राहुल गांधी आज लखनऊ आ रहे हैं। वह 4 हजार लोगों से सीधे बात करेंगे। मौका है कांशीराम जयंती से 2 दिन पहले कांग्रेस के मेगा इवेंट का। ऐसा पहली बार होगा कि राहुल गांधी कांशीराम को लेकर कोई बड़ा इवेंट लखनऊ में करने जा रहे हैं। कांग्रेस की प्रदेश कमेटी, एससी-एसटी और OBC प्रकोष्ठ के पदाधिकारी गोमतीनगर के इंदिरागांधी प्रतिष्ठान में जुटेंगे। लेकिन, यहां आम लोग बुलाए नहीं गए हैं। दलित वोटर की सियासत में कांग्रेस का यह बड़ा कदम माना जा रहा है। दूसरी तरफ, सपा भी कांशीराम जयंती को PDA दिवस के रूप में मनाने का ऐलान कर चुकी है। यूपी के 75 जिलों में पार्टी के जिला मुख्यालयों पर 15 मार्च को कार्यक्रम होंगे। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस और सपा को 2024 की तरह 2027 में भी दलितों का समर्थन मिलेगा? 9 अक्टूबर, 2025 की लखनऊ रैली के बाद बसपा से वापस जुड़ रहे दलित का क्या मन बदल पाएंगे? यूपी की सियासत में दलित वोटर क्यों इतने जरूरी हैं? इस रिपोर्ट में पढ़िए…
कांग्रेस को चाहिए यूपी में मुस्लिम-दलित वोट
सीनियर जर्नलिस्ट हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- राहुल गांधी इस देश में मुस्लिम-दलित की राजनीति करना चाहते हैं। इसकी वजह भी है। आज की तारीख में कांग्रेस के पास खुद का कोई वोटबैंक बचा नहीं है। कांग्रेस चाहती है कि उसे मुस्लिमों और दलितों का पूरा समर्थन मिले। ये दोनों वोटबैंक अकेले 40% हो जाते हैं। ये भी सच है कि इस वोटबैंक के बिना कांग्रेस इस देश की सत्ता पर नहीं पहुंच सकती। राहुल गांधी दलित को पीड़ित दिखाकर उनका समर्थन हासिल करना चाहते हैं। देश में किसी दलित पर हमला होता है, तो राहुल गांधी या कांग्रेस के लोग सबसे पहले उससे मिलने की कोशिश करते हैं। रायबरेली में भीड़ ने फतेहपुर के दलित को पीट-पीटकर मार दिया था। तब और हरियाणा में दलित आईपीएस के सुसाइड के मामले में ऐसा दिखा भी है। राहुल दलितों के बीच ये संदेश देना चाहते हैं कि कांग्रेस उनके साथ खड़ी है। अखिलेश ने ऐलान किया, कांशीराम जयंती मनाएंगे
सीनियर जर्नलिस्ट हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- सपा प्रमुख अखिलेश यादव को भी यह बात समझ में आ चुकी है कि सिर्फ ओबीसी और मुस्लिम के समर्थन से सरकार नहीं बना सकते। ओबीसी के नाम पर सपा के साथ पूरी तरह से यादव समाज ही खड़ा है। ओबीसी की दूसरी जातियों का समर्थन उन्हें छिटपुट ही मिल रहा है। जबकि, गैर यादव ओबीसी समूह का बड़ा समर्थन मौजूदा समय में भाजपा के साथ जुड़ चुका है। इसलिए यूपी की सत्ता में वापसी करने के लिए दलितों का समर्थन हर हाल में चाहिए। बसपा-भाजपा के दबाव में, इसका दूसरी पार्टियों को फायदा
हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- मौजूदा समय में बसपा सबसे कमजोर हालत में है। लोकसभा में उसका कोई भी सदस्य नहीं। यूपी के विधानसभा में मात्र एक विधायक है। राज्यसभा में भी दिसंबर के बाद उसके जीरो होने का आसार हैं। सपा-कांग्रेस दोनों ही पार्टियों को लगता है कि कमजोर बसपा का वो विकल्प बन सकती हैं। दोनों पार्टियां बसपा को भले ही कमजोर कहने से बचती हैं, लेकिन मायावती पर भाजपा के दबाव में काम करने के आरोप लगाकर इसी कमजोरी को उजागर करने की कोशिश करती हैं। क्या बसपा वाकई कमजोर है? हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- ऐसा नहीं है। मायावती भले ही खुद बहुत ज्यादा नहीं निकलती हों, लेकिन उनका संगठन जमीनी स्तर पर सक्रिय है। पार्टी के कोऑर्डिनेटर खामोशी से संगठन का काम कर रहे हैं। 9 अक्टूबर, 2025 को लखनऊ में कांशीराम की पुण्यतिथि पर उमड़ी लाखों की भीड़ इसकी बानगी भी है। बसपा का कोर वोटर्स फिर तेजी से जुड़ रहा। एक्सपर्ट बोले- सिर्फ फोटो लगा लेने से दलित वोट नहीं मिलेगा
दलित चिंतक एवं जेएनयू में प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं- दलित समाज के जो भी आइकन हैं, उन्हें किसी पार्टी ने कभी वैधता नहीं दी थी। बहुजन समाज अपने नायक-नायिकाओं को संघर्षों और आंदोलनों से पहचानता है। सिर्फ फोटो लगा लेने से इन वर्गों का समर्थन हासिल कर लेंगे, तो ये उनकी भूल है। यूपी में दलित वोटर्स की ताकत समझिए यूपी में 21% दलित वोटर हैं। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में 84 एससी के लिए रिजर्व हैं। इसके अलावा 40-50 ऐसी सीटें हैं, जहां दलित 20% से 30% वोटर हैं। मतलब, प्रदेश की 130 सीटों पर दलित निर्णायक असर रखते हैं। दलितों के समर्थन और विरोध में होने से कैसे यूपी की सियासत में बाजी पलट जाती है? इसे समझने के लिए हमें 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के रिजल्ट को देखना होगा। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने 84 रिजर्व सीटों में 63 जीत ली थीं। वहीं, सपा को 20 सीटों पर सफलता मिली थी। 1 सीट राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के खाते में गई थी। 2024 का लोकसभा चुनाव यूपी में संविधान खतरे में है, के साए में हुआ। तब प्रदेश की 17 रिजर्व सीटों में सपा और कांग्रेस गठबंधन ने भाजपा के बराबर 8 सीटें जीत ली थीं। वहीं 1 सीट नगीना की आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर ने जीती थी। सपा ने सामान्य कोटे में आने वाली अयोध्या की प्रतिष्ठा वाली सीट भी दलित चेहरे अवधेश प्रसाद को उतारकर जीत ली थी। इसी का परिणाम रहा कि यूपी में एनडीए की सीटों की संख्या 36 पर सिमट गई। सपा-कांग्रेस का महागठबंधन 43 सीटों पर जीतने में कामयाब रहा। महागठबंधन इसी सफलता को 2027 के विधानसभा चुनाव में भी दोहराना चाहता है। हालांकि खराब प्रदर्शन के बावजूद 2024 के लोकसभा में बसपा को यूपी में 9.84% वोट मिले थे। दलितों में जाटव बसपा के कोर वोटर्स माने जाते हैं। जबकि पासवान, धोबी, कोरी और वाल्मीकि समाज का झुकाव अब भाजपा की ओर है। यूपी के दलितों में किस उपजाति के कितने वाेटर्स ————————- यह खबर भी पढ़ें- यूपी में भाजपा के 54% जिलाध्यक्ष सवर्ण, सपा में 70% मुस्लिम-यादव, बसपा में 92% दलित; जानिए जातीय गणित उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति सबसे बड़ा समीकरण होता है। पार्टियां भले ही सर्वसमाज की राजनीति का दावा करें, लेकिन संगठन में जिम्मेदारी देते समय उनका भरोसा अब भी अपने कोर वोट बैंक पर ही टिका है। ये रिपोर्ट में पढ़िए…
कांग्रेस को चाहिए यूपी में मुस्लिम-दलित वोट
सीनियर जर्नलिस्ट हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- राहुल गांधी इस देश में मुस्लिम-दलित की राजनीति करना चाहते हैं। इसकी वजह भी है। आज की तारीख में कांग्रेस के पास खुद का कोई वोटबैंक बचा नहीं है। कांग्रेस चाहती है कि उसे मुस्लिमों और दलितों का पूरा समर्थन मिले। ये दोनों वोटबैंक अकेले 40% हो जाते हैं। ये भी सच है कि इस वोटबैंक के बिना कांग्रेस इस देश की सत्ता पर नहीं पहुंच सकती। राहुल गांधी दलित को पीड़ित दिखाकर उनका समर्थन हासिल करना चाहते हैं। देश में किसी दलित पर हमला होता है, तो राहुल गांधी या कांग्रेस के लोग सबसे पहले उससे मिलने की कोशिश करते हैं। रायबरेली में भीड़ ने फतेहपुर के दलित को पीट-पीटकर मार दिया था। तब और हरियाणा में दलित आईपीएस के सुसाइड के मामले में ऐसा दिखा भी है। राहुल दलितों के बीच ये संदेश देना चाहते हैं कि कांग्रेस उनके साथ खड़ी है। अखिलेश ने ऐलान किया, कांशीराम जयंती मनाएंगे
सीनियर जर्नलिस्ट हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- सपा प्रमुख अखिलेश यादव को भी यह बात समझ में आ चुकी है कि सिर्फ ओबीसी और मुस्लिम के समर्थन से सरकार नहीं बना सकते। ओबीसी के नाम पर सपा के साथ पूरी तरह से यादव समाज ही खड़ा है। ओबीसी की दूसरी जातियों का समर्थन उन्हें छिटपुट ही मिल रहा है। जबकि, गैर यादव ओबीसी समूह का बड़ा समर्थन मौजूदा समय में भाजपा के साथ जुड़ चुका है। इसलिए यूपी की सत्ता में वापसी करने के लिए दलितों का समर्थन हर हाल में चाहिए। बसपा-भाजपा के दबाव में, इसका दूसरी पार्टियों को फायदा
हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- मौजूदा समय में बसपा सबसे कमजोर हालत में है। लोकसभा में उसका कोई भी सदस्य नहीं। यूपी के विधानसभा में मात्र एक विधायक है। राज्यसभा में भी दिसंबर के बाद उसके जीरो होने का आसार हैं। सपा-कांग्रेस दोनों ही पार्टियों को लगता है कि कमजोर बसपा का वो विकल्प बन सकती हैं। दोनों पार्टियां बसपा को भले ही कमजोर कहने से बचती हैं, लेकिन मायावती पर भाजपा के दबाव में काम करने के आरोप लगाकर इसी कमजोरी को उजागर करने की कोशिश करती हैं। क्या बसपा वाकई कमजोर है? हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- ऐसा नहीं है। मायावती भले ही खुद बहुत ज्यादा नहीं निकलती हों, लेकिन उनका संगठन जमीनी स्तर पर सक्रिय है। पार्टी के कोऑर्डिनेटर खामोशी से संगठन का काम कर रहे हैं। 9 अक्टूबर, 2025 को लखनऊ में कांशीराम की पुण्यतिथि पर उमड़ी लाखों की भीड़ इसकी बानगी भी है। बसपा का कोर वोटर्स फिर तेजी से जुड़ रहा। एक्सपर्ट बोले- सिर्फ फोटो लगा लेने से दलित वोट नहीं मिलेगा
दलित चिंतक एवं जेएनयू में प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं- दलित समाज के जो भी आइकन हैं, उन्हें किसी पार्टी ने कभी वैधता नहीं दी थी। बहुजन समाज अपने नायक-नायिकाओं को संघर्षों और आंदोलनों से पहचानता है। सिर्फ फोटो लगा लेने से इन वर्गों का समर्थन हासिल कर लेंगे, तो ये उनकी भूल है। यूपी में दलित वोटर्स की ताकत समझिए यूपी में 21% दलित वोटर हैं। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में 84 एससी के लिए रिजर्व हैं। इसके अलावा 40-50 ऐसी सीटें हैं, जहां दलित 20% से 30% वोटर हैं। मतलब, प्रदेश की 130 सीटों पर दलित निर्णायक असर रखते हैं। दलितों के समर्थन और विरोध में होने से कैसे यूपी की सियासत में बाजी पलट जाती है? इसे समझने के लिए हमें 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के रिजल्ट को देखना होगा। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने 84 रिजर्व सीटों में 63 जीत ली थीं। वहीं, सपा को 20 सीटों पर सफलता मिली थी। 1 सीट राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के खाते में गई थी। 2024 का लोकसभा चुनाव यूपी में संविधान खतरे में है, के साए में हुआ। तब प्रदेश की 17 रिजर्व सीटों में सपा और कांग्रेस गठबंधन ने भाजपा के बराबर 8 सीटें जीत ली थीं। वहीं 1 सीट नगीना की आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर ने जीती थी। सपा ने सामान्य कोटे में आने वाली अयोध्या की प्रतिष्ठा वाली सीट भी दलित चेहरे अवधेश प्रसाद को उतारकर जीत ली थी। इसी का परिणाम रहा कि यूपी में एनडीए की सीटों की संख्या 36 पर सिमट गई। सपा-कांग्रेस का महागठबंधन 43 सीटों पर जीतने में कामयाब रहा। महागठबंधन इसी सफलता को 2027 के विधानसभा चुनाव में भी दोहराना चाहता है। हालांकि खराब प्रदर्शन के बावजूद 2024 के लोकसभा में बसपा को यूपी में 9.84% वोट मिले थे। दलितों में जाटव बसपा के कोर वोटर्स माने जाते हैं। जबकि पासवान, धोबी, कोरी और वाल्मीकि समाज का झुकाव अब भाजपा की ओर है। यूपी के दलितों में किस उपजाति के कितने वाेटर्स ————————- यह खबर भी पढ़ें- यूपी में भाजपा के 54% जिलाध्यक्ष सवर्ण, सपा में 70% मुस्लिम-यादव, बसपा में 92% दलित; जानिए जातीय गणित उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति सबसे बड़ा समीकरण होता है। पार्टियां भले ही सर्वसमाज की राजनीति का दावा करें, लेकिन संगठन में जिम्मेदारी देते समय उनका भरोसा अब भी अपने कोर वोट बैंक पर ही टिका है। ये रिपोर्ट में पढ़िए…