यूपी में कक्षा- 8 तक के करीब 5 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों को मर्ज करने की तैयारी है। ये वो स्कूल हैं, जहां स्टूडेंट की संख्या 50 से कम है। स्कूल शिक्षा महानिदेशक ने ऐसे स्कूलों की रिपोर्ट मांगी है। अकेले सुल्तानपुर जिले में ही 50 से कम छात्र संख्या के 444 स्कूल सामने आए हैं। अगर स्कूल मर्ज हुए, तो जाहिर है कि टीचर के हजारों पद कम हो जाएंगे। इससे भविष्य में भर्ती की उम्मीदों को भी झटका लगेगा। वहीं, सरकार का तर्क है कि ये कदम शिक्षा की बेहतरी के लिए उठाया जा रहा है। लेकिन, शिक्षक संघ इसके विरोध में उतर आए हैं। क्या है पूरा मामला? क्यों ऐसा किया जा रहा? शिक्षक संगठन क्यों विरोध कर रहे? सरकार का क्या तर्क है…इन सवालों का जवाब जानने के लिए पढ़िए पूरी खबर। पहले जानते हैं पूरा मामला क्या है?
बेसिक शिक्षा के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार ने आदेश जारी किया कि 50 से कम स्टूडेंट वाले परिषदीय स्कूलों (कक्षा-8 तक) का विलय करने की प्रक्रिया शुरू की जाए। इसके बाद स्कूल शिक्षा महानिदेशक कंचन वर्मा ने सभी बीएसए से 50 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का ब्योरा मांगा। साथ ही उसके पड़ोस के स्कूल की जानकारी भी मांगी। उन्होंने साफ किया है कि कम छात्र संख्या वाले स्कूल को पड़ोस के किसी स्कूल में विलय किया जाएगा। यह भी देखें कि ऐसे स्कूल के रास्ते में कोई नदी, नाला, हाईवे, रेलवे ट्रैक नहीं होना चाहिए। ऐसा इसलिए, ताकि किसी दुर्घटना की आशंका नहीं रहे। सरकार का क्या तर्क?
सरकार का कहना है कि सभी स्टूडेंट को बेहतर और सुविधापूर्वक शिक्षा देने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा (एनसीएफ) -2020 के तहत स्कूलों के बीच सहयोग, समन्वय और संसाधनों के साझा उपयोग को बढ़ावा देना जरूरी है। जिससे हर स्टूडेंट को सुविधा के साथ बेहतर शिक्षा मिल सके। सरकार की तैयारी क्या है?
हर जिले में एक मुख्यमंत्री अभ्युदय कंपोजिट विद्यालय (कक्षा 1 से 8 तक) खोला जा रहा है। प्रदेश सरकार की ओर से इन स्कूलों को आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और शैक्षणिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। हर स्कूल में कम से कम 450 स्टूडेंट के लिए संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। स्कूल बिल्डिंग को 1.42 करोड़ की लागत से अपग्रेड भी किया जा रहा। स्कूलों में स्मार्ट क्लास, टॉयलेट, फर्नीचर, पुस्तकालय, कंप्यूटर रूम, मिडडे मील किचन, डायनिंग हॉल, सीसीटीवी, वाई-फाई, ओपन जिम और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था की जाएगी। इसी तरह सरकार की ओर से हर जिले में एक मुख्यमंत्री मॉडल कंपोजिट स्कूल (कक्षा 1 से 12 तक) की स्थापना की जा रही है। इस पर करीब 30 करोड़ रुपए की लागत आएगी। इन स्कूलों में कम से कम 1500 छात्रों के लिए स्मार्ट क्लास, एडवांस साइंस लैब, डिजिटल लाइब्रेरी, खेल मैदान, कौशल विकास सुविधाओं की स्थापना की जाएगी। कक्षा 11-12 के लिए विज्ञान, वाणिज्य और कला संकाय की अलग-अलग कक्षाओं का भी प्रावधान किया जाएगा। शिक्षक संघ विरोध क्यों कर रहे?
उत्तर प्रदेश महिला शिक्षक संघ की अध्यक्ष सुलोचना मौर्य का कहना है कि स्कूलों की संख्या कम करने से बच्चों का नुकसान होगा। अभी एक किलोमीटर की दूरी पर ही बच्चे स्कूल नहीं आते। जब एक ग्रामसभा का स्कूल बंद कर दूसरी ग्राम सभा के स्कूल में बच्चों को मर्ज किया जाएगा, तो स्कूल की दूरी और बढ़ जाएगी। गांव में गरीब माता-पिता बच्चों के लिए वैन नहीं लगा सकते। वह सुरक्षा की दृष्टि से भी बच्चों को दूर स्कूल नहीं भेजेंगे। इससे सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों और अभिभावक का होगा। बच्चे पढ़ाई छोड़ देंगे या प्राइवेट स्कूल में एडमिशन लेने को मजबूर होंगे। उत्तर प्रदेश प्राइमरी शिक्षक संघ के अध्यक्ष योगेश त्यागी का कहना है कि सरकार शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और बाल संरक्षण अधिनियम का खुला उल्लंघन कर रही है। संगठन मंत्री महेंद्र कुमार ने बताया कि कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को कंपोजिट स्कूल में तब्दील करने से शिक्षकों को बड़ा नुकसान होगा। उनका कहना है कि प्रधानाध्यापक के पद कम होने से शिक्षकों में प्रमोशन के अवसर कम हो जाएंगे। एक सहायक अध्यापक जीवनभर सेवा के बाद भी सहायक अध्यापक पद से ही रिटायर हो जाएगा। इन आंकड़ों पर भी नजर डालिए 28 हजार प्राइमरी स्कूल पहले कम हुए
साल 2017-18 में बेसिक शिक्षा परिषद के 1.58 लाख से अधिक स्कूल थे। इनमें 1 लाख 13 हजार 289 प्राइमरी स्कूल थे। कंपोजिट विद्यालयों के गठन के लिए कम छात्र संख्या वाले करीब 28 हजार स्कूलों को पड़ोस के स्कूल में मर्ज किया गया। इससे 28 हजार प्रधानाध्यापक के पद सीधे-सीधे कम हो गए। वहीं, छात्र-शिक्षक अनुपात के लिहाज से हजारों टीचर भी सरप्लस हो गए। 70 फीसदी हेड मास्टर स्थायी नहीं
उत्तर प्रदेश शैक्षिक महासंघ के संगठन मंत्री महेंद्र कुमार ने बताया कि परिषदीय स्कूलों में करीब एक दशक से प्रधानाध्यापक के पद पर पदोन्नति नहीं हुई है। 70 फीसदी से ज्यादा स्कूलों में कार्यवाहक हेडमास्टर हैं। कार्यवाहक हेडमास्टरों को कोई अतिरिक्त भत्ता नहीं दिया जाता। 42 लाख छात्र भी कम हो गए
बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों में 2017-18 में करीब 1.37 करोड़ स्टूडेंट थे। योगी सरकार की ओर से हर साल ‘स्कूल चलो अभियान’ चलाकर नामांकन संख्या बढ़ाई गई। कोरोना महामारी के दौरान जब ग्रामीणों के पास प्राइवेट स्कूलों में फीस जमा करने के लिए पैसे नहीं थे, तो उन्होंने भी अपने बच्चों का सरकारी स्कूलों में दाखिला कराया। 2021-22 में स्टूडेंट की संख्या 1.91 करोड़ तक पहुंच गई। लेकिन, बीते 3 साल में लगातार ये संख्या घटती चली गई। आलम यह है कि अब ये संख्या 1.49 करोड़ रह गई है। जानकार मानते हैं कि करीब 28 हजार प्राथमिक स्कूलों को कंपोजिट स्कूल में तब्दील करने से भी छात्रों की संख्या कम हुई है। महकमे के अधिकारी कहते हैं कि शिक्षकों की ओर से नामांकन बढ़ाने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधार में दिलचस्पी नहीं ली जाती है। इस वजह से बच्चे स्कूल छोड़कर चले जाते हैं। जबकि सरकार हर संभव सहायता और सभी सुविधाएं दे रही है। हालांकि इस पूरे मामले में स्कूल शिक्षा महानिदेशक कंचन वर्मा का कहना है हम रिसोर्स रि-यूटीलाइज कर रहे हैं वह भी सहमति से, स्कूल बंद करने की बात नहीं है। ————————- ये खबर भी पढ़ें- भास्कर गंगा यात्रा…यूपी में गंगा को मैली कर रही काली नदी, इत्र नगरी में सीवेज, औद्योगिक कचरा और केमिकल बढ़ा रहे प्रदूषण, पार्ट-3 कन्नौज शहर से 15 किलोमीटर दूर है मेहंदीघाट। एक तरफ शव जल रहे, दूसरी तरफ काली नदी और गंगा के संगम पर लोग स्नान कर रहे। गंगा स्नान कर रहे लोगों के चेहरे के भाव बता रहे हैं कि मजबूरी में उन्हें ऐसा करना पड़ रहा। दरअसल, काली नदी, जो कभी नागिन की तरह लहराती थी, कालिंदी बनकर गंगा को गले लगाती थी। आज नाले की तरह सिसक रही है। यहां काली नदी का काला, बदबूदार जल और गंगा की मटमैली धारा एक-दूसरे से लिपटते हैं। मानो दोनों अपनी व्यथा साझा कर रही हों। पढ़ें पूरी खबर
बेसिक शिक्षा के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार ने आदेश जारी किया कि 50 से कम स्टूडेंट वाले परिषदीय स्कूलों (कक्षा-8 तक) का विलय करने की प्रक्रिया शुरू की जाए। इसके बाद स्कूल शिक्षा महानिदेशक कंचन वर्मा ने सभी बीएसए से 50 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का ब्योरा मांगा। साथ ही उसके पड़ोस के स्कूल की जानकारी भी मांगी। उन्होंने साफ किया है कि कम छात्र संख्या वाले स्कूल को पड़ोस के किसी स्कूल में विलय किया जाएगा। यह भी देखें कि ऐसे स्कूल के रास्ते में कोई नदी, नाला, हाईवे, रेलवे ट्रैक नहीं होना चाहिए। ऐसा इसलिए, ताकि किसी दुर्घटना की आशंका नहीं रहे। सरकार का क्या तर्क?
सरकार का कहना है कि सभी स्टूडेंट को बेहतर और सुविधापूर्वक शिक्षा देने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा (एनसीएफ) -2020 के तहत स्कूलों के बीच सहयोग, समन्वय और संसाधनों के साझा उपयोग को बढ़ावा देना जरूरी है। जिससे हर स्टूडेंट को सुविधा के साथ बेहतर शिक्षा मिल सके। सरकार की तैयारी क्या है?
हर जिले में एक मुख्यमंत्री अभ्युदय कंपोजिट विद्यालय (कक्षा 1 से 8 तक) खोला जा रहा है। प्रदेश सरकार की ओर से इन स्कूलों को आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और शैक्षणिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। हर स्कूल में कम से कम 450 स्टूडेंट के लिए संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। स्कूल बिल्डिंग को 1.42 करोड़ की लागत से अपग्रेड भी किया जा रहा। स्कूलों में स्मार्ट क्लास, टॉयलेट, फर्नीचर, पुस्तकालय, कंप्यूटर रूम, मिडडे मील किचन, डायनिंग हॉल, सीसीटीवी, वाई-फाई, ओपन जिम और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था की जाएगी। इसी तरह सरकार की ओर से हर जिले में एक मुख्यमंत्री मॉडल कंपोजिट स्कूल (कक्षा 1 से 12 तक) की स्थापना की जा रही है। इस पर करीब 30 करोड़ रुपए की लागत आएगी। इन स्कूलों में कम से कम 1500 छात्रों के लिए स्मार्ट क्लास, एडवांस साइंस लैब, डिजिटल लाइब्रेरी, खेल मैदान, कौशल विकास सुविधाओं की स्थापना की जाएगी। कक्षा 11-12 के लिए विज्ञान, वाणिज्य और कला संकाय की अलग-अलग कक्षाओं का भी प्रावधान किया जाएगा। शिक्षक संघ विरोध क्यों कर रहे?
उत्तर प्रदेश महिला शिक्षक संघ की अध्यक्ष सुलोचना मौर्य का कहना है कि स्कूलों की संख्या कम करने से बच्चों का नुकसान होगा। अभी एक किलोमीटर की दूरी पर ही बच्चे स्कूल नहीं आते। जब एक ग्रामसभा का स्कूल बंद कर दूसरी ग्राम सभा के स्कूल में बच्चों को मर्ज किया जाएगा, तो स्कूल की दूरी और बढ़ जाएगी। गांव में गरीब माता-पिता बच्चों के लिए वैन नहीं लगा सकते। वह सुरक्षा की दृष्टि से भी बच्चों को दूर स्कूल नहीं भेजेंगे। इससे सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों और अभिभावक का होगा। बच्चे पढ़ाई छोड़ देंगे या प्राइवेट स्कूल में एडमिशन लेने को मजबूर होंगे। उत्तर प्रदेश प्राइमरी शिक्षक संघ के अध्यक्ष योगेश त्यागी का कहना है कि सरकार शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और बाल संरक्षण अधिनियम का खुला उल्लंघन कर रही है। संगठन मंत्री महेंद्र कुमार ने बताया कि कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को कंपोजिट स्कूल में तब्दील करने से शिक्षकों को बड़ा नुकसान होगा। उनका कहना है कि प्रधानाध्यापक के पद कम होने से शिक्षकों में प्रमोशन के अवसर कम हो जाएंगे। एक सहायक अध्यापक जीवनभर सेवा के बाद भी सहायक अध्यापक पद से ही रिटायर हो जाएगा। इन आंकड़ों पर भी नजर डालिए 28 हजार प्राइमरी स्कूल पहले कम हुए
साल 2017-18 में बेसिक शिक्षा परिषद के 1.58 लाख से अधिक स्कूल थे। इनमें 1 लाख 13 हजार 289 प्राइमरी स्कूल थे। कंपोजिट विद्यालयों के गठन के लिए कम छात्र संख्या वाले करीब 28 हजार स्कूलों को पड़ोस के स्कूल में मर्ज किया गया। इससे 28 हजार प्रधानाध्यापक के पद सीधे-सीधे कम हो गए। वहीं, छात्र-शिक्षक अनुपात के लिहाज से हजारों टीचर भी सरप्लस हो गए। 70 फीसदी हेड मास्टर स्थायी नहीं
उत्तर प्रदेश शैक्षिक महासंघ के संगठन मंत्री महेंद्र कुमार ने बताया कि परिषदीय स्कूलों में करीब एक दशक से प्रधानाध्यापक के पद पर पदोन्नति नहीं हुई है। 70 फीसदी से ज्यादा स्कूलों में कार्यवाहक हेडमास्टर हैं। कार्यवाहक हेडमास्टरों को कोई अतिरिक्त भत्ता नहीं दिया जाता। 42 लाख छात्र भी कम हो गए
बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों में 2017-18 में करीब 1.37 करोड़ स्टूडेंट थे। योगी सरकार की ओर से हर साल ‘स्कूल चलो अभियान’ चलाकर नामांकन संख्या बढ़ाई गई। कोरोना महामारी के दौरान जब ग्रामीणों के पास प्राइवेट स्कूलों में फीस जमा करने के लिए पैसे नहीं थे, तो उन्होंने भी अपने बच्चों का सरकारी स्कूलों में दाखिला कराया। 2021-22 में स्टूडेंट की संख्या 1.91 करोड़ तक पहुंच गई। लेकिन, बीते 3 साल में लगातार ये संख्या घटती चली गई। आलम यह है कि अब ये संख्या 1.49 करोड़ रह गई है। जानकार मानते हैं कि करीब 28 हजार प्राथमिक स्कूलों को कंपोजिट स्कूल में तब्दील करने से भी छात्रों की संख्या कम हुई है। महकमे के अधिकारी कहते हैं कि शिक्षकों की ओर से नामांकन बढ़ाने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधार में दिलचस्पी नहीं ली जाती है। इस वजह से बच्चे स्कूल छोड़कर चले जाते हैं। जबकि सरकार हर संभव सहायता और सभी सुविधाएं दे रही है। हालांकि इस पूरे मामले में स्कूल शिक्षा महानिदेशक कंचन वर्मा का कहना है हम रिसोर्स रि-यूटीलाइज कर रहे हैं वह भी सहमति से, स्कूल बंद करने की बात नहीं है। ————————- ये खबर भी पढ़ें- भास्कर गंगा यात्रा…यूपी में गंगा को मैली कर रही काली नदी, इत्र नगरी में सीवेज, औद्योगिक कचरा और केमिकल बढ़ा रहे प्रदूषण, पार्ट-3 कन्नौज शहर से 15 किलोमीटर दूर है मेहंदीघाट। एक तरफ शव जल रहे, दूसरी तरफ काली नदी और गंगा के संगम पर लोग स्नान कर रहे। गंगा स्नान कर रहे लोगों के चेहरे के भाव बता रहे हैं कि मजबूरी में उन्हें ऐसा करना पड़ रहा। दरअसल, काली नदी, जो कभी नागिन की तरह लहराती थी, कालिंदी बनकर गंगा को गले लगाती थी। आज नाले की तरह सिसक रही है। यहां काली नदी का काला, बदबूदार जल और गंगा की मटमैली धारा एक-दूसरे से लिपटते हैं। मानो दोनों अपनी व्यथा साझा कर रही हों। पढ़ें पूरी खबर