राजनीति में कई दिन ऐसे होते हैं, जो दशकों का भविष्य तय कर देते हैं। ये कहानी उस दौर की है, जब सत्ता साझेदारी नहीं, सौदेबाजी पर टिकी थी। एक तरफ मुलायम सिंह सत्ता को सीढ़ी मान रहे थे, दूसरी तरफ कांशीराम आंदोलन की चाबी। बीच में थीं मायावती… जिन्हें पहले दूर रखा गया, फिर कंट्रोल किया गया और आखिर में मिटाने की कोशिश की गई। राजनीति की रंगभूमि में आज पढ़िए कहानी जब एक गेस्ट हाउस रणभूमि बन गया और एक रात ने यूपी की राजनीति को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया… अक्टूबर 1993, दिल्ली का अशोका होटल। कमरा नंबर- 324, बाहर गलियारे में हलचल तेज थी। ये कमरा उद्योगपति जयंत मल्होत्रा का था। कमरे में राजनीति के दो धुरंधर आमने-सामने बैठे थे, मुलायम सिंह यादव और कांशीराम। इनके अलावा उद्योगपति संजय डालमिया भी मौजूद थे। डालमिया ग्लास मेज पर रखते हुए बोले- “मुलायम जी, दुश्मन बड़ा है। अकेले लड़ेंगे तो बीजेपी का रथ सबको रौंद देगा।” मुलायम सिंह ने अपनी छोटी आंखों से कांशीराम को देखा, बोले- “दुश्मन एक है, तो हाथ मिलाने में हर्ज नहीं है। पर सीटें…?” कांशीराम के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आई। फिर कहा- “मुलायम जी, मुझे सीटों की भूख नहीं। मुझे तो उस ‘मास्टर चाबी’ की तलाश है, जिससे दलितों के नसीब का ताला खुले। आप चुनाव लड़िए, हम साथ देंगे।” मल्होत्रा ने मुस्कुराते हुए बीच में टोक दिया- “ये गठबंधन देश की सॉफ्ट लैंडिंग के लिए जरूरी है कांशीराम जी। अमीर-गरीब की खाई बहुत गहरी हो गई है।” समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अब एक ही पाले में थे। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने भी पर्दे के पीछे से आशीर्वाद दे दिया था। अजीब बात ये थी कि इस पूरी बातचीत से कांशीराम ने अपनी सबसे तेज-तर्रार शिष्या मायावती को दूर रखा था। एक करीबी कार्यकर्ता ने दबी जुबान में कांशीराम से पूछा- “साहेब, बहनजी को नहीं बुलाया? वो बुरा मान सकती हैं।” कांशीराम ने धीमी आवाज में कहा- “मायावती का मिजाज तेज है। वो सौदेबाजी की नाजुक डोर तोड़ सकती थी। अभी उसे दूर रखना ही सही है।” मायावती को पश्चिमी यूपी तक सीमित कर दिया गया। नतीजे आए तो दिल्ली से लखनऊ तक के राजनीतिक गलियारों में भूकंप आ गया। मंडल और दलित राजनीति के मेल ने हिंदुत्व के रथ की रफ्तार धीमी कर दी थी। भाजपा 177 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन बहुमत से बहुत दूर। वहीं, सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें मिली थीं। ये गठबंधन भी बहुमत के जादुई आंकड़े (212) से काफी पीछे था, लेकिन कांग्रेस (28) और जनता दल (27) के सहयोग से सरकार बन गई। कांशीराम की 10 साल पुरानी पार्टी देश के सबसे बड़े सूबे की तकदीर लिखने वाली थी। कांशीराम ने ‘मास्टर चाबी’ का एक हिस्सा पकड़ लिया था, लेकिन हवा में एक सवाल अभी तैर रहा था- ये दोस्ती ‘मजबूरी’ की थी या ‘जरूरत’ की…? मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले थे। 27 मंत्रियों में से 11 बसपा के थे। कांशीराम ने मायावती की ओर देखा- “तुम सरकार में शामिल नहीं होगी। तुम्हें सरकार पर लगाम कसनी है।” मायावती की आंखों में एक अलग चमक थी- “बेफिक्र रहिए साहेब। सरकार बसपा के एजेंडे पर चलेगी। एक भी फाइल मेरी नजर से गुजरे बिना नहीं जाएगी।” दिसंबर, 1993 की उस दोपहर लखनऊ की सड़कें जाम थीं। हवा में एक नया गीत गूंज रहा था, जिसे इंदिरा गांधी के करीबी कहे जाने वाले तांत्रिक चंद्रास्वामी के एक पूर्व सहयोगी ने खास मुलायम सिंह की फरमाइश पर लिखा था। इसके बोले थे- “वीर मुलायम चहुं दिश ओर, कांशीराम का लग गया जोर…।” मुलायम ने खुद कहा था- “गाड़ी तभी आगे बढ़ेगी जब गाने में कांशीराम जी का नाम होगा। पार्टनर को खुश रखना जरूरी है।” ये दो अलग-अलग दुनिया का मिलन था। एक तरफ सपा के उग्र और शोर मचाते समर्थक थे, जो जीत के नशे में चूर होकर नाच रहे थे। दूसरी तरफ बसपा के लोग थे- चुपचाप, सहमे हुए, लेकिन आंखों में गजब की चमक। लखनऊ की भरी सर्दी में भी उनमें से कई नंगे पांव थे। इस गठबंधन की नींव तीन अलग-अलग विचारधारा पर टिकी थी, जो एक-दूसरे को बस बर्दाश्त कर रही थी। कांशीराम के लिए ये गठबंधन एक प्रयोगशाला थी। वे मुलायम की विरासत को खास पसंद नहीं करते थे। कांशीराम को भरोसा था कि यूपी का ये प्रयोग पूरे देश में हलचल मचा देगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए मायावती की ओर देखा- “अब मैं पूरे देश का दौरा करने निकलूंगा। लखनऊ की कमान तुम्हारे हाथ में है। संभाल लोगी ना…?” मायावती ने उन्हें भरोसा दिलाते हुए कहा- “आप बेफिक्र रहिए साहेब। लखनऊ मेरी मुट्ठी में होगा।” लेकिन मुलायम सिंह यादव, मंझे हुए खिलाड़ी थे। उन्हें राजनीति का ‘पहलवान’ कहा जाता था। उनके लिए ये गठबंधन सिर्फ सत्ता की सीढ़ी था। मुलायम ने अपने करीबियों से दबी जुबान में कहा- “कांशीराम और ये छोरी अभी कच्चे हैं।” ‘छोरी’ यानी मायावती…। उनके दिमाग में एक और चाल चल रही थी। उन्हें भरोसा था कि आज नहीं तो कल, वे बसपा के विधायकों को तोड़कर अपनी पार्टी में मिला लेंगे और कांशीराम की पूरी टोली को ही निगल जाएंगे। मगर सचिवालय के गलियारों में एक नई गूंज सुनाई देने लगी। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मुलायम सिंह बैठे जरूर थे, लेकिन असली धाक किसी और की थी। कांशीराम ने जानबूझकर उत्तर प्रदेश के मामलों से दूरी बना ली थी। वे समझ चुके थे कि उनकी शिष्या अब उड़ान भरने के लिए तैयार है। अखबारों की सुर्खियों में एक नया नाम उछला- “सुपर सीएम…” एक पत्रकार ने मायावती से पूछा- “बहनजी, लोग आपको सुपर सीएम कहने लगे हैं। क्या ये सच है?” मायावती के चेहरे पर एक सख्त, लेकिन संतुष्ट मुस्कान आई। वे बोलीं- “जनता जो देख रही है, वही कह रही है। बीएसपी इस सरकार की रीढ़ है और रीढ़ ही तय करती है कि शरीर कैसे चलेगा।” मंडल आयोग की रिपोर्ट दोनों पार्टियों के बीच का फेविकोल थी। उन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में भी आरक्षण का दांव खेल दिया। बीजेपी और कांग्रेस के नेता बिलबिला उठे- “पहाड़ों में पिछड़ी जातियां सिर्फ दो प्रतिशत हैं। वहां आरक्षण की राजनीति पागलपन है।” मुलायम सिंह ने अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ जवाब दिया- “हमें प्रतिशत से नहीं, सामाजिक न्याय से मतलब है।” मायावती के लिए ये गठबंधन एक लॉटरी साबित हुआ। 1991 की हार के बाद उन्हें संसद दूर लग रही थी, लेकिन जनवरी 1994 में वे राज्यसभा की सदस्य चुन ली गईं। एक समर्थक ने बधाई देते हुए कहा- “बहनजी, अब आप फिर से संसद में दहाड़ेंगी।” मायावती ने ठंडे लहजे में जवाब दिया- “संसद तो ठीक है, लेकिन अब असली ताकत लखनऊ है। मुझे यूपी के हर जिले में बीएसपी का परचम लहराना है।” उधर, मीडिया में खबरें छपने लगीं कि मुलायम और मायावती के बीच ‘कोल्ड वॉर’ शुरू हो गई है। मायावती ने फौरन मोर्चा संभाला। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा- “ये मनुवादी मीडिया बीजेपी के इशारे पर नाच रहा है। हमारे और मुलायम सिंह जी के बीच कोई दरार नहीं है। ये फूट डालने की साजिश है।” पत्रकार ने पूछा- “लेकिन कांग्रेस और जनता दल तो आपको बिना शर्त समर्थन दे रहे हैं, आप उन्हें भी मनुवादी कह रही हैं?” मायावती ने मेज पर हाथ मारते हुए कहा- “समर्थन देना उनकी मजबूरी है, एहसान नहीं। हमारे बिना वे बीजेपी को नहीं रोक सकते थे। बीजेपी तो पूरे देश पर कब्जा करने का ख्वाब देख रही थी, हमने उसके रथ के पहिए जाम किए हैं।” वहीं, यूपी सचिवालय में एक नया मुहावरा चल पड़ा था- ‘बहनजी का आदेश।’ मायावती को सुपर सीएम कहलाना पसंद था और वो इसे साबित भी करती थीं। अक्सर डंके की चोट पर कहतीं- “मैं मुख्यमंत्री से चर्चा नहीं करती, कभी-कभी उन्हें निर्देश भी देती हूं।” हकीकत ये थी कि मुलायम सिंह महिला नेताओं के साथ वैसे भी असहज रहते थे। मायावती के आक्रामक तेवर ने उन्हें और भी दूर कर दिया था। मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव पीएल पुनिया (पन्नालाल पुनिया) दोनों के बीच ब्रिज की तरह काम करते थे। पुनिया के पास अक्सर मायावती की मांगों की एक लंबी फेहरिस्त पहुंचती। “पुनिया साब, ये तबादलों की लिस्ट है, शाम तक ऑर्डर हो जाने चाहिए।” फोन पर मायावती की आवाज किसी सेनापति जैसी होती। लिस्ट में सिर्फ तबादले नहीं, दलितों पर हो रहे अत्याचारों की शिकायतें भी होती थीं और ये शिकायतें हवा-हवाई नहीं थीं। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग की फाइलें चीख-चीखकर गवाही दे रही थीं कि गठबंधन सरकार में दलितों की हालत क्या हो गई है। 1989-90 में जहां दलितों पर अत्याचार के सिर्फ 1067 मामले दर्ज थे, वहीं 1995 में आंकड़ा 14 हजार 966 पर पहुंच चुका था। मायावती ने रिपोर्ट देखकर भड़कते हुए कहा- “ये देखिए पुनिया साब, हमारी सरकार होने के बावजूद अत्याचार 10 गुना बढ़ गए हैं? क्या यही हमारा सामाजिक न्याय है?” पुनिया ने रिपोर्ट सामने रखी- “बहनजी, ज्यादातर हमलों में ब्राह्मण-ठाकुर नहीं, यादव शामिल हैं।” मायावती सन्न रह गईं। जिन पिछड़ी जातियों के साथ मिलकर उन्होंने ‘सामाजिक न्याय’ का सपना बुना था, वही यादव अब दलितों के खिलाफ हिंसा पर उतर आए थे। मायावती ने मुट्ठी भींचते हुए खुद से कहा- ” ये गठबंधन अब न्याय नहीं, सिर्फ एक मजबूरी का सौदा रह गया है।” पुनिया के माथे पर पसीना आ गया। वे भाग-दौड़ करते, पर मुख्यमंत्री का अपना वोटबैंक था। वे अपने समर्थकों को नाराज नहीं कर सकते थे। मुलायम सिंह के एक करीबी अधिकारी ने दबी जुबान में बताया- “जैसे ही मायावती की लिस्ट आती, पुनिया साब के चेहरे पर तनाव साफ दिखता।” मुख्यमंत्री की अपनी मजबूरियां थीं। हालत ये थी कि सपा समर्थक गांव प्रधान भी मुख्यमंत्री कोष से बीएसपी के कैबिनेट मंत्री से ज्यादा फंड हथिया लेता था। कांशीराम ने इस खींचतान में घी डालने का काम किया। वो कभी मुख्यमंत्री से मिलने नहीं जाते, बल्कि जोर देते थे कि मुलायम सिंह खुद स्टेट गेस्ट हाउस आएं। मुलायम पूरी तैयारी और औपचारिक वेशभूषा में वहां पहुंचते, पर कांशीराम उन्हें ‘औकात’ दिखाने का खेल खेलते। रिसेप्शन पर खड़े मुख्यमंत्री को आधा-आधा घंटा इंतजार कराया जाता। फिर कांशीराम नीचे आते- बिखरे बाल, बदन पर सिर्फ एक बनियान और लुंगी। ये मुख्यमंत्री की सरेआम बेइज्जती थी, वो भी कैमरों के सामने। मुलायम सिंह ये अपमान जहर के घूंट की तरह पी रहे थे। उन्होंने बाहर कोई शोर नहीं मचाया, लेकिन भीतर ही भीतर एक खतरनाक योजना पर काम शुरू कर दिया। मुलायम सिंह ने जान लिया था कि सीधी लड़ाई से काम नहीं चलेगा। उन्होंने बीएसपी के उन पुराने दिग्गजों को टटोलना शुरू किया जो मायावती के बढ़ते कद से जल रहे थे। नाम सामने आए- डॉ. मसूद अहमद, जंग बहादुर पटेल और राज बहादुर। मुलायम सिंह ने अपने प्यादे भेजे- “क्यों बहनजी के पीछे अपनी सियासत बर्बाद कर रहे हो? हमारे साथ आओ, सम्मान भी मिलेगा और सत्ता भी।” मुलायम की ये चाल कामयाब रही। बीएसपी का संगठन अंदर से दरकने लगा। विधायक टूटने के लिए तैयार थे। कांशीराम और मायावती को लग रहा था कि वे मुलायम को झुका रहे हैं, पर वे नहीं जानते थे कि मुलायम उनके पैरों के नीचे से उनकी अपनी ही जमीन खींच रहे थे। 1995 की शुरुआत में हुए पंचायत चुनाव कांशीराम और मायावती के लिए झटके की तरह थे। 50 में से 30 जिलों पर मुलायम सिंह की सपा ने कब्जा कर लिया। कांग्रेस और बीजेपी ने भी कुछ सीटें झटक लीं, लेकिन बीएसपी के हाथ लगा सिर्फ एक जिला। मुलायम सिंह अपनी जीत के नशे में एक बहुत बड़ा गणित भूल रहे थे- अटल बिहारी वाजपेयी और कांशीराम की दोस्ती। 1991 में जब कांशीराम संसद पहुंचे, तो वाजपेयी उन पहले बड़े नेताओं में थे, जिन्होंने हाथ आगे बढ़ाया था। एक शाम वाजपेयी के बंगले पर चाय का दौर चल रहा था। कांशीराम सामने बैठे थे। वाजपेयी ने मंद मुस्कान के साथ कहा- “कांशीराम जी, राजनीति में दुश्मन कोई नहीं होता, सिर्फ संभावनाएं होती हैं।” कांशीराम ने जवाब दिया- “अटल जी, हम तो उस मास्टर चाबी की तलाश में हैं जो दलितों के भाग्य खोल दे।” वाजपेयी की पारखी नजरों ने भांप लिया था कि अगर यूपी में बीजेपी को फिर से सत्ता की दहलीज पार करनी है, तो दलितों का साथ जरूरी है। संघ प्रमुख राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) ने भी इस पर मुहर लगा दी। मुलायम सिंह को यकीन था कि हिंदुत्व और बहुजन विचारधारा कभी एक नहीं हो सकते। वे निश्चिंत थे, इस बात से बेखबर कि अटल बिहारी वाजपेयी के ड्रॉइंग रूम में उनकी सरकार का डेथ-वारंट पहले ही लिखा जा चुका था। 1995 की गर्मियां लखनऊ के लिए आग लेकर आई थीं। कांशीराम अस्पताल के बिस्तर पर थे। पुरानी डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर ने शरीर तोड़ दिया था, लेकिन दिमाग अभी भी बिजली की तरह चल रहा था। अस्पताल के उस सफेद कमरे में उद्योगपति जयंत मल्होत्रा की मौजूदगी इस बात का सबूत थी कि बड़ा खेल होने वाला है। कांशीराम ने वाजपेयी के साथ अपनी पुरानी दोस्ती का पत्ता फेंका। वाजपेयी ने आडवाणी और कल्याण सिंह को एक ऐसी योजना पर राजी कर लिया, जो मुलायम सिंह के पैरों के नीचे से कालीन खींचने वाली थी। हैरानी की बात ये थी कि मायावती को आखिरी पल तक इसकी भनक नहीं थी। कांशीराम ने मायावती को अस्पताल बुलाया। मायावती की आंख में आंसू थे। उन्होंने कांशीराम का हाथ पकड़कर कहा- “साहेब, अगर आपको कुछ हो गया तो हमारा क्या होगा? ये आंदोलन कौन संभालेगा?” कांशीराम ने नर्स को बाहर जाने का इशारा किया और धीमी आवाज में पूछा- “तुम मुख्यमंत्री बनना चाहोगी?” मायावती सन्न रह गईं। उन्हें लगा ‘साहेब’ बीमारी में बहक रहे हैं। कांशीराम ने फाइलों का एक पुलिंदा उनकी ओर खिसकाया और कहा- “ये लो और सीधे राज्यपाल के पास जाओ। वो तुम्हें शपथ दिलाएंगे।” 1 जून, 1995 की दोपहर जैसे ही खबर आई कि मायावती राज्यपाल मोतीलाल वोरा से मिली हैं और समर्थन वापसी का पत्र सौंपा है, मुख्यमंत्री कार्यालय में सन्नाटा पसर गया। मुलायम सिंह का गुस्सा सातवें आसमान पर था। ये गुस्सा दूसरों से ज्यादा खुद पर था। मुलायम को लगा था कि कांशीराम बीमार हैं तो कोई हलचल नहीं होगी, पर यहीं वे गच्चा खा गए। मुलायम के एक पुराने वफादार ने उनके कान में फुसफुसाया- “नेताजी, बीएसपी के विधायक हमारी जेब में हैं। बस थोड़ा डराना होगा ताकि ये सरकार बनाने का दावा ही छोड़ दें।” 2 जून, शाम करीब 4 बजे हजरतगंज में स्टेट गेस्ट हाउस के कमरा नंबर- 1 में मायावती अपने खास रणनीतिकारों के साथ बैठी थीं। तभी बाहर एक ऐसा शोर उठा, जिसने लखनऊ की रूह कंपा दी। समाजवादी पार्टी के करीब 200 समर्थक जिनमें विधायक भी थे, गेट तोड़कर भीतर दाखिल हो चुके थे। हवा में गालियां और नफरत का तेजाब घुला था। वे चिल्ला रहे थे- “@#$% के दिमाग सातवें आसमान पर हैं, आज इन्हें जमीन दिखानी होगी।” कॉमन हॉल में बैठे बीएसपी विधायक जान बचाने के लिए इधर-उधर भागे, पर उन्हें दबोच लिया गया। थप्पड़, लात और घूसे… सब-कुछ सरेआम हो रहा था। पांच विधायकों को जानवरों की तरह घसीटते हुए गाड़ियों में डालकर सीधे मुख्यमंत्री आवास ले गए। वहां बंद कमरे में कोरे कागजों पर दस्तखत का खेल शुरू हुआ- “साइन करो कि तुम हमारे के साथ हो, वरना घर की सूरत नहीं देख पाओगे।” उधर, गेस्ट हाउस के हॉल में तोड़फोड़ के बाद हमलावर कमरा नंबर- 1 की ओर बढ़े। बीएसपी नेता आरके चौधरी किसी तरह जान बचाकर कमरे में घुसे और उनके निजी सुरक्षा गार्ड लालचंद ने फौरन कुंडी चढ़ा दी। बाहर खड़ी भीड़ अब दरिंदों की तरह दरवाजे को पीट रही थी। उनमें शामिल कुछ महिलाएं चीख रही थीं- “उस @#$% को बाहर घसीटो, देखो आज उसका क्या हाल करते हैं।” दरवाजे पर पड़ते हर वार के साथ मायावती का गला सूख रहा था। वहीं, बाहर खड़े सीनियर पुलिस अफसर सिगरेट के छल्ले उड़ा रहे थे। अचानक गेस्ट हाउस की बिजली और टेलीफोन लाइन काट दी गई। उस अंधेरे गलियारे में सिर्फ गालियां, धमकियां और दरवाजा टूटने की डरावनी आवाजें थीं। तभी दो जांबाज पुलिस अफसर विजय भूषण और सुभाष सिंह दीवार बनकर खड़े हो गए। उन्होंने अपनी जान की बाजी लगा दी। भीड़ उन्हें रौंदने को तैयार थी, पर वे टस से मस नहीं हुए। अगर वे दो मिनट और न रुकते, तो उस कमरे का दरवाजा टूट चुका होता। हालात हाथ से निकल चुके थे, तभी जिलाधिकारी राजीव खेर मौके पर पहुंचे। ऊपर से फोन पर धमकियां मिल रही थीं। खेर ने फोन पटक दिया और गरज कर बोले- “लाठीचार्ज…” भीड़ तितर-बितर हुई, पर फर्ज निभाने की कीमत राजीव खेर को चुकानी पड़ी। रात 11 बजे ही उनका तबादला हो गया। मायावती को इतना डर गई थीं कि सपा समर्थकों के जाने के कई घंटों बाद तक दरवाजा नहीं खोला। उस शाम ने मायावती के भीतर के ‘स्टील’ को वो धार दी कि वे भारतीय राजनीति की ‘आयरन लेडी’ बन गईं। अस्पताल के बिस्तर पर पड़े कांशीराम ने खबर सुनी तो धीमे से बोले- “मायावती, सियासी वहशत की आग तपकर आज कुंदन बन गई हो।” 3 जून, राजभवन- लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस की उस काली शाम के ठीक अगले दिन, लखनऊ की हवाएं बदली हुई थीं। कल जो महिला अपनी जान बचाने के लिए एक कमरे में कैद थी, आज प्रदेश की किस्मत लिखने जा रही थी। राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने मायावती को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। बिना किसी प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक विरासत के एक दलित महिला देश के सबसे बड़े सूबे की ‘हुक्मरान’ बन चुकी थी। फिर भी असली जंग अभी बाकी थी, विधानसभा का फ्लोर टेस्ट…। 19 जून मुलायम सिंह के हाथ से सत्ता जा चुकी थी, लेकिन उनके पास एक ‘ट्रंप कार्ड’ अभी भी था- विधानसभा स्पीकर धनीराम वर्मा। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही धनीराम ने एक ऐसा बम फोड़ा, जिसने सबको सन्न कर दिया। उन्होंने अपनी कुर्सी से ऐलान किया- “राज्यपाल का मुलायम सरकार को हटाना और मायावती को सीएम करना पूरी तरह ‘असंवैधानिक’ है। ये सदन स्थगित किया जाता है।” इतना कहकर वे और समाजवादी पार्टी के विधायक सदन से बाहर निकल गए। उन्हें लगा खेल खत्म हो गया, पर असली खेल तो अब शुरू हुआ था। सदन में मौजूद बाकी 275 सदस्यों ने हार नहीं मानी। अगले दिन बीएसपी विधायक बरखूराम वर्मा को विधानसभा का नया अध्यक्ष चुन लिया। सपा और विद्रोही गुट बाहर तमाशा देखते रह गया और अंदर मायावती के पक्ष में समर्थन का सैलाब उमड़ पड़ा। कांग्रेस, भाजपा, जनता दल और यहां तक कि सपा के 13 बागियों ने भी मायावती का साथ दिया। मुलायम सिंह यादव अब पूरी तरह अलग-थलग पड़ चुके थे। अगले दिन वोटिंग से ठीक पहले सदन का माहौल गर्म हो गया। राजनीति के चतुर खिलाड़ी कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी ने भाजपा के कल्याण सिंह को घेरा- “कल्याण जी, साफ बताइए, ये सरकार कब तक चलेगी?” कल्याण सिंह, वाजपेयी और जोशी की वजह से भारी मन के साथ गठबंधन के लिए राजी हुए थे। उन्होंने प्रमोद तिवारी पर निशाना साधा- “तिवारी जी, आप महाभारत के ‘शकुनी’ जैसा किरदार निभाना बंद कीजिए। मायावती तब तक पद पर रहेंगी, जब तक दिल्ली में बैठी आपकी कांग्रेस सरकार उन्हें नहीं हटाती।” इसके बाद बारी थी मायावती की। उन्होंने मोर्चा संभाला तो उनकी आवाज में वो ‘स्टील’ था, जो गेस्ट हाउस की आग में तपकर निकला था। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी और नरसिंह राव का शुक्रिया अदा किया, पर अपने असली दुश्मन को नहीं भूलीं। मायावती ने न केवल बहुमत साबित किया, बल्कि ये भी बता दिया कि अब लखनऊ में ‘साहेब’ नहीं, ‘बहनजी’ का राज चलेगा। राजनीति की रंगभूमि पर एक और अध्याय का अंत हुआ। जिस महिला को ‘हिस्टीरिकल’ (बेलगाम) कहकर खारिज किया गया, उसने अपनी जिद और संघर्ष से इतिहास के पन्नों को पलट दिया। लखनऊ के सिंहासन पर अब एक ऐसी ‘आयरन लेडी’ बैठी थी, जिसकी हुकूमत की गूंज आने वाले दशकों तक भारतीय राजनीति के गलियारों मे सुनाई देने वाली थी। *** रेफरेंस
Behenji: A Political Biography of Mayawati Kindle Edition – Ajoy Bose | Crime, Grime Gumption: Case Files of an IPS Officer – O.P. Singh | मेरे संघर्षमय जीवन एवं बहुजन आंदोलन का सफरनामा – मायावती | तत्कालीन संस्करण माया मैग्जीन, इंडिया टुडे। सीनियर जर्नलिस्ट- नवल किशोर सिन्हा | दयानंद पांडे | हरीश मिश्रा | कई चश्मदीदों ने नाम ने छापने की शर्त पर भी जानकारी दी। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। ———————————————————– सीरीज की ये स्टोरी भी पढ़ें… इंदिरा पर लगा था ‘वोट चोरी’ का आरोप; राज नारायण बोले- बैलेट पर जादुई स्याही थी, कांग्रेस निशान अपने आप उभर आता है दिसंबर, 1970 की वो रात दिल्ली की हड्डियों में कंपकंपी पैदा कर रही थी। राष्ट्रपति भवन के भीतर जो लावा उबल रहा था, उसने पूरे देश की राजनीति को झुलसा दिया। अचानक खबर आई- लोकसभा भंग हुई। वक्त से एक साल पहले चुनाव होंगे। विपक्ष ने कहा- “मैडम ने मास्टरस्ट्रोक खेला है।” पूरी स्टोरी पढ़ें…
Behenji: A Political Biography of Mayawati Kindle Edition – Ajoy Bose | Crime, Grime Gumption: Case Files of an IPS Officer – O.P. Singh | मेरे संघर्षमय जीवन एवं बहुजन आंदोलन का सफरनामा – मायावती | तत्कालीन संस्करण माया मैग्जीन, इंडिया टुडे। सीनियर जर्नलिस्ट- नवल किशोर सिन्हा | दयानंद पांडे | हरीश मिश्रा | कई चश्मदीदों ने नाम ने छापने की शर्त पर भी जानकारी दी। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। ———————————————————– सीरीज की ये स्टोरी भी पढ़ें… इंदिरा पर लगा था ‘वोट चोरी’ का आरोप; राज नारायण बोले- बैलेट पर जादुई स्याही थी, कांग्रेस निशान अपने आप उभर आता है दिसंबर, 1970 की वो रात दिल्ली की हड्डियों में कंपकंपी पैदा कर रही थी। राष्ट्रपति भवन के भीतर जो लावा उबल रहा था, उसने पूरे देश की राजनीति को झुलसा दिया। अचानक खबर आई- लोकसभा भंग हुई। वक्त से एक साल पहले चुनाव होंगे। विपक्ष ने कहा- “मैडम ने मास्टरस्ट्रोक खेला है।” पूरी स्टोरी पढ़ें…