमंत्री कुमारमंगलम ने बसपा सांसदों से बात कर कहा, अगर आपने सहयोग किया तो शाम तक मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री हो सकती हैं। सरकार के खेमे में बढ़ती गतिविधियों को देखकर शरद पवार मायावती के पास पहुंचे। मायावती ने उनसे सीधा सवाल किया, ‘अगर हम सरकार के खिलाफ वोट करते हैं तो क्या सरकार गिर जाएगी?’ पवार ने हां में जवाब दिया। जब बहस के बाद वोटिंग का समय आया तो पूरे सदन में सन्नाटा छाया हुआ था। बसपा वोटिंग का बहिष्कार करने की बजाय इस प्रक्रिया में शामिल हो गई। मायावती, आरिफ मोहम्मद खां और अकबर अहमद डंपी की तरफ देखकर गरजीं, ‘लाल बटन दबाओ’ ये उस जमाने की सबसे बड़ी ‘राजनीतिक कलाबाजी’ थी। परिणाम ‘फ्लैश’ हुआ तो वाजपेयी सरकार 1 मत से विश्वास मत खो चुकी थी। कांशीराम को बंधक बनाने का लगा आरोप
अजय बोस लिखते हैं- कांशीराम गर्म मिजाज के शख्स थे। उनकी जुबान भी खराब थी। नाराज होने पर उन्हें अपने हाथ इस्तेमाल करने में भी कोई परहेज नहीं था। मायावती भी मुखर थीं। वो भी कांशीराम के लिए उतने ही चुनिंदा शब्दों का इस्तेमाल करती थीं, जितने कांशीराम करते थे। मायावती कांशीराम के प्रति बहुत ‘पजेसिव’ थीं। अगर कोई भी शख्स उनके पास 5 मिनट से अधिक बैठ जाता, तो वो कमरे में किसी न किसी बहाने से आ जाती थीं। गिरती सेहत के कारण कांशीराम ने 15 दिसंबर, 2001 में मायावती को अपना राजनीतिक वारिस घोषित कर दिया। 14 सितंबर, 2003 को कांशीराम को लकवा की वजह से अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। तब मायावती सीएम थीं। उन्होंने कांशीराम की देखभाल का सारा जिम्मा अपने हाथों में ले लिया। इसी दौरान कांशीराम के परिवार ने मायावती पर उन्हें बंधक बनाकर रखने के आरोप लगाए। हाईकोर्ट में याचिका तक दाखिल की, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद कांशीराम की मां ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कांशीराम की स्थिति को जांचने के लिए मेडिकल बोर्ड का गठन किया। लेकिन, फैसला आने से पहले ही याचिकाकर्ता मां की मौत होने से केस खारिज हो गया। अजय बोस अपनी किताब में लिखते हैं कि कांशीराम के अंतिम दिनों में जिस तरह मायावती ने उनकी सेवा की, उसकी मिसाल मिलना बहुत मुश्किल है। वह पूरे तीन साल तक मायावती के घर में रहे। जिस तरह से मायावती अपने हाथों से उनके कपड़े धोती और उन्हें खाना खिलाती, वो बताता था कि कांशीराम के लिए उनके दिल में क्या जगह थी। उस समय कांशीराम उन्हें कुछ देने की स्थिति में नहीं थे। मायावती जो कुछ भी उनके लिए कर रही थीं, वो सिर्फ उनके प्रति स्नेह-वश कर रही थीं। 9 अक्टूबर, 2006 में उनके निधन पर मायावती ने मुखाग्नि दी थी। मायावती के कमरे में कोई जूता पहन कर क्यों नहीं जा सकता
2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा और रालोद ने गठबंधन किया था। गठबंधन दल के नेताओं की देवबंद में संयुक्त रैली थी। इस रैली में मायावती, अखिलेश यादव और अजीत सिंह को शामिल होना था। मंच पर मायावती और अखिलेश यादव पहुंच चुके थे। अजीत सिंह जूता पहन कर मंच पर चढ़ने के लिए आगे बढ़े कि तभी बसपा के एक नेता ने उन्हें रोक दिया। उनसे जूते उतारने के लिए कहा। बोला कि बहन मायावती को ये पसंद नहीं कि वो जब मंच पर चढ़ें तो उनके अलावा कोई वहां जूता पहने रहे। अजीत सिंह को अपने जूते उतारने पड़े और तब जाकर उन्हें मंच पर मायावती के साथ खड़े होने का मौका मिला। मायावती के जीवनीकार अजय बोस लिखते हैं कि सफाई के प्रति मायावती की ‘सनक’ के पीछे भी एक कहानी है। दरअसल, जब मायावती पहली बार लोकसभा में चुन कर आईं तो उनके तेल लगे बाल और देहाती लिबास तथाकथित संभ्रांत महिला सांसदों के लिए मजाक का विषय बन गया था। वो अक्सर शिकायत करती थीं कि मायावती को बहुत पसीना आता है। उनमें से एक वरिष्ठ महिला सांसद से यहां तक कहा था कि वो मायावती से कहें कि वो अच्छा ‘परफ्यूम’ लगा कर सदन में आया करें।’ मायावती के नजदीकी लोगों के मुताबिक, बार-बार उनकी जाति का उल्लेख करके ये आभास दिलाने की कोशिश करते कि दलित अक्सर गंदे होते हैं। इसका उन पर बड़ा गहरा असर पड़ा। मायावती ने इसके बाद हुक्म दिया कि उनके कमरे में कोई भी व्यक्ति वो चाहे जितना बड़ा ही क्यों ना हो, जूता पहन कर नहीं जाएगा। मायावती की एक और जीवनीकार नेहा दीक्षित ने भी कारवां पत्रिका में लिखती हैं कि मायावती में सफाई के लिए इस हद तक जुनून है कि वो अपने घर में दिन में तीन बार पोंछा लगवाती हैं। भ्रष्टाचार के आरोप, राजनीतिक के नेपथ्य में जाना और फिर कमबैक की कोशिश
2007 से 2012 तक यूपी में 5 साल पूरे बहुमत से शासन करने वाली मायावती ने दलितों के लिए खूब काम किए। लखनऊ से लेकर नोएडा तक दलित नायकों के पत्थरों की मूर्तियां तक लगवाईं। वह अपने समर्थकों से महंगे गिफ्ट लेती थीं। 2012 के आखिरी तक उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। ताज कॉरिडोर मामले से लेकर एनआरएचएम घोटाले में उनके नाम खूब उछाले गए। साल- 2012 में उन्होंने राज्यसभा के नामांकन पत्र के समय 112 करोड़ की कुल संपत्ति होने का हलफनामा दाखिल किया। उन्होंने दिल्ली के मशहूर सरदार पटेल मार्ग पर करोड़ों रुपए देकर 22 और 23 नंबर की कोठियों का सौदा किया। इसके अलावा अपने पुश्तैनी गांव बादलपुर में उन्होंने शाही शान-शौकत वाली आलीशान कोठी बनवाई। 2012 वाले हलफनामे में ही उन्होंने स्वीकार किया कि उनके पास लगभग एक करोड़ मूल्य के आभूषण हैं। मायावती के नजदीकी रिश्तेदारों पर आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप लगे। इन आरोपों से वह कानूनी दांव-पेंच में घिरती चली गईं। इसी के साथ बसपा का ग्राफ भी गिरता चला गया। 2012 में प्रमुख विपक्षी दल वाली बसपा 2014 के लोकसभा में अपना खाता तक नहीं खोल पाई। 2017 विधानसभा में तीसरे नंबर पर खिसक गई। 2019 में सपा-रालोद से गठबंधन किया तो लोकसभा में 10 सांसद जीते। लेकिन, 2022 के विधानसभा में बसपा का वोट शेयर गिरकर 12.88% रह गया। दो साल बाद हुए लोकसभा में ये वोट शेयर 9 के नीचे पहुंच गया। आज लोकसभा में एक भी बसपा का सांसद नहीं है। विधानसभा में भी सिर्फ एक विधायक है। मायावती राजनीतिक रूप से अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही हैं। हालांकि, 2025 में बसपा सुप्रीमो ने एक बार फिर कमबैक की ताकत का प्रदर्शन किया है। भतीजे आकाश को पार्टी में अंदर-बाहर करने वाली मायावती अब अपने भतीजे को पार्टी में नंबर-2 का ओहदा दे चुकी हैं। 9 अक्टूबर, 2025 को कांशीराम की पुण्यतिथि पर लाखों की भीड़ जुटाकर मायावती ने एक बार फिर 2027 विधानसभा के लिए पार्टी की उम्मीदों को जिंदा कर दिया है। —————————— ये खबर भी पढ़ें- मेरठ में जहां युवक को जिंदा जलाया, वहां से रिपोर्ट, OBC बनाम ठाकुर की राजनीति ‘मुजफ्फरनगर से सोनू मुझसे मिलने आ रहा था। फोन करके कहने लगा कि मौसी मैं 80 हजार लेकर आ रहा हूं, भैया के साथ बाइक खरीदने जाएंगे। यही उसकी आखिरी बात थी। तब क्या पता था कि सोनू मुझसे मिल ही नहीं पाएगा। कोई ऑटो वाला उसको मार डालेगा।’ पढ़िए पूरी खबर…