‘एक हजार साल पहले जो शौर्य महाराज सुहेलदेव ने दिखाया था, उसे सभी को जानना चाहिए। उन्होंने सोमनाथ मंदिर को तोड़ने वाले विदेशी आक्रांता को सिर्फ रोका ही नहीं, बल्कि ऐसी निर्मम मौत दी कि किसी की दोबारा ऐसा करने की हिम्मत नहीं हुई। सालार मसूद (गाजी मियां) माफिया से कम नहीं था। अभी जो माफिया मिट्टी में मिल गए हैं, उनका ही एक रूप था। उसने हमारे मंदिर तोड़े थे। महाराज सुहेलदेव ने उसे ऐसी मौत दी थी, जो इस्लाम में सबसे खराब मानी जाती है। गर्म लोहे के तवे पर बांधा और जला दिया।’ यह बात सीएम योगी ने रविवार को लखनऊ में कही। योगी भारतेंदु नाट्य अकादमी (बीएनए) के स्थापना की स्वर्ण जयंती समारोह पर बोल रहे थे। समारोह 12 अप्रैल तक चलेगा। उन्होंने अकादमी के भवन और दो प्रेक्षागृहों का लोकार्पण किया। कलाकारों और छात्रों को सम्मानित किया। ‘रंगभेद’ पत्रिका का विमोचन किया। योगी ने कहा- माना जाता है कि इस्लाम में इस प्रकार की मौत जहन्नुम में जाने की गारंटी होती है। महाराज सुहेलदेव ने उसे जहन्नुम भेजने की गारंटी दी थी। जब तक अत्याचारी के साथ इस प्रकार का व्यवहार नहीं करेंगे, वह भारत की संस्कृति से इसी प्रकार का व्यवहार करता रहेगा। तस्वीरें देखिए- योगी के भाषण की बड़ी बातें- 1. ‘हम अपने नायकों को सम्मान देने पर परहेज करते हैं’
योगी ने कहा- हमारी समस्या क्या है? हम अपने नायकों को सम्मान देने पर परहेज करते हैं। यही कारण है कि एक वक्त समाज के नायकों को खलनायक के रूप में पेश किया गया। खलनायकों को हीरो बताया गया। इसका परिणाम हुआ कि समाज में उसी तरह के चरित्र सामने आते दिखाई दिए। 2. ‘दुनिया का सबसे लोकप्रिय सीरियल रामायण है’
योगी ने फिल्म ‘धुरंधर’ और विपक्षी नेताओं का नाम लिए बिना कहा- एक समय हमारे संस्थानों पर ऐसे लोगों को कब्जा हो गया था। जो पेशवर गुंडे-माफिया को नायक को रूप में पेश करते थे। आज सिनेमा सच्चाई दिखा रहा है। आज सिनेमा अच्छा करने की कोशिश कर रहा है। समाज भी उस अच्छाई को वैसे ही देख रहा है। समाज की संवेदनाएं देखनी है तो रामायण सीरियल को ले लीजिए। दुनिया का सबसे लोकप्रिय सीरियल रामायण ही है। उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती। भारतीय समाज अपनी परंपरा और विरासत को सम्मान देना जानता है। 3. ‘जहां सालार मसूद को मारा था, वहां उसके नाम पर मेला लगता था’
भारतीय समाज ने महाराजा सुहेलदेव को भुला दिया। हमारी सरकार ने उनका स्मारक बनवाया। ये गुलामी नहीं तो क्या है? जिस स्थान पर महाराज ने सालार मसूद को मारा था, उस स्थान पर मसूद मेला लगता था। सुहेलदेव का कोई जिक्र नहीं था। महाराज के योगदान को कोई याद ही नहीं करता था। लेकिन, अब लोग महाराज सुहेलदेव के स्मारक पर जाते हैं। 4. ‘गोरखपुर का सांसद रहते महाराजा सुहेलदेव के लिए कार्यक्रम कराया’
जब मैं गोरखपुर से सांसद था। महाराजा सुहेलदेव के विजयोत्सव पर बहराइच में हमने कार्यक्रम का आयोजन कराया था। मैं वहां जा रहा था, तो प्रशासन ने रोकने का प्रयास किया। फिर भी मैं गया। उस वक्त कार्यक्रम में इनती भीड़ नहीं थी। सालार मसूद के मेले में भारी संख्या में लोग जा रहे थे। जो तुम्हें रौंदने आया था, उसके मेले को क्यों जा रहे थे? लेकिन, अब समय बदल गया है। आज मुझे अच्छा लगता है। भीड़ अब उल्टा महाराज सुहेलदेव के स्मारक में जाती है। सालार मसूद के मेले में कोई झांकने नहीं जाता। 5. ‘भारतीय संस्कृति को रौंदने वालों को सम्मान नहीं मिलना चाहिए’
महाराजा सुहेलदेव पर कोई नाट्य नहीं, कोई संगीत नहीं है। हमें उनके ऊपर बनाना चाहिए। वीरांगना अवंतीबाई, वीरांगना उदादेवी, वीरांगना झलकारी बाई, महाराजा बिजली पासी के ऊपर संगीत, नाटक बनने चाहिएं। नाट्य अकादमी को लघु नाटक बनाने चाहिएं। जिससे बच्चे इन्हें अपने नायक मानेंगे। जिन खलनायकों ने भारत की संस्कृति को रौंदा, उन्हें कभी भी सम्मान नहीं मिलना चाहिए। 6. सरकार में संवेदना होती है तो लड़ते-लड़ते बीमारी भगा देती है
वंदे मातरम् गीत बताता है कि राष्ट्रभक्ति और स्वराज का क्या महत्व है? विदेशी हुकूमत ने बंगाल के अकाल को हल्केपन से लिया था। लोग भूखों मर रहे थे, स्पेनिश फ्लू का शिकार हो रहे थे। लेकिन, अंग्रेज सरकार के कान पर जूं नहीं रेंग रही थी। 1921 के जनगणना के आंकड़े रोंगटे खड़े करने वाले थे। उस दशक में भारत की आबादी बढ़ने की बजाय घटी। 30 करोड़ से कम आबादी वाले भारत में स्पेनिस फ्लू से 3 करोड़ से अधिक लोग मरे थे। विदेशी हुकूमत तब भी लगान, लूट और अत्याचार कर रही थी। सीएम ने कोरोना महामारी के हालात का जिक्र करते हुए सरकार के सकारात्मक रवैये को भी गिनाया। कहा- जब सरकार में संवेदना होती है तो वह लड़ते-लड़ते बीमारी को भी भगा देती है। सरकार जब संवेदनाओं से भरपूर होती है तो नागरिकों के हितों की रक्षा करती है। उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने बंगाल के अकाल-त्रासदी को लेकर यह उपन्यास रचा था। उसके बाद अलग-अलग कालखंड में देश को त्रासदी झेलनी पड़ी। लेकिन, सरकार के स्तर पर प्रयास नहीं हुए। सीएम ने कहा कि अकाल में बंगाल और वहां के लोगों की स्थिति का दर्द इस उपन्यास में बयां किया गया।
महाराज सुहेलदेव की कहानी… महाराजा सुहेलदेव का जन्म 990 ईस्वी में श्रावस्ती में हुआ था। 17वीं शताब्दी में लिखी गई फारसी भाषा के मिरात-ए-मसूदी के अनुसार, सुहेलदेव श्रावस्ती के राजा मोरध्वज के सबसे बड़े पुत्र थे। पौराणिक कथाओं के विभिन्न संस्करणों में उन्हें सकरदेव, सुहीरध्वज, सुहरीदिल, सुहरीदलध्वज, राय सुह्रिद देव, सुसज और सुहारदल समेत विभिन्न नामों से जाना जाता है। अवध गजेटियर के अनुसार, उनका शासनकाल 1027 से 1077 ईस्वी तक रहा। उनका राज्य मुख्य रूप से बहराइच और श्रावस्ती जिलों में फैला था। जिसका विस्तार पूर्व में गोरखपुर और पश्चिम में सीतापुर तक बताया जाता है। बहराइच के केवी इंटर कॉलेज पयागपुर के पूर्व प्रवक्ता परमेश्वर सिंह ने 8 साल पहले महाराजा सुहेलदेव के बारे में डिटेल जानकारी दी थी। उनके मुताबिक, बहराइच शहर से करीब 3 किलोमीटर उत्तर की ओर एक विशाल सूर्यकुंड व भव्य सूर्य मंदिर था। वहीं पर बालार्क ऋषि नाम के महात्मा रहते थे। वह महाराजा सुहेलदेव के गुरु थे। सुहेलदेव को धनुष विद्या, शब्दभेदी बाण चलाना, तलवार चलाना, गदा और भाला फेंकने में विशेष दक्षता प्राप्त थी। उनको नदी में तैरने का भी शौक था। शेरों का शिकार तीर और तलवार से करना उनके लिए एक साधारण सी बात थी। गुरु के आदेशानुसार 25 साल की आयु तक इनकी माता के अलावा कोई भी महिला इनके करीब नहीं आ सकी। वह उच्च कोटि के शासक थे। इनके समय में लोग घरों में ताला लगाने की जरूरत नहीं समझते थे। उन्होंने श्रावस्ती नगर को सुंदर रूप दिया था। झील किनारे बनाया गया महाराजा सुहेलदेव का स्मारक बहराइच जिला मुख्यालय से 8 किमी दूर गोंडा रोड पर चित्तौरा झील है। झील के किनारे महाराजा सुहेलदेव का स्मारक बनाया गया है। यहां कांस्य से बनी महाराज सुहेलदेव की 40 फीट ऊंची प्रतिमा लगाई गई है। दावा है कि यह प्रतिमा देश की सबसे बड़ी दो पैरों पर खड़े घोड़े पर सवार महाराजा सुहेलदेव की प्रतिमा है। इस प्रतिमा का निर्माण उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी की देख-रेख में हुआ। इसे मूर्तिकार पद्मश्री रामसुतार ने बनाया। स्मारक का पीएम नरेंद्र मोदी ने 16 फरवरी, 2021 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से शिलान्यास किया था। अब जानिए सैयद सालार मसूद गाजी के बारे में… —————————- अब भास्कर के सबसे बड़े सर्वे में हिस्सा लीजिए…
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योगी ने कहा- हमारी समस्या क्या है? हम अपने नायकों को सम्मान देने पर परहेज करते हैं। यही कारण है कि एक वक्त समाज के नायकों को खलनायक के रूप में पेश किया गया। खलनायकों को हीरो बताया गया। इसका परिणाम हुआ कि समाज में उसी तरह के चरित्र सामने आते दिखाई दिए। 2. ‘दुनिया का सबसे लोकप्रिय सीरियल रामायण है’
योगी ने फिल्म ‘धुरंधर’ और विपक्षी नेताओं का नाम लिए बिना कहा- एक समय हमारे संस्थानों पर ऐसे लोगों को कब्जा हो गया था। जो पेशवर गुंडे-माफिया को नायक को रूप में पेश करते थे। आज सिनेमा सच्चाई दिखा रहा है। आज सिनेमा अच्छा करने की कोशिश कर रहा है। समाज भी उस अच्छाई को वैसे ही देख रहा है। समाज की संवेदनाएं देखनी है तो रामायण सीरियल को ले लीजिए। दुनिया का सबसे लोकप्रिय सीरियल रामायण ही है। उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती। भारतीय समाज अपनी परंपरा और विरासत को सम्मान देना जानता है। 3. ‘जहां सालार मसूद को मारा था, वहां उसके नाम पर मेला लगता था’
भारतीय समाज ने महाराजा सुहेलदेव को भुला दिया। हमारी सरकार ने उनका स्मारक बनवाया। ये गुलामी नहीं तो क्या है? जिस स्थान पर महाराज ने सालार मसूद को मारा था, उस स्थान पर मसूद मेला लगता था। सुहेलदेव का कोई जिक्र नहीं था। महाराज के योगदान को कोई याद ही नहीं करता था। लेकिन, अब लोग महाराज सुहेलदेव के स्मारक पर जाते हैं। 4. ‘गोरखपुर का सांसद रहते महाराजा सुहेलदेव के लिए कार्यक्रम कराया’
जब मैं गोरखपुर से सांसद था। महाराजा सुहेलदेव के विजयोत्सव पर बहराइच में हमने कार्यक्रम का आयोजन कराया था। मैं वहां जा रहा था, तो प्रशासन ने रोकने का प्रयास किया। फिर भी मैं गया। उस वक्त कार्यक्रम में इनती भीड़ नहीं थी। सालार मसूद के मेले में भारी संख्या में लोग जा रहे थे। जो तुम्हें रौंदने आया था, उसके मेले को क्यों जा रहे थे? लेकिन, अब समय बदल गया है। आज मुझे अच्छा लगता है। भीड़ अब उल्टा महाराज सुहेलदेव के स्मारक में जाती है। सालार मसूद के मेले में कोई झांकने नहीं जाता। 5. ‘भारतीय संस्कृति को रौंदने वालों को सम्मान नहीं मिलना चाहिए’
महाराजा सुहेलदेव पर कोई नाट्य नहीं, कोई संगीत नहीं है। हमें उनके ऊपर बनाना चाहिए। वीरांगना अवंतीबाई, वीरांगना उदादेवी, वीरांगना झलकारी बाई, महाराजा बिजली पासी के ऊपर संगीत, नाटक बनने चाहिएं। नाट्य अकादमी को लघु नाटक बनाने चाहिएं। जिससे बच्चे इन्हें अपने नायक मानेंगे। जिन खलनायकों ने भारत की संस्कृति को रौंदा, उन्हें कभी भी सम्मान नहीं मिलना चाहिए। 6. सरकार में संवेदना होती है तो लड़ते-लड़ते बीमारी भगा देती है
वंदे मातरम् गीत बताता है कि राष्ट्रभक्ति और स्वराज का क्या महत्व है? विदेशी हुकूमत ने बंगाल के अकाल को हल्केपन से लिया था। लोग भूखों मर रहे थे, स्पेनिश फ्लू का शिकार हो रहे थे। लेकिन, अंग्रेज सरकार के कान पर जूं नहीं रेंग रही थी। 1921 के जनगणना के आंकड़े रोंगटे खड़े करने वाले थे। उस दशक में भारत की आबादी बढ़ने की बजाय घटी। 30 करोड़ से कम आबादी वाले भारत में स्पेनिस फ्लू से 3 करोड़ से अधिक लोग मरे थे। विदेशी हुकूमत तब भी लगान, लूट और अत्याचार कर रही थी। सीएम ने कोरोना महामारी के हालात का जिक्र करते हुए सरकार के सकारात्मक रवैये को भी गिनाया। कहा- जब सरकार में संवेदना होती है तो वह लड़ते-लड़ते बीमारी को भी भगा देती है। सरकार जब संवेदनाओं से भरपूर होती है तो नागरिकों के हितों की रक्षा करती है। उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने बंगाल के अकाल-त्रासदी को लेकर यह उपन्यास रचा था। उसके बाद अलग-अलग कालखंड में देश को त्रासदी झेलनी पड़ी। लेकिन, सरकार के स्तर पर प्रयास नहीं हुए। सीएम ने कहा कि अकाल में बंगाल और वहां के लोगों की स्थिति का दर्द इस उपन्यास में बयां किया गया।
महाराज सुहेलदेव की कहानी… महाराजा सुहेलदेव का जन्म 990 ईस्वी में श्रावस्ती में हुआ था। 17वीं शताब्दी में लिखी गई फारसी भाषा के मिरात-ए-मसूदी के अनुसार, सुहेलदेव श्रावस्ती के राजा मोरध्वज के सबसे बड़े पुत्र थे। पौराणिक कथाओं के विभिन्न संस्करणों में उन्हें सकरदेव, सुहीरध्वज, सुहरीदिल, सुहरीदलध्वज, राय सुह्रिद देव, सुसज और सुहारदल समेत विभिन्न नामों से जाना जाता है। अवध गजेटियर के अनुसार, उनका शासनकाल 1027 से 1077 ईस्वी तक रहा। उनका राज्य मुख्य रूप से बहराइच और श्रावस्ती जिलों में फैला था। जिसका विस्तार पूर्व में गोरखपुर और पश्चिम में सीतापुर तक बताया जाता है। बहराइच के केवी इंटर कॉलेज पयागपुर के पूर्व प्रवक्ता परमेश्वर सिंह ने 8 साल पहले महाराजा सुहेलदेव के बारे में डिटेल जानकारी दी थी। उनके मुताबिक, बहराइच शहर से करीब 3 किलोमीटर उत्तर की ओर एक विशाल सूर्यकुंड व भव्य सूर्य मंदिर था। वहीं पर बालार्क ऋषि नाम के महात्मा रहते थे। वह महाराजा सुहेलदेव के गुरु थे। सुहेलदेव को धनुष विद्या, शब्दभेदी बाण चलाना, तलवार चलाना, गदा और भाला फेंकने में विशेष दक्षता प्राप्त थी। उनको नदी में तैरने का भी शौक था। शेरों का शिकार तीर और तलवार से करना उनके लिए एक साधारण सी बात थी। गुरु के आदेशानुसार 25 साल की आयु तक इनकी माता के अलावा कोई भी महिला इनके करीब नहीं आ सकी। वह उच्च कोटि के शासक थे। इनके समय में लोग घरों में ताला लगाने की जरूरत नहीं समझते थे। उन्होंने श्रावस्ती नगर को सुंदर रूप दिया था। झील किनारे बनाया गया महाराजा सुहेलदेव का स्मारक बहराइच जिला मुख्यालय से 8 किमी दूर गोंडा रोड पर चित्तौरा झील है। झील के किनारे महाराजा सुहेलदेव का स्मारक बनाया गया है। यहां कांस्य से बनी महाराज सुहेलदेव की 40 फीट ऊंची प्रतिमा लगाई गई है। दावा है कि यह प्रतिमा देश की सबसे बड़ी दो पैरों पर खड़े घोड़े पर सवार महाराजा सुहेलदेव की प्रतिमा है। इस प्रतिमा का निर्माण उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी की देख-रेख में हुआ। इसे मूर्तिकार पद्मश्री रामसुतार ने बनाया। स्मारक का पीएम नरेंद्र मोदी ने 16 फरवरी, 2021 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से शिलान्यास किया था। अब जानिए सैयद सालार मसूद गाजी के बारे में… —————————- अब भास्कर के सबसे बड़े सर्वे में हिस्सा लीजिए…
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