दिसंबर 1971 का खौफनाक हफ्ता… अरब सागर की लहरें उफान पर थी। समंदर में दुश्मन के छक्के छुड़ाने के लिए INS खुकरी तैनात था। इसके कप्तान थे गोरखपुर के कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला। INS खुकरी 1950 के दशक का ब्रिटेन में बना ‘ब्लैकवुड क्लास’ जहाज था। ये देखने में भले ही दमदार लगता था, लेकिन हकीकत कुछ और थी। दूसरे विश्वयुद्ध में हमारे हजारों जवानों ने ब्रिटेन के लिए खून बहाया था, जिसका कर्ज अंग्रेजों पर था। अंग्रेज ठहरे बनिए, उन्होंने एहसान चुकाने के बदले हमें वो जहाज थमा दिए जो आउटडेटेड थे। वेस्टर्न कमांड की 14वीं स्क्वाड्रन में शामिल INS खुकरी, INS कृपाण और INS कुठार सेकेंड क्लास एंटी-सबमरीन फ्रिगेट थे। एंटी-सबमरीन फ्रिगेट यानी समंदर के वो सिपाही हैं, जिनका इकलौता काम पानी के नीचे छिपी दुश्मन की पनडुब्बियों (सबमरीन) को ढूंढकर तबाह करना होता है। खुकरी में लगा सोनार (पानी के नीचे पनडुब्बियों का पता लगाने का सिस्टम) बहुत कमजोर था। ये केवल 2500 मीटर तक ही दुश्मन को पकड़ सकता था, लेकिन पाकिस्तानी जहाज दस गुना ज्यादा यानी 25 हजार मीटर दूर से ही शिकार पकड़ सकते थे। पाकिस्तान से जंग छिड़ चुकी थी। भारत के पुराने जहाजों को पाकिस्तान की मॉडर्न डैफ्ने क्लास पनडुब्बियों से जूझना था। फ्रांस में बनी ये पनडुब्बियां इतनी खामोश चलती थीं कि इन्हें पकड़ना नामुमकिन जैसा था। इन्हें साइलेंट किलर कहा जाता था। 2 दिसंबर की सर्द रात जब भारतीय बेड़ा बॉम्बे से कराची की ओर बढ़ा, तो पाकिस्तानी पनडुब्बियां घात लगाकर बैठी थीं। इसी बीच एक बड़ी अनहोनी हो गई। INS कुठार में कुछ खराबी आ गई। जहाज बीच समंदर में बेदम खड़ा हो गया। मैसेज कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला तक पहुंचा। “INS कुठार अपने दम पर चलने की हालत में नहीं है। कृपाण उसे खींच रहा है। आपकी जिम्मेदारी है कि इन दोनों को अपने सुरक्षा घेरे में लेकर सही-सलामत बॉम्बे पहुंचाएं। ओवर…!” कैप्टन मुल्ला ने रिसीवर संभाला और बोले- “ओके, हम कवर दे रहे हैं। ओवर एंड आउट…” रास्ते में कई बार INS खुकरी के सायरन बजे, लेकिन हर बार अलार्म झूठा निकलता। फिर आई 5 दिसंबर की वो दोपहर। जहाज के सोनार रूम में अचानक हलचल मच गई। सोनार ऑपरेटर के हेडफोन में एक खास तरह की गूंज सुनाई दी- ‘पिंग…’ उसने फौरन रिपोर्ट दी- “सर, काॅन्टेक्ट… रेंज ढाई हजार मीटर, ये कोई मछली नहीं है, पक्का कोई सबमरीन है।” कैप्टन मुल्ला के दिमाग की नसें तन गईं। उन्होंने गरजकर आदेश दिया- “पूरे जहाज को एक्शन स्टेशन पर डाल दो। कृपाण को सिग्नल दो कि वो अपनी चाल न बदले। हम इस शिकारी का पीछा करेंगे।” अफसर ने आदेश का पालन किया। खुकरी अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए खतरे की दिशा में मुड़ा। सोनार ऑपरेटर तनाव भरी आवाज में बोला- “सर, वो एकदम हमारे आसपास है।” कैप्टन महेंद्र का हाथ हवा में लहराया- “अभी, फायर…” एक के बाद एक कई धमाके हुए। समंदर की लहरें कांप उठीं। पानी के विशाल गुब्बारे जहाज के बराबर ऊंचे उठने लगे। खुकरी का हर हिस्सा थरथरा उठा। थोड़ी देर बाद रिकॉर्डिंग मशीनों ने एक खौफनाक चरमराहट कैद की। जैसे पानी के नीचे कुछ टूट रहा हो। जवानों ने उत्साह से कहा- “हमने उसे तबाह कर दिया सर… पक्का हिट है।” फर्स्ट अफसर ने पास आकर धीरे से पूछा- “सर, क्या हम रुककर चेक करें? तेल के धब्बे या मलबा मिल गया तो पक्का हो जाएगा।” कैप्टन महेंद्र ने घड़ी देखी और फिर दूर रेंगते हुए उन दो लाचार जहाजों की तरफ इशारा किया। फिर बोले- “नहीं… हमारी पहली जिम्मेदारी कुठार को बचाकर बॉम्बे तक पहुंचाना है। यहां रुककर अपनी लोकेशन दुश्मन को नहीं बता सकते। आगे बढ़ो…!” अगले दिन ये बेड़ा बॉम्बे पहुंचा, तो खुकरी के शेरों के चेहरों पर जीत की चमक थी। कैप्टन महेंद्र ने वेस्टर्न नेवल कमांड हेडक्वार्टर में रिपोर्ट पेश की। “सर, हमने दुश्मन को मार गिराया। हमारे पास धमाकों की रिकॉर्डिंग है।” सामने बैठे सीनियर अफसर ने फाइल बंद करते हुए ठंडे लहजे में कहा- “रिकॉर्डिंग काफी नहीं है कैप्टन… तेल कहां है? मलबा कहां है? बिना पक्के सबूत हम नहीं मान सकते कि पाकिस्तान की पनडुब्बी को डुबो दिया।” इंडियन नेवी जानती थी कि जहाजों के सोनार में इतनी ताकत नहीं है, इसलिए भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) के साथ एक सीक्रेट रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम चल रहा था। मिशन था- पुराने सोनार को नया दिमाग देना। नेवी के एक होनहार नौजवान अधिकारी, लेफ्टिनेंट वीके जैन इस प्रोजेक्ट पर रात-दिन मेहनत कर रहे थे। नतीजे उम्मीद जगाने वाले थे, लेकिन रिसर्च अभी अधूरी थी। फिर भी तय हुआ कि इस नए एक्सपेरिमेंटल T-170 सोनार को INS खुकरी में लगाकर आजमाया जाए। इससे खुकरी की दुश्मन को ट्रैक करने की क्षमता 2500 से बढ़कर 25 हजार मीटर यानी ढाई किलाेमीटर हो जाती। दरअसल, एक दिन पहले ही नेवी को पाकिस्तानी पनडुब्बी ‘PNS हंगोर’ की मौजूदगी के सुराग मिले थे। पता चला कि हंगोर दमन-दीव से करीब 16 नॉटिकल मील (करीब 29 किमी) दूर है। हुआ यूं कि 1 दिसंबर के आसपास हंगोर का एयर कंडीशनर (AC) खराब हो गया। पनडुब्बी में बिना AC के रहना नरक जैसा था। मरम्मत के लिए पनडुब्बी को समंदर की सतह पर लाना था। करीब 36 घंटे का वक्त लगना था। PNS हंगोर के कमांडर ने कराची में रेडियो मैसेज भेजा और अपनी हालत बताई। वो रेडियो मैसेज इंडियन नेवी के डायरेक्शन फाइंडर्स की पकड़ में आ गया। दुश्मन की लोकेशन अब साफ थी। पश्चिमी बेड़े को फौरन हुक्म जारी हुआ- “दुश्मन को खोजो और नेस्तनाबूद कर दो।” ये आदेश F-14 स्क्वाड्रन के कमांडर कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला को मिला, लेकिन उनकी टीम अधूरी थी। INS कुठार बाहर हो चुका था। मैदान में सिर्फ दो ही शिकारी बचे थे- INS खुकरी और INS कृपाण। 8 दिसंबर की सुबह दोनों जहाज निकल पड़े। नए सोनार की टेस्टिंग के लिए लेफ्टिनेंट जैन भी खुकरी पर सवार हो गए। 9 दिसंबर की सुबह उस समुद्री इलाके में सर्चिंग शुरू हुई, जहां पाकिस्तानी पनडुब्बी के होने के सिग्नल मिले थे। कैप्टन महेंद्र ने जहाज के कंट्रोल रूम (व्हीलहाउस) से दूर आसमान को देखा और बोले- “लेफ्टिनेंट जैन, उम्मीद है आपका ये नया सोनार हमें धोखा नहीं देगा।” लेफ्टिनेंट जैन ने जवाब दिया- “सर, हमने पूरी जान लगा दी है। बस एक बार सिग्नल मिल जाए।” उधर हंगोर के सोनार ने बहुत दूर से ही खुकरी और कृपाण को भांप लिया था। हमारे जहाजों को पता भी नहीं था कि दुश्मन को उनकी भनक लग चुकी है। हंगोर का कमांडर शातिर था। वो एक बार समंदर की सतह पर आया, दूरबीन से हालात देखे और फिर चुपचाप पानी के नीचे सरक गया। उसे समझ आ गया था कि भारतीय जहाज एक खास आयताकार (रेक्टेंगुलर) पैटर्न में उसे खोज रहे हैं। ये नाटो देशों की पुरानी ड्रिल थी, जिसे पाकिस्तानी बखूबी जानते थे। उन्हें पता चल गया कि खुकरी और कृपाण अगले कुछ मिनटों में किस पॉइंट पर होंगे। उधर खुकरी और कृपाण ‘ब्लैक-आउट’ मोड में थे। भारतीय जहाजों पर एक मोमबत्ती तक नहीं जल रही थी ताकि दुश्मन को पता न चले। वे अंधेरे में भटकते हुए उसी आयताकार जाल की तरफ बढ़ रहे थे जिसे मौत ने बिछाया था। व्हीलहाउस में कैप्टन महेंद्र के चेहरे पर झुंझलाहट थी। BARC का नया सोनार सिरदर्द बन गया था। वो ठीक से काम करे, इसके लिए जहाज की रफ्तार 12 नॉट्स तक कम करनी पड़ रही थी। पनडुब्बी पर हमला करने के लिए तेज रफ्तार चाहिए होती है और कैप्टन मुल्ला को कछुए की चाल चलना पड़ रहा था। कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला, ऑपरेशंस ऑफिसर मनु शर्मा और नेविगेशन का काम देख रहे लेफ्टिनेंट कुंदन मल मुस्तैद थे। कैप्टन महेंद्र घड़ी की सुइयों को देख रहे थे। रात के साढ़े आठ बज रहे थे। वे दस मिनट के लिए नीचे गए और जब वापस लौटे तो उनकी आवाज में बेचैनी थी। “शर्मा, क्या सीकिंग हेलिकॉप्टरों के रिप्लेसमेंट की कोई खबर है?” कैप्टन की कड़क आवाज गूंजी। “नहीं सर, अभी तक कोई सिग्नल नहीं मिला है। हमारा सर्च एरिया पूरी तरह खाली है।” मनु शर्मा ने फौरन जवाब दिया। कैप्टन महेंद्र ने गहरी सांस ली और कड़ककर कहा- “जैन तुम्हारी इस मशीन की वजह से रफ्तार कम हो रही है। जहाज जिग-जैग पैटर्म में न चलाया तो दुश्मन का निशाना आसान हो जाऊंगा। और इस स्पीड में जिगजैग किया तो रफ्तार इतनी गिर जाएगी कि हम ही शिकार बन जाएंगे।” लेफ्टिनेंट जैन बोले- “सर, मुझे बस एक मिनट दीजिए। मैं चार्ट पर समझाता हूं कि पोजीशन क्या है।” तभी पाकिस्तानी पनडुब्बी हंगोर ने पहला ‘टॉरपीडो’ दागा। उसका निशाना खुकरी नहीं, INS कृपाण था। किस्मत ने साथ दिया, टॉरपीडो कृपाण के पास पहुंचा पर फटा नहीं, लेकिन हंगोर की लोकेशन पता चल गई। अब हंगोर के पाकिस्तानी कमांडर के पास दो ही रास्ते थे, भाग जाए या दोबारा हमला करे। उसने जोखिम लिया और दूसरा टॉरपीडो लोड किया। कृपाण को खतरे का एहसास हो गया था। कृपाण ने बचाव के लिए जहाज को तेजी से मोड़ा, लेकिन खुकरी अभी पुरानी लय में आगे बढ़ रही थी। INS खुकरी में लेफ्टिनेंट जैन, कैप्टन महेंद्र की तरफ अभी मुड़े ही थे, कि जोरदार धमाका हुआ। हंगोर का टॉरपीडो खुकरी के मैगजीन (जहां गोला-बारूद रखा जाता है) के ठीक नीचे फटा। कान फाड़ देने वाला धमाका था। बारूद ने आग पकड़ ली और लोहा कागज की तरह फटने लगा। पूरा जहाज किसी खिलौने की तरह हवा में उछला और एक तरफ पंद्रह डिग्री झुक गया। कैप्टन महेंद्र व्हीलहाउस में अपनी कुर्सी से उछले और लोहे के बल्कहेड से जा टकराए। उनके माथे से खून की धार बह निकली। “सर, आप ठीक हैं?” लेफ्टिनेंट कुंदन चिल्लाए। कैप्टन ने दहाड़ते हुए कहा- “मेरी फिक्र छोड़ो, रिपोर्ट दो…।” अभी वे संभले ही थे कि दूसरा धमाका हुआ। पूरे जहाज की बिजली गुल हो गई। हर तरफ घना अंधेरा छा गया। कैप्टन चिल्लाए- “दोनों इंजनों को फुल अहेड करो अभी…।” लेकिन बिजली जा चुकी थी, इंजन रूम से कम्युनिकेशन टूट चुका था। खुकरी अब एक बेजान लोहे के टुकड़े की तरह पानी में डूब रहा था। कैप्टन ने आदेश दिया- “शर्मा, फौरन नीचे जाकर देखो क्या हाल है।” शर्मा भागते हुए डेक पर पहुंचे। वहां का मंजर देखकर उनकी रूह कांप गई। खुकरी का पिछला हिस्सा समंदर निगल चुका था। चिमनी से आग की ऊंची लपटें निकल रही थीं। शर्मा ने वापस आकर बदहवास होकर कहा- “सर, जहाज डूब रहा है। हमें फौरन जहाज खाली करवाना होगा।” बिजली नहीं थी, ब्रॉडकास्ट सिस्टम काम नहीं कर सकते थे। कैप्टन महेंद्र ने अपनी चोट की परवाह किए बिना कमान संभाली। वो जोर से चिल्लाए- “गला फाड़कर चिल्लाओ… सबको कहो- जहाज छोड़ो, पानी में कूदो…।” शर्मा की आवाज गूंजी- “सब बाहर निकलो जल्दी…।” नीचे ‘काउशेड’ (जवानों के आराम करने की जगह) में भी अफरा-तफरी मच गई थी। लेफ्टिनेंट एसके बसु काउशेड से व्हीलहाउस की तरफ जाने वाली सीढ़ियों की ओर भागे। वहां पहले ही भीड़ जमा हो गई थी। सबके चेहरों पर एक ही सवाल था- “अब क्या होगा?” सभी ब्रॉडकास्ट सिस्टम से आने वाले अगले आदेश का इंतजार कर रहे थे। बसु जब हांफते हुए व्हीलहाउस में पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर उनके रोंगटे खड़े हो गए। कैप्टन महेंद्र वहां चट्टान की तरह खड़े थे। उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी। कैप्टन आदेश दे रहे थे- “चीफ योमैन, फौरन वेस्टर्न नेवल कमांड को सिग्नल भेजो। उन्हें बताओ, हमें टॉरपीडो लग चुका है। खुकरी खतरे में है।” योमैन एक तरह का ऑफिस इंचार्ज होता है। वही शिप की कागजी कार्रवाई संभालता है। चीफ योमैन टॉर्च की हल्की रोशनी में कांपते हाथों से मैसेज लिख रहे थे। मौत सामने खड़ी थी, लेकिन कैप्टन महेंद्र का दिमाग बिजली की तरह चल रहा था। जवान बदहवास होकर नीचे से ऊपर भाग रहे थे। रास्ता सिर्फ एक संकरी सीढ़ी थी। नाविकों ने मोटी लाइफ जैकेट पहन रखी थी, जिसकी वजह से वे उस तंग रास्ते में फंस रहे थे। कैप्टन महेंद्र आगे बढ़े। वे खुद जवानों को खींचकर बाहर निकाल रहे थे। “धक्का मत दो, एक-एक करके निकलो।” जहाज अब नब्बे डिग्री तक झुक चुका था। समंदर का बर्फीला पानी व्हीलहाउस तक आ पहुंचा था। “सर अब देर हो रही है, चलिए…।” लेफ्टिनेंट कुंदन ने कैप्टन का हाथ पकड़ा। कैप्टन महेंद्र ने एक पल लेफ्टिनेंट की आंखों में देखा। उनकी आंखों में एक अजीब सी शांति थी। कैप्टन ने धक्का देकर लेफ्टिनेंट कुंदन को किनारे किया। “ये मेरा आखिरी हुक्म है, कूद जाओ… अपनी जान बचाओ…!” कैप्टन का ऑर्डर कोई टाल नहीं सकता था। लेफ्टिनेंट कुंदन समंदर की लहरों में कूद गए। कुछ दूर तैरने के बाद पीछे मुड़कर देखा। खुकरी तेजी से डूब रहा था। “सब जहाज छोड़ दो, पानी में उतरो… ये मेरा ऑर्डर है।” कैप्टन महेंद्र लगातार चिल्ला रहे थे। तभी एक जवान लाइफ जैकेट लेकर उनकी ओर दौड़ा- “सर, आप ये पहन लीजिए।” कैप्टन ने जैकेट देखी और पास खड़े एक घबराए हुए युवा जवान की ओर बढ़ा दी। “इसे पहनो और कूदो।” वो अपनी जान बचा सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी लाइफ जैकेट एक जूनियर को दे दी। पानी तेजी से ऊपर आ रहा था। तभी कैप्टन की नजर लेफ्टिनेंट बसु पर पड़ी। उन्होंने बसु के कंधे पर हाथ रखा और पिता जैसी ममता के साथ बोले- “बच्चू… अब देर मत करो। तुरंत पानी में उतरो…।” लेफ्टिनेंट बसु की आंखों में आंसू थे। वो उफनते अरब सागर में कूद गए। पीछे मुड़कर देखा तो कैप्टन अब भी वहीं थे, जैसे वे जहाज नहीं बल्कि अपने सम्मान की रक्षा कर रहे हों। समंदर में उतर चुके ऑपरेशंस ऑफिसर मनु शर्मा ने देखा, कैप्टन अपनी कुर्सी पर वैसे ही बैठे थे जैसे राजा सिंहासन पर बैठता है। उनके हाथ में जलती हुई सिगरेट थी। एकदम शांत थे, जैसे वे किसी पुराने दोस्त का इंतजार कर रहे हों। जहाज के अगले हिस्से पर कुछ जवान अब भी रेलिंग पकड़े लटके हुए थे। वे अपने कप्तान को छोड़कर नहीं जाना चाहते थे। तभी एक गहरी कराह जैसी आवाज आई। यूं लगा जैसे लोहे का विशालकाय शरीर दर्द से तड़प रहा हो। समुद्र की एक अलिखित परंपरा सदियों से चली आ रही है कि डूबते जहाज का कप्तान कभी अपना जहाज नहीं छोड़ता। टाइटेनिक के कैप्टन एडवर्ड स्मिथ ने भी 1912 में यही किया था। आखिरी दम तक लोगों को बचाया और जहाज के साथ डूब गए। INS खुकरी पर वही परंपरा जिंदा हुई। कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला ने टॉरपीडो लगने के बाद सबको बाहर निकाला। उनके मन में एक ही बात थी- वो अपने बाकी साथियों को छोड़कर नहीं जा सकते हैं। उन्होंने जहाज को चुना, क्योंकि वो सिर्फ लोहा नहीं, उनकी जिम्मेदारी, इज्जत और परिवार था। INS खुकरी डूब गया, लेकिन कैप्टन मुल्ला की बहादुरी अमर हो गई। एक ऐसी परंपरा की मिसाल बनकर जो कभी नहीं मरती। 9 दिसंबर 1971, रात 8:45 बजे पर INS खुकरी अपने जांबाज कप्तान और उन वफादार नाविकों के साथ हमेशा के लिए समंदर की गहराइयों में समा गया। समंदर फिर से शांत था, लेकिन भारत मां की गोद में शहीद सो चुका था। कैप्टन मुल्ला की वीरता को मरणोपरांत महावीर चक्र से नवाजा गया। *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल ग्राफिक्स- सौरभ कुमार *** कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है। ——————————————————— सीरीज की ये स्टोरी भी पढ़ें… यूपी के योद्धा-1:पाकिस्तानी हथियार से उसी का बंकर उड़ाया, दुश्मन फौज भागी; गाजीपुर के राम उग्रह की कहानी 20, माउंटेन डिवीजन को एक अहम जिम्मेदारी दी गई। आमतौर पर इसे बॉर्डर के काफी ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में तैनात किया जाता है, लेकिन खास रणनीति के तहत इसे पूर्वी पाकिस्तान की बोगुरा पोस्ट पर कब्जा करने की जिम्मेदारी मिली। पूरी स्टोरी पढ़ें…