मायावती–बोलीं जातीय जनगणना पर क्रेडिट लेने की होड़:कांग्रेस-भाजपा की सियासत में दलित-ओबीसी समाज फिर बना ‘वोट बैंक

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने कहा- देश में सन् 1931 के बाद पहली बार जातीय जनगणना कराए जाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक फैसला किया है। लेकिन इस फैसले का राजनीतिक क्रेडिट लेने की होड़ ने एक बार फिर दलित व ओबीसी समाज के संवैधानिक हकों को लेकर कांग्रेस व भाजपा की पुरानी पोल खोल दी है। आरक्षण व सामाजिक न्याय को कमजोर करने का रिकॉर्ड कांग्रेस के नाम बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा जातीय जनगणना पर कांग्रेस खुद को जनता की हितैषी बताने में जुटी है, लेकिन वह यह भूल गई कि आरक्षण व सामाजिक न्याय को कमजोर करने का सबसे पुराना रिकॉर्ड उसी के नाम है। आजादी के बाद दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद दलित और ओबीसी समाज को आरक्षण के नाम पर गुमराह कर, असल अधिकारों से वंचित रखने का दोष कांग्रेस पर बराबर लगता रहा है। यही कारण था कि समय के साथ कांग्रेस का जनाधार खिसकता गया और दलित-ओबीसी वर्ग का भरोसा डगमगाया। वोटबैंक की चाहत में कांग्रेस का प्रेम उफान पर मायावती ने निशाना साधते हुए कहा कि सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस को अब दलित और पिछड़ा वर्ग की पीड़ा समझ आ रही है। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या यह ‘सामाजिक न्याय’ का प्रेम है या फिर महज वोटबैंक साधने की नई सियासी रणनीति? जनता को यह भी याद है कि कैसे आरक्षण की धार को कुंद करने की कोशिशें कांग्रेस की सरकारों में हुई थीं। वोट की चिंता में भाजपा ने लिया जातीय जनगणना पर निर्णय दूसरी ओर, भाजपा का ट्रैक रिकॉर्ड भी इससे जुदा नहीं। कांग्रेस की ही तरह भाजपा भी जातीय जनगणना से लंबे समय तक बचती रही, लेकिन जब जन भावना और सियासी दबाव ने करवट ली, तब जाकर केंद्र सरकार को यह फैसला लेना पड़ा। यह झुकाव ‘सामाजिक न्याय’ के प्रति प्रतिबद्धता का नहीं, बल्कि वोट की चिंता का परिणाम ज्यादा लगता है। बाबा साहेब से लेकर धारा 340 तक… दोनों दलों का मिला-जुला खेल बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को भारत रत्न से सम्मानित करने में हो या ओबीसी को संवैधानिक ढांचे के तहत आरक्षण देने की लड़ाई में, कांग्रेस और भाजपा दोनों की भूमिका को लेकर कई बार सवाल उठे हैं। धारा 340 के प्रावधानों को निष्क्रिय बनाए रखने से लेकर जातीय जनगणना की अनदेखी तक, इन दोनों दलों का ट्रैक रिकॉर्ड सामाजिक न्याय के बजाय सियासी लाभ पर केंद्रित रहा है। जनता को रहना होगा सजग अब जब जातीय जनगणना की प्रक्रिया गति पकड़ रही है, तब सबसे जरूरी है कि जनता—खासतौर पर दलित और ओबीसी वर्ग—सियासी बयानों की चकाचौंध से बचकर, हक और अधिकारों की बारीकी को समझे। क्योंकि असली लड़ाई काग़ज़ों पर नहीं, हकीकत में समानता की है। सवाल यही है—क्या यह जातीय जनगणना सिर्फ वोटों की फसल काटने का औजार बनेगी, या वास्तव में सामाजिक न्याय की बहुप्रतीक्षित जमीन तैयार करेगी?