यूपी की कुर्मी बहुल 40 सीटों पर पल्लवी की नजर:टूट चुका है गठबंधन, अकेले लड़ीं तो भाजपा-सपा की रणनीति पर कितना असर

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नए समीकरण आकार लेने लगे हैं। समाजवादी पार्टी से 2024 लोकसभा चुनाव में गठबंधन टूटने के बाद अपना दल (कमेरावादी) अब अकेले दम पर आगे बढ़ने की रणनीति पर चल रही। पार्टी कुर्मी-बहुल 40 विधानसभा सीटों को टारगेट करते हुए बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने में जुटी है। सिराथू से विधायक और पार्टी की प्रमुख नेता पल्लवी पटेल साफ कह रही हैं कि 2027 के लिए उनके सभी राजनीतिक विकल्प खुले हैं। चाहे चुनाव अकेले लड़ने का फैसला हो या किसी नए गठबंधन की राह। राज्यसभा चुनाव से उपजे सपा-अपना दल (कमेरावादी) के मतभेद हों या लोकसभा सीटों को लेकर हुई तनातनी। कुर्मी राजनीति की बढ़ती अहमियत हो या भाजपा-सपा दोनों की रणनीति। इन सबके बीच पल्लवी पटेल की 40 सीटों की तैयारी 2027 की सियासत में कितनी अहम होगी? अपना दल (K) आखिर प्रदेश में कौन-सी 40 सीटों पर तैयारी कर रही? इन सीटों पर क्या समीकरण हैं? सपा के साथ 2024 में क्यों गठबंधन टूटा? 2027 विधानसभा में सपा के साथ गठबंधन की कितनी संभावनाएं? पढ़िए ये रिपोर्ट… पल्लवी पटेल के दो बयान, जो चर्चा में रहे
पल्लवी पटेल के हालिया दो बयान सियासी हलकों में काफी चर्चा में रहे। पहला बयान 19 दिसंबर को भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी को लेकर था। उनसे सवाल पूछा गया था कि कुर्मी समाज पर पंकज चौधरी की नियुक्ति का क्या असर पड़ेगा? इस पर पल्लवी ने कहा था- बुजुर्ग कहते हैं कि शिकारी तालाब से मछली पकड़ने के लिए कांटे में मांस का लोथड़े लगाता है। बस इतना ही कहूंगी। दूसरा बयान सपा प्रमुख अखिलेश यादव को लेकर था। पल्लवी ने कहा था- मैं पटेल हूं, पल्लवी पटेल। धोखा, छल-छलावा हमारे संस्कारों में नहीं है। समाजवादी पार्टी और अखिलेश जी से हमारे राजनीतिक ही नहीं, निजी संबंध भी हैं। वे मेरे बड़े भाई जैसे हैं। मैं हमेशा उनकी छोटी बहन बनकर ही रही हूं। मेरी मर्यादा है, जिसका उल्लंघन मैं नहीं कर सकती। 2022 में पहली बार विधायक बनीं पल्लवी
अपना दल के संस्थापक रहे सोनेलाल पटेल की दूसरी संतान पल्लवी पटेल हैं। पीएचडी कर चुकीं पल्लवी 2022 में पहली बार कौशांबी की सिराथू सीट से विधायक चुनी गईं। उन्होंने इस सीट पर भाजपा के दिग्गज एवं डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या को हराया था। अपना दल कमेरावादी ने पहली बार सपा के साथ गठबंधन किया था। पार्टी को समझौते में दो सीटें मिली थीं। प्रतापगढ़ में सोनेलाल की पत्नी कृष्णा पटेल खुद चुनाव में उतरी थीं। वहीं, सिराथू सीट से पल्लवी पटेल को सपा ने अपने सिंबल पर चुनाव लड़ाया था। पल्लवी पटेल जीत गईं, वहीं कृष्णा पटेल को हार का सामना करना पड़ा था। 2024 राज्यसभा चुनाव के दौरान सपा से उभरा मतभेद
2024 में यूपी की 11 राज्यसभा सीटों के चुनाव के दौरान पल्लवी पटेल और सपा के बीच मतभेद उभरा। भाजपा के पास 8, तो सपा के पास दो प्रत्याशी को जिताने लायक वोट थे। भाजपा ने 9वें प्रत्याशी के तौर पर संजय सेठ को उतार दिया था। इस चुनाव में सपा ने जया बच्चन, रामजी लाल सुमन और आलोक रंजन को प्रत्याशी बनाया था। पल्लवी पटेल ने पहली बार पीडीए का राग छेड़ते हुए जया बच्चन को वोट देने से मना कर दिया था। उन्होंने कहा था कि उनका वोट पीडीए प्रत्याशी को जाएगा। इसी दौरान सपा के 7 विधायकों ने भी संजय सेठ के पक्ष में वोट देने का निर्णय ले लिया। चर्चा चली कि पल्लवी पटेल भी भाजपा प्रत्याशी संजय सेठ के साथ जा सकती हैं। तब पल्लवी पटेल को लेकर अखिलेश ने सार्वजनिक बयान दिया कि वे भाजपा के साथ जाना चाहती हैं, तो चली जाएं। हालांकि, पल्लवी ने सपा के राज्यसभा प्रत्याशी रामजी लाल सुमन को वोट दिया और शिवपाल यादव को वोट देते हुए दिखाया भी था। लोकसभा चुनाव में अपना दल कमेरावादी की ओर से पल्लवी पटेल ने फूलपुर लोकसभा सीट मांगी। पल्लवी के मुताबिक, फूलपुर सीट से उनके पिता सोनेलाल पटेल चुनाव लड़ चुके हैं। इस कारण मैंने सपा से गठबंधन में फूलपुर लोकसभा की सीट मांगी थी। लेकिन, अखिलेश यादव ने उन्हें मिर्जापुर की सीट देने की पेशकश की। साथ में ये शर्त भी जोड़ दी कि सपा के सिंबल पर लड़ना होगा। पल्लवी पटेल ने मना कर दिया। इसके बाद सपा ने अपना दल कमेरावादी से 2022 में हुआ गठबंधन तोड़ दिया। तब से अपना दल कमेरावादी अपने संगठन को मजबूत करने में जुटी है। कुर्मी बहुल 40 विधानसभा सीटों पर पल्लवी की तैयारी
वर्तमान में अपना दल कमेरावादी की राष्ट्रीय अध्यक्ष पल्लवी की मां कृष्णा पटेल हैं। पल्लवी की बड़ी बहन पारुल पटेल भी पार्टी में सक्रिय हो चुकी हैं। दैनिक भास्कर से बातचीत में पल्लवी पटेल ने बताया कि यूपी की 40 विधानसभाओं को टारगेट करते हुए पार्टी की तैयारी चल रही है। ये सभी कुर्मी-बहुल सीटें हैं। पल्लवी पटेल के मुताबिक, अंबेडकर नगर की दो सीटें, गोंडा, बहराइच, श्रावस्ती, बलिया, बस्ती, मऊ, झांसी, बांदा, कौशांबी, प्रयागराज, कानपुर देहात, फतेहपुर, मिर्जापुर, वाराणसी, सोनभद्र, जौनपुर, प्रतापगढ़, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर जिले की सीटें हैं। पंचायत चुनाव की भी तैयारी
पल्लवी पटेल ने बताया- विधानसभा से पहले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव होने हैं। टारगेट वाली 40 विधानसभा क्षेत्रों में जिला पंचायत का चुनाव भी अपने दल के प्रत्याशियों को लड़ाएंगे। हमारी पार्टी ने इन 40 विधानसभा क्षेत्रों में बूथ स्तर तक पार्टी का संगठन खड़ा कर दिया है। पिछले दिनों 30 विधानसभाओं की एक समीक्षा बैठक हुई थी। 10 विधानसभाओं की समीक्षा बैठक जल्द होने वाली है। हमारी तैयारी 40 सीटों को लेकर है। इन पर ही पूरा फोकस है। 2027 का विधानसभा चुनाव अगड़ा बनाम पीडीए का होना तय है। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- पल्लवी पटेल ने कुर्मी बहुल 40 सीटों का चयन बहुत ही होशियारी से किया है। कुर्मी समाज किसी दल के साथ निष्ठा दिखाने की बजाय अपनी जाति के प्रत्याशी की ओर लामबंद होता है। 2027 में अकेले चुनाव लड़ेंगी या गठबंधन में
पल्लवी पटेल ने इस सवाल पर कहा- अभी हमारा किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं है। नीतिगत तौर पर मैं सपा की विधायक हूं। विधानसभा में मैं सपा के पक्ष में खड़ी रहती हूं। जनहित के मुद्दों लगातार विधानसभा में उठाती हूं। सीएम योगी आदित्यनाथ से क्षेत्र के विकास को लेकर समय-समय पर मुलाकात करती हूं। लेकिन, 2027 में किसके साथ गठबंधन होगा, ये हमारी वर्किंग कमेटी तय करेगी। सपा के साथ गठबंधन की कितनी संभावना
सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता उदयवीर कहते हैं- पल्लवी सपा के सिंबल पर विधायक हैं। अभी 2027 के चुनाव की चर्चा अभी शुरू नहीं हुई है। यूपी में हमारा इंडिया गठबंधन बना हुआ है। 2027 तक इसमें कई दल जुड़ेंगे। फिलहाल इस पर कोई भी निर्णय गठबंधन दलों के शीर्ष नेतृत्व की ओर से लिया जाएगा। 2019 के लोकसभा चुनाव में पल्लवी की पार्टी का कांग्रेस के साथ गठबंधन था। कांग्रेस ने पल्लवी के पति पंकज पटेल को फूलपुर से टिकट दिया था‚ लेकिन उन्हें हार मिली थी। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में अपना दल (कमेरावादी) का सपा के साथ गठबंधन हुआ था। मतलब इंडिया गठबंधन के दोनों प्रमुख दल सपा-कांग्रेस से अपना दल (कमेरावादी) के संबंध रहे हैं। मौजूदा समय में पल्लवी पटेल की सपा के साथ 2024 वाली तल्खी भी कम हुई है। ये पल्लवी की अखिलेश को लेकर दिए गए बयान से भी साफ झलकता है, जिसमें वो खुद को अखिलेश की छोटी बहन कहती हैं। विधानसभा में भी वह सपा विधायकों के साथ सत्ता पक्ष के खिलाफ मुखर दिखीं। पल्लवी की बॉन्डिंग सपा की मछलीशहर से विधायक रागिनी सोनकर और आजमगढ़ की मेंहनगर से विधायक पूजा सरोज के साथ खूब दिखती है। खुद पल्लवी पटेल भी पीडीए की बात करती हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- भाजपा ने कुर्मी चेहरा पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। उसका गठबंधन भी कुर्मी की राजनीति करने वाली अपना दल (एस) से है। ऐसे में सपा की भी कोशिश रहेगी कि उसका 2027 के विधानसभा चुनाव में अपना दल (कमेरावादी) से गठबंधन हो। इससे कुर्मी वोटरों की लामबंदी भाजपा के पक्ष में होने से रोकने में सपा को मदद भी मिलेगी। लेकिन, अगर सपा से गठबंधन नहीं हो पाया तो दोनों को नुकसान होगा। दूसरा अपना दल कमेरावादी का फोकस कुर्मी बहुल 40 सीटों पर है। ऐसे में अकेले लड़ने पर यहां कुर्मी वोटों का बंटवारा होगा। यह सपा-भाजपा की रणनीति पर असर डालेगा। हालांकि, पल्लवी पटेल ने जुलाई- 2025 में 2027 के विधानसभा चुनाव में बदलाव की बात की। दलितों, पिछड़ों और मुस्लिमों की असंतोष पर जोर दिया। जाति जनगणना की मांग की, जो विपक्षी एजेंडे से मेल खाती है। इसी तरह नवंबर 2025 में उन्होंने SIR (वोटर वेरिफिकेशन प्रक्रिया) का विरोध किया, जो सपा की लाइन से जुड़ा है। पिता की विरासत को लेकर बहन अनुप्रिया से मतभेद
सोनेलाल पटेल ने कुर्मी-पटेल के साथ पिछड़ों की राजनीति की थी। उनके निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने आगे बढ़ाया। लेकिन, पारिवारिक मतभेदों के चलते मां कृष्णा और बहन पल्लवी पटेल ने अलग रास्ता अख्तियार कर लिया। अब वे भी सोनेलाल पटेल की विरासत पर दावा करती हैं। सोनेलाल पटेल की 18 अक्टूबर, 2009 को कानपुर में सड़क दुर्घटना में मौत हुई थी। हालांकि, दुर्घटना को साजिश बताते हुए पत्नी कृष्णा और बेटी पल्लवी समेत कई समर्थक सीबीआई जांच की मांग उठाते रहे हैं। 24 दिसंबर को भी पल्लवी पटेल ने पार्टी के अन्य नेताओं के साथ राज्यपाल आनंदी पटेल से मुलाकात की थी। ज्ञापन सौंपकर पिता की मौत की सीबीआई जांच की मांग दोहराई थी। पल्लवी कहती हैं कि पिता की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी। घटना की सच्चाई आज तक उजागर नहीं हो पाई। आज भी उनके समर्थक ये जानना चाहते हैं कि उनकी मौत का सच क्या है? यूपी की राजनीति में कुर्मी कितने प्रभावी
देश में 1931 के बाद जाति-आधारित जनगणना नहीं हुई। इसलिए कुर्मी जाति की आबादी के आंकड़े अनुमानित हैं। 2001 में यूपी सरकार द्वारा गठित हुकुम सिंह कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, कुर्मी (और पटेल) की आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 7.4% है। यह रिपोर्ट ग्रामीण परिवार रजिस्टरों पर आधारित थी। इसमें OBC की कुल आबादी 50% से अधिक बताई गई थी। 2011 जनगणना में यूपी की कुल आबादी करीब 20 करोड़ थी। 2025 अनुमानित आबादी करीब 25 करोड़ है। इस हिसाब से प्रदेश में कुर्मी की आबादी करीब 1.75 से 2 करोड़ के बीच होगी। ओबीसी में यादवों के बाद कुर्मी की सबसे अधिक आबादी है। यही कारण है कि राजनीतिक दल इस वोटबैंक को साधना चाहते हैं। अगर मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य की बात करें तो प्रदेश के 403 विधायकों में कुर्मी/पटेल की संख्या 40 है। इनमें भाजपा से 27, सपा से 12 और कांग्रेस से 1 विधायक हैं। 100 एमएलसी में 5 कुर्मी समाज से हैं। यूपी की 80 लोकसभा सीटों में भी 11 सांसद कुर्मी समाज से हैं। इनमें सपा से 7, भाजपा के 3 और अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल सांसद हैं। विधायकों में ब्राह्मण-ठाकुर के बाद सबसे अधिक कुर्मी विधायक हैं। जबकि, सांसदों में ब्राह्मणों के बराबर इनकी संख्या है। प्रदेश में पूर्वांचल, अवध, मध्य यूपी और बुंदेलखंड में 128 सीटों पर कुर्मी वोटर प्रभावी भूमिका रखते हैं। हालांकि 48-50 सीटों पर वे निर्णायक असर रखते हैं। इसी तरह लोकसभा की 27 सीटों पर उनका प्रभाव है। लेकिन, 11 सीटों पर जीत-हार तय करते हैं। ————————- ये खबर भी पढ़ें- सपा की गुपचुप क्या बसपा से चल रही बातचीत?, बिहार नतीजों के बाद यूपी में सपा, कांग्रेस के गठबंधन को लेकर सुर बदले यूपी की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले फिर से गठबंधन की बिसात बिछने लगी है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कांशीराम की पुण्यतिथि पर भले ही बड़े दलों से दूरी का ऐलान कर दिया हो। लेकिन, बिहार चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बदले तेवरों ने सियासी चर्चाओं को नई हवा दे दी है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…