यूपी की राजनीति में ब्राह्मण कितने महत्वपूर्ण?:मायावती से लेकर योगी सरकार बनवाने में भूमिका, भाजपा को भारी न पड़ जाए नाराजगी

यूपी में ब्राह्मण विधायकों की बैठक के बाद उन्हें चेतावनी भरा नोटिस जारी करना भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी को भारी पड़ रहा है। मीडिया, सोशल मीडिया में क्षत्रिय विधायकों के कुटुंब परिवार, लोध और कुर्मी विधायकों की बैठक पर मौन रही भाजपा को चौतरफा घेरा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष के बयान के बाद इस मुद्दे को कुर्मी बनाम ब्राह्मण को रूप देकर प्रदेश में नया जातीय संघर्ष पैदा करने का प्रयास किया जा रहा। अगर समय रहते पार्टी ने इसे कंट्रोल नहीं किया, तो पंचायत से लेकर विधानसभा चुनाव तक भाजपा को नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। भास्कर संडे बिग स्टोरी में जानते हैं कि यूपी की सियासत में ब्राह्मण कितने महत्वपूर्ण हैं? क्यों राजनीतिक दल ब्राह्मणों की अनदेखी नहीं कर सकते हैं? ब्राह्मणों ने आवाज उठाई, इसलिए मचा हंगामा
यूं तो विधानसभा के मानसून सत्र में क्षत्रिय विधायकों की कुटुंब परिवार की बैठक हुई। उसके बाद कुर्मी विधायकों और लोध समाज के विधायकों की भी बैठक हुई। लेकिन, ठाकुर, कुर्मी और लोध समाज के विधायकों की बैठक में असंतोष के स्वर सामने नहीं आए। बैठक के जरिए इन समाजों ने अपनी ताकत का एहसास कराने का ही प्रयास किया। लेकिन, ब्राह्मण विधायकों की बैठक में सरकार, संगठन और आरएसएस के प्रति नाराजगी और असंतोष का भाव साफ झलका। ब्राह्मण विधायकों ने खुलकर कहा कि सरकार, संगठन और संघ में उनकी सुनवाई करना वाला कोई नहीं। समाज के लोगों को उपेक्षित किया जा रहा। मीडिया में ब्राह्मण विधायकों की ओर से उपेक्षा की बात सामने आने के बाद एकाएक पूरब से पश्चिम तक ब्राह्मण समाज के लोगों में भी यह चर्चा का विषय बन गया। समाज के लोग अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या कर संघ, संगठन और सरकार को कटघरे में खड़ा करने लगे। वहीं, विपक्ष ने भी इसे मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सपा महासचिव शिवपाल यादव ने तो यहां तक बयान दे दिया कि ब्राह्मण सपा के साथ आएं, पूरा सम्मान मिलेगा। आगामी पंचायत और फिर विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों की नाराजगी से होने वाले नुकसान को भांपते हुए भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने ब्राह्मण विधायकों को चेतावनी भरा नोटिस जारी किया। पंकज चौधरी ने नोटिस तो मामले को थामने के लिए जारी किया था, लेकिन उनका दांव उल्टा पड़ गया। इससे ब्राह्मणों में संदेश गया कि विधायकों का कहना सही है कि भाजपा में ब्राह्मणों की उपेक्षा की जा रही। क्योंकि, इससे पहले जब ठाकुर, कुर्मी, लोध विधायकों की बैठक हुई तो पार्टी ने चेतावनी जारी क्यों नहीं की? वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्रनाथ भट्‌ट कहते हैं- अध्यक्ष पंकज चौधरी ने ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर चेतावनी जारी कर सेल्फ गोल किया। जब ठाकुर, कुर्मी, लोधी समाज बैठक कर रहे थे, तो ब्राह्मणों की बैठक से भाजपा पर कौन-सा आसमान गिर गया। अब पंकज चौधरी ने अपने बचाव में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी को आगे किया है। वीरेंद्रनाथ भट्‌ट कहते हैं- यूपी की सियासत में ब्राह्मणों की अहमियत कांग्रेस ने बनाई थी। पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी ने यूपी में ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम समीकरण बनाया। आजादी से पहले मदन मोहन मालवीय, गोविंद वल्लभ पंत ब्राह्मण परिवार से थे। लेकिन, 1980 में इंदिरा गांधी ने जब वीपी सिंह को सीएम बनाया तो ब्राह्मणों को झटका लगा। उसके बाद मंडल-कमंडल की राजनीति से ब्राह्मणों को चुनौती मिलना शुरू हो गई। उसके बाद सियासत में ब्राह्मणों का पतन होता चला गया। 2007 में मायावती ने ब्राह्मणों को साधने के लिए नारा दिया, हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है। मुलायम सिंह यादव ने भी सपा में ब्राह्मणों के वर्चस्व को कम नहीं होने दिया। 2022 विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद हुए सर्वे बताते हैं कि 87 फीसदी ब्राह्मणों ने भाजपा को वोट दिया था। पश्चिम से लेकर पूरब तक करीब 20 लोकसभा और 103 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण निर्णायक भूमिका अदा करता है। भाजपा से बेहतर सम्मान नहीं मिलेगा
वरिष्ठ पत्रकार अनिल सिंह मानते हैं- ब्राह्मण विधायकों की नाराजगी या समाज में असंतोष की जो बात की जा रही है। उससे पंचायत या विधानसभा चुनाव में भाजपा पर कोई असर नहीं पड़ेगा। भाजपा अच्छी संख्या में ब्राह्मणों को टिकट देती है। दूसरे किसी भी दल में उतना सम्मान नहीं मिलेगा। वैसे भी ब्राह्मण विधायकों की बैठक सरकार या संगठन के खिलाफ नहीं थी। वह बैठक उनके स्वयं के राजनीतिक हित के लिए थी। पंचायत चुनाव आते-आते चीजें बदल जाएंगी। हां, इतना नुकसान जरूर हो सकता है कि अगर किसी सीट पर सपा का ब्राह्मण और भाजपा किसी अन्य जाति का नेता चुनाव लड़ रहा होगा, तो ब्राह्मण वोट सपा को चला जाएगा। गोलबंदी के संकेत नहीं
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक आनंद राय मानते हैं- मानसून सत्र के दौरान ठाकुर, कुर्मी और लोध विधायकों की बैठक पर पार्टी ने संज्ञान नहीं लिया था। लेकिन, इस बार ब्राह्मण विधायकों की बैठक के बाद प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने चेतावनी जारी कर दी इस मामले ने तूल पकड़ लिया है। उनका कहना है कि विधायक पीएन पाठक अच्छे मेजबान हैं। वह पत्रकारों के साथ भी क्रिकेट मैच खेलते हैं, दावत देते हैं। इस बैठक की मेजबानी का संदर्भ और व्याख्या वह ही बेहतर कर सकते हैं। लेकिन, मौजूदा परिस्थिति को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि विधायकों ने सरकार के खिलाफ गोलबंदी की। बैठक में शामिल विधायक अगले ही दो-तीन दिनों में सरकार और संगठन के मुखिया से भी मिले। वहीं, कैबिनेट मंत्री सुनील शर्मा कहते हैं- ब्राह्मण दधीचि, ब्राह्मण चाणक्य है, ब्राह्मण परशुराम है, ब्राह्मण चंद्रशेखर आजाद है। जिसका जीवन राष्ट्र और धर्म को संप्रति है, वही ब्राह्मण। ब्राह्मणों की नाराजगी का मुद्दा मीडिया और सोशल मीडिया का ही मुद्दा है। बैठक में शामिल किसी भी विधायक ने यह नहीं कहा है कि वह नाराज है। 45 सदस्यीय भाजपा की प्रदेश टीम में चार प्रदेश उपाध्यक्ष, एक प्रदेश महामंत्री और तीन प्रदेश मंत्री ब्राह्मण समाज से हैं। सात अग्रिम मोर्चों में से भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष प्रांशु दत्त द्विवेदी और संगठनात्मक 6 क्षेत्रों में से अवध के क्षेत्रीय अध्यक्ष कमलेश मिश्रा ब्राह्मण समाज से हैं। ———————– ये खबर भी पढ़ें… यूपी में भाजपा के टारगेट पर फर्जी यादव-मुस्लिम वोटर:SIR में अब वोट बचाने-कटवाने की टेंशन, जानिए सपा का प्लान एसआईआर का दूसरा चरण 6 जनवरी से शुरू हो रहा। इसे लेकर सियासी दल चौकन्ना है। सपा, भाजपा हो या फिर बसपा और कांग्रेस। सभी दल अपने-अपने वोटर को संजोने के लिए रणनीतियां बना रहे। पहले चरण की प्रक्रिया समाप्त होने के बाद माना जा रहा है कि भाजपा कार्यकर्ताओं में सक्रियता कम रही। यहां तक कि भाजपा के लोग भी मान रहे कि पहले चरण में समाजवादी पार्टी ने अधिक सक्रिय होकर काम किया है और अपने वोटर को बचाने की हर कोशिश की। पढ़ें पूरी खबर