आज से पढ़िए नई सीरीज ‘राजनीति की रंगभूमि’। ये सीरीज उत्तर प्रदेश की उस सियासी ‘महाभारत’ की कहानी कहती है, जहां नेताओं की हर चाल एक नया अध्याय रचती है। पढ़िए विचारधारा के टकराने, रिश्ते बदलने, गुट बनने-टूटने और सत्ता की बिसात पर नए दांव की कहानियां। पहले एपिसोड में राज नारायण V/S इंदिरा गांधी की कहानी। क्यों इंदिरा के लिए परेशानी का सबब थे राज नारायण? वो राज नारायण जिनकी वजह से इंदिरा अयोग्य साबित हुईं, चुनाव हारीं और देश ने देखी इमरजेंसी… दिसंबर, 1970 की वो रात दिल्ली की हड्डियों में कंपकंपी पैदा कर रही थी। राष्ट्रपति भवन के भीतर जो लावा उबल रहा था, उसने पूरे देश की राजनीति को झुलसा दिया। अचानक खबर आई- ‘लोकसभा भंग हुई। वक्त से एक साल पहले चुनाव होंगे।’ विपक्ष के खेमे में जैसे किसी ने बम फेंक दिया हो। सिगार के धुएं से भरे एक गुप्त कमरे में कुछ नेता जमा हुए। एक नेता ने धुएं का छल्ला छोड़ते हुए कहा- “मैडम ने मास्टरस्ट्रोक खेला है।” दूसरे नेता ने कड़ककर जवाब दिया- “अकेले लड़ेंगे तो गाजर-मूली की तरह काट दिए जाएंगे।” “तो फिर रास्ता क्या है?” तीसरे ने पूछा। सबकी निगाहें एक-दूसरे से मिलीं और एक ही आवाज निकली, मिलकर लड़ेंगे। दरअसल, 1969 में कांग्रेस के सीनियर नेताओं की जब इंदिरा गांधी से नहीं पटी तो उन्होंने इंदिरा को कांग्रेस से बाहर कर दिया। इसके साथ ही कांग्रेस में दो फाड़ हो गए। इंदिरा के समर्थन वाला खेमा कहलाया कांग्रेस (R)… R मतलब रिवोल्यूशनरी। वहीं, पार्टी के पुराने नेतृत्व वाले गुट को नाम मिला कांग्रेस (O) मतलब कांग्रेस ऑर्गनाइजेशन। दोनों गुट एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़े। कांग्रेस (O) का निशान ‘चरखा चलाती हुई महिला’ था और इंदिरा गुट को ‘गाय और बछड़ा’ चिह्न दिया मिला। लड़ाई अपने गुट को असली कांग्रेस साबित करने की थी। चुनाव का ऐलान होते ही कांग्रेस (O), जनसंघ और सोशलिस्ट सबने हाथ मिला लिए। 29 दिसंबर की सुबह। प्रेस कॉन्फ्रेंस का हॉल खचाखच भरा था। इंदिरा गांधी मंच पर आईं। तभी एक पत्रकार ने विस्फोटक सवाल किया- “मैडम पीएम, चर्चा है कि आप रायबरेली छोड़कर गुड़गांव से चुनाव लड़ेंगी?” हॉल में ऐसी खामोशी छाई कि सुई गिरे तो आवाज हो जाए। इंदिरा ने सीधे कहा- “नहीं…।” पत्रकार ने फिर पूछा- “क्या कोई खास वजह?” सपाट लहजे में जवाब आया- “मैं ऐसा नहीं कर रही हूं, बस इतना ही काफी है।” 19 जनवरी 1971, विपक्ष की एक और गुप्त बैठक में सन्नाटा पसरा था। सवाल बड़ा था, रायबरेली में इंदिरा के सामने बलि का बकरा कौन बनेगा? तभी एक नाम गूंजा- राज नारायण…। एक नेता ने मेज थपथपाते हुए कहा- “यही वो आदमी है जो सत्ता की नींद उड़ा सकता है।” दूसरे ने टोकते हुए पूछा- “क्या वो तैयार होंगे?” “वो हार से नहीं डरते, उन्हें तो बस लड़ने का जुनून चाहिए।” एक आवाज आई। मुकाबला तय हो गया- राज नारायण V/S इंदिरा गांधी। अब ये चुनाव नहीं, एक महायुद्ध बन चुका था। अगले ही दिन कोयंबटूर के विशाल मंच पर इंदिरा गांधी गरज रही थीं। जब उन्होंने राज नारायण का नाम सुना, तो उनके होंठों पर एक तंजिया मुस्कान तैर गई। इंदिरा ने माइक संभाला और सीधा वार किया- “विपक्ष के पास कोई चेहरा नहीं है।” भीड़ से आवाज आई- “और राज नारायण…?” इंदिरा ने व्यंग्य किया- “रायबरेली में उन्होंने एक ऐसे शख्स को उतारा है, जिसकी राजनीति आलोचना की बैसाखियों पर टिकी है। उन्हें बस शोर मचाने का शौक है। वे केवल नेहरूजी के खिलाफ बोलते रहते हैं।” 7 मार्च, 1971 को वोटिंग हुई। उन दिनों EVM नहीं थी, बैलेट पेपर की गिनती का दौर कई दिनों तक चलता था। राज नारायण का कॉन्फिडेंस ऐसा था कि गिनती शुरू होने से पहले ही 8 मार्च को उन्होंने रायबरेली में ‘विजय जुलूस’ निकाल दिया। राज नारायण चिल्ला रहे थे- “जनता का शुक्रिया, ये लोकतंत्र की जीत है…।” 10 मार्च की सुबह जब गिनती शुरू हुई, तो पासा पलट गया। कांग्रेस (R) की ऐसी आंधी चली कि राज नारायण के पैरों तले जमीन खिसक गई। नतीजा आया, इंदिरा को मिले 1,83,309 वोट और राज नारायण को 71,499…। 1.10 लाख से ज्यादा वोटों का फासला। राज नारायण के लिए ये हार नहीं, एक सदमा था। वे बुदबुदाए- “ये नहीं हो सकता… जो जनता जुलूस में साथ थी, उसने वोट किसे दिया?” यहीं से उस गॉसिप ने जन्म लिया जिसने आगे चलकर इतिहास बदल दिया। रायबरेली की गलियों में ‘जादुई स्याही’ की खुसफुसाहट फैल रही थी। एक समर्थक ने राज नारायण से कहा- “नेताजी, ये वोट का नहीं, केमिकल का खेल है।” राज नारायण ने चौंककर पूछा- “क्या मतलब?” समर्थक बोला- “सुना है बैलेट पेपर पर जादुई स्याही लगी थी। वोटर जहां मुहर लगाता, वो निशान गायब हो जाता है और गिनती से पहले कांग्रेस के निशान वाली मुहर अपने आप उभर आती है।” राज नारायण बोले- “अगर ये सच है, तो मैं इस स्याही को अदालत तक खींच ले जाऊंगा।” यही वो शक था, जिसने उस ऐतिहासिक अदालती लड़ाई की नींव रखी। हार का जख्म अभी ताजा था और दिमाग में ‘गायब होने वाली स्याही’ का भूत सवार था। अप्रैल 1971 की दोपहर। राज नारायण इलाहाबाद के वकील रमेश श्रीवास्तव के दफ्तर में दाखिल हुए। राज नारायण ने मेज थपथपाते हुए कहा- “रमेश, मुझे इंदिरा को कोर्ट में घसीटना है।” रमेश श्रीवास्तव ने माथे का पसीना पोंछा- “होश में तो हो? सामने प्रधानमंत्री है।” राज नारायण ने कहा- “कानून की किताब में ‘प्रधानमंत्री’ जैसा कोई शब्द नहीं होता रमेश, वहां सिर्फ मुजरिम होता है।” “ठीक है, पर ये पहाड़ हिलाने के लिए तुम्हें शांति भूषण चाहिए।” वकील साहब ने मशविरा दिया। राज नारायण बोले- “वही सही, सुना है कांग्रेस (O) के आदमी हैं और फीस भी नहीं लेंगे।” रमेश- “फीस छोड़ो, उनके पास वो जिगरा है जो हमें चाहिए।” 22 अप्रैल 1971, शांति भूषण का चैंबर राज नारायण ने अपनी याचिका का ड्राफ्ट शांति भूषण की मेज पर रखा। शांति भूषण ने पन्ने पलटे और एक फीकी हंसी हंसे, बोले- “ये क्या मजाक है राज नारायण जी?” राज नारायण चौंके- “क्यों… क्या हुआ?” शांति भूषण ने कड़ककर कहा- “ये याचिका है या किसी मदारी का खेल? जादुई स्याही… गायब होने वाले निशान…? आप अदालत जा रहे हैं या सर्कस?” राज नारायण झुंझलाए- “जनता में यही चर्चा है वकील साब।” शांति भूषण ने फाइल बंद करते हुए कहा- “जनता गपशप करती है, लेकिन अदालत सबूत मांगती है। मैं ये केस तभी लड़ूंगा, जब ये जादुई स्याही वाली बकवास हटाई जाएगी।” “लेकिन…” राज नारायण ने कुछ कहना चाहा। शांति भूषण ने बात काट दी- “कोई लेकिन-वेकिन नहीं… मुझे ये केस ‘सीरियस’ बनाना है, कोई पब्लिसिटी स्टंट नहीं। मंजूर है…?” राज नारायण ने बेदिली से सिर हिलाया- “ठीक है, जैसा आप कहें।” शांति भूषण ने कलम उठाई और दो नए आरोप जोड़ दिए। “वायुसेना के विमानों का इस्तेमाल और सरकारी अफसरों से मंच बनवाना।” रमेश श्रीवास्तव ने पूछा- “जीत की क्या उम्मीद है भूषण साब?”
शांति भूषण ने ठंडी सांस ली- “जीरो…।”
रमेश ने हैरानी से कहा- “फिर भी लड़ेंगे…?” शांति भूषण बोले- “हां… इस उम्मीद में कि शायद कोई ऐसा जज मिल जाए, जिसके सीने में फौलाद का दिल हो और जमीर जिंदा हो।” अगली सुबह सूरज की पहली किरण खिलते ही राज नारायण फिर शांति भूषण के सामने खड़े थे। आंखें लाल थीं। शांति भूषण ने पूछा- “रातभर सोए नहीं क्या?” राज नारायण ने दर्द भरे लहजे में कहा- “नींद को गोली मारिए वकील साब। वो जादुई स्याही वाला मुद्दा हटाकर मुझे लग रहा है जैसे मैं अपनी आत्मा बेच आया हूं।” शांति भूषण- “जिद मत कीजिए राज नारायण जी…।” राज नारायण अड़ गए- “मैं पूरी रात तड़पा हूं। उसे वापस लाइए, वरना मेरा दम घुट जाएगा।” शांति भूषण ने कुछ पल उन्हें देखा, फिर बोले- “ठीक है। मैं उसे फिर से जोड़ देता हूं।” राज नारायण की आंखों में चमक आई- “सच…?” शांति भूषण ने मुस्कुराते हुए कहा- “हां, लेकिन ‘केमिकल’ के नाम पर नहीं। हम इसे ‘मैकेनिकल फ्रॉड’ कहेंगे। हम कहेंगे कि मुहरें इंसानों ने नहीं, मशीनों ने एक ही जगह लगाई हैं। अब राजी हैं…?” राज नारायण चहके- “बिल्कुल राजी…।” आखिरकार, 258 पन्नों की उस ऐतिहासिक याचिका का ड्राफ्ट तैयार हुआ। इसमें आठ ‘बम’ फिट किए गए: 1. यशपाल कपूर: सरकारी अफसर रहते हुए चुनाव एजेंट बनना। 2. रिश्वत: स्वामी अद्वैतानंद को चुनाव में खड़ा करने के लिए पैसे देना। 3. वायुसेना का दुरुपयोग: एयरफोर्स के विमानों से चुनावी उड़ानें। 4. प्रशासनिक धांधली: डीएम और एसपी से मंच और लाउडस्पीकर लगवाना। 5. लालच: मतदाताओं को शराब और कंबल बांटना। 6. धार्मिक भावना: ‘गाय-बछड़ा’ के जरिए धर्म का कार्ड खेलना। 7. वाहनों का काफिला: वोटरों को लाने-ले जाने के लिए सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल। 8. चुनावी खर्च सीमा: चुनावी खर्च में 35 हजार रुपए की लिमिट नहीं मानी। शांति भूषण ने राज नारायण की आंखों में झांका और धीमी आवाज में कहा- “याद रखिएगा राज नारायण जी, अगर इनमें से एक भी साबित हो गया, तो प्रधानमंत्री को मुश्किल हो सकती है। ” राज नारायण मुस्कुराए- “इतिहास के पन्ने पलटने का वक्त आ गया है वकील साब।” इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई। गवाही, कानूनी दांवपेंच और चार साल की लंबी बहस के बाद फैसला आया। 12 जून 1975, सुबह 9:50 बजे।
1, सफदरजंग रोड
प्रधानमंत्री आवास, नई दिल्ली। सन्नाटा इतना गहरा था कि सांसों की आवाज भी किसी धमाके जैसी लग रही थी। कमरे में रखे PTI और UNI के दो टेलीप्रिंटर किसी खूंखार जानवर की तरह रह-रहकर खड़खड़ा उठते और कागज उगलने लगते। पीएम इंदिरा गांधी के निजी सचिव एनके शेषन के माथे पर पसीना था। वो एक मशीन से दूसरी मशीन तक ऐसे चक्कर काट रहे थे, जैसे पिंजरे में कोई बाघ बंद हो। “ये खामोशी मार डालेगी।” शेषन बुदबुदाए और घड़ी देखी। 10 बजने में 10 मिनट कम थे। तभी फोन की घंटी बजी। शेषन ने झपट्टा मारकर रिसीवर उठाया। “हैलो, हां… क्या खबर है?” “सर, जज साब अभी घर से नहीं निकले हैं।” दूसरी तरफ से दबी आवाज आई। शेषन ने दांत पीसते हुए रिसीवर पटक दिया। “अजीब आदमी है ये सिन्हा, पत्थर का बना है या फौलाद का…?” अब थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं ये कुछ दिन पहले की बात है- इलाहाबाद के एक कमरे में यूपी के रसूखदार सांसद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के सामने नोटों से भरा सूटकेस खोला। “जज साब, पांच लाख की छोटी-सी भेंट है। बस फैसला थोड़ा… नर्म रखिएगा।” सांसद ने जहरीली मुस्कान के साथ कहा। सिन्हा ने सूटकेस की तरफ देखा भी नहीं। उनकी निगाहें सांसद के चेहरे को घूर रही थीं। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। सन्नाटा ऐसा कि सांसद की सिट्टी-पिट्ठी गुम हो गई। सांसद के साथ आए एक नेताजी ने कहा- “सिन्हा साब, क्यों जिद कर रहे हैं? इस एक फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट की कुर्सी आपका इंतजार कर रही है।” सिन्हा ने अपनी ऐनक उतारी, नफरत भरी निगाहों से उसे देखा और उठकर चले गए। इसके पहले भी सिन्हा को शीशे में उतारने की कोशिश हुई थी। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव प्रेम प्रकाश नैय्यर एक गुप्त मिशन पर देहरादून पहुंचे। मिशन था- इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को ‘समझाना’। नैय्यर ने चाय की चुस्की लेते हुए धीरे से कहा- “जज साब, पीएम का विदेश दौरा तय है। मुल्क की इज्जत का सवाल है। क्या इस फैसले को कुछ समय के लिए टाला नहीं जा सकता? बस जब तक मैडम वापस न आ जाएं। कोई भी नेगेटिव खबर पूरे देश को शर्मसार कर देगी।” ये सुनते ही जस्टिस सिन्हा की आंखों में अंगारे दहक उठे। उन्होंने बिना एक पल गंवाए फोन का रिसीवर उठाया और सीधे कोर्ट के रजिस्ट्रार को नंबर मिलाया। “रजिस्ट्रार साब, अभी के अभी नोटिस बोर्ड पर चढ़वा दीजिए… फैसला 12 जून को सुनाया जाएगा। हर हाल में…।” जस्टिस सिन्हा जानते थे कि वे पहले ही एक बड़ी रियायत दे चुके थे। 8 जून को गुजरात विधानसभा चुनाव थे। उन्होंने जान-बूझकर फैसला रोके रखा ताकि वोटर्स पर असर न पड़े, लेकिन बार-बार रियायत देना ठीक नहीं था। पूरी इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) इस वक्त एक ही काम में लगी थी। उस फैसले की एक लाइन कहीं से लीक हो जाए, जो जस्टिस सिन्हा देने वाले थे। दिल्ली से आए जासूस इलाहाबाद की गलियों में धूल छान रहे थे। उनका एकमात्र निशाना था- जज साहब का स्टेनोग्राफर नेगीराम निगम। जासूसों ने नेगीराम को घेरा। पहले लालच दिया, फिर ‘ऊपर’ का डर दिखाया और आखिर में धमकियां भी दीं। निगम भी उसी फौलाद का बना था, जिससे उसके साहब जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा बने थे। 11 जून की रात। फैसला टाइप हो चुका था। जस्टिस सिन्हा ने स्टेनो की आंखों में देखा और एक इशारा किया। अगली सुबह जब खुफिया विभाग के लोग आखिरी कोशिश करने स्टेनोग्राफर के घर पहुंचे तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। घर पर ताला लटका था। निगम और उनकी पत्नी गायब थे। ये देखकर इंटेलिजेंस के अफसर सिर पकड़कर रह गए। फैसला जस्टिस सिन्हा की जेब में था और टाइप करने वाला परिंदा पिंजरा तोड़कर उड़ चुका था। अब जो कुछ भी होना था, वो सीधे अदालत के कमरा नंबर- 24 में होना था। अब दोबारा लौटते हैं 12 जून, 1975 की सुबह 10 बजे इलाहाबाद हाईकोर्ट का कमरा नंबर- 24, भीड़ ऐसी कि तिल रखने की जगह नहीं थी। आखिर प्रधानमंत्री के खिलाफ लगी याचिका पर फैसला आना था। खुफिया विभाग के अफसर सादी वर्दी में इधर-उधर डोल रहे थे। उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो चुकी थीं। 55 साल के दुबले-पतले जस्टिस सिन्हा अपनी कुर्सी पर बैठे। पेशकार ने गला साफ किया और गरजकर कहा- “खामो ऽऽऽ श, जब फैसला सुनाया जाएगा। कोई ताली नहीं बजाएगा।” सिन्हा ने 258 पन्नों की फाइल खोली। उनकी आवाज सपाट थी, जैसे कोई मशीन बोल रही हो। जस्टिस सिन्हा ने फैसला पढ़ना शुरू किया- “तमाम सबूतों और गवाहों के मद्देनजर ये साबित होता है कि श्रीमती गांधी ने चुनाव प्रचार में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया था।” जस्टिस सिन्हा के ये शब्द सुनकर कोर्ट रूम में सन्नाटा एक सेकेंड के लिए ठहरा और फिर शोर का समंदर उमड़ पड़ा। जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को उस चुनाव में दो भ्रष्ट आचरणों का दोषी माना था। उसमें से एक था- ‘प्रधानमंत्री सचिवालय में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी यशपाल कपूर का उपयोग चुनाव में अपनी संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए किया।’ सिन्हा ने कहा कि भले ही कपूर ने मिसेज गांधी के लिए चुनाव प्रचार 7 जनवरी को शुरू किया। इस्तीफा 13 जनवरी को दिया, लेकिन वे सरकारी सेवा में 25 जनवरी तक बने हुए थे। मिसेज गांधी ने उसी दिन अपने आपको एक उम्मीदवार मान लिया था, जब 29 दिसंबर 1970 को उन्होंने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया था और चुनाव में उतरने की घोषणा की थी। दिल्ली: सुबह 10:20 बजे। UNI की मशीन पर घंटी बजी। शेषन ने झपटकर कागज फाड़ा। मोटे अक्षरों में छपा था- ‘Indira Gandhi Unseated’ (मिसेज गांधी अपदस्थ) शेषन बदहवास होकर गलियारे में भागे। सामने पायलट की सफेद वर्दी में राजीव गांधी आ रहे थे। शेषन ने कांपते हाथों से कागज उनकी तरफ बढ़ाया। राजीव ने पढ़ा और तेजी से अपनी मां के कमरे की ओर मुड़े। “मम्मी… उन्होंने आपको डिस्क्वालिफाई कर दिया है।” राजीव की आवाज में एक अजीब सी गंभीरता थी। मिसेज गांधी ने सिर उठाया, चेहरे पर कोई शिकन नहीं। बस इतना कहा- “तो आखिर उन्होंने कर ही दिया।” तभी टेलीप्रिंटर पर अगला फ्लैश आया- ‘छह साल के लिए चुनाव लड़ने पर रोक’। इलाहाबाद का फैसला आने के बाद दिल्ली की सियासत में जलजला आ गया था। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद उस वक्त श्रीनगर में थे। वे फौरन दिल्ली लौटना चाहते थे, लेकिन इंदिरा ने उन्हें रोक दिया। राष्ट्रपति अहमद ने फोन पर पूछा- “मैडम, मेरा दिल्ली लौटना जरूरी है। मैं तुरंत आता हूं।” इंदिरा ने ठंडे लहजे में जवाब दिया- “नहीं, अभी आपका आना ठीक नहीं होगा। आप अपना दौरा जारी रखिए।” अगले तीन दिन तक राष्ट्रपति हर सुबह फोन करते- “क्या अब मैं लौट आऊं?” इंदिरा हर बार एक ही जवाब देतीं- “अभी नहीं।” वे अच्छी तरह जानती थीं कि अगर राष्ट्रपति अचानक दिल्ली लौटे, तो शोर मच जाएगा कि वे मैडम का इस्तीफा स्वीकार करने की जल्दी में आए हैं। इधर राष्ट्रपति भवन के बाहर विपक्ष ने डेरा डाल दिया था और एक ही रट थी- पीएम का इस्तीफा…। 16 जून को जैसे ही राष्ट्रपति दिल्ली पहुंचे, इंदिरा उनसे मिलने पहुंचीं। ये मुलाकात सिर्फ 15 मिनट की थी। इंदिरा गांधी ने दो टूक शब्दों में कहा- “मैं इलाहाबाद के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रही हूं। याचिका तैयार है।” राष्ट्रपति अहमद ने बस इतना कहा- “ठीक है, जैसा आप उचित समझें।” उसी शाम विपक्षी नेताओं का एक बड़ा दल राष्ट्रपति से मिलने पहुंचा। उनकी आवाज में तल्खी थी। विपक्षी नेता बोले- “राष्ट्रपति जी, आपको फौरन उन्हें कुर्सी छोड़ने का आदेश देना चाहिए।” अहमद ने शांति से जवाब दिया- “हमें कांग्रेस संसदीय दल की बैठक का इंतजार करना चाहिए।” विपक्ष के नेता बिफर पड़े- “बैठक का इंतजार? यानी आप अब भी उन्हीं का पक्ष ले रहे हैं?” राष्ट्रपति अहमद को फौरन अपनी गलती का एहसास हुआ कि कहीं उन्हें इंदिरा गांधी का ‘रबर स्टैंप’ न मान लिया जाए। उन्होंने तुरंत अपनी बात सुधारी- “मेरा मतलब ये था कि हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक रुकना चाहिए।” उनके प्रेस सचिव ने फौरन एक हैंडआउट जारी किया ताकि अखबारों में ये न छप जाए कि राष्ट्रपति झुक गए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने भले ही कुर्सी हिला दी थी, लेकिन 1 सफदरजंग रोड के भीतर बगावत का खून उबल रहा था। इंदिरा गांधी के दोनों बेटों राजीव और संजय ने साफ कर दिया कि पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता। राजीव ने मां की आंखों में झांककर कहा- “मम्मी, आपको इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं।” संजय ने और भी तीखे तेवर में जोड़ा- “इस्तीफा कमजोर लोग देते हैं। हम दुनिया को दिखा देंगे कि असली नेता कौन है।” अगले ही पल दिल्ली की सड़कों पर सरकारी मशीनरी का तांडव शुरू हो गया। DTC (दिल्ली ट्रांसपोर्ट कमीशन) की बसों और ट्रकों का काफिला गांवों की ओर दौड़ पड़ा। लोगों को भरकर लाया जाने लगा, ताकि दुनिया देखे कि भीड़ किसके साथ है। 20 जून 1975 की दोपहर, दिल्ली का बोट क्लब। तपती धूप में एक विशाल रैली बुलाई गई। मंच पर इंदिरा गांधी के साथ उनका पूरा परिवार खड़ा था- संजय, राजीव और सोनिया गांधी। पहली बार इंदिरा ने सार्वजनिक रूप से अपने परिवार का जिक्र किया। भीड़ ने नारे लगाए, पर इंदिरा का चेहरा गंभीर था। वे बोलीं- “बड़ी ताकतें न केवल मुझे सत्ता से बेदखल करना चाहती हैं, बल्कि वे मेरा जीवन भी समाप्त कर देना चाहती हैं।” रैली कामयाब रही, लेकिन संजय गांधी के लिए इतना काफी नहीं था। उनका पारा तब चढ़ गया, जब दूरदर्शन ने इस रैली का लाइव टेलीकास्ट नहीं किया। सूचना और प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल पीएम हाउस पहुंचे। उनका सामना संजय गांधी से हुआ। संजय का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। संजय ने झल्लाते हुए कहा- “देखिए गुजराल साब, ऐसा नहीं चलेगा। मॉम की स्पीच रेडियो पर क्यों नहीं आई?” गुजराल ने शांति से जवाब दिया- “देखिए संजय, जब तक मैं मंत्री हूं, नियम ऐसे ही चलेंगे।” संजय चिल्लाने लगे- “आप जानते हैं आप किससे बात कर रहे हैं?” गुजराल ने उनकी आंखों में आंखें डालकर कहा- “बात करनी है तो थोड़ा सलीका सीखिए। आपको ये तक नहीं पता कि बड़ों से कैसे बात की जाती है? मैं आपकी मां का मंत्री हूं, आपका नहीं।” गुजराल उठे और वहां से चले गए। कुछ ही दिनों में गुजराल से मंत्रालय छीन लिया गया। 23 जून 1975, सुप्रीम कोर्ट इंदिरा V/S राज नारायण केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे के लिए सुनवाई शुरू हुई। जस्टिस कृष्ण अय्यर मामला सुन रहे थे। इंदिरा गांधी की तरफ से मशहूर वकील नानी पालखीवाला पेश हुए। राजनारायण की तरफ से शांति भूषण अदालत पहुंचे। पालखीवाला ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। जस्टिस अय्यर ने दोनों पक्षों को सुना। उनका फैसला भी किसी सस्पेंस फिल्म के ट्विस्ट जैसा था। 24 जून को फैसला आया। जस्टिस अय्यर ने कहा- “मिसेज गांधी पर कोई गंभीर चुनावी अपराध साबित नहीं हुआ है। फिर भी जब तक अपील का फैसला नहीं आता, वो लोकसभा में वोट नहीं दे सकेंगी।” संजय गांधी की टीम ने फौरन रेडियो और टीवी पर प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया। हर तरफ बस एक ही शोर मचा- “अदालत ने कह दिया है, इंदिरा ही प्रधानमंत्री रहेंगी।” सच्चाई को सरकारी प्रचार की परतों के नीचे दबा दिया गया, लेकिन जेपी की रैली में उमड़ी भीड़ ने बता दिया कि तूफान अब ‘सिंहासन’ के बेहद करीब है। 25 जून 1975, दिल्ली का रामलीला मैदान। लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की रैली में जनसैलाब उमड़ पड़ा। जेपी मंच से दहाड़ रहे थे। कुछ देर बाद राज नारायण ने माइक संभाला और बोलना शुरू करते ही बिजली गिरा दी- “अदालत ने मैडम को अयोग्य करार दे दिया है, फिर भी वे कुर्सी से चिपक कर बैठी हैं। कल 26 जून को हम उनके आवास का घेराव करेंगे। याद रहे… याचना नहीं, अब रण होगा।” सभा खत्म हुई और राज नारायण दिल्ली में अपने भगवानदास रोड वाले मकान पर लौट आए। उन्हें लग रहा था कि वे कल इतिहास रचेंगे, पर वे नहीं जानते थे कि मैडम ने इतिहास को ही ‘लॉक’ करने की तैयारी कर ली है। रात के सन्नाटे में राष्ट्रपति भवन की लाइटें जलीं और एक कागज पर दस्तखत होते ही पूरे देश की किस्मत पर कालिख पुत गई। देश में ‘इमरजेंसी’ लागू हो चुकी थी। 26 जून की भोर में राज नारायण के दरवाजे पर पुलिस खड़ी थी। पुलिस अफसर ने कड़ककर कहा- “राज नारायण जी, दिल्ली पुलिस। आप गिरफ्तार हैं।” राज नारायण ठंडी हंसी हंसे- “मैडम डर गईं? चलिए…।” अगले कुछ ही घंटों में विपक्ष के सारे धुरंधर हरियाणा की अलग-अलग जेलों में थे। राज नारायण को हिसार जेल में रखा गया। 10 अगस्त को संसद ने संविधान में 39वां संशोधन किया गया। अनुच्छेद 71 हटाया गया और अनुच्छेद 329 A जोड़ा गया। इसके तहत प्रावधान किया गया कि प्रधानमंत्री के चुनाव को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। नतीजा, अब सुप्रीम कोर्ट इंदिरा गांधी V/S राज नारायण केस की सुनवाई नहीं कर सकता था। हाईकोर्ट का फैसला भी शून्य हो गया। फिर भी आपातकाल का दौर जारी रहा। करीब 19 महीने बाद जब इंदिरा गांधी को विश्वास हो गया कि चुनाव हुए तो भी वही जीतेंगी, तब 18 जनवरी, 1977 को लोकसभा भंग करके आम चुनाव कराने का ऐलान हुआ। इमरजेंसी इसके भी दो महीने बाद 21 मार्च को खत्म हुई। जेल में बंद विपक्षी नेताओं की रिहाई शुरू हुई। राज नारायण के साथ उनके करीबी राज कुमार जैन भी हिसार जेल में बंद थे। राज कुमार की रिहाई का आदेश आ चुका थी, लेकिन राज नारायण का नहीं। राज नारायण ने तीन खुफिया चिट्ठियां लिखीं। राज कुमार को बुलाकर चिटि्ठयां उनकी मुट्ठी में दबा दीं। फिर फुसफुसाते हुए कहा- “राज कुमार, ये विपक्ष का भविष्य हैं। इन्हें चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी और मोरारजी देसाई तक पहुंचा देना। कहना, राज नारायण ने संदेश भेजा है।” “क्या लिखा है इसमें नेताजी?” राज कुमार ने उत्सुकता से पूछा। “इसमें लिखा है कि मैं भले ही जेल में सड़ रहा हूं, लेकिन तुम तीनों को मैदान नहीं छोड़ना है। इंदिरा के खिलाफ चुनाव लड़ना ही होगा, वरना ये देश हमें कभी माफ नहीं करेगा।” राज कुमार जैन रिहा हुए और उन्होंने एक-एक करके तीनों नेताओं के दरवाजे खटखटाए। लेकिन, जवाब सुनकर उनके होश उड़ गए। वाजपेयी चिट्ठी पढ़कर मुस्कुरा दिए। इंदिरा के खिलाफ लड़ना सीधे हार के कुएं में कूदने जैसा था। मोरारजी ने भी पल्ला झाड़ लिया। जैसे ही राज नारायण जेल से बाहर आए। उन्होंने प्रेस के सामने गर्जना की- “अगर कोई नहीं लड़ेगा, तो राज नारायण अकेला लड़ेगा।” ये ऐलान नहीं था, इंदिरा की राजनीतिक हार की शुरुआत थी। 1971 की उस हार का बदला अब रायबरेली की धूल में लिया जाने वाला था। चुनाव की तारीखें नजदीक थीं। दिल्ली के एक कमरे में राज नारायण के एक हितैषी ने उनसे कहा- “राज नारायण, जिद छोड़ो। दो सीटों से पर्चा भरो। प्रतापगढ़ की सीट बिल्कुल सुरक्षित है। हमारी पार्टी का वहां कब्जा है। तुम वहां से आसानी से निकल जाओगे।” राज नारायण ने अपनी मोटी भौहें सिकोड़ीं- “दो सीटें क्यों? क्या मुझे अपनी ताकत पर शक है?” हितैषी ने समझाया- “अरे भाई, इंदिरा पीएम है। अगर दांव उल्टा पड़ गया तो? जनता पार्टी की सरकार बन रही है, तुम्हारा मंत्री बनना तय है। मंत्री बनने के लिए जीतना जरूरी है। प्रतापगढ़ से भी पर्चा भर दो।” राज नारायण कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए और गरज कर बोले- “क्या मैं पद का लोभी दिखता हूं? क्या मैं कुर्सी के लिए राजनीति में आया हूं? मेरा फैसला अटल है… मैं सिर्फ रायबरेली से लड़ूंगा। मैं उस भ्रष्ट महिला को सबक सिखाकर रहूंगा।” चुनाव प्रचार शुरू हो चुका था। रायबरेली की धूल राज नारायण के लिए पराई नहीं थी। एक जनसभा में राज नारायण बोलने पहुंचे। हाथ में एक साधारण सी थैली थी। भीड़ शांत हुई, तो उन्होंने थैली ऊपर उठाकर दिखाई। वे कुछ चबा रहे थे। राज नारायण ने माइक पर तंजिया लहजे में कहा- “देखो भाइयों, हम तो गुड़-चना खाकर गुजारा करते हैं। ये रहा प्रमाण, हम जनता के आदमी हैं। दूसरी तरफ इंदिरा जी हैं- वीआईपी… हमसे अच्छे तो उनके कुत्ते हैं। ऐशो-आराम में रहते हैं। अब वक्त आ गया है कि शाही ठाठ मिट्टी में मिला दें। अब जनता की बारी है।” पूरा मैदान ‘राज नारायण जिंदाबाद’ के नारों से गूंज उठा। सत्ता की चूलें हिलने लगी थीं। वोटिंग के बाद गिनती शुरू हुई। रेडियो पर जो खबर आई, उससे 1 सफदरजंग रोड पर मातम छा गया। राज नारायण को 52% (1,77,719) वोट मिले थे, जबकि सत्ता की स्वामिनी इंदिरा गांधी 35.7% (1,22,517) वोटों पर सिमट गई थीं। *** रेफरेंस The Case That Shook India: The Verdict That Led to the Emergency – Prashant Bhushan | Emergency Retold – Kuldip Nayar | Emergency Chronicles: Indira Gandhi and Democrac y’s Turning Point – Gyan Prakash | राजनारायण एक नाम नहीं इतिहास – शाहनवाज अहमद कादरी | राजनारायण विचार पथ – धीरेंद्र श्रीवास्तव | State of Uttar Pradesh v. Raj Narain (इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला) व्यक्ति: प्रो. आनंद कुमार, सुरेश खैरनार, विजय विद्रोही, धीरेंद्र श्रीवास्तव, शाहनवाज अहमद कादरी। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का उपयोग किया गया है।
शांति भूषण ने ठंडी सांस ली- “जीरो…।”
रमेश ने हैरानी से कहा- “फिर भी लड़ेंगे…?” शांति भूषण बोले- “हां… इस उम्मीद में कि शायद कोई ऐसा जज मिल जाए, जिसके सीने में फौलाद का दिल हो और जमीर जिंदा हो।” अगली सुबह सूरज की पहली किरण खिलते ही राज नारायण फिर शांति भूषण के सामने खड़े थे। आंखें लाल थीं। शांति भूषण ने पूछा- “रातभर सोए नहीं क्या?” राज नारायण ने दर्द भरे लहजे में कहा- “नींद को गोली मारिए वकील साब। वो जादुई स्याही वाला मुद्दा हटाकर मुझे लग रहा है जैसे मैं अपनी आत्मा बेच आया हूं।” शांति भूषण- “जिद मत कीजिए राज नारायण जी…।” राज नारायण अड़ गए- “मैं पूरी रात तड़पा हूं। उसे वापस लाइए, वरना मेरा दम घुट जाएगा।” शांति भूषण ने कुछ पल उन्हें देखा, फिर बोले- “ठीक है। मैं उसे फिर से जोड़ देता हूं।” राज नारायण की आंखों में चमक आई- “सच…?” शांति भूषण ने मुस्कुराते हुए कहा- “हां, लेकिन ‘केमिकल’ के नाम पर नहीं। हम इसे ‘मैकेनिकल फ्रॉड’ कहेंगे। हम कहेंगे कि मुहरें इंसानों ने नहीं, मशीनों ने एक ही जगह लगाई हैं। अब राजी हैं…?” राज नारायण चहके- “बिल्कुल राजी…।” आखिरकार, 258 पन्नों की उस ऐतिहासिक याचिका का ड्राफ्ट तैयार हुआ। इसमें आठ ‘बम’ फिट किए गए: 1. यशपाल कपूर: सरकारी अफसर रहते हुए चुनाव एजेंट बनना। 2. रिश्वत: स्वामी अद्वैतानंद को चुनाव में खड़ा करने के लिए पैसे देना। 3. वायुसेना का दुरुपयोग: एयरफोर्स के विमानों से चुनावी उड़ानें। 4. प्रशासनिक धांधली: डीएम और एसपी से मंच और लाउडस्पीकर लगवाना। 5. लालच: मतदाताओं को शराब और कंबल बांटना। 6. धार्मिक भावना: ‘गाय-बछड़ा’ के जरिए धर्म का कार्ड खेलना। 7. वाहनों का काफिला: वोटरों को लाने-ले जाने के लिए सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल। 8. चुनावी खर्च सीमा: चुनावी खर्च में 35 हजार रुपए की लिमिट नहीं मानी। शांति भूषण ने राज नारायण की आंखों में झांका और धीमी आवाज में कहा- “याद रखिएगा राज नारायण जी, अगर इनमें से एक भी साबित हो गया, तो प्रधानमंत्री को मुश्किल हो सकती है। ” राज नारायण मुस्कुराए- “इतिहास के पन्ने पलटने का वक्त आ गया है वकील साब।” इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई। गवाही, कानूनी दांवपेंच और चार साल की लंबी बहस के बाद फैसला आया। 12 जून 1975, सुबह 9:50 बजे।
1, सफदरजंग रोड
प्रधानमंत्री आवास, नई दिल्ली। सन्नाटा इतना गहरा था कि सांसों की आवाज भी किसी धमाके जैसी लग रही थी। कमरे में रखे PTI और UNI के दो टेलीप्रिंटर किसी खूंखार जानवर की तरह रह-रहकर खड़खड़ा उठते और कागज उगलने लगते। पीएम इंदिरा गांधी के निजी सचिव एनके शेषन के माथे पर पसीना था। वो एक मशीन से दूसरी मशीन तक ऐसे चक्कर काट रहे थे, जैसे पिंजरे में कोई बाघ बंद हो। “ये खामोशी मार डालेगी।” शेषन बुदबुदाए और घड़ी देखी। 10 बजने में 10 मिनट कम थे। तभी फोन की घंटी बजी। शेषन ने झपट्टा मारकर रिसीवर उठाया। “हैलो, हां… क्या खबर है?” “सर, जज साब अभी घर से नहीं निकले हैं।” दूसरी तरफ से दबी आवाज आई। शेषन ने दांत पीसते हुए रिसीवर पटक दिया। “अजीब आदमी है ये सिन्हा, पत्थर का बना है या फौलाद का…?” अब थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं ये कुछ दिन पहले की बात है- इलाहाबाद के एक कमरे में यूपी के रसूखदार सांसद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के सामने नोटों से भरा सूटकेस खोला। “जज साब, पांच लाख की छोटी-सी भेंट है। बस फैसला थोड़ा… नर्म रखिएगा।” सांसद ने जहरीली मुस्कान के साथ कहा। सिन्हा ने सूटकेस की तरफ देखा भी नहीं। उनकी निगाहें सांसद के चेहरे को घूर रही थीं। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। सन्नाटा ऐसा कि सांसद की सिट्टी-पिट्ठी गुम हो गई। सांसद के साथ आए एक नेताजी ने कहा- “सिन्हा साब, क्यों जिद कर रहे हैं? इस एक फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट की कुर्सी आपका इंतजार कर रही है।” सिन्हा ने अपनी ऐनक उतारी, नफरत भरी निगाहों से उसे देखा और उठकर चले गए। इसके पहले भी सिन्हा को शीशे में उतारने की कोशिश हुई थी। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव प्रेम प्रकाश नैय्यर एक गुप्त मिशन पर देहरादून पहुंचे। मिशन था- इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को ‘समझाना’। नैय्यर ने चाय की चुस्की लेते हुए धीरे से कहा- “जज साब, पीएम का विदेश दौरा तय है। मुल्क की इज्जत का सवाल है। क्या इस फैसले को कुछ समय के लिए टाला नहीं जा सकता? बस जब तक मैडम वापस न आ जाएं। कोई भी नेगेटिव खबर पूरे देश को शर्मसार कर देगी।” ये सुनते ही जस्टिस सिन्हा की आंखों में अंगारे दहक उठे। उन्होंने बिना एक पल गंवाए फोन का रिसीवर उठाया और सीधे कोर्ट के रजिस्ट्रार को नंबर मिलाया। “रजिस्ट्रार साब, अभी के अभी नोटिस बोर्ड पर चढ़वा दीजिए… फैसला 12 जून को सुनाया जाएगा। हर हाल में…।” जस्टिस सिन्हा जानते थे कि वे पहले ही एक बड़ी रियायत दे चुके थे। 8 जून को गुजरात विधानसभा चुनाव थे। उन्होंने जान-बूझकर फैसला रोके रखा ताकि वोटर्स पर असर न पड़े, लेकिन बार-बार रियायत देना ठीक नहीं था। पूरी इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) इस वक्त एक ही काम में लगी थी। उस फैसले की एक लाइन कहीं से लीक हो जाए, जो जस्टिस सिन्हा देने वाले थे। दिल्ली से आए जासूस इलाहाबाद की गलियों में धूल छान रहे थे। उनका एकमात्र निशाना था- जज साहब का स्टेनोग्राफर नेगीराम निगम। जासूसों ने नेगीराम को घेरा। पहले लालच दिया, फिर ‘ऊपर’ का डर दिखाया और आखिर में धमकियां भी दीं। निगम भी उसी फौलाद का बना था, जिससे उसके साहब जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा बने थे। 11 जून की रात। फैसला टाइप हो चुका था। जस्टिस सिन्हा ने स्टेनो की आंखों में देखा और एक इशारा किया। अगली सुबह जब खुफिया विभाग के लोग आखिरी कोशिश करने स्टेनोग्राफर के घर पहुंचे तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। घर पर ताला लटका था। निगम और उनकी पत्नी गायब थे। ये देखकर इंटेलिजेंस के अफसर सिर पकड़कर रह गए। फैसला जस्टिस सिन्हा की जेब में था और टाइप करने वाला परिंदा पिंजरा तोड़कर उड़ चुका था। अब जो कुछ भी होना था, वो सीधे अदालत के कमरा नंबर- 24 में होना था। अब दोबारा लौटते हैं 12 जून, 1975 की सुबह 10 बजे इलाहाबाद हाईकोर्ट का कमरा नंबर- 24, भीड़ ऐसी कि तिल रखने की जगह नहीं थी। आखिर प्रधानमंत्री के खिलाफ लगी याचिका पर फैसला आना था। खुफिया विभाग के अफसर सादी वर्दी में इधर-उधर डोल रहे थे। उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो चुकी थीं। 55 साल के दुबले-पतले जस्टिस सिन्हा अपनी कुर्सी पर बैठे। पेशकार ने गला साफ किया और गरजकर कहा- “खामो ऽऽऽ श, जब फैसला सुनाया जाएगा। कोई ताली नहीं बजाएगा।” सिन्हा ने 258 पन्नों की फाइल खोली। उनकी आवाज सपाट थी, जैसे कोई मशीन बोल रही हो। जस्टिस सिन्हा ने फैसला पढ़ना शुरू किया- “तमाम सबूतों और गवाहों के मद्देनजर ये साबित होता है कि श्रीमती गांधी ने चुनाव प्रचार में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया था।” जस्टिस सिन्हा के ये शब्द सुनकर कोर्ट रूम में सन्नाटा एक सेकेंड के लिए ठहरा और फिर शोर का समंदर उमड़ पड़ा। जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को उस चुनाव में दो भ्रष्ट आचरणों का दोषी माना था। उसमें से एक था- ‘प्रधानमंत्री सचिवालय में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी यशपाल कपूर का उपयोग चुनाव में अपनी संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए किया।’ सिन्हा ने कहा कि भले ही कपूर ने मिसेज गांधी के लिए चुनाव प्रचार 7 जनवरी को शुरू किया। इस्तीफा 13 जनवरी को दिया, लेकिन वे सरकारी सेवा में 25 जनवरी तक बने हुए थे। मिसेज गांधी ने उसी दिन अपने आपको एक उम्मीदवार मान लिया था, जब 29 दिसंबर 1970 को उन्होंने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया था और चुनाव में उतरने की घोषणा की थी। दिल्ली: सुबह 10:20 बजे। UNI की मशीन पर घंटी बजी। शेषन ने झपटकर कागज फाड़ा। मोटे अक्षरों में छपा था- ‘Indira Gandhi Unseated’ (मिसेज गांधी अपदस्थ) शेषन बदहवास होकर गलियारे में भागे। सामने पायलट की सफेद वर्दी में राजीव गांधी आ रहे थे। शेषन ने कांपते हाथों से कागज उनकी तरफ बढ़ाया। राजीव ने पढ़ा और तेजी से अपनी मां के कमरे की ओर मुड़े। “मम्मी… उन्होंने आपको डिस्क्वालिफाई कर दिया है।” राजीव की आवाज में एक अजीब सी गंभीरता थी। मिसेज गांधी ने सिर उठाया, चेहरे पर कोई शिकन नहीं। बस इतना कहा- “तो आखिर उन्होंने कर ही दिया।” तभी टेलीप्रिंटर पर अगला फ्लैश आया- ‘छह साल के लिए चुनाव लड़ने पर रोक’। इलाहाबाद का फैसला आने के बाद दिल्ली की सियासत में जलजला आ गया था। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद उस वक्त श्रीनगर में थे। वे फौरन दिल्ली लौटना चाहते थे, लेकिन इंदिरा ने उन्हें रोक दिया। राष्ट्रपति अहमद ने फोन पर पूछा- “मैडम, मेरा दिल्ली लौटना जरूरी है। मैं तुरंत आता हूं।” इंदिरा ने ठंडे लहजे में जवाब दिया- “नहीं, अभी आपका आना ठीक नहीं होगा। आप अपना दौरा जारी रखिए।” अगले तीन दिन तक राष्ट्रपति हर सुबह फोन करते- “क्या अब मैं लौट आऊं?” इंदिरा हर बार एक ही जवाब देतीं- “अभी नहीं।” वे अच्छी तरह जानती थीं कि अगर राष्ट्रपति अचानक दिल्ली लौटे, तो शोर मच जाएगा कि वे मैडम का इस्तीफा स्वीकार करने की जल्दी में आए हैं। इधर राष्ट्रपति भवन के बाहर विपक्ष ने डेरा डाल दिया था और एक ही रट थी- पीएम का इस्तीफा…। 16 जून को जैसे ही राष्ट्रपति दिल्ली पहुंचे, इंदिरा उनसे मिलने पहुंचीं। ये मुलाकात सिर्फ 15 मिनट की थी। इंदिरा गांधी ने दो टूक शब्दों में कहा- “मैं इलाहाबाद के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रही हूं। याचिका तैयार है।” राष्ट्रपति अहमद ने बस इतना कहा- “ठीक है, जैसा आप उचित समझें।” उसी शाम विपक्षी नेताओं का एक बड़ा दल राष्ट्रपति से मिलने पहुंचा। उनकी आवाज में तल्खी थी। विपक्षी नेता बोले- “राष्ट्रपति जी, आपको फौरन उन्हें कुर्सी छोड़ने का आदेश देना चाहिए।” अहमद ने शांति से जवाब दिया- “हमें कांग्रेस संसदीय दल की बैठक का इंतजार करना चाहिए।” विपक्ष के नेता बिफर पड़े- “बैठक का इंतजार? यानी आप अब भी उन्हीं का पक्ष ले रहे हैं?” राष्ट्रपति अहमद को फौरन अपनी गलती का एहसास हुआ कि कहीं उन्हें इंदिरा गांधी का ‘रबर स्टैंप’ न मान लिया जाए। उन्होंने तुरंत अपनी बात सुधारी- “मेरा मतलब ये था कि हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक रुकना चाहिए।” उनके प्रेस सचिव ने फौरन एक हैंडआउट जारी किया ताकि अखबारों में ये न छप जाए कि राष्ट्रपति झुक गए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने भले ही कुर्सी हिला दी थी, लेकिन 1 सफदरजंग रोड के भीतर बगावत का खून उबल रहा था। इंदिरा गांधी के दोनों बेटों राजीव और संजय ने साफ कर दिया कि पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता। राजीव ने मां की आंखों में झांककर कहा- “मम्मी, आपको इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं।” संजय ने और भी तीखे तेवर में जोड़ा- “इस्तीफा कमजोर लोग देते हैं। हम दुनिया को दिखा देंगे कि असली नेता कौन है।” अगले ही पल दिल्ली की सड़कों पर सरकारी मशीनरी का तांडव शुरू हो गया। DTC (दिल्ली ट्रांसपोर्ट कमीशन) की बसों और ट्रकों का काफिला गांवों की ओर दौड़ पड़ा। लोगों को भरकर लाया जाने लगा, ताकि दुनिया देखे कि भीड़ किसके साथ है। 20 जून 1975 की दोपहर, दिल्ली का बोट क्लब। तपती धूप में एक विशाल रैली बुलाई गई। मंच पर इंदिरा गांधी के साथ उनका पूरा परिवार खड़ा था- संजय, राजीव और सोनिया गांधी। पहली बार इंदिरा ने सार्वजनिक रूप से अपने परिवार का जिक्र किया। भीड़ ने नारे लगाए, पर इंदिरा का चेहरा गंभीर था। वे बोलीं- “बड़ी ताकतें न केवल मुझे सत्ता से बेदखल करना चाहती हैं, बल्कि वे मेरा जीवन भी समाप्त कर देना चाहती हैं।” रैली कामयाब रही, लेकिन संजय गांधी के लिए इतना काफी नहीं था। उनका पारा तब चढ़ गया, जब दूरदर्शन ने इस रैली का लाइव टेलीकास्ट नहीं किया। सूचना और प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल पीएम हाउस पहुंचे। उनका सामना संजय गांधी से हुआ। संजय का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। संजय ने झल्लाते हुए कहा- “देखिए गुजराल साब, ऐसा नहीं चलेगा। मॉम की स्पीच रेडियो पर क्यों नहीं आई?” गुजराल ने शांति से जवाब दिया- “देखिए संजय, जब तक मैं मंत्री हूं, नियम ऐसे ही चलेंगे।” संजय चिल्लाने लगे- “आप जानते हैं आप किससे बात कर रहे हैं?” गुजराल ने उनकी आंखों में आंखें डालकर कहा- “बात करनी है तो थोड़ा सलीका सीखिए। आपको ये तक नहीं पता कि बड़ों से कैसे बात की जाती है? मैं आपकी मां का मंत्री हूं, आपका नहीं।” गुजराल उठे और वहां से चले गए। कुछ ही दिनों में गुजराल से मंत्रालय छीन लिया गया। 23 जून 1975, सुप्रीम कोर्ट इंदिरा V/S राज नारायण केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे के लिए सुनवाई शुरू हुई। जस्टिस कृष्ण अय्यर मामला सुन रहे थे। इंदिरा गांधी की तरफ से मशहूर वकील नानी पालखीवाला पेश हुए। राजनारायण की तरफ से शांति भूषण अदालत पहुंचे। पालखीवाला ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। जस्टिस अय्यर ने दोनों पक्षों को सुना। उनका फैसला भी किसी सस्पेंस फिल्म के ट्विस्ट जैसा था। 24 जून को फैसला आया। जस्टिस अय्यर ने कहा- “मिसेज गांधी पर कोई गंभीर चुनावी अपराध साबित नहीं हुआ है। फिर भी जब तक अपील का फैसला नहीं आता, वो लोकसभा में वोट नहीं दे सकेंगी।” संजय गांधी की टीम ने फौरन रेडियो और टीवी पर प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया। हर तरफ बस एक ही शोर मचा- “अदालत ने कह दिया है, इंदिरा ही प्रधानमंत्री रहेंगी।” सच्चाई को सरकारी प्रचार की परतों के नीचे दबा दिया गया, लेकिन जेपी की रैली में उमड़ी भीड़ ने बता दिया कि तूफान अब ‘सिंहासन’ के बेहद करीब है। 25 जून 1975, दिल्ली का रामलीला मैदान। लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की रैली में जनसैलाब उमड़ पड़ा। जेपी मंच से दहाड़ रहे थे। कुछ देर बाद राज नारायण ने माइक संभाला और बोलना शुरू करते ही बिजली गिरा दी- “अदालत ने मैडम को अयोग्य करार दे दिया है, फिर भी वे कुर्सी से चिपक कर बैठी हैं। कल 26 जून को हम उनके आवास का घेराव करेंगे। याद रहे… याचना नहीं, अब रण होगा।” सभा खत्म हुई और राज नारायण दिल्ली में अपने भगवानदास रोड वाले मकान पर लौट आए। उन्हें लग रहा था कि वे कल इतिहास रचेंगे, पर वे नहीं जानते थे कि मैडम ने इतिहास को ही ‘लॉक’ करने की तैयारी कर ली है। रात के सन्नाटे में राष्ट्रपति भवन की लाइटें जलीं और एक कागज पर दस्तखत होते ही पूरे देश की किस्मत पर कालिख पुत गई। देश में ‘इमरजेंसी’ लागू हो चुकी थी। 26 जून की भोर में राज नारायण के दरवाजे पर पुलिस खड़ी थी। पुलिस अफसर ने कड़ककर कहा- “राज नारायण जी, दिल्ली पुलिस। आप गिरफ्तार हैं।” राज नारायण ठंडी हंसी हंसे- “मैडम डर गईं? चलिए…।” अगले कुछ ही घंटों में विपक्ष के सारे धुरंधर हरियाणा की अलग-अलग जेलों में थे। राज नारायण को हिसार जेल में रखा गया। 10 अगस्त को संसद ने संविधान में 39वां संशोधन किया गया। अनुच्छेद 71 हटाया गया और अनुच्छेद 329 A जोड़ा गया। इसके तहत प्रावधान किया गया कि प्रधानमंत्री के चुनाव को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। नतीजा, अब सुप्रीम कोर्ट इंदिरा गांधी V/S राज नारायण केस की सुनवाई नहीं कर सकता था। हाईकोर्ट का फैसला भी शून्य हो गया। फिर भी आपातकाल का दौर जारी रहा। करीब 19 महीने बाद जब इंदिरा गांधी को विश्वास हो गया कि चुनाव हुए तो भी वही जीतेंगी, तब 18 जनवरी, 1977 को लोकसभा भंग करके आम चुनाव कराने का ऐलान हुआ। इमरजेंसी इसके भी दो महीने बाद 21 मार्च को खत्म हुई। जेल में बंद विपक्षी नेताओं की रिहाई शुरू हुई। राज नारायण के साथ उनके करीबी राज कुमार जैन भी हिसार जेल में बंद थे। राज कुमार की रिहाई का आदेश आ चुका थी, लेकिन राज नारायण का नहीं। राज नारायण ने तीन खुफिया चिट्ठियां लिखीं। राज कुमार को बुलाकर चिटि्ठयां उनकी मुट्ठी में दबा दीं। फिर फुसफुसाते हुए कहा- “राज कुमार, ये विपक्ष का भविष्य हैं। इन्हें चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी और मोरारजी देसाई तक पहुंचा देना। कहना, राज नारायण ने संदेश भेजा है।” “क्या लिखा है इसमें नेताजी?” राज कुमार ने उत्सुकता से पूछा। “इसमें लिखा है कि मैं भले ही जेल में सड़ रहा हूं, लेकिन तुम तीनों को मैदान नहीं छोड़ना है। इंदिरा के खिलाफ चुनाव लड़ना ही होगा, वरना ये देश हमें कभी माफ नहीं करेगा।” राज कुमार जैन रिहा हुए और उन्होंने एक-एक करके तीनों नेताओं के दरवाजे खटखटाए। लेकिन, जवाब सुनकर उनके होश उड़ गए। वाजपेयी चिट्ठी पढ़कर मुस्कुरा दिए। इंदिरा के खिलाफ लड़ना सीधे हार के कुएं में कूदने जैसा था। मोरारजी ने भी पल्ला झाड़ लिया। जैसे ही राज नारायण जेल से बाहर आए। उन्होंने प्रेस के सामने गर्जना की- “अगर कोई नहीं लड़ेगा, तो राज नारायण अकेला लड़ेगा।” ये ऐलान नहीं था, इंदिरा की राजनीतिक हार की शुरुआत थी। 1971 की उस हार का बदला अब रायबरेली की धूल में लिया जाने वाला था। चुनाव की तारीखें नजदीक थीं। दिल्ली के एक कमरे में राज नारायण के एक हितैषी ने उनसे कहा- “राज नारायण, जिद छोड़ो। दो सीटों से पर्चा भरो। प्रतापगढ़ की सीट बिल्कुल सुरक्षित है। हमारी पार्टी का वहां कब्जा है। तुम वहां से आसानी से निकल जाओगे।” राज नारायण ने अपनी मोटी भौहें सिकोड़ीं- “दो सीटें क्यों? क्या मुझे अपनी ताकत पर शक है?” हितैषी ने समझाया- “अरे भाई, इंदिरा पीएम है। अगर दांव उल्टा पड़ गया तो? जनता पार्टी की सरकार बन रही है, तुम्हारा मंत्री बनना तय है। मंत्री बनने के लिए जीतना जरूरी है। प्रतापगढ़ से भी पर्चा भर दो।” राज नारायण कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए और गरज कर बोले- “क्या मैं पद का लोभी दिखता हूं? क्या मैं कुर्सी के लिए राजनीति में आया हूं? मेरा फैसला अटल है… मैं सिर्फ रायबरेली से लड़ूंगा। मैं उस भ्रष्ट महिला को सबक सिखाकर रहूंगा।” चुनाव प्रचार शुरू हो चुका था। रायबरेली की धूल राज नारायण के लिए पराई नहीं थी। एक जनसभा में राज नारायण बोलने पहुंचे। हाथ में एक साधारण सी थैली थी। भीड़ शांत हुई, तो उन्होंने थैली ऊपर उठाकर दिखाई। वे कुछ चबा रहे थे। राज नारायण ने माइक पर तंजिया लहजे में कहा- “देखो भाइयों, हम तो गुड़-चना खाकर गुजारा करते हैं। ये रहा प्रमाण, हम जनता के आदमी हैं। दूसरी तरफ इंदिरा जी हैं- वीआईपी… हमसे अच्छे तो उनके कुत्ते हैं। ऐशो-आराम में रहते हैं। अब वक्त आ गया है कि शाही ठाठ मिट्टी में मिला दें। अब जनता की बारी है।” पूरा मैदान ‘राज नारायण जिंदाबाद’ के नारों से गूंज उठा। सत्ता की चूलें हिलने लगी थीं। वोटिंग के बाद गिनती शुरू हुई। रेडियो पर जो खबर आई, उससे 1 सफदरजंग रोड पर मातम छा गया। राज नारायण को 52% (1,77,719) वोट मिले थे, जबकि सत्ता की स्वामिनी इंदिरा गांधी 35.7% (1,22,517) वोटों पर सिमट गई थीं। *** रेफरेंस The Case That Shook India: The Verdict That Led to the Emergency – Prashant Bhushan | Emergency Retold – Kuldip Nayar | Emergency Chronicles: Indira Gandhi and Democrac y’s Turning Point – Gyan Prakash | राजनारायण एक नाम नहीं इतिहास – शाहनवाज अहमद कादरी | राजनारायण विचार पथ – धीरेंद्र श्रीवास्तव | State of Uttar Pradesh v. Raj Narain (इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला) व्यक्ति: प्रो. आनंद कुमार, सुरेश खैरनार, विजय विद्रोही, धीरेंद्र श्रीवास्तव, शाहनवाज अहमद कादरी। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का उपयोग किया गया है।