बिहार चुनाव में कांग्रेस की दुर्गति हुई। 61 सीटों पर चुनाव में उतरी कांग्रेस 10% स्ट्राइक रेट से 6 सीट ही जीत सकी। कांग्रेस की यह दुर्गति यूपी में सपा के लिए परेशानी का सबब बन गई है। बिहार की तरह यूपी में भी महागठबंधन का सामना भाजपा के एनडीए गठबंधन के साथ होना है। बिहार में राजद की तरह यूपी में सपा का भी मूल जनाधार MY समीकरण ही है। बिहार की तरह यूपी में भी कांग्रेस का खुद का अपना कोई खास वोट बैंक नहीं है। यही वह पहलू है, जिसकी वजह से सपा यूपी में कोई रिस्क नहीं उठाना चाहती है। सपा के एक बड़े नेता का दावा है कि पार्टी यूपी विधानसभा में 340 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। मतलब सहयोगियों के लिए वह अधिकतम 63 सीट ही छोड़ने को तैयार है। जबकि कांग्रेस खुद यूपी के सभी 75 जिलों में सीटों की दावेदारी कर रही है। आखिर सपा खुद क्यों 340 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है? कांग्रेस की यूपी में राजनीतिक हैसियत क्या वाकई में 63 सीटों से अधिक की नहीं है? पिछले चुनावों में दोनों पार्टियों का कैसा प्रदर्शन रहा था? पढ़िए ये रिपोर्ट… पहले पढ़ते हैं सपा 350 सीट पर क्यों लड़ना चाहती है
सपा ने 2022 का यूपी विधानसभा चुनाव गठबंधन में लड़ा था। तब उसके गठबंधन में दो बड़े सहयोगी थे। पहला- राष्ट्रीय लोक दल (रालोद), जिसे 33 सीटें मिली थी। दूसरा बड़ा सहयोगी सुभासपा थी, जिसे 17 सीट मिली थी। 10 अन्य सीटों में 5 अपना दल (कमेरावादी), शिवपाल की पार्टी को 1, महानदल को 2, जनवादी पार्टी व राकपा को 1–1 सीट समझौते में मिली थी। अपना दल कमेरावादी की पल्लवी पटेल सपा की सिंबल पर लड़ी थीं। शिवपाल की पार्टी का अब सपा में विलय हो चुका है। इस हिसाब से सपा सहयोगियों के लिए 50–60 सीट छोड़ सकती है। मतलब सपा खुद 340 सीट पर लड़ेगी। सपा के एक नेता बताते हैं कि सहयोगियों को संगठन की जमीनी हकीकत के आधार पर सीट मिलेगी। कांग्रेस के लिए क्यों 63 सीट की तय की गई लिमिट
सपा के एक बड़े नेता का दावा है कि कांग्रेस भले ही खुले तौर पर 100 से 125 सीटों पर लड़ने की बात करती हो, लेकिन वह प्रदेश के सभी 75 जिलों में न्यूनतम 1–1 विधानसभा पर लड़ना चाहती है। जिससे उसकी मौजूदगी पूरे प्रदेश में दर्ज हो। पर यहां दिक्कत ये है कि आजमगढ़, अम्बेडकरनगर, कौशाम्बी व शामली में सभी सीटें सपा ने जीती थी। ऐसे में यहां कांग्रेस को सीट देना उसके लिए मुश्किल होगा। कांग्रेस अमेठी व रायबरेली लोकसभा की सभी 10 विधानसभाओं पर लड़ना चाहती है। यहां भी सपा के विधायक हैं, इसकी वजह से ये मांग भी पूरी नहीं हो पाएगी। सपा इस बार पीडीए के फार्मूले पर सहयोगियों को साधने में जुटी है। पल्लवी पटेल की अपना दल (कमेरावादी) के हालिया बयानों के चलते अभी तय नहीं है कि ये गठबंधन आगे बना रहेगा या नहीं। हालांकि पिछले दिनों सपा मुखिया अखिलेश यादव पार्टी की एक बैठक में पल्लवी पटेल को संकेतों ये कहते हुए ऑफर दिया है कि इस बार आपका ज्यादा ख्याल रखा जाएगा। गठबंधन होगा तो 8 सीट तक उन्हें मिल सकती है। 340 सपा लड़ती है तो सिर्फ 55 सीट ही बचती है। दूसरा आधार 2022 का विधानसभा और 2024 का लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन है। 2022 में कांग्रेस ने अकेले 399 सीटों पर चुनाव लड़ा था। फरेंदा और रामपुर खास से उसके दो प्रत्याशी वीरेंद्र चौधरी व आराधना मिश्रा ही जीत पाए थे। जबकि 4 सीटों पर वह नंबर दो रही थी। उसे पूरे प्रदेश में कुल 21 लाख 51 हजार 234 वोट मिले थे। ये कुल 2.33% था। मतलब यूपी में कांग्रेस का जनाधार 2–3 प्रतिशत के बीच ही बचा है। 2024 के लोकसभा में कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन में उतरी थी। तब उसे 17 सीटें मिली थी। 6 पर कांग्रेस को जीत मिली थी। जबकि इतने ही सीट पर उसने टक्कर दी थी। 5 सीट पर वह बड़े अंतर से हारी थी। महागठबंधन में चुनाव लड़ने से कांग्रेस का वोटबैंक बढ़कर 9.46% पहुंचा था। इन 17 लोकसभा में विधानसभा की 85 सीटें हैं। विधानसभावार कांग्रेस को 85 में 39 सीटों पर बढ़त मिली थी। मतलब लोकसभा के पैटर्न पर महागठबंधन को वोट मिले तो कांग्रेस ये 39 सीटें जीत सकती है। पर पेंच ये है कि इसमें भी कई पर मौजूदा समय में सपा के विधायक हैं। सपा कम से कम अपने मौजूदा विधायकों वाली और करीबी अंतर से हारी सीटों को सहयोगी दलों को सौंपेगी, इस पर जानकार भी संशय व्यक्त करते हैं। सपा के साथ 2022 में सहयोगी के तौर पर चुनाव लड़े रालोद और सुभासपा अब उससे अलग होकर एनडीए का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में उनके खाते की 50 सीटें बचती हैं। सपा को ये सीटें कांग्रेस को देने में कोई समस्या भी नहीं आएगी। 2017 विधानसभा में 100 सीटें देने वाली सपा क्यों पीछे हट रही
कांग्रेस के नेताओं का तर्क है कि 2017 में सपा के साथ गठबंधन में उसके हिस्से में 100 सीटें आई थी। हालांकि उसने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा था। कुछ सीटों पर बिहार की तरह फ्रेंडली मुकाबला भी हुआ था। रिजल्ट भी बिहार की तरह तब आया था। भाजपा नीत एनडीए गठबंधन को तब 325 (312 अकेले बीजेपी को) सीटें मिली थीं। जबकि सपा की अगुआई वाले गठबंधन में शामिल कांग्रेस 114 सीटों पर लड़ी थी। उसे 7 सीटों पर और 311 सीटों पर लड़ी सपा को 47 सीटों पर जीत मिली थी। तब कांग्रेस 44 सीटों पर नंबर दो पर थी। उसे कुल 54 लाख 16 हजार 540 वोट ( 6.25%) मिले थे। मतलब तब भी उसकी ताकत 51 सीटों पर ही मजबूत थी। इसी आधार पर सपा विधानसभा 2027 में कांग्रेस को 50 से अधिक सीटें देने को तैयार नहीं है। अब बिहार चुनाव का परिणाम भी बना सपा के दावे का आधार
सपा से जुड़े एक बड़े नेता कहते हैं कि बिहार में जिस तरीके से महागठबंधन में शामिल कांग्रेस का प्रदर्शन सबसे खराब रहा, उससे भी उनका दावा कमजोर हुआ है। बिहार में महागठबंधन MY समीकरण के भरोसे रहा। पिछड़े के तौर पर वीआईपी के मुकेश सहनी के बहाने निषाद वोटबैंक को जोड़ा था। बिहार में निषाद वोटबैंक लगभग 2.61% के लगभग है। बिहार में मुस्लिम 17 तो यादव 14 फीसदी हैं। मतलब महागठबंधन का कोर वोट बैंक 33% के लगभग था। पोल्स मैन और लोकनीति का सर्वे बताता है कि इस बार महागठबंधन को 74% यादव और 69% मुसलमानों का समर्थन मिला। 2020 की तुलना में इसमें गिरावट साफ नजर आयी। तब 84 फीसदी यादव और 76 फीसदी मुस्लिमों का समर्थन मिला था। मतलब साफ है कि सीमांचल में ओवैसी के चलते मुस्लिम वोटर महागठबंधन से दूर गए। इसी तरह इस बार 28 यादव विधायकों में महागठबंधन से 12 ही जीते हैं। 15 एनडीए और 1 बसपा से यादव विधायक बने हैं। यादव वोटर्स का झुकाव पार्टी की बजाय अपनी जाति के प्रत्याशियों की तरफ गया। राजद 25 सीटें और कांग्रेस 6 सीटें ही जीत पाई। राजद ने 143 सीटों पर चुनाव लड़ा था। जबकि कांग्रेस को गठबंधन में 61 सीटें मिली थी। अन्य सीटें दूसरे सहयोगियों को मिली थी। 11 सीटों पर फ्रेंडली मुकाबला भी हुआ था। बिहार में महागठबंधन को 37 प्रतिशत तो एनडीए को 47 प्रतिशत वोट मिले थे। दोनों में 10 प्रतिशत का गैप रहा। कांग्रेस की कमजोरी और मजबूत वोटबैंक न होने का खामियाजा महागठबंधन को मिला। यही कारण है कि यूपी में सपा भी कांग्रेस को अधिक सीटें नहीं देना चाहती है। यूपी में पीडीए का नारा कितना कारगर होगा
यूपी में महागठबंधन के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव पीडीए की पहली परीक्षा थी। इसमें वह अच्छे नंबर से पास रही। विधानसभा उप चुनाव में महागठबंधन का ये पीडीए नारा नहीं चला। 9 सीटों पर सपा सिर्फ 2 पर जीत पाई। 2024 लोकसभा में बसपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था। पर बसपा प्रमुख मायावती की सक्रियता और 9 अक्टूबर की रैली के बाद बसपा का कोर वोट बैंक फिर से एकजुट हो रहा है। मतलब दलितों का वोट बसपा की बजाय किसी और के पाले में जाना मुश्किल होगा। दूसरा बिहार की तरह ओवैसी की AIMIM ने यूपी में दम दिखाया तो मुस्लिमों के भी बिखरने का डर है। अब बची बात पिछड़ों की तो भाजपा ने सुभासपा को फिर से अपने पाले में लाकर इस समीकरण को मजबूत ही किया है। निषाद पार्टी और अपना दल पहले से भाजपा के साथ हैं। ऐसे में यहां भी महागठबंधन की दाल बहुत अधिक नहीं गलने की उम्मीद है। हालांकि कांग्रेस पिछड़ों को एकजुट करने के लिए गांव–गांव में चौपाल लगाकर संविधान पर चर्चा का कार्यक्रम करने का 26 नवंबर से अभियान शुरू करने जा रही है। पिछड़ों को वह कितना साध पाएगी, ये विधानसभा से पहले पंचायत और एमएलसी की 11 सीटों के परिणाम से स्पष्ट हो जाएगा। ————— ये खबर भी पढ़ें- यूपी में SIR हेल्पलाइन नंबर उठ नहीं रहा:4 दिसंबर तक बिना डॉक्यूमेंट जमा करना है फॉर्म; पढ़िए SIR की हर टेंशन का जवाब क्या आप भी भारत निर्वाचन आयोग की ओर से कराए जा रहे SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिव्यू) में मदद के लिए हेल्पलाइन नंबर- 1950 पर फोन कर रहे हैं। लेकिन, मदद नहीं मिल रही? इस तरह की शिकायतें लखनऊ में हर दूसरे व्यक्ति की हैं। ऐसा इसलिए हो रहा, क्योंकि बड़े अफसरों की नाक के नीचे काम करने वाले कर्मचारी ही लापरवाही कर रहे हैं। दैनिक भास्कर की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि 1950 कंट्रोल रूम में काम करने वाले कर्मचारी फोन के रिसीवर को सेट से हटाकर अलग रख दे रहे, जिससे उन्हें कोई परेशानी न हो। फोन करने वाला परेशान हो, अपनी बला से। जब से SIR की प्रक्रिया शुरू हुई, तभी से इस तरह की शिकायतें लगातार आ रही थीं। 1950 पर अव्वल तो फोन नहीं लग रहा, लग भी रहा तो उसे रिसीव नहीं किया जा रहा। हमने इस शिकायत को पहले खुद कॉल करके चेक किया। फिर अफसरों से इसका जवाब मांगा। पढ़िए पूरी खबर…
सपा ने 2022 का यूपी विधानसभा चुनाव गठबंधन में लड़ा था। तब उसके गठबंधन में दो बड़े सहयोगी थे। पहला- राष्ट्रीय लोक दल (रालोद), जिसे 33 सीटें मिली थी। दूसरा बड़ा सहयोगी सुभासपा थी, जिसे 17 सीट मिली थी। 10 अन्य सीटों में 5 अपना दल (कमेरावादी), शिवपाल की पार्टी को 1, महानदल को 2, जनवादी पार्टी व राकपा को 1–1 सीट समझौते में मिली थी। अपना दल कमेरावादी की पल्लवी पटेल सपा की सिंबल पर लड़ी थीं। शिवपाल की पार्टी का अब सपा में विलय हो चुका है। इस हिसाब से सपा सहयोगियों के लिए 50–60 सीट छोड़ सकती है। मतलब सपा खुद 340 सीट पर लड़ेगी। सपा के एक नेता बताते हैं कि सहयोगियों को संगठन की जमीनी हकीकत के आधार पर सीट मिलेगी। कांग्रेस के लिए क्यों 63 सीट की तय की गई लिमिट
सपा के एक बड़े नेता का दावा है कि कांग्रेस भले ही खुले तौर पर 100 से 125 सीटों पर लड़ने की बात करती हो, लेकिन वह प्रदेश के सभी 75 जिलों में न्यूनतम 1–1 विधानसभा पर लड़ना चाहती है। जिससे उसकी मौजूदगी पूरे प्रदेश में दर्ज हो। पर यहां दिक्कत ये है कि आजमगढ़, अम्बेडकरनगर, कौशाम्बी व शामली में सभी सीटें सपा ने जीती थी। ऐसे में यहां कांग्रेस को सीट देना उसके लिए मुश्किल होगा। कांग्रेस अमेठी व रायबरेली लोकसभा की सभी 10 विधानसभाओं पर लड़ना चाहती है। यहां भी सपा के विधायक हैं, इसकी वजह से ये मांग भी पूरी नहीं हो पाएगी। सपा इस बार पीडीए के फार्मूले पर सहयोगियों को साधने में जुटी है। पल्लवी पटेल की अपना दल (कमेरावादी) के हालिया बयानों के चलते अभी तय नहीं है कि ये गठबंधन आगे बना रहेगा या नहीं। हालांकि पिछले दिनों सपा मुखिया अखिलेश यादव पार्टी की एक बैठक में पल्लवी पटेल को संकेतों ये कहते हुए ऑफर दिया है कि इस बार आपका ज्यादा ख्याल रखा जाएगा। गठबंधन होगा तो 8 सीट तक उन्हें मिल सकती है। 340 सपा लड़ती है तो सिर्फ 55 सीट ही बचती है। दूसरा आधार 2022 का विधानसभा और 2024 का लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन है। 2022 में कांग्रेस ने अकेले 399 सीटों पर चुनाव लड़ा था। फरेंदा और रामपुर खास से उसके दो प्रत्याशी वीरेंद्र चौधरी व आराधना मिश्रा ही जीत पाए थे। जबकि 4 सीटों पर वह नंबर दो रही थी। उसे पूरे प्रदेश में कुल 21 लाख 51 हजार 234 वोट मिले थे। ये कुल 2.33% था। मतलब यूपी में कांग्रेस का जनाधार 2–3 प्रतिशत के बीच ही बचा है। 2024 के लोकसभा में कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन में उतरी थी। तब उसे 17 सीटें मिली थी। 6 पर कांग्रेस को जीत मिली थी। जबकि इतने ही सीट पर उसने टक्कर दी थी। 5 सीट पर वह बड़े अंतर से हारी थी। महागठबंधन में चुनाव लड़ने से कांग्रेस का वोटबैंक बढ़कर 9.46% पहुंचा था। इन 17 लोकसभा में विधानसभा की 85 सीटें हैं। विधानसभावार कांग्रेस को 85 में 39 सीटों पर बढ़त मिली थी। मतलब लोकसभा के पैटर्न पर महागठबंधन को वोट मिले तो कांग्रेस ये 39 सीटें जीत सकती है। पर पेंच ये है कि इसमें भी कई पर मौजूदा समय में सपा के विधायक हैं। सपा कम से कम अपने मौजूदा विधायकों वाली और करीबी अंतर से हारी सीटों को सहयोगी दलों को सौंपेगी, इस पर जानकार भी संशय व्यक्त करते हैं। सपा के साथ 2022 में सहयोगी के तौर पर चुनाव लड़े रालोद और सुभासपा अब उससे अलग होकर एनडीए का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में उनके खाते की 50 सीटें बचती हैं। सपा को ये सीटें कांग्रेस को देने में कोई समस्या भी नहीं आएगी। 2017 विधानसभा में 100 सीटें देने वाली सपा क्यों पीछे हट रही
कांग्रेस के नेताओं का तर्क है कि 2017 में सपा के साथ गठबंधन में उसके हिस्से में 100 सीटें आई थी। हालांकि उसने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा था। कुछ सीटों पर बिहार की तरह फ्रेंडली मुकाबला भी हुआ था। रिजल्ट भी बिहार की तरह तब आया था। भाजपा नीत एनडीए गठबंधन को तब 325 (312 अकेले बीजेपी को) सीटें मिली थीं। जबकि सपा की अगुआई वाले गठबंधन में शामिल कांग्रेस 114 सीटों पर लड़ी थी। उसे 7 सीटों पर और 311 सीटों पर लड़ी सपा को 47 सीटों पर जीत मिली थी। तब कांग्रेस 44 सीटों पर नंबर दो पर थी। उसे कुल 54 लाख 16 हजार 540 वोट ( 6.25%) मिले थे। मतलब तब भी उसकी ताकत 51 सीटों पर ही मजबूत थी। इसी आधार पर सपा विधानसभा 2027 में कांग्रेस को 50 से अधिक सीटें देने को तैयार नहीं है। अब बिहार चुनाव का परिणाम भी बना सपा के दावे का आधार
सपा से जुड़े एक बड़े नेता कहते हैं कि बिहार में जिस तरीके से महागठबंधन में शामिल कांग्रेस का प्रदर्शन सबसे खराब रहा, उससे भी उनका दावा कमजोर हुआ है। बिहार में महागठबंधन MY समीकरण के भरोसे रहा। पिछड़े के तौर पर वीआईपी के मुकेश सहनी के बहाने निषाद वोटबैंक को जोड़ा था। बिहार में निषाद वोटबैंक लगभग 2.61% के लगभग है। बिहार में मुस्लिम 17 तो यादव 14 फीसदी हैं। मतलब महागठबंधन का कोर वोट बैंक 33% के लगभग था। पोल्स मैन और लोकनीति का सर्वे बताता है कि इस बार महागठबंधन को 74% यादव और 69% मुसलमानों का समर्थन मिला। 2020 की तुलना में इसमें गिरावट साफ नजर आयी। तब 84 फीसदी यादव और 76 फीसदी मुस्लिमों का समर्थन मिला था। मतलब साफ है कि सीमांचल में ओवैसी के चलते मुस्लिम वोटर महागठबंधन से दूर गए। इसी तरह इस बार 28 यादव विधायकों में महागठबंधन से 12 ही जीते हैं। 15 एनडीए और 1 बसपा से यादव विधायक बने हैं। यादव वोटर्स का झुकाव पार्टी की बजाय अपनी जाति के प्रत्याशियों की तरफ गया। राजद 25 सीटें और कांग्रेस 6 सीटें ही जीत पाई। राजद ने 143 सीटों पर चुनाव लड़ा था। जबकि कांग्रेस को गठबंधन में 61 सीटें मिली थी। अन्य सीटें दूसरे सहयोगियों को मिली थी। 11 सीटों पर फ्रेंडली मुकाबला भी हुआ था। बिहार में महागठबंधन को 37 प्रतिशत तो एनडीए को 47 प्रतिशत वोट मिले थे। दोनों में 10 प्रतिशत का गैप रहा। कांग्रेस की कमजोरी और मजबूत वोटबैंक न होने का खामियाजा महागठबंधन को मिला। यही कारण है कि यूपी में सपा भी कांग्रेस को अधिक सीटें नहीं देना चाहती है। यूपी में पीडीए का नारा कितना कारगर होगा
यूपी में महागठबंधन के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव पीडीए की पहली परीक्षा थी। इसमें वह अच्छे नंबर से पास रही। विधानसभा उप चुनाव में महागठबंधन का ये पीडीए नारा नहीं चला। 9 सीटों पर सपा सिर्फ 2 पर जीत पाई। 2024 लोकसभा में बसपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था। पर बसपा प्रमुख मायावती की सक्रियता और 9 अक्टूबर की रैली के बाद बसपा का कोर वोट बैंक फिर से एकजुट हो रहा है। मतलब दलितों का वोट बसपा की बजाय किसी और के पाले में जाना मुश्किल होगा। दूसरा बिहार की तरह ओवैसी की AIMIM ने यूपी में दम दिखाया तो मुस्लिमों के भी बिखरने का डर है। अब बची बात पिछड़ों की तो भाजपा ने सुभासपा को फिर से अपने पाले में लाकर इस समीकरण को मजबूत ही किया है। निषाद पार्टी और अपना दल पहले से भाजपा के साथ हैं। ऐसे में यहां भी महागठबंधन की दाल बहुत अधिक नहीं गलने की उम्मीद है। हालांकि कांग्रेस पिछड़ों को एकजुट करने के लिए गांव–गांव में चौपाल लगाकर संविधान पर चर्चा का कार्यक्रम करने का 26 नवंबर से अभियान शुरू करने जा रही है। पिछड़ों को वह कितना साध पाएगी, ये विधानसभा से पहले पंचायत और एमएलसी की 11 सीटों के परिणाम से स्पष्ट हो जाएगा। ————— ये खबर भी पढ़ें- यूपी में SIR हेल्पलाइन नंबर उठ नहीं रहा:4 दिसंबर तक बिना डॉक्यूमेंट जमा करना है फॉर्म; पढ़िए SIR की हर टेंशन का जवाब क्या आप भी भारत निर्वाचन आयोग की ओर से कराए जा रहे SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिव्यू) में मदद के लिए हेल्पलाइन नंबर- 1950 पर फोन कर रहे हैं। लेकिन, मदद नहीं मिल रही? इस तरह की शिकायतें लखनऊ में हर दूसरे व्यक्ति की हैं। ऐसा इसलिए हो रहा, क्योंकि बड़े अफसरों की नाक के नीचे काम करने वाले कर्मचारी ही लापरवाही कर रहे हैं। दैनिक भास्कर की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि 1950 कंट्रोल रूम में काम करने वाले कर्मचारी फोन के रिसीवर को सेट से हटाकर अलग रख दे रहे, जिससे उन्हें कोई परेशानी न हो। फोन करने वाला परेशान हो, अपनी बला से। जब से SIR की प्रक्रिया शुरू हुई, तभी से इस तरह की शिकायतें लगातार आ रही थीं। 1950 पर अव्वल तो फोन नहीं लग रहा, लग भी रहा तो उसे रिसीव नहीं किया जा रहा। हमने इस शिकायत को पहले खुद कॉल करके चेक किया। फिर अफसरों से इसका जवाब मांगा। पढ़िए पूरी खबर…