कानपुर में डॉल्फिन की बॉडी 2 जनवरी को गंगा के पानी में उतराती हुई मिली। जाजमऊ पुल के नीचे डॉल्फिन की मौत के बाद 2 सवाल सबसे पहले उठे। पहला- गंगा का पानी जलीय जंतुओं के लिए सांस लेने लायक नहीं। दूसरा- नमामि गंगे अभियान के बावजूद गंगा स्वच्छ क्यों नहीं हुईं? डॉल्फिन की ऑर्गन जांच के लिए बरेली के IVRI भेजे गए हैं, ताकि मौत की सटीक वजह सामने आ सके। क्योंकि, डॉल्फिन अपनी औसत ऐज से 10 साल पहले मर गई थी। उसके शरीर पर किसी तरह के चोट के निशान भी नहीं थे। वहीं, पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड मान रहा है कि कानपुर में गंगा का पानी D कैटेगरी में है, जोकि पीने लायक नहीं है। 7 नाले सीधे गंगा नदी में गिर रहे हैं, कानपुर में चल रहा सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट 350 एमएलडी कैपेसिटी का है, जबकि उसमें हर दिन 550 एमएलडी पानी पहुंच रहा है। क्या वाकई गंगा की स्वच्छता दिखावा है? इसकी सच्चाई जानने के लिए दैनिक भास्कर टीम कानपुर में ग्राउंड जीरो पर पहुंची। पढ़िए रिपोर्ट… बदबूदार पानी सीधे गंगा नदी में गिर रहा
हम सबसे पहले गंगा नदी के गोलाघाट पहुंचे। यहां सीढ़ियों से नीचे की ओर उतरने पर एक किनारे बालू के बीच से नाली बनी नजर आई। नजरें ऊपर की ओर से उठाने पर सीढ़ियों से तेज धारा में बदबूदार पानी सीधा गंगा में गिरता हुआ दिखा। थोड़ा आगे बढ़ने पर देखा कि गोलाघाट पर बनी बस्ती के पीछे की ओर घरों का गंदा पानी नाले के रास्ते गंगा में जा रहा था। यहां रहने वाले उमेश कौशिक ने बताया- कानपुर प्रशासन कहता है कि इस गंदे पानी को पहले प्रोसेस किया जा रहा है, मगर देखिए पानी झागदार और बदबूदार है। कई महीनों से यहां से ये पानी ऐसे ही गंगा नदी में सीधे जा रहा है। साफ पानी में काला सीवरेज मिल रहा
अगले पड़ाव में हम कैंट के डपकेश्वर घाट पहुंचे। घाट से नीचे उतरने पर यहां बदबू फैली हुई थी। एक नाला सीधे गंगा नदी के किनारे पर साफ पानी में मिल रहा था। जिस जगह पर ये पानी मिक्स हो रहा था, वो पानी हल्के भूरे रंग में बदल रहा था। नाले का पानी पूरी तरह से काले रंग का था, जो सीवरेज के पानी की तरह था। नगर निगम की अलग-अलग बोर्ड बैठकों में जो डेटा रखे गए। उसके मुताबिक, गंगा नदी में 7 नाले सीधे गंगा नदी में गिर रहे हैं। इनमें कई नालों को बंद करने के प्रोजेक्ट पर नगर निगम काम कर रहा है। इनमें रामेश्वर घाट, रानीघाट, गोलाघाट, डपकेश्वर, अर्रा ड्रेन, ट्रांसपोर्ट नगर, ‘गंदा नाला’, ‘हलवा खेड़ा नाला’, परमट नाला, नवाबगंज, म्योर मिल जैसे स्पॉट शामिल हैं। अब गंगा प्रहरी क्या कहते हैं, ये पढ़िए
ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता कम, सहायक नदियों से वेस्ट आ रहा
इन 2 स्पॉट को देखने के बाद हमने गंगा रक्षा पीठ (भारत) के पीठाधीश्वर रामजी त्रिपाठी से बात की। वो कहते हैं- माघ मेला चल रहा है, इसलिए हम लोग ऐसे स्पॉट पर जाकर देखते हैं कि गंदा पानी गंगा नदी में न जाने पाए। गोलाघाट और डपकेश्वर घाट के पानी को डायवर्ट कराया गया है। 2 दिन पहले सीसामऊ का नाला भी ओवरफ्लो हुआ था। आप समझिए कि जो ट्रीटमेंट प्लांट लगाया गया है, उसकी कैपेसिटी 350 एमएलडी है, लेकिन पानी 550 एमएलडी आ रहा है। फिर ये पानी का ट्रीटमेंट कैसे कर रहे हैं? जबकि उतनी क्षमता का प्लांट ही नहीं है। नाले बढ़ते-बढ़ते 27 से 32 हो गए हैं, मगर ट्रीटमेंट प्लांट नहीं बन सके हैं। सहायक नदियों में काली नदी और रामगंगा से शुगर मिलों का वेस्ट गंगा नदी तक पहुंच रहा है। नमामि गंगे प्रोजेक्ट में काम तो बहुत हुआ है, मगर गंगा नदी का एरिया बहुत बड़ा है, इसलिए और प्रयास करने की जरूरत है। प्रदूषण बोर्ड ने गंगा के पानी को D कैटेगरी में रखा अब गंगा की स्थिति को हमने UPPCB (उत्तर प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड) से समझा। नवंबर, 2025 को कानपुर जिले में बह रही गंगा नदी के पानी पर बोर्ड ने एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें पूरे जिले के गंगा जल को D कैटेगरी में रखा गया था। यानी पानी पीने लायक नहीं है। जाजमऊ, जहां पर गंगा नदी में डाल्फिन की बॉडी मिली थी। वहां पर पानी में मल मिला था। ये बताता है कि नालों और टेनरी का वेस्ट पानी बिना ट्रीटमेंट के ही सीधे गंगा जल में मिल रहा है। डिजाल्वड ऑक्सीजन कम होने की वजह से ये माना गया कि इस पानी में रहने वाले जीवों को सांस लेने में दिक्कत हो रही होगी। अब जानिए 2 जनवरी को डॉल्फिन कैसे मिली 350 Kg की डॉल्फिन पानी में उतराती मिली
जाजमऊ इलाके में गंगा नदी के किनारे नाविकों ने शाम करीब 5 बजे गंगा नदी में एक बड़ी मछली को तैरते हुए पाया। उसे बाहर निकालने पर पता चला कि यह एक डॉल्फिन थी। नाविकों ने इसकी सूचना पुलिस को दी, जिसके बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। वन विभाग ने शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भिजवाया। आशंका जताई जा रही है कि गंगा में प्रदूषण की वजह से डॉल्फिन की मौत हुई है। जहां शव मिला, वहां जाजमऊ में सबसे ज्यादा टेनरियों का प्रदूषित पानी गंगा में गिरता है। यह डॉल्फिन लगभग 10 फीट लंबी और विलुप्त प्रजाति की बताई जा रही है, जिसका अनुमानित वजन 350 किलो था। डाल्फिन की उम्र करीब 30 साल होती है। वहीं, जो डॉल्फिन मरी हुई मिली, वो करीब 20 साल की थी। ऐसे में माना गया कि वह अपनी औसत आयु से 10 साल पहले मर गई थी। डॉल्फिन का पोस्टमॉर्टम कानपुर चिड़ियाघर में किया गया। वन विभाग और चिड़ियाघर के डॉक्टरों ने पाया कि डॉल्फिन मादा थी। उसके शरीर पर चोट के निशान नहीं थे। उसके बॉडी पार्ट को सुरक्षित करके बरेली के भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI) भेजा गया है। यहां वैज्ञानिक बॉडी को एक्जामिन करके रिपोर्ट एडमिनिस्ट्रेशन को भेजेंगे। अब लोगों की बात गंगा पूजनीय, उसमें नाले नहीं गिरने चाहिए कानपुर के रोहन यादव कहते हैं- सीसामऊ नाले सीधे गंगा नदी में गिर रहे हैं, इसी वजह से गंगा स्वच्छ नहीं हो पा रही है। गंगा नदी हमारी पूजनीय है, इसलिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। नालों को सीधे गिरने से रोकना होगा। राजेश कुमार कहते हैं- गंगा नदी में सीधे नालों का गिरना गलत है, पीएम मोदी खुद इस मामले को देख रहे थे। करोड़ों रुपए खर्च भी हुए, मगर अभी भी गंगा नदी का पानी पूरी तरह से स्वच्छ नहीं हो सका है। गंगा मैली नहीं होनी चाहिए। DM बोले- 6 और ट्रीटमेंट प्लांट पर काम चल रहा DM जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा- कानपुर एक महानगर है, यहां सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट भी बना हुआ है। 6 और STP तैयार करने हैं। टेनरियों का पानी प्रोसेस करने के बाद ही गंगा नदी में डाला जाता है। कुछ छोटी जगहों से अगर पानी जा रहा है, तो उसको भी प्रोसेस करने का प्रयास किया जाता है। माघ मेल के दौरान वैसे भी टेनरियों को बंद करने के आदेश दिए गए हैं। अगर कहीं लापरवाही मिलती है, तो उनके खिलाफ हम कार्रवाई भी करते हैं। ………. ये पढ़ें – कानपुर गंगा में 10 फीट लंबी मृत डॉल्फिन मिली, प्रदूषित पानी से मौत की आशंका, पोस्टमॉर्टम के लिए शव भेजा गया कानपुर के जाजमऊ थाना क्षेत्र में गंगा किनारे एक मृत डॉल्फिन मिली है। यह डॉल्फिन लगभग 10 फीट लंबी और विलुप्त प्रजाति की बताई जा रही है, जिसका अनुमानित वजन 350 किलोग्राम है। वन विभाग ने शव को कब्जे में ले लिया है।
हम सबसे पहले गंगा नदी के गोलाघाट पहुंचे। यहां सीढ़ियों से नीचे की ओर उतरने पर एक किनारे बालू के बीच से नाली बनी नजर आई। नजरें ऊपर की ओर से उठाने पर सीढ़ियों से तेज धारा में बदबूदार पानी सीधा गंगा में गिरता हुआ दिखा। थोड़ा आगे बढ़ने पर देखा कि गोलाघाट पर बनी बस्ती के पीछे की ओर घरों का गंदा पानी नाले के रास्ते गंगा में जा रहा था। यहां रहने वाले उमेश कौशिक ने बताया- कानपुर प्रशासन कहता है कि इस गंदे पानी को पहले प्रोसेस किया जा रहा है, मगर देखिए पानी झागदार और बदबूदार है। कई महीनों से यहां से ये पानी ऐसे ही गंगा नदी में सीधे जा रहा है। साफ पानी में काला सीवरेज मिल रहा
अगले पड़ाव में हम कैंट के डपकेश्वर घाट पहुंचे। घाट से नीचे उतरने पर यहां बदबू फैली हुई थी। एक नाला सीधे गंगा नदी के किनारे पर साफ पानी में मिल रहा था। जिस जगह पर ये पानी मिक्स हो रहा था, वो पानी हल्के भूरे रंग में बदल रहा था। नाले का पानी पूरी तरह से काले रंग का था, जो सीवरेज के पानी की तरह था। नगर निगम की अलग-अलग बोर्ड बैठकों में जो डेटा रखे गए। उसके मुताबिक, गंगा नदी में 7 नाले सीधे गंगा नदी में गिर रहे हैं। इनमें कई नालों को बंद करने के प्रोजेक्ट पर नगर निगम काम कर रहा है। इनमें रामेश्वर घाट, रानीघाट, गोलाघाट, डपकेश्वर, अर्रा ड्रेन, ट्रांसपोर्ट नगर, ‘गंदा नाला’, ‘हलवा खेड़ा नाला’, परमट नाला, नवाबगंज, म्योर मिल जैसे स्पॉट शामिल हैं। अब गंगा प्रहरी क्या कहते हैं, ये पढ़िए
ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता कम, सहायक नदियों से वेस्ट आ रहा
इन 2 स्पॉट को देखने के बाद हमने गंगा रक्षा पीठ (भारत) के पीठाधीश्वर रामजी त्रिपाठी से बात की। वो कहते हैं- माघ मेला चल रहा है, इसलिए हम लोग ऐसे स्पॉट पर जाकर देखते हैं कि गंदा पानी गंगा नदी में न जाने पाए। गोलाघाट और डपकेश्वर घाट के पानी को डायवर्ट कराया गया है। 2 दिन पहले सीसामऊ का नाला भी ओवरफ्लो हुआ था। आप समझिए कि जो ट्रीटमेंट प्लांट लगाया गया है, उसकी कैपेसिटी 350 एमएलडी है, लेकिन पानी 550 एमएलडी आ रहा है। फिर ये पानी का ट्रीटमेंट कैसे कर रहे हैं? जबकि उतनी क्षमता का प्लांट ही नहीं है। नाले बढ़ते-बढ़ते 27 से 32 हो गए हैं, मगर ट्रीटमेंट प्लांट नहीं बन सके हैं। सहायक नदियों में काली नदी और रामगंगा से शुगर मिलों का वेस्ट गंगा नदी तक पहुंच रहा है। नमामि गंगे प्रोजेक्ट में काम तो बहुत हुआ है, मगर गंगा नदी का एरिया बहुत बड़ा है, इसलिए और प्रयास करने की जरूरत है। प्रदूषण बोर्ड ने गंगा के पानी को D कैटेगरी में रखा अब गंगा की स्थिति को हमने UPPCB (उत्तर प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड) से समझा। नवंबर, 2025 को कानपुर जिले में बह रही गंगा नदी के पानी पर बोर्ड ने एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें पूरे जिले के गंगा जल को D कैटेगरी में रखा गया था। यानी पानी पीने लायक नहीं है। जाजमऊ, जहां पर गंगा नदी में डाल्फिन की बॉडी मिली थी। वहां पर पानी में मल मिला था। ये बताता है कि नालों और टेनरी का वेस्ट पानी बिना ट्रीटमेंट के ही सीधे गंगा जल में मिल रहा है। डिजाल्वड ऑक्सीजन कम होने की वजह से ये माना गया कि इस पानी में रहने वाले जीवों को सांस लेने में दिक्कत हो रही होगी। अब जानिए 2 जनवरी को डॉल्फिन कैसे मिली 350 Kg की डॉल्फिन पानी में उतराती मिली
जाजमऊ इलाके में गंगा नदी के किनारे नाविकों ने शाम करीब 5 बजे गंगा नदी में एक बड़ी मछली को तैरते हुए पाया। उसे बाहर निकालने पर पता चला कि यह एक डॉल्फिन थी। नाविकों ने इसकी सूचना पुलिस को दी, जिसके बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। वन विभाग ने शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भिजवाया। आशंका जताई जा रही है कि गंगा में प्रदूषण की वजह से डॉल्फिन की मौत हुई है। जहां शव मिला, वहां जाजमऊ में सबसे ज्यादा टेनरियों का प्रदूषित पानी गंगा में गिरता है। यह डॉल्फिन लगभग 10 फीट लंबी और विलुप्त प्रजाति की बताई जा रही है, जिसका अनुमानित वजन 350 किलो था। डाल्फिन की उम्र करीब 30 साल होती है। वहीं, जो डॉल्फिन मरी हुई मिली, वो करीब 20 साल की थी। ऐसे में माना गया कि वह अपनी औसत आयु से 10 साल पहले मर गई थी। डॉल्फिन का पोस्टमॉर्टम कानपुर चिड़ियाघर में किया गया। वन विभाग और चिड़ियाघर के डॉक्टरों ने पाया कि डॉल्फिन मादा थी। उसके शरीर पर चोट के निशान नहीं थे। उसके बॉडी पार्ट को सुरक्षित करके बरेली के भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI) भेजा गया है। यहां वैज्ञानिक बॉडी को एक्जामिन करके रिपोर्ट एडमिनिस्ट्रेशन को भेजेंगे। अब लोगों की बात गंगा पूजनीय, उसमें नाले नहीं गिरने चाहिए कानपुर के रोहन यादव कहते हैं- सीसामऊ नाले सीधे गंगा नदी में गिर रहे हैं, इसी वजह से गंगा स्वच्छ नहीं हो पा रही है। गंगा नदी हमारी पूजनीय है, इसलिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। नालों को सीधे गिरने से रोकना होगा। राजेश कुमार कहते हैं- गंगा नदी में सीधे नालों का गिरना गलत है, पीएम मोदी खुद इस मामले को देख रहे थे। करोड़ों रुपए खर्च भी हुए, मगर अभी भी गंगा नदी का पानी पूरी तरह से स्वच्छ नहीं हो सका है। गंगा मैली नहीं होनी चाहिए। DM बोले- 6 और ट्रीटमेंट प्लांट पर काम चल रहा DM जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा- कानपुर एक महानगर है, यहां सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट भी बना हुआ है। 6 और STP तैयार करने हैं। टेनरियों का पानी प्रोसेस करने के बाद ही गंगा नदी में डाला जाता है। कुछ छोटी जगहों से अगर पानी जा रहा है, तो उसको भी प्रोसेस करने का प्रयास किया जाता है। माघ मेल के दौरान वैसे भी टेनरियों को बंद करने के आदेश दिए गए हैं। अगर कहीं लापरवाही मिलती है, तो उनके खिलाफ हम कार्रवाई भी करते हैं। ………. ये पढ़ें – कानपुर गंगा में 10 फीट लंबी मृत डॉल्फिन मिली, प्रदूषित पानी से मौत की आशंका, पोस्टमॉर्टम के लिए शव भेजा गया कानपुर के जाजमऊ थाना क्षेत्र में गंगा किनारे एक मृत डॉल्फिन मिली है। यह डॉल्फिन लगभग 10 फीट लंबी और विलुप्त प्रजाति की बताई जा रही है, जिसका अनुमानित वजन 350 किलोग्राम है। वन विभाग ने शव को कब्जे में ले लिया है।