यूपी के योद्धा-1:पाकिस्तानी हथियार से उसी का बंकर उड़ाया, रॉकेट लॉन्चर लेकर घुसे तो दुश्मन फौज भागी; गाजीपुर के राम उग्रह की कहानी

नवंबर 1971, पूर्वी पाकिस्तान यानी आज का बांग्लादेश। पाकिस्तान अपने ही बंगाली नागरिकों पर अत्याचार कर रहा था। गांव जलाए जा रहे थे, लोग मारे जा रहे थे। बंगाली बोलने वाले लाखों पाकिस्तानी जान बचाने के लिए भारत के बंगाल और असम में घुस रहे थे। 80 लाख लोग भारत की सीमा पर शरण लेने के लिए खड़े थे। ये शरणार्थी संकट नहीं, बल्कि जंग की आहट थी। सवाल ये नहीं था कि लड़ाई होगी या नहीं, बल्कि ये था कि कब होगी? बॉर्डर पार पाकिस्तानी सेना पूरी तरह तैयार थी, जबकि भारत अभी भी तैयारी में जुटा था। इसी के तहत 20, माउंटेन डिवीजन को एक अहम जिम्मेदारी दी गई। आमतौर पर इसे बॉर्डर के काफी ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में तैनात किया जाता है, लेकिन खास रणनीति के तहत इसे पूर्वी पाकिस्तान की बोगुरा पोस्ट पर कब्जा करने की जिम्मेदारी मिली। इसी डिवीजन में एक छोटे से सेक्शन (सेना की सबसे छोटी यूनिट) की कमान संभाल रहे थे लांस नायक राम उग्रह सिंह। आने वाले दिनों में ये नाम ‘मोरापाड़ा’ की कठिन और दलदली जमीन पर लड़ते हुए इतिहास बनाने वाला था। कहानी शुरू होती है, 20 नवंबर 1971 से… लेकिन इससे पहले 20, माउंटेन डिवीजन के कुछ अधिकारियों को जान लेते हैं। ये वो किरदार हैं जिनके बूते इतिहास लिखा जाने वाला था। एक डिवीजन कई टुकड़ियों जैसे- ब्रिगेड, कंपनी, प्लाटून वगैरह में बंटी होती है। ऐसे ही 202, माउंटेन ब्रिगेड के कमांडिंग ऑफिसर थे ब्रिगेडियर फरहत भट्टी। इसकी सबसे अहम बटालियन 8 गार्ड्स इन्फैंट्री (पैदल सेना) की कमान लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह के हाथ में थी; और इसी 8 गार्ड्स की एक कंपनी (डी कंपनी) में एक सेक्शन का जिम्मा लांस नायक राम उग्रह सिंह के पास था। चलिए अब कहानी शुरू करते हैं… 20 नवंबर, 1971 ब्रिगेडियर फरहत भट्टी ने लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह को कमांड हेडक्वार्टर बुलाया। ब्रिगेडियर के केबिन में घुसते ही लेफ्टि. कर्नल सिंह ने सैल्यूट किया और सीना तानकर कहा- “जय हिंद…।” ब्रिगेडियर भट्टी ने पूछा- “तैयारी कैसी है…?” लेफ्टि. कर्नल सिंह ने जवाब दिया- “जवान देश के लिए मरने और मारने को तैयार हैं।” ब्रिगेडियर भट्टी ने फौरन कहा- “यही जोश बना रहना चाहिए। लेकिन देश के लिए मरना नहीं है, सिर्फ मारना है। मेरा कोई जवान शहीद नहीं होने चाहिए।” लेफ्टि. कर्नल सिंह ने मुस्कुराकर हां में सिर हिलाया और बोले- “ऐसा ही होगा सर…।” ब्रिगेडियर भट्टी- “पाकिस्तानी मजबूत है। हमें अभी हमला का आदेश नहीं मिला है। पाकिस्तानी पहले अटैक कर सकता है। यूनिट अलर्ट रहनी चाहिए।” लेफ्टि. कर्नल सिंह- “यूनिट तैयार है सर।” इस मुलाकात के बाद लेफ्टि. कर्नल शमशेर सिंह बटालियन के जवानों के साथ मीटिंग करने पहुंचे। ‘डी कंपनी’ के राम उग्रह सिंह भी वहां मौजूद थे। लेफ्टि. कर्नल सिंह ने ब्रिगेडियर से हुई बातचीत के बारे में बताया, बोले- “हमें बोगुरा पोस्ट फतह करनी है। इसके लिए हिली कस्बे पर कब्जा जमाना होगा। दुश्मन की तरफ खेत और दलदल हैं, काफी मुश्किलें आएंगी।” फिर अचानक जोश में भरकर बोले- “क्या हम चुनौती पार कर लेंगे?” सभी जवानों ने एक सुर में जवाब दिया- “इसमें कोई शक नहीं है साब। हम लड़ेंगे, हम जीतेंगे।” हिली, भारत और पूर्वी पाकिस्तान के बीच एक कस्बा था। भारतीय हिस्से में बस्तियां और सड़कें थीं, जबकि पाकिस्तानी हिस्से में धान के खेत, कीचड़ से भरे मैदान और मोरपारा, बसुदेवपुर, चंदीपुर जैसे छोटे गांव थे। 22 नवंबर की शाम। बॉर्डर पर तनाव था। जंग कभी भी शुरू हो सकती थी। भारतीय सेना तैयार थी। प्लान साफ था, बोगुरा पर कब्जा, ताकि पाकिस्तानी सेना को उत्तर-पूर्वी पाकिस्तान में अलग किया जा सके। सबसे सीधा रास्ता हिली से होकर जाता था। इसके लिए सबसे पहले मोरपारा गांव पर कब्जा करना था। लेफ्टि. कर्नल सिंह अपने साथियों को प्लान बता रहे थे। उन्होंने कहा- “पाकिस्तानी सेना की 205 इन्फैंट्री ब्रिगेड की यहां मजबूत तैयारी है। क्या आपको इसकी जानकारी है?” किसी जवान ने जोश भरे लहजे में कहा- “जी साब।” लेफ्टि. कर्नल ने पूछा- “क्या पता है?” कोई कुछ नहीं बोला। तभी सेक्शन कमांडर राम उग्रह पांडे ने कहा- “साब दुश्मनों ने कुछ भी तैयारी किया हो। हम उनके मंसूबों पर पानी फेर देंगे।” लेफ्टि. कर्नल सिंह जवानों का जोश देखना चाह रहे थे। उन्होंने कहा- “वक्त पास आ रहा है। देश के नमक का कर्ज उतारने का मौका है। मैं आप लोगों को कुछ बताना चाहता हूं।” उन्होंने आगे बताना शुरू किया- “दुश्मनों ने कंक्रीट के पक्के बंकर बनाए हैं। रेलवे की पुरानी बोगियों को फायरिंग पोजीशन में बदल दिया है। कई परतों में कांटेदार तार लगाए हैं। माइन बिछाई है। मशीन गन, रिकॉइललेस राइफल और टैंक तैनात हैं।” उन्होंने एक नक्शा फैलाया। उसमें मोरपारा गांव लाल निशान से दिखाया गया था। लेफ्टि. कर्नल सिंह ने गंभीर आवाज में कहा- “जवानों, मोरपारा दुश्मन की सबसे मजबूत चौकी है। आर्टिलरी पहले हमला करेगी, उसके बाद हम आगे बढ़ेंगे। रात का अंधेरा हमारी मदद करेगा।” जवानों का जोश उफान पर था। तभी पीछे से लांस नायक राम उग्रह पांडेय की आवाज आई- “बहादुरी हमारी पहचान है। इस बार ये पहचान और पुख्ता हो जाएगी साब।” प्लान मीटिंग खत्म हुई। शमशेर सिंह वापस चले गए, लेकिन राम उग्रह अपने साथियों के साथ वहीं खड़े रहे। उन्होंने अपने सेक्शन के जवानों को इकट्ठा किया। सभी की आंखों में आग जल रही थी। राम उग्रह ने पूरे दमखम से कहा- “दुश्मन मजबूत है। फायरिंग भी तेज होगी, लेकिन हम गार्ड्स हैं। हम रेंगकर जाएंगे, ग्रेनेड का इस्तेमाल करेंगे और एक दूसरे को कवर देंगे। कोई भी पीछे नहीं रहेगा।” कुछ जवान जंग के नाम से हिचकिचा रहे थे। किसी ने कहा- “दूसरी तरफ दलदल है। फंस गए तो?” राम उग्रह ने हल्की मुस्कान लेकिन कठोर आवाज में कहा- “आगे मैं रहूंगा, रास्ता मैं बनाऊंगा। अगर गिर जाऊं तब भी रुकना नहीं। तुम लोग आगे बढ़ते रहना।” 23 नवंबर, रात करीब 12 बजे। जंग के एलान यानी 3 दिसंबर से 10 दिन पहले भारतीय आर्टिलरी (तोपखाना) ने हिली पर कब्जे के लिए फायरिंग शुरू की। तोपों की गड़गड़ाहट से जमीन कांप उठी। पाकिस्तानी बंकरों पर गोले गिरने शुरू हो गए। उधर से भी जवाबी हमला शुरू हुआ। आग और धुआं चारों तरफ फैला था, लेकिन दुश्मन के बंकर अब भी खड़े थे। भारत का प्लान उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, सेना को काफी नुकसान हुआ। रात 1 बजे हमला और तेज किया गया। 8 गार्ड्स की दो कंपनियां आगे बढ़ीं। लांस नायक राम उग्रह पांडे की सेक्शन यूनिट रेंगते हुए आगे बढ़ रही थी। भारतीय जवान दुश्मन की सबसे मजबूत सिक्योरिटी लाइन के सामने खड़े थे। सबसे पहली बाधा कांटेदार तारों की थी। तार के उस पार दुश्मनों के बंकर थे। राम उग्रह पांडे ने वायर कटर निकाला, फिर आसपास देखा। सभी जवान जमीन पर लेटे थे। राम उग्रह ने एक-एक करके सारे तार काट दिए और जवानों के निकलने के लिए रास्ता बना दिया। साथी जवान आगे बढ़े, लेकिन सबसे आगे थे राम उग्रह पांडे। राम उग्रह ने फुसफुसाकर कहा- “सावधान रहना। यहां माइन हो सकती है।” जवान अब भी रेंगते हुए आगे बढ़ रहे थे, लेकिन पाकिस्तानी फौज भी सतर्क थी। उन्होंने अचानक मशीन गन से फायरिंग शुरू कर दी। सिर के ऊपर से दनादन गोलियां गुजरने लगीं। राम उग्रह ने चीखकर कहा- “फौरन कवर लो…।” सभी जवान जमीन से चिपक गए। सांसें तेज थीं, लेकिन उंगलियां सख्ती से ट्रिगर पर जमी थीं। कोई पीछे नहीं हटा। दुश्मन का पहला बंकर नजरों के सामने था। साफ दिखाई दे रहा था कि गोलियों की बौछार कहां से हो रही है। पूरी टीम वहीं फंसी थी। आगे बढ़ना मुश्किल हो गया था। राम उग्रह ने हालात के मुताबिक फैसला लिया। अपने पाउच से ग्रेनेड निकाला और कड़ककर बोले- “कवर फायर दो। मैं कुछ करता हूं।” साथी जवानों ने अपनी राइफलों से बंकर की ओर फायरिंग शुरू कर दी। गोलियां बिजली की लकीरों की तरह बंकर पर गिर रही थीं। कवर फॉयर के बीच राम उग्रह आगे बढ़ रहे थे। शरीर कीचड़ से लथपथ था। रेंगने में भी पूरी ताकत लगानी पड़ रही थी। कभी पैर दलदल में धंस जाते, तो कभी हाथ कीचड़ में फिसल जाते। अंधेरे में कुछ ठीक से दिख नहीं रहा था लेकिन लांस नायक रुके नहीं। बंकर अब भी करीब दस मीटर दूर था। बंकर के अंदर से पाकिस्तानी सैनिकों की आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं। मशीनगन से फायर झोंक रहा पाकिस्तानी गुस्से और घबराहट में चिल्लाया- “ये हिंदुस्तानी कितने करीब आ गए। देखो, कीचड़ में रेंग रहे हैं कीड़ों जैसे…! फुल फायर करो, मार डालो इन काफिरों को, कोई @#₹@ बचना नहीं चाहिए।” तभी दूसरा पाकिस्तानी सिपाही बोला- “जनाब, मैगजीन खत्म हो गई। आर्टिलरी से कुछ नहीं होगा। क्या करें, पीछे हटें…?” पाकिस्तानी सेक्शन ऑफिसर गुर्राया- “चुप कर, हमारा बंकर मजबूत है। वो रेंगकर भी आएंगे तो हमारी मशीनगन उन्हें चीर देगी। बस गोलियों के ट्रेसर पर नजर रखो। वो ज्यादा नजदीक आएं, तो पूरा बर्स्ट मारो। कोई काफिर नहीं बचेगा, अल्लाह हमारे साथ है।” तभी राइफलमैन चिल्लाया- “अल्लाह… वो हिंदुस्तानी ग्रेनेड फेंकने वाला है। उस तरफ फायरिंग करो, उस तरफ…!” जब तक वो कुछ करते, तब तक लांस नायक राम उग्रह ने ग्रेनेड फेंक दिया। सांस तेज हो गई। एक पल के लिए डर लगा कि ग्रेनेड सही जगह गिरेगा या नहीं? लेकिन अगले ही पल ग्रेनेड हवा में घूमता हुआ बंकर के मुंह के बिल्कुल पास गिरा। एक जोरदार धमाका हुआ। बंकर से धुएं का गुबार उठा और फायरिंग बंद हो गई। राम उग्रह को कवर फायर दे रहे एक जवान ने कहा- “साब बंकर धंस गया है।” जवानों में जोश भर गया। भारत ने पूर्वी पाकिस्तान का फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस तोड़ दिया था। सभी को लगा कि रास्ता खुल रहा है, लेकिन राम उग्रह के कंधे में तेज दर्द हो रहा था। दरअसल, ग्रेनेड के कई स्प्लिंटर उनके शरीर में भी घुस गए थे। एक स्प्लिंटर उनके चेहरे में भी लगा था। दर्द इतना तेज था कि एक पल के लिए सांस रुक जाए, फिर भी उन्होंने दांत पीसकर खुद को संभाला। साथी जवानों को कुछ नहीं बताया। तभी एक जवान उनके पास पहुंचा- “अरे ये क्या साब… आप ठीक हो?” लांस नायक राम उग्रह ने जोश में कहा- “क्या मैं तुम्हें ठीक नहीं लग रहा?” सिपाही ने कहा- “साब,आप रुक जाइए।” लांस नायक ने उसे फटकारते हुए कहा- “अभी रुकने का वक्त नहीं है। तुम लोग इधर जाओ। वहां पाकिस्तानी फायरिंग को रोको ताकि दूसरा सेक्शन आगे बढ़े। मैं उन दो बंकरों को देखता हूं। चेहरा खराब हुआ है हौसला नहीं।” लांस नायक के घायल होने की बात बाकी साथियों को पता चली। एक दूसरे सिपाही ने राम उग्रह का हाथ पकड़ा और कहा- “साब, आपकी हालत देखिए… शरीर लहूलुहान है। आप यूनिट जाइए, मैं सेक्शन संभाल लूंगा।” राम ने सख्त आवाज में जवाब दिया- “नहीं… ये मेरा सेक्शन है। पीछे कायर जाते हैं।” एक और सिपाही ने आगे बढ़कर कहा- “साब, आप घायल हैं। अगर आप गिर गए तो हम सब टूट जाएंगे। कम से कम पीछे मेडिकल पॉइंट तक चलिए। हम यहां रुककर कवर देंगे। पीछे की पलटन बाकी सब देख लेगी।” लांस नायक राम उग्रह ने गहरी सांस ली। दर्द से चेहरा सिकुड़ गया, लेकिन आंखों में जुनून था। उन्होंने पहले जवान की ओर देखा और बोले- “सुनो, अगर मैं अब पीछे हटा तो ये लड़ाई लटक जाएगी। दुश्मन को लगेगा, हम कमजोर पड़ गए। हम इतना बढ़ चुके हैं कि पीछे जाना मुमकिन नहीं है। हम आगे जाएंगे या पीछे तो सिर्फ लाश ही जाएगी।” तभी दूसरे पाकिस्तानी बंकर से जोरदार फायरिंग हुई। गोली सीधे एक सिपाही के सीने में जा धंसी। ‘फच्च’ की आवाज आई और वो तुरंत लुढ़क गया। उसकी आंखें खुली रह गईं। अचानक हुई से गोलीबारी से पूरी टीम चौंक गई। लांस नायक राम उग्रम चीखते हुए जवान के पास गए। दांत पीसकर कहा- “@#₹@ पाकिस्तानी… आगे बढ़ों, कोई बचना नहीं चाहिए। हैवी फायर करो।” इतना सुनते ही पूरी यूनिट का खून खौल गया। जवानों ने हाथ में राइफलें कस लीं। एक सिपाही बोला- “साब, अब देखना इनको छोड़ेंगे नहीं। मरूंगा या सबको मार दूंगा” उसी पल दूसरे बंकर से पाकिस्तानी सैनिकों की आवाजें आईं- “मर गया @#₹#. अब सभी हिंदुस्तानी कुत्तों को जहन्नुम भेजेंगे।” उनकी गालियां और नारे हवा में गूंज रहे थे। ये सुनकर राम उग्रह गुस्से से उबल पड़े। जख्मी हालत में भी वो आगे बढ़ रहे थे। दुश्मन की कुछ गोलियां सिर के ऊपर से गुजर रही थीं। राम उग्रह ने सही मौका देखा, टार्गेट नजदीक था। उन्होंने एक ग्रेनेड बंकर के बाईं ओर फेंक दिया। रात के अंधेरे में पाकिस्तानी फौजियों को लगा भारतीय सैनिक उसी तरफ हैं। उन्होंने फायरिंग बाईं तरफ मोड़ दी। मौका देखकर राम उग्रह ने दूसरा ग्रेनेड फेंका। आग की लपट उठी, चारों तरफ धुआं फैल गया। लांस नायक ने पीछे मुड़कर टीम की तरफ देखा। उनकी आवाज में दोगुना जोश भरकर बोले- “दूसरा भी गया…।” अब बारी तीसरे बंकर को उड़ाने की थी। थोड़ी ऊंचाई पर होने की वजह से वो काफी खतरनाक था। उसे तबाह किए बिना, हिली पर कब्जा नहीं हो सकता था। राम उग्रह ने कुछ ही मिनट में एक नया प्लान बनाया। फिर अपने साथियों को बताया- “चार सिपाही चार तरफ से हमला करेंगे।” फिर सभी को उनकी पोजिशन बताई और तीसरे बंकर की ओर बढ़ने लगे। बंकर नजर आ रहा था। मशीन गन की नाल निकलने वाली गोलियों से चमक रही थी। तभी सिपाही ने कहा- “साब कारतूस और ग्रेनेड खत्म हो रहे हैं।” एक सिपाही की बंदूक पहले से ही बंद हो गई थी। हालांकि, आगे इतनी चढ़ाई हो चुकी थी कि पीछे लौटना मरने के बराबर था। कभी भी दुश्मन की गोली सीने में धंस सकती थी। लांस नायक राम उग्रह ने अपनी बंदूक दूसरे साथी को दे दी। उनके पास अब सिर्फ हैंड ग्रेनेड था। वो उसी के साथ आगे बढ़ने लगे। कुछ दूरी उनकी नजर एक पाकिस्तानी सिपाही की लाश पर गई। वो जोश में बंकर से काफी दूर आ गया और भारत की गोलीबारी में मारा गया। उसके पास एक रॉकेट लॉन्चर पड़ा था। राम उग्रह ने मन ही मन खुश होकर कहा- “अब उन्हीं के हथियार से उन्हें मारेंगे।” उन्होंने दोनों हथियार उठाए और तेजी से आगे बढ़े। उनके घायल शरीर से अब भी बहुत खून रिस रहा था, लेकिन मोर्चे पर वो सबसे आगे थे। दूसरी तरफ पाकिस्तानी बंकर से धुंआधार गोलियां चल रही थीं। दुश्मनों को जिस जगह पर भारतीयों की भनक लगती, वो बम फेंक देते। उस बंकर से हो रही गोलीबारी रोके बिना भारतीय जवान आगे नहीं बढ़ सकते थे। लांस नायक राम उग्रह ने एक जगह पर रॉकेट लॉन्चर के साथ पोजीशन ली। टारगेट सेट किया और ट्रिगर दबा दिया। एक तेज धमाके साथ तीसरा बंकर भी ध्वस्त हो गया। ठीक उसी पल एक गोली राम उग्रह की छाती में लगी और वे वहीं गिर पड़े। साथी जवान दौड़कर पहुंचे। खून तेजी से बह रहा था। राम उग्रह ने आखिरी ताकत जुटाई। साथियों की ओर देखा और टूटती आवाज में कहा- “रुको मत, आगे बढ़ो… जंग जीतनी है।” और फिर अचानक आंखें बंद हो गईं। लांस नायक राम उग्रह पांडेय शहीद हो चुके थे। उनकी टीम आगे बढ़ी। पाकिस्तानी फौज उस मोर्चे पर सिर्फ एक दिन और टिक सकी। 8 गार्ड्स इन्फैंट्री ने अपना काम पूरा कर दिया था। पाकिस्तान को दो हिस्सों में तोड़कर बांग्लादेश की नींव रखी गई और राम उग्रह की शहादत हमेशा के अमर हो गई। भारत सरकार ने वीरता के लिए साल 1972 में उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया। राष्ट्रपति वीवी गिरि के हाथों वो सम्मान लेने के बाद उनकी पत्नी ने कहा- “वो अक्सर कहते थे फर्ज से बड़ा कुछ नहीं और परिवार से ज्यादा बड़ा है देश। उन्होंने अपना फर्ज निभाया। उनके न होने का दुख है लेकिन इसका फख्र भी है कि वो जो कहते थे, उन्होंने वही किया।” *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल ग्राफिक्स- सौरभ कुमार *** कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है।