मुकदमा रामवीर पर, सजा राजवीर ने काटी:मैनपुरी में दरोगा ने पैर पकड़कर माफी मांगी, फिर गैंगस्टर बनाया था; 17 साल बाद बेगुनाह निकले

मैनपुरी के राजवीर यादव। उम्र 55 साल है, लेकिन चेहरे और हाथों की झुर्रियों से 65 साल के लगते हैं। बोलते वक्त जुबान कांपती है। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि उनके पिछले 17 साल कोर्ट-कचहरी में खुद को बेगुनाह साबित करने में बर्बाद हो गए। मानसिक पीड़ा ऐसी कि रातों की नींद गायब हो गई। सामाजिक प्रतिष्ठा इतनी खराब हो गई कि बेटियों के लिए जहां भी रिश्ता देखने गए, गैंगस्टर कहकर ताना मारा गया। बेंगलुरु जाकर काम करना चाहते थे। लेकिन, मुकदमे की तारीख ने उन्हें मैनपुरी छोड़ने का मौका ही नहीं दिया। 25 जुलाई, 2025 को राजवीर को न्याय मिला। जिस केस से उनका दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं था, उसमें उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया गया। कहा गया, आपको गलत फंसाया गया। राजवीर अब राहत महसूस कर रहे, लेकिन उस सिस्टम को कोस भी रहे जिसने उन्हें 17 सालों तक उलझाए रखा। दैनिक भास्कर की टीम मैनपुरी में इस परिवार से मिलने पहुंची। पूरी घटना और कानूनी कार्यवाही को समझा। आइए पूरा मामला जानते हैं… गिरफ्तार करना था रामवीर को, पकड़े गए राजवीर
करीब 17 साल पहले 31 अगस्त को बदनपुर गांव के ही एक दलित व्यक्ति ने नगला भंत गांव के रामवीर, मनोज, प्रवेश और भोले के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज कराया था। पुलिस ने शाम को 5 बजे मनोज, प्रवेश और भोले को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। उसी दिन रात में नगला पंत गांव के पास ट्रक लूट की एक शिकायत आई। पुलिस ने इस मामले में भी गिरफ्तार किए गए लोगों का नाम जोड़ते हुए धाराएं बढ़ा दीं। रामवीर की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी चली। रामवीर के भाई राजवीर उस दिन खेतों में पानी लगाने गए थे। पुलिस ने रामवीर की जगह उन्हें गिरफ्तार किया और चालान करके जेल भेज दिया। राजवीर कहते रहे कि मैं रामवीर नहीं हूं। मेरा किसी भी घटना से कोई संबंध नहीं है। लेकिन, पुलिस ने उनकी एक नहीं सुनी। राजवीर 22 दिन तक जेल में रहे। परिवार के लोगों ने किसी तरह से जमानत करवाई। खेत में पानी लगा रहा था, ट्रक लूट में नाम आ गया
मैनपुरी जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर नगला भंत गांव है। इसी गांव में राजवीर का घर है। परिवार में पत्नी सुनीता के अलावा 3 बेटियां और 1 बेटा है। बेटियों की शादी हो चुकी है। हम गांव पहुंचे तो राजवीर परिवार और गांव के लोगों के साथ बैठे मिले। हमने इस पूरी घटना को लेकर बात शुरू की। राजवीर कहते हैं- बगल के गांव बदनपुर से एक लड़के को पुलिस ले गई। उस पर दबाव डालकर हमारे गांव के 4 लोगों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट में मुकदमा करवा दिया। राजवीर कहते हैं- हमारा किसी भी मुकदमे में कोई नाम नहीं था। हमारे छोटे भाई रामवीर नहीं मिले, इसलिए पुलिस हमको उठा ले गई। एक दिन यहीं मैनपुरी कोतवाली में रखा और अगले दिन चालान करके जेल भेज दिया। रात 10 बजे एक ट्रक की लूट में भी मनोज, प्रवेश और भोले को आरोपी बना दिया। जबकि शाम के 7 बजे ही सबको जेल भेजा जा चुका था। उस मामले में भी धारा- 307 लगाई गई। जेल में काम न करना पड़े, इसलिए 20 हजार दिए
राजवीर कहते हैं- मुझे आगरा जेल भेज दिया गया। उस वक्त हमारी आर्थिक स्थिति थोड़ी खराब थी। मेरे खिलाफ कभी कोई मुकदमा नहीं हुआ था। कभी जेल भी नहीं गया था, इसलिए डर लग रहा था। जेल के अंदर काम न करना पड़े, इसलिए हमने इकट्ठा 20 हजार रुपए दिए थे। इसके बाद वहां हमसे काम नहीं करवाया गया। 22 दिन जेल में रहने के बाद हमारी जमानत हो गई। फिर कोर्ट में तारीखों का सिलसिला शुरू हो गया। राजवीर के खिलाफ मुकदमा शुरू हुआ। वह हर तारीख पर जाते। पुलिस और वकील से कहते कि उनका नाम गलत तरीके से इस केस में शामिल किया गया है। उनका कोई मतलब नहीं है। लेकिन, कहीं कुछ नहीं हुआ। 4 साल बीत गए। 2012 में उस वक्त के जज शक्ति सिंह ने मामले पर फैसला सुनाया। कहा कि इसमें राजवीर का कोई दोष नहीं है, उन्हें बाइज्जत बरी किया जाता है। दरोगा ने पैर छुए, लेकिन 1 महीने बाद गैंगस्टर बना दिया
जिस वक्त राजवीर बरी हुए, उन्होंने राहत की सांस ली। वह कहते हैं- उस वक्त इस मामले की जांच ओम प्रकाश दरोगा कर रहे थे। उन्होंने कोर्ट के बाहर मुझसे माफी मांगी। लेकिन, एक महीने बाद ही चार्जशीट लगी और मेरे खिलाफ गैंगस्टर लगा दिया गया। यह सब दरोगा ओम प्रकाश ने ही किया था। उस वक्त गैंगस्टर कोर्ट मैनपुरी में नहीं थी। इसके लिए आगरा जाना पड़ता था। हर 15-20 दिन में तारीख लगती और हमको पहुंचना होता था। राजवीर गैंगस्टर लगाए जाने के वक्त को याद करते हुए कहते हैं- मैं एक बार बेंगलुरु जा चुका था। वहां काम में अच्छा पैसा मिलता था। सोचा था, गांव में खेती और परिवार का काम निपटाने के बाद वहां जाकर नौकरी करूंगा। लेकिन, गैंगस्टर लगा दिया गया। फिर मैं यहीं गांव में फंसकर रह गया। बार-बार तारीख पर आगरा जाता रहा। अपने वकील और विपक्ष के वकील से भी कहता रहा कि मैं निर्दोष हूं। वह भी जानते थे, लेकिन तब न्याय नहीं मिल पाया। लोग कहते, पिता गैंगस्टर, इसलिए शादी में दिक्कत हुई
हमने राजवीर की पत्नी सुनीता से बात की। वह कहती हैं- मामला किसी और का था और पुलिस की गलती से हमारे पति का नाम चढ़ गया। किसी तरह से पैसे की व्यवस्था करके हम लोग केस लड़ते रहे। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। सबसे ज्यादा दिक्कत तो बेटियों की शादी करने में आई। हम जानना चाहते थे कि जो एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था, उसका क्या हुआ? कब यह पता कि राजवीर पर गलत कार्रवाई हुई? इसके लिए हम रामवीर के पास पहुंचे। रामवीर, राजवीर के छोटे भाई हैं। गांव में ही रहते हैं। पुलिस के दबाव में केस दर्ज हुआ था
रामवीर कहते हैं- बदनपुर के जिस लड़के पर दबाव बनाकर हम सबके खिलाफ हरिजन एक्ट लगवाया गया था। बाद में उसने ही कोर्ट में जज साहब के सामने कहा कि हम पर दबाव बनाकर केस दर्ज करवाया गया था। हम अपना केस वापस ले रहे हैं। इसके बाद 2012 में वह केस खत्म हो गया। मेरे भाई राजवीर भी छूट गए। उस वक्त दरोगा ओम प्रकाश ने मेरे भी पैर छुए। कहा कि तुम्हारे भाई को छुड़वा दिया है, जज साहब से मेरी शिकायत न करना। हमें डर था कि कुछ कहा तो आगे फिर से कोई कार्रवाई कर देंगे। रामवीर से हमने पूछा कि जब केस रद्द हो गया तो फिर गैंगस्टर क्यों लगा दिया गया? रामवीर कहते हैं, जो लोग आरोपी थे सभी को छोड़ दिया गया लेकिन एक महीने बाद ही दरोगा ओम प्रकाश ने ट्रक लूट वाली चार्जशीट में भाई राजवीर और तीन अन्य लोगों का नाम दे दिया। सभी के खिलाफ गैंगस्टर लगा दिया गया। यह सब कोर्ट में केस रद्द होने के करीब 1 महीने बाद हुआ। हमने रामवीर से पूछा कि क्या कभी दरोगा ओम प्रकाश कोर्ट में पेश नहीं हुए? रामवीर कहते हैं- यही तो बात है। उन्हें जितनी बार कोर्ट में बुलाया गया, वह कभी बयान देने के लिए पेश ही नहीं हुए। कई बार हम लोगों ने सम्मन जारी करवाकर पेशी के लिए बुलाया, लेकिन वह नहीं आए। करीब 50 बार सम्मन हुआ, लेकिन वह एक बार भी पेश नहीं हुए। हम तो चाहते थे कि वह पेश हों और बताएं कि कैसे कार्रवाई की है? अब वह रिटायर हो गए हैं। आगरा में ही कहीं रहते हैं। 25 जुलाई को कोर्ट ने माना कि राजवीर का किसी भी घटना में कोई रोल नहीं और उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया। इन 17 सालों में राजवीर 200 से ज्यादा बार कोर्ट गए। लाखों रुपए खर्च किए। मानसिक पीड़ा झेली, सामाजिक भेदभाव देखा। आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर हो गए। अब वह चाहते हैं कि कोर्ट उनकी इन परेशानियों को समझे। जो जिम्मेदार पुलिसवाले थे, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए और हमें उचित मुआवजा दिया जाए। ————————— ये खबर भी पढ़ें… आनंदीबेन पटेल के नाम नया रिकॉर्ड, यूपी में राज्यपाल के रूप में 6 साल पूरे; पीएम मोदी से नजदीकी है बड़ी वजह तारीख 29 जुलाई, 2025। यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के नाम आज एक नया रिकॉर्ड दर्ज हो गया। उन्होंने यूपी में सबसे ज्यादा समय तक राज्यपाल बने रहने का गौरव हासिल किया है। इससे पहले किसी भी राज्यपाल ने यूपी में 6 साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है। उनके नाम मोदी सरकार में सबसे ज्यादा समय तक राज्यपाल रहने का भी रिकॉर्ड दर्ज है। पढ़िए पूरी खबर…