सतुआ पीकर रहने वाले बाबा के पास 50-करोड़ का आश्रम:भाई का हो चुका कत्ल; संतोष तिवारी के जगद्गुरु बनने की कहानी

पीली पोशाक। चलने के लिए करोड़ों की लैंड रोवर डिफेंडर और स्पोर्ट्स कार, पोर्शे टर्बो जैसी गाड़ियां। आंखों पर रे-बैन जैसा ब्रांडेड चश्मा। जिसकी तारीफ अक्सर यूपी के सीएम योगी भी करते हैं। हम बात कर रहे हैं बुंदेलखंड के ललितपुर के छोटे से गांव मसौरा से निकले संतोष तिवारी की। संतोष तिवारी कोई और नहीं, माघ मेले में सुर्खियां बटोर रहे सतुआ बाबा हैं। 26 साल पहले सतुआ बाबा को जिस बड़े भाई ने अध्यात्म की राह दिखाई, वो अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनका कत्ल हो चुका है। आखिर संतोष तिवारी कैसे बनारस पहुंचे? उनके संन्यासी बनने की खबर परिवार को कब लगी? मां ने जिद कर क्यों आखिरी सांस उनके आश्रम में ली? पढ़िए सतुआ बाबा की जिंदगी के अनसुने किस्से… ललितपुर जिला मुख्यालय से महज 6 किमी की दूर नेशनल हाईवे- 44 से सटा मसौरा गांव है। यहां रहने वाले शोभाराम तिवारी और उनकी पत्नी राजा बेटी तिवारी की 4 संतानों में संतोष तिवारी उर्फ सतुआ बाबा सबसे छोटे हैं। सबसे बड़े महेश तिवारी, फिर नीरज और उमेश तिवारी हैं। महेश तिवारी अब इस दुनिया में नहीं हैं। 2007 में उनका कत्ल हो चुका है। महेश ही वो शख्स थे, जो संतोष तिवारी को ललितपुर से बनारस आश्रम ले गए थे। 13 साल की उम्र में बनारस पढ़ने गए थे
संतोष तिवारी उर्फ सतुआ बाबा के बड़े भाई उमेश तिवारी ने दैनिक भास्कर को बताया कि ये साल- 2000 की बात थी। वह 9वीं पास हो चुके थे। तब उनकी उम्र बमुश्किल 13 साल थी। संतोष पढ़ाई की बजाय अध्यात्म शिक्षा लेना चाहते थे। ऐसे में हमारे बड़े भाई महेश तिवारी उन्हें लेकर बनारस मणिकर्णिका घाट पहुंचे। वहां गंगा में स्नान किया। पास में ही सतुआ आश्रम दिखा। यहां भी वैदिक गुरुकुल शिक्षा की सुविधा थी। संतोष ने बड़े भाई से कहा कि इसी आश्रम में प्रवेश दिलवा दो। इसके बाद वे संतोष को लेकर सतुआ आश्रम पहुंचे। वहां वे आश्रम के महंत यमुनाचार्यजी महाराज से मिले। उन्होंने छोटे भाई को उनके हाथ में सौंपा और बोले कि आज से ये आपकी ही शरण में हैं। आश्रम में उनके जैसे और भी बच्चे पढ़ने के लिए रह रहे थे। जल्द ही संतोष महंत के प्रिय शिष्यों में शामिल हो गए
उमेश तिवारी कहते हैं- आश्रम में प्रवेश मिलने के बाद छुटि्टयों में संतोष घर आते रहते थे। धार्मिक ग्रंथों में जल्दी ही वे पारंगत हो गए। उनकी प्रतिभा से महंत भी प्रभावित थे। जल्द ही वे उनके प्रिय शिष्यों में शामिल हो गए। बात 2005 की रही होगी। एक दिन संतोष तिवारी का फोन आया, बोले कि मैं संन्यास ग्रहण कर रहा हूं। उनकी बात सुनकर मुझे हंसी आई और मैंने उस बात को उतने ही हल्केपन से अनसुना कर दिया। कुछ दिन बाद ललितपुर में भगवान जगदीश मंदिर के अनुष्ठान में वाराणसी के कुछ पुजारी लोग पहुंचे। उनकी तरफ से कहा गया कि संतोष तिवारी अब संन्यास ले चुके हैं। तब घर में पहली बार लोगों ने इस बात को गंभीरता से लिया। मेरी मां तो रोने लगीं। पिताजी भी चिंता में पड़ गए। मेरी मां ने तुरंत महंत यमुनाचार्यजी महाराज से बात की। कहा कि मैंने अपने बेटे को आपके आश्रम में पढ़ने भेजा था, आपने उसे संन्यासी कैसे बना दिया? बड़ी मुश्किल से बड़े महाराज (यमुनाचार्यजी महाराज) ने मां और पिताजी को समझाया। ये दुख मां और पिताजी को ताउम्र सालता रहा। अक्सर वे संतोष को लेकर सोच में पड़ जाते थे। चिंता करते थे कि उसका आगे क्या भविष्य होगा? 2007 में बड़े भाई की हत्या के बाद गए थे तेरहवीं में
उमेश तिवारी कहते हैं- मेरे बड़े भाई महेश तिवारी पेशे से पत्रकार थे। 2007 की बात थी। वे सुबह-सुबह अपने गहरे मित्र जितेंद्र ठाकुर के घर गए थे। वहां अचानक उन्हें गोली लग गई। जितेंद्र के परिवार के लोग ही अस्पताल ले गए, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। गोली लगने को लेकर जितेंद्र ठाकुर ने सफाई में कहा कि रिवाल्वर देखते समय अचानक फायर हो गया था, लेकिन उसके कई झूठ से संदेह हुआ। इस पर हम लोगों ने उसके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कराया था। इस मामले में उसे आजीवन कारावास की सजा हुई थी, लेकिन 9 साल बाद वह हाईकोर्ट से बरी हो गया। बड़े भाई महेश तिवारी की हत्या के बाद संतोष घर आए थे। सतुआ बाबा के पिता, मां और भाभी का भी हो चुका है निधन
संतोष तिवारी उर्फ सतुआ बाबा के पिता शोभाराम तिवारी का 2019 में तो उनके बड़े भाई महेश तिवारी की पत्नी मनीषा तिवारी का 2023 में निधन हो चुका है। मनीषा तिवारी 2021 तक गांव की प्रधान रह चुकी थीं। 2023 में ही संतोष तिवारी की मां राजा बेटी तिवारी भी चल बसीं। उन्होंने सतुआ बाबा के आश्रम में ही आखिरी सांस ली थी। आखिरी समय में उनकी बड़ी इच्छा थी कि कुछ वक्त वो छोटे बेटे संतोष तिवारी के साथ गुजार पाएं। तब तक संतोष तिवारी इस मठ के महंत हो चुके थे। वर्तमान में सतुआ बाबा के तीनों बड़े भाइयों का परिवार गांव में ही अलग-अलग रह रहा है। सभी के आलीशान मकान बन चुके हैं। बड़े भाई का छोटा बेटा हरिद्वार में बाबा रामदेव के आश्रम में अकाउंटेंट है। जबकि बड़ा बेटा ब्लॉक में आउटसोर्स कर्मी है। उमेश तिवारी ने बताया कि संतोष तिवारी ने गांव के मंदिर का पर्यटन विभाग से बोलकर जीर्णोद्धार कराया है। आखिरी बार वे 2023 में गांव में अपनी मां की तेरहवीं में शामिल होने आए थे। गुरु के जीते-जी ही बन चुके थे महामंडलेश्वर
सतुआ बाबा के गुरु यमुनाचार्यजी महाराज ने 28 नवंबर, 2011 को निधन से पहले ही उनको महामंडलेश्वर घोषित कर उत्तराधिकारी बना दिया था। तब से संतोष तिवारी मठ की महंती संभाल रहे हैं। इस मठ की गद्दी संभालने वाले महंत को सतुआ बाबा की उपाधि दी जाती है। यही कारण है कि संतोष तिवारी को उनके अनुयायी अब सतुआ बाबा कहकर संबोधित करते हैं। सतुआ पीठ की संपत्तियां गुजरात तक फैली हैं। देश के अन्य राज्यों में भी आश्रम के नाम पर संपत्ति है। संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा की प्रसिद्धि लगातार बढ़ती गई। महाकुंभ- 2025 में जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने उनका जगद्गुरु के तौर पर पट्‌टाभिषेक किया। सीएम योगी समेत कई महामंडलेश्वर और अवधेशानंद गिरि महाराज इस अवसर पर मौजूद रहे थे। इस बार माघ मेले में सतुआ बाबा को सबसे बड़ा आश्रम आवंटित किया गया है। सतुआ बाबा विष्णु स्वामी संप्रदाय के 57वें आचार्य हैं। माना जाता है कि विष्णु स्वामी का जन्म 2600 साल पहले दक्षिण भारत के मदुरै जिले में हुआ था। वे बाल रूपम गोपाल के उपासक थे। शिष्य परंपरा विष्णु स्वामी संप्रदाय की शुरुआत उन्होंने की थी। इस पंथ के 50वें आचार्य दीक्षित प्रथम सतुआ बाबा महंत रणछोड़ दास ने 18वीं सदी में मणिकर्णिका घाट पर सतुआ बाबा आश्रम बनाया था। उसके बाद महंत मोहनदासजी दूसरे सतुआ बाबा, महंत भोलादासजी तीसरे और महंत दामोदर दासजी चौथे सतुआ बाबा बने। महंत नरोत्तमदास जी पांचवें और यमुनाचार्य महाराज 1963 में छठवें सतुआ बाबा बने। कभी आश्रम में साधक सतुआ पीते थे, आज करोड़ों की लग्जरी गाड़ी
‘सतुआ बाबा’ नाम के पीछे भी एक कहानी है। 1998 में विष्णु पीठ की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय थी। उस समय मठ में भोजन तक की व्यवस्था नहीं थी। साधक केवल सतुआ पीकर जीवन यापन करते थे। इस कारण यह नाम प्रचलन में आया। खुद संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा कहते हैं कि ‘सतुआ बाबा’ कोई व्यक्तिगत नाम नहीं, बल्कि विष्णु पीठ में पीठाधीश्वर का एक गारिमामय पद है। जिस आश्रम में कभी साधक सतुआ पीकर जीवन यापन करते थे, आज उस आश्रम के महंत की लग्जरी लाइफ सुर्खियों में हैं। बनारस में आज ये आश्रम काफी बड़े क्षेत्र में फैल चुका है। इसकी मौजूदा कीमत 50 करोड़ बताई जाती है। इस मठ की कई संपत्ति गुजरात में भी हैं। वो भी करोड़ों में बताई जाती हैं। माघ मेले में सतुआ बाबा के शिविर के बाहर 3 करोड़ की लग्जरी कार खड़ी है। नंबर यूके 08 बीजी 8009 उत्तराखंड का है, लेकिन उस पर विष्णु स्वामी जगद्गुरु सतुआ बाबा काशी लिखा हुआ है। इसकी ऑनरोड कीमत 3 करोड़ से ज्यादा बताई जाती है। इसी तरह पोर्शे जैसी लग्जरी कार है, जिसकी कीमत 4.40 करोड़ बताई जाती है। दान या संपत्ति मिलने पर सूचना देने का है नियम
यह आश्रम मुख्य रूप से विष्णु स्वामी संप्रदाय की प्राचीन धार्मिक पीठ है, जो गुरु-शिष्य परंपरा से संचालित होती है। आश्रम की वेबसाइट shrisatuababa.com के मुताबिक कोई ट्रस्ट डीड, सोसाइटी नंबर, 80G/12A सर्टिफिकेट या सरकारी रजिस्ट्रेशन डिटेल्स सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। संपत्ति और संचालन भक्तों के दान से चलता है। हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील जयेंद्र सिंह कहते हैं कि नियमों की बात करें तो धार्मिक मठों की संपत्ति पर राज्य सरकार या एंडोमेंट बोर्ड की निगरानी होती है। बड़ी संपत्ति मिलने पर कई बार सूचना देना या अनुमति लेना जरूरी होता है। ———————— ये खबर भी पढ़ें- मायावती चिल्लाईं- आप हरिजन कहकर जलील कर रहे, यही तेवर देख कांशीराम ने चुना दिल्ली का इंदरपुरी इलाका। एक छोटा-सा खस्ताहाल मकान। दिसंबर, 1977 की एक सर्द रात थी। अचानक रात 11 बजे किसी ने घर की कुंडी खटखटाई। घर के मालिक प्रभुदास ने दरवाजा खोला, तो देखा कि बाहर मुड़े-तुड़े कपड़ों में गले में मफलर डाले, लगभग गंजा हो चला एक अधेड़ शख्स खड़ा था। उस अधेड़ ने अपना परिचय दिया- ‘मैं बामसेफ का अध्यक्ष हूं…आपकी बेटी को पुणे में एक भाषण देने के लिए आमंत्रित करने आया हूं।’ ये शख्स कोई और नहीं, कांशीराम थे। जो प्रभुदास की छठी संतान मायावती के संबंध में बात कर रहे थे। इस एक मुलाकात ने मायावती की जिंदगी बदल दी। IAS बनने का सपना देखने वाली ये लड़की आगे चलकर देश के सबसे बड़े सूबे यूपी की 4 बार सीएम बनीं। समर्थक उन्हें प्यार से ‘बहनजी’ कहकर बुलाते हैं। आज मायावती का 70वां जन्मदिन है। इस मौके पर दैनिक भास्कर में पढ़िए उनकी जिंदगी के कुछ अनोखे किस्से…