भाजपा सरकार महापुरुषों की प्रतिमाओं पर छत्र, लाइट और बाउंड्रीवाल लगाने जा रही है। अखिलेश यादव एक के बाद 12 से ज्यादा महापुरुषों की मूर्तियां गोमती रिवर फ्रंट पर लगाने का वादा कर चुके हैं। यूपी में मूर्तियों की राजनीति नई नहीं है। बसपा सुप्रीमो मायावती का शासनकाल सबसे ज्यादा मूर्तियां लगाने के लिए जाना जाता है। सवाल उठना वाजिब है कि क्या महापुरुषों की मूर्तियां लगाने से पार्टियों को फायदा होता है? पिछले दिनों हुई इन घोषणाओं का क्या 2027 विधानसभा चुनाव में असर पड़ने वाला है? पढ़िए रिपोर्ट… पिछले एक साल में अलग-अलग मौकों पर अखिलेश यादव ने कहा- सपा सरकार बनने पर ये मूर्तियां लगेंगी। इनमें महाराजा सुहेलदेव, राजा बिजली पासी, कांशीराम, शिवाजी महाराज, आल्हा, ऊदल, भगवान विश्वकर्मा और केदारनाथ सिंह सैंथवार की मूर्तियां शामिल हैं। हालिया ऐलान अखिलेश ने नोएडा के दादरी में किया। वहां ‘समाजवादी समता भाईचारा रैली’ में गुर्जर समाज के महापुरुष मिहिर भोज की मूर्ति लगाने की घोषणा की। मौजूदा भाजपा सरकार महाराजा सुहेलदेव, केवटराज निषाद, पूर्व पीएम चंद्रशेखर, जयप्रकाश नारायण समेत तमाम महापुरुषों की मूर्तियां लगवा चुकी है। इसके अलावा 7 अप्रैल को हुई कैबिनेट मीटिंग में सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में डॉ. अंबेडकर, संत रविदास, ज्योतिबा फुले और महर्षि वाल्मीकि की मूर्तियों पर छत्र, बाउंड्री वॉल और लाइट लगाने का फैसला किया है। पहले मूर्तियों की सियासत समझिए… इस मुद्दे पर सीनियर जर्नलिस्ट राजेंद्र कुमार कहते हैं- मूर्तियों की राजनीति से कोई भी दल अछूता नहीं है। मायावती ने अपने शासनकाल में लखनऊ और नोएडा में अम्बेडकर पार्क बनवाया, जहां डॉ. अंबेडकर और कांशीराम की मूर्तिंयां लगवाईं। लखनऊ के गोमतीनगर में सड़क के किनारे तमाम दलित महापुरुषों की मूर्ति के साथ-साथ अपनी मूर्ति भी लगवाई। भाजपा सरकार आई तो सबसे पहले लोकभवन में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई की मूर्ति लगवाई। इसके अलावा लखनऊ में हाल ही में बने राष्ट्र प्रेरणा स्थल में अटल बिहारी वाजपेई, दीनदयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विशाल मूर्तियां लगवाई हैं। ऐसे में अखिलेश मूर्तियां लगाने की जगह बताते हुए घोषणा कर रहे हैं, तो ये उनकी राजनीति का हिस्सा है। वो 2027 के चुनाव में इसका फायदा लेने की कोशिश करेंगे। राजेंद्र कुमार कहते हैं- अखिलेश को ये पता है कि सत्ता हासिल करने के लिए कम से कम 40% वोट चाहिए। ये वोट सिर्फ मुस्लिम और यादव से नहीं मिलने वाला। ऐसे में उन्होंने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की बात शुरू की। इसके बाद महापुरुषों की मूर्तियां लगाने की घोषणा भी विभिन्न जातियों को अपने साथ जोड़ने का ही एक तरीका है। भाजपा लाई डॉ. बीआर अंबेडकर मूर्ति विकास योजना
मूर्तियों की सियासत को लेकर एक और बड़ी खबर 7 अप्रैल को कैबिनेट मीटिंग के बाद सामने आई। भाजपा सरकार दलित महापुरुषों की मूर्तियों के सौंदर्यीकरण के लिए ‘डॉ. बीआर अंबेडकर मूर्ति विकास योजना’ ला रही है। इसके तहत मूर्तियों पर प्रोटेक्टिव कैनोपी या छाता लगाया जाएगा, स्मारक की बाउंड्री वॉल और लाइटिंग भी की जाएगी। योजना में यूपी के सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में 10 महापुरुषों के स्मारक का सौंदर्यीकरण होगा। इसमें डॉ. अंबेडकर, संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले, महर्षि वाल्मीकि जैसे महापुरुष शामिल हैं। हर स्मारक के लिए 10 लाख रुपए दिए जाएंगे। अंबेडकर जयंती पर 14 अप्रैल को योजना के बारे में विस्तार से बताया जाएगा। मूर्ति संरक्षण के बहाने भाजपा उस वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है, जो आम तौर पर मायावती का माना जाता है। इसे 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यूपी के 22% दलित वोट बैंक को जोड़ने का प्रयास माना जा रहा है। मायावती शासन में मूर्तियों का विरोध करती थी सपा
राजेंद्र कुमार बताते हैं- सपा मायावती के शासनकाल में लगी मूर्तियों का विरोध करती रही है। हालांकि, सपा का विरोध इस बात पर ज्यादा था कि मायावती ने अपनी मूर्तियां शहर में लगवाईं। सबसे ज्यादा मूर्तियां मायावती के शासनकाल में ही लगवाई गईं। 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में सपा ने इन मूर्तियों को लेकर चुनाव आयोग से शिकायत भी की थी। सपा का कहना था कि मायावती और बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियां वोट प्रभावित कर सकती हैं। आयोग ने शिकायत को जायज मानते हुए सभी मूर्तियों को प्लास्टिक शीट्स और प्लाई वुड से ढकवा दिया था। राजेंद्र कुमार के मुताबिक, मायावती ने चौराहे और सड़कें घेर करके मूर्तियां लगवाईं। गोमतीनगर के ग्रीन बेल्ट पर पत्थरों का पार्क बनवाया और सड़क के किनारे बड़ी संख्या में मूर्तियां लगवाईं। वहीं, अखिलेश यादव शुरू से ही कहते आ रहे हैं कि वे सत्ता में आए तो रिवर फ्रंट पर महापुरुषों की मूर्तिं लगवाएंगे। इसके पीछे मकसद ये है कि महापुरुषों का नाम भी जुड़ेगा और रिवर फ्रंट का विस्तार भी होगा। अब समझिए मूर्तियां लोगों पर कैसे असर डालती हैं… लोगों पर प्रतीकों के साइकोलॉजिक असर के बारे में मनोचिकित्सक डॉ. प्रीति उपाध्याय कहती हैं कि मूर्तियां या स्मारक लोगों के दिमाग पर गहरा असर डालते हैं। ये कलेक्टिव मेमोरी को ट्रिगर करने का काम करते हैं। ये दिमाग में डोपामाइन एक्टिव करके भावनाओं, व्यवहार और पहचान पर गहरी छाप छोड़ती हैं। मसलन अंबेडकर पार्क के पास से कोई गुजरता है, फिर चाहे वो बसपा विरोधी हो या समर्थक, पार्क पर उसकी नजर जरूर जाती है। पार्क बने कई बरस हो गए, लेकिन लोग आज भी याद करते हैं कि मायावती ने पार्क बनवाया था। डॉ प्रीति बताती हैं कि प्रतीकों की राजनीति वोट प्रभावित करती है। जिस समुदाय के महापुरुष की मूर्ति लगती है, उस समाज के लोगों में आत्मसम्मान और सामूहिक पहचान को मजबूत करती है। उदाहरण के लिए, दलित समुदाय में अंबेडकर या कांशीराम की मूर्तियां ‘दलित गौरव’ का प्रतीक हैं। मायावती के मुख्यमंत्री रहते बनीं डॉ अंबेडकर, कांशीराम और उनकी खुद की मूर्तियां दलित वोट को बसपा की तरफ खींचती है। सर्वसमाज का नेता बनने की कोशिश
सीनियर जर्नलिस्ट सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं- अखिलेश यादव मूर्तियों के जरिए सभी जातियों के सम्मान का संदेश देना चाहते हैं। सपा अपने कोर वोट (यादव-मुस्लिम) के अलावा PDA यानी पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक फॉर्मूले को और मजबूत करना चाहती है। साथ ही कुछ ऊपरी जातियों जैसे राजपूत और ब्राह्मण को भी अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रही है। सिद्धार्थ मानते हैं कि मूर्तिंयां लगाने के बहाने वे रिवर फ्रंट को जातीय एकता का प्रतीक बनाने का प्रयास कर रहे हैं। अखिलेश की कोशिश खुद को सभी समाज का नेता बनाने की है। वो साबित करना चाहते हैं कि सपा जाति आधारित सामाजिक न्याय चाहती है, जबकि भाजपा धार्मिक प्रतीकों पर ज्यादा फोकस करती है। रिवर फ्रंट पर 100 मीटर का झूला लगाने का था प्लान
गोमती रिवर फ्रंट पर दोनों ओर हरियाली, झूले, ओपेन जिम, क्रिकेट पिच बनी है। अखिलेश के समय यहां रिवर क्रूज और वाटर बस चलाने की भी योजना थी। साथ ही लंदन की टेम्स नदी पर बने ‘लंदन आई’ (विशालकाय झूला) की तर्ज पर ‘लखनऊ आई’ बनाने की योजना थी। इसके तहत 100 मीटर ऊंचा झूला लगाया जाना था, जिससे पूरे शहर का दीदार किया जा सके। रिवर फ्रंट पर पहले फेज का काम पूरा ही हुआ था और अखिलेश यादव सत्ता से बाहर हो गए। भाजपा सरकार आई तो रिवर फ्रंट की जांच शुरू हो गई। इससे बाकी प्रोजेक्ट रुक गए। यूपी में विधायकों के सर्वे का आज आखिरी दिन: विधायक बदलना चाहते हैं या नहीं? जल्दी बताइए यूपी में विधायकों के 4 साल पूरे हो चुके हैं। क्या आपके मौजूदा विधायक को 2027 के विधानसभा चुनाव में टिकट मिलना चाहिए? भास्कर सर्वे में हिस्सा लेकर बताइए… ———————————- ये खबर भी पढ़ें… राजा सुहेलदेव के मेले से राजभर 110 सीटें साधेंगे:3 जातियों को एकजुट करने की तैयारी, बहराइच में पहले गाजी मियां मेला लगता था इस साल बहराइच में 10 जून से महाराजा सुहेलदेव की याद में मेला लगाया जाना है। अब तक महमूद गजनवी के कमांडर सैयद सालार मसूद (गाजी मियां) की कब्र पर मेला लगता रहा है। एक मेले के जरिए भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टी सुभासपा तीन जातियों को अपने पाले में लाना चाह रही है। पूरी खबर पढ़ें…
मूर्तियों की सियासत को लेकर एक और बड़ी खबर 7 अप्रैल को कैबिनेट मीटिंग के बाद सामने आई। भाजपा सरकार दलित महापुरुषों की मूर्तियों के सौंदर्यीकरण के लिए ‘डॉ. बीआर अंबेडकर मूर्ति विकास योजना’ ला रही है। इसके तहत मूर्तियों पर प्रोटेक्टिव कैनोपी या छाता लगाया जाएगा, स्मारक की बाउंड्री वॉल और लाइटिंग भी की जाएगी। योजना में यूपी के सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में 10 महापुरुषों के स्मारक का सौंदर्यीकरण होगा। इसमें डॉ. अंबेडकर, संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले, महर्षि वाल्मीकि जैसे महापुरुष शामिल हैं। हर स्मारक के लिए 10 लाख रुपए दिए जाएंगे। अंबेडकर जयंती पर 14 अप्रैल को योजना के बारे में विस्तार से बताया जाएगा। मूर्ति संरक्षण के बहाने भाजपा उस वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है, जो आम तौर पर मायावती का माना जाता है। इसे 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यूपी के 22% दलित वोट बैंक को जोड़ने का प्रयास माना जा रहा है। मायावती शासन में मूर्तियों का विरोध करती थी सपा
राजेंद्र कुमार बताते हैं- सपा मायावती के शासनकाल में लगी मूर्तियों का विरोध करती रही है। हालांकि, सपा का विरोध इस बात पर ज्यादा था कि मायावती ने अपनी मूर्तियां शहर में लगवाईं। सबसे ज्यादा मूर्तियां मायावती के शासनकाल में ही लगवाई गईं। 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में सपा ने इन मूर्तियों को लेकर चुनाव आयोग से शिकायत भी की थी। सपा का कहना था कि मायावती और बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियां वोट प्रभावित कर सकती हैं। आयोग ने शिकायत को जायज मानते हुए सभी मूर्तियों को प्लास्टिक शीट्स और प्लाई वुड से ढकवा दिया था। राजेंद्र कुमार के मुताबिक, मायावती ने चौराहे और सड़कें घेर करके मूर्तियां लगवाईं। गोमतीनगर के ग्रीन बेल्ट पर पत्थरों का पार्क बनवाया और सड़क के किनारे बड़ी संख्या में मूर्तियां लगवाईं। वहीं, अखिलेश यादव शुरू से ही कहते आ रहे हैं कि वे सत्ता में आए तो रिवर फ्रंट पर महापुरुषों की मूर्तिं लगवाएंगे। इसके पीछे मकसद ये है कि महापुरुषों का नाम भी जुड़ेगा और रिवर फ्रंट का विस्तार भी होगा। अब समझिए मूर्तियां लोगों पर कैसे असर डालती हैं… लोगों पर प्रतीकों के साइकोलॉजिक असर के बारे में मनोचिकित्सक डॉ. प्रीति उपाध्याय कहती हैं कि मूर्तियां या स्मारक लोगों के दिमाग पर गहरा असर डालते हैं। ये कलेक्टिव मेमोरी को ट्रिगर करने का काम करते हैं। ये दिमाग में डोपामाइन एक्टिव करके भावनाओं, व्यवहार और पहचान पर गहरी छाप छोड़ती हैं। मसलन अंबेडकर पार्क के पास से कोई गुजरता है, फिर चाहे वो बसपा विरोधी हो या समर्थक, पार्क पर उसकी नजर जरूर जाती है। पार्क बने कई बरस हो गए, लेकिन लोग आज भी याद करते हैं कि मायावती ने पार्क बनवाया था। डॉ प्रीति बताती हैं कि प्रतीकों की राजनीति वोट प्रभावित करती है। जिस समुदाय के महापुरुष की मूर्ति लगती है, उस समाज के लोगों में आत्मसम्मान और सामूहिक पहचान को मजबूत करती है। उदाहरण के लिए, दलित समुदाय में अंबेडकर या कांशीराम की मूर्तियां ‘दलित गौरव’ का प्रतीक हैं। मायावती के मुख्यमंत्री रहते बनीं डॉ अंबेडकर, कांशीराम और उनकी खुद की मूर्तियां दलित वोट को बसपा की तरफ खींचती है। सर्वसमाज का नेता बनने की कोशिश
सीनियर जर्नलिस्ट सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं- अखिलेश यादव मूर्तियों के जरिए सभी जातियों के सम्मान का संदेश देना चाहते हैं। सपा अपने कोर वोट (यादव-मुस्लिम) के अलावा PDA यानी पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक फॉर्मूले को और मजबूत करना चाहती है। साथ ही कुछ ऊपरी जातियों जैसे राजपूत और ब्राह्मण को भी अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रही है। सिद्धार्थ मानते हैं कि मूर्तिंयां लगाने के बहाने वे रिवर फ्रंट को जातीय एकता का प्रतीक बनाने का प्रयास कर रहे हैं। अखिलेश की कोशिश खुद को सभी समाज का नेता बनाने की है। वो साबित करना चाहते हैं कि सपा जाति आधारित सामाजिक न्याय चाहती है, जबकि भाजपा धार्मिक प्रतीकों पर ज्यादा फोकस करती है। रिवर फ्रंट पर 100 मीटर का झूला लगाने का था प्लान
गोमती रिवर फ्रंट पर दोनों ओर हरियाली, झूले, ओपेन जिम, क्रिकेट पिच बनी है। अखिलेश के समय यहां रिवर क्रूज और वाटर बस चलाने की भी योजना थी। साथ ही लंदन की टेम्स नदी पर बने ‘लंदन आई’ (विशालकाय झूला) की तर्ज पर ‘लखनऊ आई’ बनाने की योजना थी। इसके तहत 100 मीटर ऊंचा झूला लगाया जाना था, जिससे पूरे शहर का दीदार किया जा सके। रिवर फ्रंट पर पहले फेज का काम पूरा ही हुआ था और अखिलेश यादव सत्ता से बाहर हो गए। भाजपा सरकार आई तो रिवर फ्रंट की जांच शुरू हो गई। इससे बाकी प्रोजेक्ट रुक गए। यूपी में विधायकों के सर्वे का आज आखिरी दिन: विधायक बदलना चाहते हैं या नहीं? जल्दी बताइए यूपी में विधायकों के 4 साल पूरे हो चुके हैं। क्या आपके मौजूदा विधायक को 2027 के विधानसभा चुनाव में टिकट मिलना चाहिए? भास्कर सर्वे में हिस्सा लेकर बताइए… ———————————- ये खबर भी पढ़ें… राजा सुहेलदेव के मेले से राजभर 110 सीटें साधेंगे:3 जातियों को एकजुट करने की तैयारी, बहराइच में पहले गाजी मियां मेला लगता था इस साल बहराइच में 10 जून से महाराजा सुहेलदेव की याद में मेला लगाया जाना है। अब तक महमूद गजनवी के कमांडर सैयद सालार मसूद (गाजी मियां) की कब्र पर मेला लगता रहा है। एक मेले के जरिए भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टी सुभासपा तीन जातियों को अपने पाले में लाना चाह रही है। पूरी खबर पढ़ें…