3 महीने बाद भी 28 जिलाध्यक्ष के नाम तय नहीं:फैसला लेने में यूपी भाजपा का सबसे खराब दौर, नया प्रदेश अध्यक्ष भी नहीं बना

भाजपा के 28 संगठनात्मक जिलों में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर 3 महीने बाद भी सहमति नहीं बन सकी है। चुनाव प्रभारी महेंद्रनाथ पांडेय, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी और महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह सरकार के मंत्रियों और आरएसएस के पदाधिकारियों को एक नाम पर राजी नहीं कर सके। क्या है इसकी वजह? नाम तय करने में देरी क्यों हो रही? कहां पेच फंसा है? पढ़िए खास रिपोर्ट… भाजपा ने 16 मार्च, 2025 को 98 में से 70 जिलों में जिलाध्यक्ष नियुक्त किए थे। इनमें 39 सवर्ण, 25 पिछड़े और 6 अनुसूचित जाति वर्ग से थे। 70 में से 44 जिलों में नए चेहरों को मौका दिया गया था। वहीं, पार्टी 26 मौजूदा जिलाध्यक्षों पर भरोसा जताया था। पार्टी ने सहमति नहीं बनने के कारण 28 जिलाध्यक्षों की नियुक्ति को होल्ड कर दिया था। इनमें चुनाव प्रभारी महेंद्रनाथ पांडेय का संसदीय क्षेत्र चंदौली भी शामिल है। ऐसा माना जा रहा था कि धीरे-धीरे सहमति बनाकर नाम तय किए जाएंगे। नियुक्तियां की जाएंगी। लेकिन, 3 महीने बीतने के बाद भी इंतजार बरकरार है। नाम तय करने में देरी की वजह गुटबाजी भी
राजनीतिक विश्लेषक आनंद राय और वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल का मानना है कि यूपी भाजपा में बढ़ती गुटबाजी भी राजनीतिक नियुक्तियों और संगठनात्मक चुनाव में देरी की वजह है। यूपी में राज्य अल्पसंख्यक आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं हो सकी है। मनोनीत पार्षदों की नियुक्तियां भी अभी तक अटकी हैं। कोर ग्रुप में ही सीएम योगी, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य, डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक, प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी और महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह कई मुद्दों पर एकमत नहीं हैं। यही वजह है, व्यापारिक कल्याण बोर्ड में उपाध्यक्ष पद पर नटवर गोयल की नियुक्ति को लेकर हुआ विवाद दिल्ली तक पहुंचा था। भाजपा के प्रदेश प्रभारी भी नहीं
भाजपा ने विधानसभा चुनाव- 2022 से पहले पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राधामोहन सिंह को 2019 में यूपी का प्रभारी नियुक्त किया था। राधामोहन सिंह की देख-रेख में ही पंचायत चुनाव 2021 और विधानसभा चुनाव 2022 हुए थे। 2023 में राधामोहन सिंह के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद से हटने के बाद पार्टी ने किसी भी राष्ट्रीय पदाधिकारी या जनप्रतिनिधि को यूपी भाजपा का प्रभारी नियुक्त नहीं किया है। राजनीतिक विश्लेषक आनंद राय मानते हैं- प्रभारी की नियुक्ति नहीं होने से सरकार और संगठन में बेहतर समन्वय की कमी दिख रही। राज्य महिला आयोग में सदस्यों की नियुक्ति से लेकर राजनीतिक नियुक्तियों में भी विवाद की स्थिति रही है। इतना ही नहीं, छोटे-छोटे मामलों में सरकार के मंत्रियों और संगठन के पदाधिकारियों को दिल्ली पहुंचकर केंद्रीय नेतृत्व के सामने अपनी पीड़ा का इजहार करना पड़ रहा है। प्रदेश प्रभारी के रहते इस तरह की समस्याओं का समाधान उन्हीं के स्तर से हो जाता है। उधर, सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रीय नेतृत्व को ऐसा कोई बड़ा चेहरा प्रभारी के लिए उपयुक्त नहीं लग रहा, जो यूपी में सीएम योगी, आरएसएस और भाजपा के बीच समन्वय कर सके। गोंडा में भी नए जिलाध्यक्ष का इंतजार
गोंडा में भाजपा के जिलाध्यक्ष अमर किशोर कश्यप का पार्टी कार्यालय में महिला से गले लगते वीडियो वायरल हुआ था। इसके बाद अमर किशोर को पार्टी से बाहर कर दिया गया था। गोंडा में भी नए जिलाध्यक्ष की नियुक्ति का इंतजार है। संगठन के कामकाज पर पड़ रहा असर
राजनीतिक विश्लेषक आनंद राय मानते हैं- संगठनात्मक चुनाव में देरी से संगठन के कामकाज पर भी असर पड़ता है। 28 जिलों में जिलाध्यक्ष पद के दावेदार मौजूदा जिलाध्यक्ष को सहयोग नहीं करते हैं। उनके कामकाज में कमियां निकालने का मौका नहीं छोड़ते। वहीं, मौजूदा जिलाध्यक्ष भी असमंजस की स्थिति में अपने पूरे मनोयोग से काम नहीं कर पाते। यही हाल पार्टी के अवध, कानपुर, पश्चिम, ब्रज, गोरखपुर और काशी क्षेत्र के प्रदेश अध्यक्ष का है। इतना ही नहीं, भाजपा महिला मोर्चा, युवा मोर्चा, एससी मोर्चा, किसान मोर्चा, ओबीसी मोर्चा और अल्पसंख्यक मोर्चा की भी यही स्थिति है। निर्णयों के मामले में सबसे खराब दौर
भाजपा के एक पदाधिकारी बताते हैं कि राजनीतिक नियुक्तियां हों या संगठनात्मक चुनाव, निर्णयों के मामले में भाजपा सबसे खराब दौर से गुजर रही है। भूपेंद्र चौधरी और धर्मपाल सिंह के कार्यकाल में अग्रिम मोर्चों के प्रदेश अध्यक्ष और टीम नहीं बनी। क्षेत्रीय अध्यक्ष भी अपनी नई टीम नहीं बना सके। सितंबर, 2023 में नियुक्त नए 69 जिलाध्यक्षों को भी अपनी टीम बनाने का मौका नहीं मिला था। इतना ही नहीं, योगी सरकार के 3 साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी सभी निगम, बोर्ड और आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियां नहीं हुईं। वह बताते हैं कि इससे पहले तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और महामंत्री संगठन सुनील बंसल के बीच युवा मोर्चा और महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष को लेकर सहमति नहीं बन पाने से अग्रिम मोर्चों के प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति में थोड़ा विलंब हुआ था। लेकिन, अन्य नियुक्तियों में ज्यादा देरी नहीं हुई थी। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय मानते हैं- यूपी में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए कोरम पूरा है। लेकिन, पार्टी पहले पहलगाम हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर में व्यस्त रही। अब इजराइल-ईरान युद्ध में विदेशों में फंसे भारतीयों को सुरक्षित लाने की चिंता है। यूपी में जिलाध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष पर सबसे ज्यादा पेंच फंसा है। वर्चस्व और गुटबाजी में भी प्रक्रिया फंसी है। वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल का मानना है कि भाजपा अपनी आगामी चुनावी रणनीति के मद्देनजर ही निर्णय करती है। किस प्रकार के लोगों को जिम्मेदारी दी जाए जो चुनाव के लिए उपयुक्त हो, उनके चयन में देरी और मुश्किल होती है। इस पूरे मामले पर भाजपा के प्रदेश चुनाव प्रभारी महेंद्रनाथ पांडेय का कहना है 28 जिलों में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के मामले में विचार चल रहा है। पार्टी नेतृत्व को भी अवगत करा दिया है। जैसे दिशा-निर्देश मिलेंगे वैसे ही आगे की कार्रवाई होगी। प्रदेश अध्यक्ष चुनाव के लिए कोरम पूरा है। 98 में से 70 जिलाध्यक्ष निर्वाचित हो चुके हैं। ———————- ये खबर भी पढ़ें… यूपी ब्यूरोक्रेसी- कभी लात-घूसे चले तो कोई धरने पर बैठा, नेता-मंत्री भी दो फाड़ हुए; बड़े अफसरों की लड़ाई सीएम तक पहुंची कानपुर में डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह और सीएमओ डॉ. हरिदत्त नेमी के बीच 5 महीने तक विवाद चला। मामले ने न केवल प्रशासनिक हलकों में हलचल मचाई, बल्कि सियासी रंग भी लिया। 7 भाजपा विधायकों में से 5 ने डीएम का पक्ष लिया, जबकि कुछ जनप्रतिनिधियों ने सीएमओ के समर्थन में पत्र लिखे। आखिरकार, शासन ने सीएमओ डॉ. नेमी को सस्पेंड कर दिया। श्रावस्ती के अपर सीएमओ उदय नाथ को नया सीएमओ बनाया। ये पहला मामला नहीं, जब यूपी की नौकरशाही में अफसरों का टकराव सुर्खियां बना है। पढ़ें पूरी खबर