स्वामी की तरह सनातन विरोध कर रहे राम अचल राजभर:रामायण को हिंदू धर्म का अपमान बताया; क्या इससे सपा होगा नुकसान

यूपी की सियासत में एक बार फिर रामायण को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। सपा नेता और अकबरपुर से विधायक राम अचल राजभर ने रामायण जलाने वाले तमिलनाडु के द्रविड़ नेता पेरियार ललई सिंह यादव की तारीफ की। साथ ही सनातन धर्म पर भी सवाल उठाए। उनका यह बयान सामने आते ही लोगों ने उनका विरोध शुरू कर दिया। ऐसे में सवाल उठना वाजिब है कि क्या राम अचल राजभर भी स्वामी प्रसाद मौर्य की राह पर चल निकले हैं? स्वामी ने भी पार्टी छोड़ने से पहले रामचरितमानस को लेकर विवादित बयान दिया था। राम अचल राजभर के बयान को सपा ने उनका अपना विचार बताया है। कहा कि सपा किसी के विचार पर पाबंदी नहीं लगाती। पहले पढ़िए राम अचल राजभर ने क्या कहा था नवरात्र के दौरान अंबेडकरनगर में पीडीए पंचायत में राम अचल राजभर ने रामायण जलाने वाले पेरियार ललई सिंह यादव की सराहना की थी। कहा था- पेरियार रामास्वामी नायकर, जो गड़ेरिया पाल बिरादरी के थे, उन्होंने सबसे पहले दक्षिण भारत में रामायण जलाने का काम किया था। पेरियार ललई यादव ने ‘सच्ची रामायण’ लिखी थी। अरे पढ़िए अपने संतों, महापुरुषों और गुरुओं का इतिहास, तब दिमाग का ताला खुलेगा। तब आप कुंभ नहीं जाओगे, अयोध्या नहीं जाओगे। अपने बच्चों को स्कूल भेजोगे, पाठशाला भेजोगे, ताकि वे आईएएस बनें। राजभर ने रामायण को ‘सनातन धर्म का अपमान’ बताते हुए दावा किया कि यह ग्रंथ ‘जातीय भेदभाव’ को बढ़ावा देता है। ‘इतिहास की गलत व्याख्या’ पर आधारित है। उनका यह बयान वीडियो के रूप में सोशल मीडिया पर फैल गया। यह पहली बार नहीं, जब राम अचल राजभर ने धार्मिक ग्रंथों पर टिप्पणी की हो। 2023 में रामनवमी पर अखंड रामायण पाठ को लेकर उन्होंने कहा था कि यह 97% लोगों को अपमानित करने वाला फैसला’ है। यह शूद्र समाज को नीचा दिखाता है। हालांकि, उस समय सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे ‘व्यंग्य’ बताकर तंज कसा था। लेकिन, इस बार उन्होंने भी चुप्पी साध ली है। सपा बोली- किसी के विचार नहीं रोक सकते
सपा प्रवक्ता मनोज यादव कहते हैं- पार्टी किसी की भावना और उसके विचार को नहीं रोक सकती। राम अचल राजभर कैबिनेट मंत्री रहे हैं। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। वे बड़े नेता हैं। उन्होंने किसी किताब का हवाला दिया है। सपा हमेशा समानता की बात करती आई है और करती रहेगी। क्या इससे सपा को नुकसान होगा? वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं- राम अचल राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे लोगों को अंबेडकरवादी कह सकते हैं। पिछड़ों, अति पिछड़ों और दलितों का एक मजबूत संगठन हुआ करता था अराजक संघ। यह एक जमाने में बहुत मशहूर भी था। पेरियार ललई यादव उसके संस्थापक थे। उनकी एक सच्ची रामायण भी है, जो दलितों-पिछड़ों में काफी लोकप्रिय भी रही है। इस रामायण पर प्रतिबंध भी लगा। इनकी लाइन हमेशा से अलग रही है। ये खुद को कमेरा मानते हैं। जाति के आधार पर वर्गीकरण हुआ है। ये खुद को सनातनी परंपरा का अंग नहीं मानते। उस धारा के जो लोग बचे लोग थे, वे पहले कांशीराम और मायावती के साथ गए। फिर परिस्थितियां बदलीं, तो उन्होंने अपना नया ठिकाना तलाशा। सोनेलाल पटेल और ओम प्रकाश राजभर भी उसी धारा के लोग हैं। राम अचल राजभर का बयान भी उसी विचारधारा के आधार पर है। लेकिन, आज के हिसाब से समाजवादी पार्टी पीडीए की राजनीति कर रही है। उसके पास वो लोग भी हैं, जो सनातनी परंपरा को मानने वाले भी है और न मानने वाले भी हैं। ऐसे में जो मानने वाले हैं, उनकी आस्था आहत हुई होगी। इससे सपा को नुकसान हो सकता है। राम अचल राजभर जिस जिले से आते हैं (अंबेडकरनगर), वह कभी बसपा का गढ़ रहा है। अब सपा ने उसे अपनी ओर कर लिया है। अंबेडकरनगर में राम अचल राजभर के इस बयान का नुकसान समाजवादी पार्टी को उठाना पड़ सकता है। कहीं लड़ाई राजभर वोटबैंक की तो नहीं?
सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं- बड़ी संख्या में राजभर बिरादरी के लोग इस विचारधारा पर विश्वास करते हैं, जो राम अचल राजभर बोल रहे हैं। हाल के दिनों में ओम प्रकाश राजभर की विश्वसनीयता कमजोर हुई है। ऐसे में उस वोटबैंक को साधने के लिए भी ये बयान हो सकता है। इस बिरादरी के बीच में ये निश्चित रूप से लोकप्रियता हासिल कर सकते हैं। लेकिन, पिछड़ों के बीच सपा को नुकसान हो सकता है। आने वाले दिनों में ये जुबानी संघर्ष और बढ़ेगा। जानिए राजभर का बसपा से सपा तक का सफर
राम अचल राजभर यूपी की राजनीति के दिग्गज राजनेता हैं। स्नातक शिक्षित राजभर किसान, सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व विधायक हैं। उनका राजनीतिक सफर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से शुरू हुआ था। वहां वह संस्थापक कांशीराम के करीबी थे। बसपा में 1990 के दशक से सक्रिय रहे हैं। अकबरपुर विधानसभा से 5 बार विधायक बने (1993, 1996, 2002, 2007, 2012)। मायावती सरकार में परिवहन मंत्री रहे। उन्हें ‘संगठन शिल्पकार’ कहा जाता था। लेकिन, 2021 में जिला पंचायत चुनावों में पार्टी कैडर के खिलाफ बगावत के आरोप में निष्कासित कर दिए गए। बसपा छोड़ने के बाद 2022 विधानसभा चुनाव में उन्होंने सपा के टिकट पर अकबरपुर से जीत हासिल की। अखिलेश ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया। वो पूर्वांचल में राजभर वोट साधने के लिए सपा का चेहरा हैं। ———————– ये खबर भी पढ़ें… बागपत में चिताओं से अस्थियां गायब हो रहीं, 8 महीने से गांववाले परेशान; क्या दिवाली पर तंत्र-मंत्र के लिए तांत्रिक चुरा रहे यूपी में बागपत के हिम्मतपुर सूजती गांव में लोग डरे हुए हैं। श्मशान घाट से अस्थियां गायब हो रही हैं। कुछ दिन पहले एक व्यक्ति का अंतिम संस्कार हुआ। परिवार जब तीसरे दिन अस्थियां लेने गया, तो चिता के पास दीपक जल रहा था, उपले सुलग रहे थे और तंत्र-मंत्र का सामान बिखरा हुआ था। अस्थियां गायब थीं। पढ़िए पूरी खबर…