शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद 6 दिन से माघ मेला में धरने पर बैठे हैं। वो कहते हैं- मुस्लिमों में जो धर्मगुरु होता है, वही खलीफा (राष्ट्र का अध्यक्ष) होता है। हिंदू धर्म में खलीफा परंपरा को लाया जा रहा है। सनातन में कालनेमि वाले बयान पर शंकराचार्य ने कहा- चोला तो साधु का है और गोहत्या हो रही है। अब आप बताइए कि कालनेमि कौन है? केशव प्रसाद मौर्य के विवाद को विराम देने के निवेदन पर वह कहते हैं- ये BJP की प्रारंभिक भावना को प्रदर्शित करने वाला बयान है, मगर आज वाली BJP लोगों को स्वीकार नहीं। गंगा स्नान पर वह कहते हैं- आदर से स्नान की परंपरा है, निरादर से स्नान की परंपरा नहीं है। रामभद्राचार्य ने कहा- एडमिनिस्ट्रेशन ने नोटिस देकर सही किया, इसपर शंकराचार्य ने कहा- उनकी बात मत करिए, वो दोस्ती निभा रहे हैं। पढ़िए पूरा इंटरव्यू… सवाल : योगी कहते हैं, कुछ लोग सनातन को कमजोर कर रहे, इशारा आपकी तरफ?
जवाब : हां, कुछ लोग सनातन को कमजोर कर रहे हैं, ये बिल्कुल सही है। सनातन में परंपरा रही है कि राजा और धर्माचार्य अलग होते थे। राजगुरु होते थे, राजा खुद गुरू नहीं होते थे। ये मुस्लिमों में परंपरा है, वहां खलीफा परंपरा है। इसके मायने हैं कि जो राष्ट्र का अध्यक्ष होता है, वही धर्मगुरु भी होता है। हिंदू धर्म में खलीफा परंपरा को लाने का प्रयास किया जा रहा है। जो राजा है, वहीं गुरू भी है। जो लोग हिंदू धर्म में खलीफा परंपरा लेकर आ रहे हैं, वही लोग हिंदू धर्म को कमजोर कर रहे हैं। सवाल : योगी ने कालनेमि का जिक्र किया, जो धर्म को नष्ट कर रहा है?
जवाब : भई, कालनेमि कौन है? कालनेमि राक्षस था और साधु बनकर सामने दिखाई दे रहा था। राक्षस क्या करता था, ब्राह्मण, मानव, गायों को मार दे, चोला साधु का पहनता है। यहां देखिए, चोला तो साधु का है और गोहत्या हो रही है। अब आप बताइए कि कालनेमि कौन है, बताइए। सवाल : केशव मौर्य ने आपसे कहा कि स्नान करके मामले को विराम दें?
जवाब : ये वो वाली BJP है, जो शुरू में आई थी कि हम हिंदुओं के लिए काम करेंगे। केशव प्रसाद मौर्य ने उसी BJP की प्रारंभिक भावना का प्रदर्शन किया है, जो स्वागत योग्य है। इसी BJP को लोगों ने अपनाया था। ये वाली जो BJP अब आ गई है हम जो चाहेंगे वो करेंगे, कोई कुछ भी कहे, हम सुनेंगे ही नहीं। ये वाली BJP लोगों को स्वीकार नहीं है। सवाल : आपने कहा कि पहले मौनी का स्नान, फिर बंसत का, आजका दिन बीता, कल कौन सा?
जवाब : मौनी अमावस्या के दिन, जब सुबह हम अपने शिविर से निकलते थे, तब इस आशय के साथ निकले थे कि हम संगम जाएंगे, वहां स्नान होगा। पिछले वर्षों में जैसे जाते रहे हैं, वैसे ही जा रहे थे। फिर हमको संगम स्नान करने में बाधा डाली गई, अभद्रता और अपराध किए गए। जब तक क्षमा याचना का स्पष्ट शब्द नहीं आता है, भविष्य में ऐसी घटना नहीं होगी, ये साफ नहीं होता है, तब तक स्नान करने का क्या मतलब है। तुलसीदास ने कहा था- देव दनुज किन्नर नर श्रेणी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥ आदर से स्नान की परंपरा है, निरादर से स्नान की परंपरा नहीं है। सवाल : संत समाज दो हिस्सों में बंटा, कुछ आपके पक्ष में बोल रहे हैं, कुछ सरकार के?
जवाब : ये शैली राजनीति की है, जिस तरफ ज्यादा लोग हो, वो भारी पड़ जाता है। ये शैली साधु महात्मा में नहीं चलती है। यहां ये नहीं होता कि किसके पास कितने साधु हैं। ये राजनीति में देखा जाता है कि किसके पास कितने वोट हैं। हमारे यहां देखा जाता है कि कौन शास्त्र समन्नत बोल रहा है। ये राजनीति नहीं है। यहां भीड़ नहीं दिखाई देती है। सवाल : माघ मेला के घटनाक्रम को अपना अपमान क्यों मान रहे?
जवाब : ये जो माघ मेला है, जब मुगल काल चल रहा था, तब यहां जजिया कर लगा दिया गया था। जो हिंदू टैक्स देता था, वही स्नान कर पाता था। ऐसे वक्त में अगल-बगल पेशवाओं का राज था, वो शंकराचार्य के पास गए कि महाराज जी आप आइए, ये बहुत गलत हो रहा है। तब शंकराचार्य आए, अपनी जान की परवाह नहीं की। हिंदुओं के साथ स्नान किया। कहा कि हे किसी की औकात तो आओ, हम स्नान के लिए आए हैं। तब उन्हें देखकर लोग आते गए और आज ये स्थिति है। तब से शंकराचार्यों ने स्नान का नियम बनाया हुआ है, क्योंकि जब शंकराचार्य ने कई वर्षों में ये परंपरा स्थापित की। जिन शंकराचार्य ने स्नान का अवसर दिलाया, आज तुम लोग उन्हीं का अपमान करोगे, ये कैसे स्वीकार कर लिया जाए। सवाल : प्रशासन जमीन और सुविधाएं वापस ले लेगा, क्या कहेंगे?
जवाब : क्या हम उनके टुकड़ों पर जी रहे हैं। वो सुविधा नहीं देंगे, तो क्या हम जिएंगे नहीं। 100 करोड़ सनातनियों का शंकराचार्य क्या उनका मोहताज है कि प्रशासन हमें कुछ दे तो हम अपना काम चलाएं। उनको जो लेना हो, वो ले लें, लेकिन अपमान करने का अधिकार उनको नहीं है। नहीं है… नहीं है। सवाल : रामभद्राचार्य जी ने कहा है कि आपको नोटिस देकर सही किया?
जवाब : उनकी बात मत करिए, वो दोस्ती निभा रहे हैं। उनको लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं। क्योंकि वो कुछ भी बोलते हैं। देखिए, यहां साधुओं, बटुकों को मारा गया और वो इस तरह की भाषा बोलते हैं। इसका मतलब उन्हें सहानुभूति राजनेताओं से ज्यादा है। वो हमारे कुल का है ही नहीं। अगर हमारे कुल का होता तो उसको हमारा दर्द होता। सवाल : रामभद्राचार्य जी ने कहा कि पालकी से नहीं जाना चाहिए था?
जवाब : उनके गाल पर थप्पड़ खुद जनता ने मारा है। उनके वीडियो इंटरनेट पर तैर रहे हैं, जिसमें वो खुद आडी कार से गंगा के किनारे तक स्नान करने गए हैं, वहीं डुबकी लगा रहे हैं। जनता ने बहुत करारा थप्पड़ रामभद्राचार्य को मारा है। हमको वो क्या कहेंगे? जहां तक पालकी की बात है, पेशवा भी हमारी पालकी उठवाकर लाते थे। नागा साधु हमारी पालकी उठवाते थे। अब हम आएं हैं। पिछले 2 माघ स्नान हम पालकी के साथ कर चुके हैं। सवाल : शंकराचार्य की पदवी को लेकर आखिर विवाद क्या है, कोर्ट में स्टेटस?
जवाब : इसका कोई विवाद नहीं है। लोग सिर्फ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि विवाद है। एक सोने के टुकड़े को सामने रखिए और कहिए कि मैं तुम्हें सोना नहीं मानता हूं। तो सोने को क्या फर्क पड़ेगा। अगर नहीं मानता, तो कसौटी के पत्थर पर मुझे रगड़कर देख ले या कटर से काटकर मेरे अंदर झांक ले या भट्ठी में तपाकर मुझे देख ले। इसलिए ये विवाद उठाने से कुछ नहीं होता है, जो है, वो वैसा ही रहेगा। उल्लू कहता है कि अंधेरा है, सूरज तो उगा ही नहीं, तो क्या सूरज उगा नहीं होता है, ये क्या बात होती है। सवाल : शंकराचार्य को शंकराचार्य ही चुनते हैं, कोर्ट का फैसला खिलाफ आया, तब क्या करेंगे?
जवाब : हमारे विपरीत क्यों आएगा, क्या कोर्ट मनमानी कर देंगे। कोर्ट निर्णय नहीं करेगी कि कौन शंकराचार्य है? ये जान लीजिए, कोर्ट में मामला होने का ये मतलब नहीं है कि वो कोई निर्णय करेंगे। कोर्ट सिर्फ ये देखेगी कि 2 पक्ष है, 1 पक्ष कह रहा है कि मैं शंकराचार्य हूं। दूसरा कह रहा है कि मैं शंकराचार्य हूं। कोर्ट देखेगा कि प्रक्रिया किसकी सही है। जिसका सही होगा, उसको हां कह दिया जाएगा। जिसका नहीं होगा, उसको न कह दिया जाएगा। हमारी प्रक्रिया पूरी सही है, इसलिए कोर्ट कुछ मनमाना नहीं कर सकती है। अब जानिए कि मौनी अमावस्या के स्नान के वक्त क्या हुआ था… 18 जनवरी को माघ मेले में मौनी अमावस्या पर अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में स्नान करने जा रहे थे। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पालकी पुलिस ने रोक दी। पुलिस ने उनसे पैदल संगम जाने को कहा। शंकराचार्य के शिष्य नहीं माने और पालकी लेकर आगे बढ़ने लगे। इस पर शिष्यों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई। पुलिस ने कई शिष्यों को हिरासत में ले लिया था। पुलिस ने एक साधु को चौकी में भी पीटा था। इससे शंकराचार्य नाराज हो गए थे और शिष्यों को छुड़वाने पर अड़ गए। अफसरों ने उन्हें समझाने की कोशिश की, हाथ जोड़े, लेकिन वे नहीं माने। इसके बाद पुलिस ने शंकराचार्य के कई और समर्थकों को हिरासत में ले लिया था। शंकराचार्य की पालकी को खींचते हुए संगम से 1 किमी दूर ले जाया गया। इस दौरान पालकी का क्षत्रप भी टूट गया। शंकराचार्य स्नान भी नहीं कर पाए। इसके बाद से वह संगम के तट पर धरना दे रहे हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बारे में जानिए …………………. ये भी पढ़ें – 5 दिन से धरने पर बैठे अविमुक्तेश्वरानंद को तेज बुखार, 5 घंटे बाद वैनिटी वैन से बाहर आए; वसंत पंचमी पर संगम स्नान नहीं किया प्रयागराज माघ मेले में 5 दिन से धरने पर बैठे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की तबीयत बिगड़ गई है। उन्हें तेज बुखार है। शिष्यों ने बताया, अविमुक्तेश्वरानंद सुबह 10 बजे वैनिटी वैन में चले गए। डॉक्टरों के कहने पर दवा खाई, आराम किया। पढ़िए पूरी खबर…
जवाब : हां, कुछ लोग सनातन को कमजोर कर रहे हैं, ये बिल्कुल सही है। सनातन में परंपरा रही है कि राजा और धर्माचार्य अलग होते थे। राजगुरु होते थे, राजा खुद गुरू नहीं होते थे। ये मुस्लिमों में परंपरा है, वहां खलीफा परंपरा है। इसके मायने हैं कि जो राष्ट्र का अध्यक्ष होता है, वही धर्मगुरु भी होता है। हिंदू धर्म में खलीफा परंपरा को लाने का प्रयास किया जा रहा है। जो राजा है, वहीं गुरू भी है। जो लोग हिंदू धर्म में खलीफा परंपरा लेकर आ रहे हैं, वही लोग हिंदू धर्म को कमजोर कर रहे हैं। सवाल : योगी ने कालनेमि का जिक्र किया, जो धर्म को नष्ट कर रहा है?
जवाब : भई, कालनेमि कौन है? कालनेमि राक्षस था और साधु बनकर सामने दिखाई दे रहा था। राक्षस क्या करता था, ब्राह्मण, मानव, गायों को मार दे, चोला साधु का पहनता है। यहां देखिए, चोला तो साधु का है और गोहत्या हो रही है। अब आप बताइए कि कालनेमि कौन है, बताइए। सवाल : केशव मौर्य ने आपसे कहा कि स्नान करके मामले को विराम दें?
जवाब : ये वो वाली BJP है, जो शुरू में आई थी कि हम हिंदुओं के लिए काम करेंगे। केशव प्रसाद मौर्य ने उसी BJP की प्रारंभिक भावना का प्रदर्शन किया है, जो स्वागत योग्य है। इसी BJP को लोगों ने अपनाया था। ये वाली जो BJP अब आ गई है हम जो चाहेंगे वो करेंगे, कोई कुछ भी कहे, हम सुनेंगे ही नहीं। ये वाली BJP लोगों को स्वीकार नहीं है। सवाल : आपने कहा कि पहले मौनी का स्नान, फिर बंसत का, आजका दिन बीता, कल कौन सा?
जवाब : मौनी अमावस्या के दिन, जब सुबह हम अपने शिविर से निकलते थे, तब इस आशय के साथ निकले थे कि हम संगम जाएंगे, वहां स्नान होगा। पिछले वर्षों में जैसे जाते रहे हैं, वैसे ही जा रहे थे। फिर हमको संगम स्नान करने में बाधा डाली गई, अभद्रता और अपराध किए गए। जब तक क्षमा याचना का स्पष्ट शब्द नहीं आता है, भविष्य में ऐसी घटना नहीं होगी, ये साफ नहीं होता है, तब तक स्नान करने का क्या मतलब है। तुलसीदास ने कहा था- देव दनुज किन्नर नर श्रेणी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥ आदर से स्नान की परंपरा है, निरादर से स्नान की परंपरा नहीं है। सवाल : संत समाज दो हिस्सों में बंटा, कुछ आपके पक्ष में बोल रहे हैं, कुछ सरकार के?
जवाब : ये शैली राजनीति की है, जिस तरफ ज्यादा लोग हो, वो भारी पड़ जाता है। ये शैली साधु महात्मा में नहीं चलती है। यहां ये नहीं होता कि किसके पास कितने साधु हैं। ये राजनीति में देखा जाता है कि किसके पास कितने वोट हैं। हमारे यहां देखा जाता है कि कौन शास्त्र समन्नत बोल रहा है। ये राजनीति नहीं है। यहां भीड़ नहीं दिखाई देती है। सवाल : माघ मेला के घटनाक्रम को अपना अपमान क्यों मान रहे?
जवाब : ये जो माघ मेला है, जब मुगल काल चल रहा था, तब यहां जजिया कर लगा दिया गया था। जो हिंदू टैक्स देता था, वही स्नान कर पाता था। ऐसे वक्त में अगल-बगल पेशवाओं का राज था, वो शंकराचार्य के पास गए कि महाराज जी आप आइए, ये बहुत गलत हो रहा है। तब शंकराचार्य आए, अपनी जान की परवाह नहीं की। हिंदुओं के साथ स्नान किया। कहा कि हे किसी की औकात तो आओ, हम स्नान के लिए आए हैं। तब उन्हें देखकर लोग आते गए और आज ये स्थिति है। तब से शंकराचार्यों ने स्नान का नियम बनाया हुआ है, क्योंकि जब शंकराचार्य ने कई वर्षों में ये परंपरा स्थापित की। जिन शंकराचार्य ने स्नान का अवसर दिलाया, आज तुम लोग उन्हीं का अपमान करोगे, ये कैसे स्वीकार कर लिया जाए। सवाल : प्रशासन जमीन और सुविधाएं वापस ले लेगा, क्या कहेंगे?
जवाब : क्या हम उनके टुकड़ों पर जी रहे हैं। वो सुविधा नहीं देंगे, तो क्या हम जिएंगे नहीं। 100 करोड़ सनातनियों का शंकराचार्य क्या उनका मोहताज है कि प्रशासन हमें कुछ दे तो हम अपना काम चलाएं। उनको जो लेना हो, वो ले लें, लेकिन अपमान करने का अधिकार उनको नहीं है। नहीं है… नहीं है। सवाल : रामभद्राचार्य जी ने कहा है कि आपको नोटिस देकर सही किया?
जवाब : उनकी बात मत करिए, वो दोस्ती निभा रहे हैं। उनको लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं। क्योंकि वो कुछ भी बोलते हैं। देखिए, यहां साधुओं, बटुकों को मारा गया और वो इस तरह की भाषा बोलते हैं। इसका मतलब उन्हें सहानुभूति राजनेताओं से ज्यादा है। वो हमारे कुल का है ही नहीं। अगर हमारे कुल का होता तो उसको हमारा दर्द होता। सवाल : रामभद्राचार्य जी ने कहा कि पालकी से नहीं जाना चाहिए था?
जवाब : उनके गाल पर थप्पड़ खुद जनता ने मारा है। उनके वीडियो इंटरनेट पर तैर रहे हैं, जिसमें वो खुद आडी कार से गंगा के किनारे तक स्नान करने गए हैं, वहीं डुबकी लगा रहे हैं। जनता ने बहुत करारा थप्पड़ रामभद्राचार्य को मारा है। हमको वो क्या कहेंगे? जहां तक पालकी की बात है, पेशवा भी हमारी पालकी उठवाकर लाते थे। नागा साधु हमारी पालकी उठवाते थे। अब हम आएं हैं। पिछले 2 माघ स्नान हम पालकी के साथ कर चुके हैं। सवाल : शंकराचार्य की पदवी को लेकर आखिर विवाद क्या है, कोर्ट में स्टेटस?
जवाब : इसका कोई विवाद नहीं है। लोग सिर्फ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि विवाद है। एक सोने के टुकड़े को सामने रखिए और कहिए कि मैं तुम्हें सोना नहीं मानता हूं। तो सोने को क्या फर्क पड़ेगा। अगर नहीं मानता, तो कसौटी के पत्थर पर मुझे रगड़कर देख ले या कटर से काटकर मेरे अंदर झांक ले या भट्ठी में तपाकर मुझे देख ले। इसलिए ये विवाद उठाने से कुछ नहीं होता है, जो है, वो वैसा ही रहेगा। उल्लू कहता है कि अंधेरा है, सूरज तो उगा ही नहीं, तो क्या सूरज उगा नहीं होता है, ये क्या बात होती है। सवाल : शंकराचार्य को शंकराचार्य ही चुनते हैं, कोर्ट का फैसला खिलाफ आया, तब क्या करेंगे?
जवाब : हमारे विपरीत क्यों आएगा, क्या कोर्ट मनमानी कर देंगे। कोर्ट निर्णय नहीं करेगी कि कौन शंकराचार्य है? ये जान लीजिए, कोर्ट में मामला होने का ये मतलब नहीं है कि वो कोई निर्णय करेंगे। कोर्ट सिर्फ ये देखेगी कि 2 पक्ष है, 1 पक्ष कह रहा है कि मैं शंकराचार्य हूं। दूसरा कह रहा है कि मैं शंकराचार्य हूं। कोर्ट देखेगा कि प्रक्रिया किसकी सही है। जिसका सही होगा, उसको हां कह दिया जाएगा। जिसका नहीं होगा, उसको न कह दिया जाएगा। हमारी प्रक्रिया पूरी सही है, इसलिए कोर्ट कुछ मनमाना नहीं कर सकती है। अब जानिए कि मौनी अमावस्या के स्नान के वक्त क्या हुआ था… 18 जनवरी को माघ मेले में मौनी अमावस्या पर अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में स्नान करने जा रहे थे। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पालकी पुलिस ने रोक दी। पुलिस ने उनसे पैदल संगम जाने को कहा। शंकराचार्य के शिष्य नहीं माने और पालकी लेकर आगे बढ़ने लगे। इस पर शिष्यों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई। पुलिस ने कई शिष्यों को हिरासत में ले लिया था। पुलिस ने एक साधु को चौकी में भी पीटा था। इससे शंकराचार्य नाराज हो गए थे और शिष्यों को छुड़वाने पर अड़ गए। अफसरों ने उन्हें समझाने की कोशिश की, हाथ जोड़े, लेकिन वे नहीं माने। इसके बाद पुलिस ने शंकराचार्य के कई और समर्थकों को हिरासत में ले लिया था। शंकराचार्य की पालकी को खींचते हुए संगम से 1 किमी दूर ले जाया गया। इस दौरान पालकी का क्षत्रप भी टूट गया। शंकराचार्य स्नान भी नहीं कर पाए। इसके बाद से वह संगम के तट पर धरना दे रहे हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बारे में जानिए …………………. ये भी पढ़ें – 5 दिन से धरने पर बैठे अविमुक्तेश्वरानंद को तेज बुखार, 5 घंटे बाद वैनिटी वैन से बाहर आए; वसंत पंचमी पर संगम स्नान नहीं किया प्रयागराज माघ मेले में 5 दिन से धरने पर बैठे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की तबीयत बिगड़ गई है। उन्हें तेज बुखार है। शिष्यों ने बताया, अविमुक्तेश्वरानंद सुबह 10 बजे वैनिटी वैन में चले गए। डॉक्टरों के कहने पर दवा खाई, आराम किया। पढ़िए पूरी खबर…