खूनी शादी 2:मर्डर के वक्त फोन पर लाइव था, वो तड़प रही थी पति चीखें सुन रहा था; प्लान परफेक्ट था, टी-शर्ट से पकड़ा गया

27 जुलाई 2014, कानपुर। रात के करीब साढ़े बारह बजे थे। शहर गहरी नींद में डूब चुका था, तभी एक युवक बदहवास हाल में स्वरूपनगर थाने पहुंचा। उम्र करीब 26-27 साल… आंसू थम नहीं रहे थे। आवाज में हकलाहट थी। उसने बताया- कुछ बाइक सवार उसकी पत्नी को कार समेत उठा ले गए। पुलिस हरकत में आई। वायरलेस पर मैसेज दौड़ने लगे। करीब ढाई घंटे बाद सुनसान इलाके में एक कार मिली। पिछली सीट पर एक महिला की लाश थी। पहचान हुई, ज्योति श्यामदासानी। कुछ देर पहले जो थाने में रोते हुए मदद मांगने आया था, वो पीयूष श्यामदासानी था। शहर के रसूखदार कारोबारी का बेटा…। ‘खूनी शादी’ के दूसरे एपिसोड में पढ़िए कानपुर के पीयूष और ज्योति की कहानी। पत्नी मर रही थी और वो फोन पर उसकी चीखें सुन रहा था। फुल प्रूफ प्लान था, लेकिन एक टी-शर्ट की वजह से पकड़ा गया… 2000 के दशक का कानपुर। शहर में दो सिंधी कारोबारियों की तूती बोलती थी। बिस्किट व्यवसायी ओमप्रकाश श्यामदासानी और ‘पान मसाला किंग’ हरीश मखीजा। धंधा अलग था, लेकिन कम्युनिटी के प्रोग्राम में बात-मुलाकात होती ही रहती थी। घर का आना-जाना भी था। दोनों के बच्चे पीयूष श्यामदासानी और मनीषा मखीजा एक ही स्कूल में पढ़े, साथ खेले और बड़े हुए। वक्त के साथ दोस्ती गहरी हुई। हंसी-मजाक भरोसे में बदला और भरोसा प्यार में। पीयूष ने घर में बात की। सब ड्राइंग रूम में सब बैठे थे। मां ने कहा- “लड़की ठीक है। परिवार भी जान-पहचान का है।” ओमप्रकाश बोले- “हरीश भाईजी बहुत अच्छे आदमी हैं। बस कुंडली दिखा लेते हैं, बाकी तो सब बढ़िया है।” बस यहीं मामला अटक गया। पीयूष और मनीषा की कुंडली नहीं मिली। ओमप्रकाश ज्योतिष को बहुत मानते थे। अब ये रिश्ता उन्हें मंजूर नहीं था। रिश्ता वहीं टूट गया। दिन बीतते गए। पीयूष और मनीषा ने मिलना-जुलना बंद कर दिया। कुछ समय बाद पीयूष के लिए जबलपुर से रिश्ता आया। दिग्गज कारोबारी शंकरलाल नागदेव की बेटी ज्योति। शादी पक्की हो गई। 28 नवंबर, 2012 धूमधाम से ज्योति और पीयूष की शादी हो गई। दोनों परिवार खुश थे। ज्योति भी नई जिंदगी के सपने संजोए, नए रिश्तों और नए भरोसे के साथ आगे बढ़ रही थी। लेकिन, इस चमकती शुरुआत के पीछे एक सच्चाई छुपी थी। पीयूष अभी भी मनीषा को अपने दिल से निकाल नहीं पाया था। शादी की रस्मों के बीच उसका मन कहीं और अटका था। पीयूष और मनीषा का रिश्ता गहरा था। रोज की मुलाकातें, लंबी बातें और भविष्य के वादे। मगर जैसे ही पीयूष की शादी हुई, हालात बदल गए। परिवार का दबाव बढ़ा और दोनों ने मजबूरी में रिश्ता खत्म कर दिया। कम से कम बाहर से तो यही लगा। शादी के बाद कुछ महीने तक सब शांत रहा। न फोन, न मैसेज। ऐसा लगा, जैसे यह कहानी यहीं खत्म हो चुकी है। लेकिन, पीयूष ज्यादा दिन खुद को रोक नहीं पाया। एक दिन कमरे में अकेला बैठा पीयूष मोबाइल घुमा रहा था। अचानक उसने मनीषा को मैसेज कर दिया- “कैसी हो?”
कुछ देर बाद जवाब आया। “ठीक हूं… और तुम?”
पीयूष ने लिखा- “बस यूं ही याद आ गई।” मनीषा- “अब याद आई?”
पीयूष- “हर दिन आती थी।” बातचीत लंबी होती चली गई। कुछ दिन बाद मनीषा का नंबर पीयूष के फोन पर चमका। नंबर अब भी सेव था। पीयूष ने एक पल को सांस रोकी और फोन उठा लिया। उधर से आवाज आई- “हैलो… कैसे हो पीयूष”
पीयूष के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई- “आवाज सुनकर अच्छा लग रहा है।” मनीषा ने धीमे से कहा- “मुझे भी।”
पीयूष बोला- “मैं समझता था सब खत्म हो गया।”
मनीषा- “कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते।” दोनों के दिल फिर से बोलने लगे थे। फोन कॉल लंबी होने लगीं और चोरी-छिपे मुलाकातें भी शुरू हो गईं। पीयूष भूल गया था कि अब वो शादीशुदा है। उधर, मनीषा के लिए भी रिश्ते आ रहे थे। एक दिन मनीषा की आवाज बुझी-बुझी-सी लग रही थी। पीयूष ने इसकी वजह पूछी। मनीषा बोली- “एक रिश्ता आया है। वो लोग आज मुझे देखने आ रहे हैं।” पीयूष चुप हो गया। मनीषा ने आगे कहा- “अगर शादी तय हो गई तो… फिर हम कभी नहीं मिल पाएंगे।” पीयूष के अंदर कुछ टूट गया। ये उसे बिल्कुल मंजूर नहीं था। मनीषा अब उसका पुराना प्यार नहीं, जुनून बन चुकी थी। उस एक फोन कॉल के बाद पीयूष पूरी तरह बदल गया। न जाने कैसे उसने मनीषा का रिश्ता पक्का नहीं होने दिया। अब उसके दिमाग में अजीब-सी बेचैनी और गुस्सा घर करने लगा। वो रात-रातभर घर से गायब रहता। इधर, ज्योति उसके इंतजार में घुलती रहती। दोनों के रिश्ते में चुप्पी बढ़ती जा रही थी, दरारें गहरी हो रही थीं। उस दिन रात के 2 बज रहे थे, जब पीयूष घर लौटा। ज्योति ने खुद को संभालते हुए पूछा- “कहां थे?”
पीयूष ने जूते उतारते हुए कहा- “कुछ काम था।” ये सुनते ही ज्योति गुस्से से कांपने लग गई थी, बोली- “हर रात काम?”
पीयूष चिढ़ गया- “पूछताछ मत किया करो ज्यादा।” ज्योति- “जरूर पूछूंगी, वाइफ हूं तुम्हारी…।”
पीयूष ने पलटकर देखा- “तो क्या हर चीज तुम्हें बतानी होगी।”
ज्योति- “तुम हमेशा से ऐसे ही थे तो शादी क्यों की?” पीयूष झुंझला गया, बोला- “लोग बदल जाते हैं।”
ज्योति- “या कोई और आ जाता है?” पीयूष की आंखों में गुस्सा उतर आया- “क्या मतलब है इसका? छोटी-छोटी बात पर ड्रामा करने लगती हो।” ज्योति ने ऊंची आवाज में कहा- “ड्रामा तो मेरी जिंदगी बन गई है।” पीयूष- “प्लीज मुझे शांति से जीने दो…।”
ज्योति ने थकी आवाज में कहा- “और मैं…?” पीयूष बिना कुछ कहे कमरे से बाहर चला गया। कुछ देर बाद उसने मनीषा को फोन किया और पूरी बात बताई। दोनों एक बात पर आकर टिक गए। अगर ज्योति रही तो दोनों साथ नहीं आ पाएंगे। शुरुआत में ये बातें हल्की-फुल्की थीं। कभी गुस्से में कही गई, कभी बेबसी में। “काश… वो बीच में न होती। सब कुछ कितना आसान हो जाता।” लेकिन, धीरे-धीरे ये बातें सोच में और फिर इरादे में बदलने लगीं। पीयूष के दिमाग में अब एक ही सवाल घूमता रहता था कि ज्योति को कैसे हटाया जाए? मनीषा भी इस प्लानिंग में बराबर की हिस्सेदार थी। एक दिन पीयूष से बोली- “अवधेश को जानते हो, मेरा ड्राइवर। जरूरत पड़ने पर वो कुछ भी कर सकता है।” इसके बाद से साजिश को असली शक्ल मिलनी शुरू हो गई। मनीषा ने अवधेश से बात की। पहले इशारों में, फिर सीधे शब्दों में। ये काम अकेले अवधेश के बस की बात नहीं थी। तीन लोग और शामिल किए गए… रेनू उर्फ अखिलेश, सोनू और आशीष। पैसों की बात भी फाइनल हो गई। एक बार फिर से प्लानिंग हुई। इसका मास्टरमाइंड पीयूष था। पीयूष काफी होशियार था। वो जानता था कि अगर मर्डर सीधे तरीके से हुआ तो पुलिस उस पर शक कर सकती है। वो चाहता था, सब नॉर्मल दिखे। 13 जुलाई, 2014 पीयूष मुस्कराते हुए बोला- “आज संडे है। बाहर डिनर पर चलते हैं। मौसम भी अच्छा है।” ज्योति चौंक गई- “अचानक…?”पीयूष ने हल्के अंदाज में कहा- “हां, उस दिन कुछ ज्यादा हो गया था।” ज्योति की आवाज खिल गई- “कहां चलेंगे?”पीयूष बोला- “जहां तुम कहो।” ज्योति ने हंसते हुए कहा- “बहुत दिन बाद ये सुन रही हूं।” ज्योति काफी खुश थी। बहुत दिन के बाद दोनों बाहर जा रहे थे। पीयूष के चेहरे पर उस दिन के लिए अफसोस भी झलक रहा था। शाम ढलने लगी। फिर अचानक जोरदार बारिश शुरू हो गई। पीयूष ने बाहर झांककर कहा- “ऐसे में तो भयंकर ट्रैफिक होगा।” ज्योति बोली- “थोड़ी देर देख लेते हैं। रुक लें?” इस मौसम में पीयूष का प्लान ठीक से पूरा नहीं हो पाता। वो चाहता था कि बारिश रुक जाए, लेकिन बारिश और तेज हो गई, बिजली चमकने लगी। पीयूष ठंडी आवाज में बोला- “आज नहीं जा पाएंगे।” ज्योति की मुस्कान बुझ गई- “पर तुमने तो कहा था।” पीयूष- “मौसम देखो, कानपुर का ट्रैफिक तुम जानती नहीं हो। एक बार फंसे तो घंटों की फुरसत…।” ज्योति ने धीरे से कहा- “ठीक है।” बारिश ने पीयूष के प्लान पर पानी फेर दिया। साजिश वहीं रुक गई। फिर भी कहानी खत्म नहीं हुई थी। सब कुछ फिर से तय किया गया। तारीख तय हुई 20 जुलाई यानी अगला रविवार। जगह बदली गई, टाइमिंग बदली गई। पीयूष इस बार ज्यादा सतर्क था, लेकिन इस बार भी सारी प्लानिंग धरी रह गई। ज्योति ने बाहर जाने से मना कर दिया। दो नाकाम कोशिशों से पीयूष और ज्यादा बेचैन होता जा रहा था। 27 जुलाई की रात। पीयूष मुस्कराने की कोशिश करते हुए बोला- “आज तो चलना ही है। कई रविवार से बात टल रही है।” ज्योति ने गौर से देखा- “आज कुछ अलग लग रहे हो।” पीयूष ने हंसकर कहा- “अलग क्या, बस बाहर चलने का मन है।” ज्योति ने थोड़ी देर चुप रहकर कहा- “ठीक है, चलो।” करीब 10 बजे दोनों घर से निकले। पीयूष स्टीयरिंग संभालते हुए बोला- “होटल वरांडा चलते हैं। वहां के कोफ्ते काफी बढ़िया होते हैं। ज्योति ने हल्की मुस्कान के साथ कहा- “हां, काफी वक्त हो गया वहां गए।” कार शहर की सड़कों पर बढ़ चली। ट्रैफिक काफी कम था। पीयूष ने बहुत उत्साह से बाहर चलने के लिए कहा था, लेकिन कार में काफी शांत था। ज्योति ने वजह पूछी तो बोला- “कुछ नहीं, बस यूं ही। तुम ही कुछ बात करो न…।” ज्योति ने बाहर देखते हुए कहा- “आज मौसम ठीक है।”
पीयूष धीमे से बोला- “हां… इस बार कुछ नहीं बिगड़ेगा।”
ज्योति ने उसकी तरफ देखा- “क्या कहा?” पीयूष- “नहीं, कुछ नहीं…। ये साड़ी अच्छी लग रही है तुम पर।” कार आगे बढ़ रही थी और पीयूष के भीतर की बेचैनी हर मोड़ पर गहरी होती जा रही थी। होटल में भी दोनों आमने-सामने बैठे। खाना ऑर्डर हो चुका था, लेकिन टेबल पर सन्नाटा पसरा था। न हंसी, न बातचीत। ज्योति ने मेज पर रखे पानी के गिलास को छूते हुए कहा- “तुम कुछ बोल क्यों नहीं रहे।” पीयूष ने हल्की मुस्कान के साथ कहा- “नहीं, बस थोड़ी थकान सी है।” ज्योति- “तो फिर डिनर का प्लान क्यों बनाया?” पीयूष- “काफी दिन से प्लान टल रहा था। थकान और स्ट्रेस तो बिजनेस में होती ही है।” फिर मोबाइल उठाते हुए कहा- “एक जरूरी मैसेज है।” ज्योति चुप हो गई। कुछ देर बाद बोली- “मुझे लगा हम बात करेंगे। सब ठीक करने की कोशिश करेंगे।” पीयूष ने गिलास उठाया- “पहले खाना खा लें।” तभी पीयूष का मोबाइल वाइब्रेट हुआ। उसने स्क्रीन देखी और उठ खड़ा हुआ। ज्योति ने चौंककर पूछा- “कहां जा रहे हो?” पीयूष- “फोन है, बात करके अभी आया।”
ज्योति- “यहीं बात कर लेते।” पीयूष ने हल्की झुंझलाहट में कहा- “जरूरी है, यहां बात नहीं हो सकती।” वो होटल से बाहर गया। फोन पर फुसफुसाया- “सब तैयार है न?” दूसरी तरफ से आवाज आई- “हां… हम इंतजार कर रहे हैं।” पीयूष- “आज कोई गलती नहीं होनी चाहिए।” पीयूष लौटकर आता उससे पहले खाना आ चुका था। अब दोनों ने बातचीत बिल्कुल बंद कर दी। ज्योति मायूस होकर खाना खाने लगी, कुछ कहती भी तो पीयूष बस सिर हिला देता। असल में उसका दिमाग वहां था ही नहीं। उसकी नजर बार-बार मोबाइल पर जा रही थी। कभी मैसेज, कभी खाना छोड़कर फोन पर बात करने चले जाना। वो कोई चूक नहीं होने देना चाहता था। करीब 11:30 बजे डिनर के बाद दोनों होटल से निकले। कार घर की ओर बढ़ चली। सड़कें सुनसान थीं, रात और गहरी हो चुकी थी। कुछ देर बाद पीछे से बाइक के हॉर्न की तेज आवाजें आने लगीं। ज्योति ने घबराकर कहा- “ये बाइक इतनी तेज क्यों आ रही हैं?” पीयूष ने सामने देखते हुए बोला- “शायद आगे निकलना चाहते हैं।” अचानक तेज ब्रेक की आवाज आई। दो बाइक तेजी से आगे निकलीं और कार से सामने आकर रुक गई। कुल 4 लोग थे। पल भर में उन्होंने कार को घेर लिया। ज्योति चिल्लाई- “ये क्या कर रहे हैं?” एक आदमी ने तुरंत कार की चाबी निकाल ली और पीयूष का कॉलर पकड़कर बाहर खींच लिया। पीयूष ने घबराकर कहा- “कौन हो तुम लोग… क्या चाहिए?” दूसरा बोला- “बाहर निकल…।” ज्योति काफी घबरा गई थी। तभी एक आदमी ने ज्योति को भी बाहर खींच लिया। पीयूष चिल्लाया- “दूर रहो… मेरी पत्नी को मत छुओ।” तब तक उस आदमी ने ज्योति को जबरदस्ती पीछे की सीट पर धकेल दिया। फिर खुद बैठ गया। दो आदमी आगे बैठे और चौथे आदमी ने पीयूष को जोर से धक्का दिया। फिर वो भी पीछे की सीट पर बैठ गया। उसके बैठते ही कार तेजी से आगे बढ़ गई। पीयूष धक्के से लड़खड़ा कर गिर गया था। उठा और कार के पीछे दौड़ पड़ा, चिल्लाया- “ज्योति…।” तब तक कार काफी आगे निकल चुकी थी। पीयूष ने जेब से मोबाइल निकाला और ज्योति को कॉल करने लगा। फोन उठा। ज्योति की चीख सुनाई दे रही थी। पीयूष रोते हुए बोला- “मैं यहीं हूं, घबराओ मत मैं पुलिस के पास जा रहा हूं।” एक खुरदरी-सी आवाज आई और फोन कट गया। रात करीब 12:30 बजे पीयूष स्वरूपनगर थाने पहुंचा। चेहरे पर घबराहट थी, आवाज कांप रही थी। “सर, बदमाशों ने मेरी पत्नी को अगवा कर लिया है।” दरोगा ने पीयूष को पानी दिया। फिर बोला- “आप पहले शांत हो जाइए, फिर बताइए बात क्या है।” पीयूष ने पानी नहीं पीया और एक झटके में में पूरा वाकया सुना दिया। इंस्पेक्टर कमरे में आए, दरोगा ने कुर्सी पीछे खिसकाई- “मामला गंभीर है। तुरंत वायरलेस करो।” मुंशी ने तुरंत सभी थानों को सूचना दी। “सफेद होंडा एकॉर्ड, गाड़ी नंबर UP 78 BR 5009 चार बदमाशों ने औरत को अगवा किया है।” दरोगा ने पूछा- “चेहरा देख पाए थे?”
पीयूष बोला- “नहीं देख पाया, अंधेरा था सर।”
“नाकाबंदी लगाओ…।” दरोगा ने आदेश दिया। कुछ ही देर में थाने के बाहर गाड़ी रुकी। एक बुजुर्ग हड़बड़ाते हुए अंदर आए- “मेरा बेटा कहां है?” ये पीयूष के पिता थे, ओमप्रकाश श्यामदासानी। पीयूष उन्हें देखकर टूट गया। रोते हुए बोला- “पापा, ज्योति को ले गए।” ओमप्रकाश ने इंस्पेक्टर से कहा- “साब, कुछ कीजिए… मेरी बहू को ढूंढिए। मैं हाथ जोड़ता हूं।” दरोगा गंभीर आवाज में बोला- “आप चिंता मत कीजिए। पूरी फोर्स लगी है।” मामला हाईप्रोफाइल था। कानपुर पुलिस की नींद उड़ चुकी थी। शहर के नामी बिजनेसमैन के बहू सरेराह अगवा की गई थी। सड़कों पर पुलिस की गाड़ियां दौड़ने लगीं। वायरलेस की आवाजें तेज हो गईं। पूरे शहर का माहौल अचानक भारी हो गया था। रात करीब 2 बजे खबर आई- ‘कार मिल गई है।’ पुलिस टीम मौके पर पहुंची। कार के दरवाजे लॉक थे। दरोगा ने भीतर झांककर देखा। अंदर ज्योति की लहूलुहान लाश पड़ी थी। कार का शीशा तोड़कर लाश निकाली गई। एक सिपाही ने कहा- “शरीर पर कई वार हैं, चाकू से कई बार गोदा गया है।” लूट और अपहरण का केस अब मर्डर में बदल गया था। तभी एक गाड़ी आकर रुकी। किसी ने फुसफुसाकर कहा- “आईजी साहब आए हैं।” IG (इंस्पेक्टर जनरल), कानपुर जोन आशुतोष पांडेय ने उतरते ही पूछा- “क्या स्थिति है?” दरोगा ने कहा- “महिला मृत मिली है सर। कार भी यहीं थी।” IG पांडेय ने पूछा- “लूट के बाद मर्डर हुआ है?” दरोगा बोला- “सर, यही तो उलझन है। बॉडी पर गहने मौजूद हैं। मोबाइल भी कार में ही है। कार भी बड़े सलीके से सड़क किनारे खड़ी थी।” आईजी चौंक गए, मामला सीधा नहीं था। लूट की कहानी सवालों के घेरे में थी। उधर, पीयूष का रो-रोकर बुरा हाल था। मीडिया से बात करते हुए वो कई बार फूट-फूटकर रोने लगता था। किसी को उसे संभालना पड़ता। पोस्टमॉर्टम में पता चला, ज्योति की बॉडी पर चाकू के 17 बार निशान थे। ये किसी पेशेवर का काम नहीं था। इसके अलावा कार से तीन चाकू भी बरामद हुए थे, लेकिन उनका इस्तेमाल नहीं हुआ था। केस में हर कदम पर नए सवाल खड़े हो रहे थे। पीयूष पर पुलिस का शक गहरा रहा था। मोबाइल होते हुए भी उसने पुलिस को फोन नहीं किया। एक घंटे बाद खुद पुलिस थाने पहुंचा। मामला हाई प्रोफाइल था, इसलिए बिना ठोस सबूत के हाथ डालना ठीक नहीं था। होटल की CCTV वीडियो निकलवाया गया। फुटेज में पीयूष नॉर्मल नहीं दिख रहा था। माहौल वैसा नहीं था, जैसा पीयूष ने बताया था। न हंसी, न लंबी बातचीत। ज्योति बात कर रही थी, लेकिन पीयूष का ध्यान कहीं और था। उसकी टी-शर्ट भी बदली हुई थी। वो किसी और टी-शर्ट में पुलिस स्टेशन पहुंचा था। एक ही रात में कपड़े बदलने की यह बात IG आशुतोष पांडेय को खटक गई। वो केस पर बारीकी से नजर बनाए हुए थे। अब हर बयान, हर मिनट और हर हरकत को बारीकी से परखा जा रहा था। जांच आगे बढ़ी तो सड़क ने भी सवाल पूछ लिए। जिस जगह कार रोके जाने की बात कही गई थी, वहां अचानक ब्रेक लगने के निशान नहीं थे। अब लूट की कहानी कमजोर पड़ रही थी। इसी बीच मीडिया की भीड़ बढ़ती जा रही थी। टीवी कैमरे, सवालों की बौछार, ब्रेकिंग न्यूज। हर अपडेट सुर्खी बन रही थी। पुलिस पर दबाव बढ़ रहा था। पुलिस को पहला ठोस सबूत मिला कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) से। एक नंबर सामने आया। पीयूष घंटों इस नंबर पर बात करता था। पता चला नंबर मनीषा का है। घटना के दिन पीयूष ने उस नंबर पर 9 मिनट में ही करीब 150 SMS किए थे। पुलिस का शक यकीन में बदल रहा था। 31 जुलाई, 2014, पुलिस ने पीयूष और मनीषा को हिरासत में ले लिया। दोनों को सामने बैठाकर पूछताछ हुई। पीयूष की गढ़ी हुई कहानी दरकने लगी। आखिरकार उसने सच कबूल कर लिया। पीयूष ने कबूला कि ज्योति को मारने के लिए उसने 4 लोगों को तैयार किया था। साजिश की तस्वीर साफ होने लगी थी। गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले मनीषा के ड्राइवर अवधेश को पकड़ा गया। उसके बाद सोनू, रेनू और आशीष भी पुलिस की गिरफ्त में आ गए। पूछताछ में अवधेश ने पूरी साजिश को सामने रख दिया। उसने बताया- “चाकू मैंने खुद खरीदा था। पास के शॉपिंग मॉल से। ज्योति को मारने के लिए।” पुलिस ने सवाल किया- “किसने कहा था?” अवधेश ने बिना नजरें मिलाए जवाब दिया- “पीयूष ने…। उसने पैसे दिए थे और कहा था- कोई गलती नहीं होनी चाहिए।” दरोगा ने सख्ती से पूछा- “मारने के लिए 17 बार चाकू मारा?” अवधेश बोला- “उसी ने कहा था, तब तक चाकू मारना जब तक सांसें न उखड़ जाएं।” कमरे में सन्नाटा छा गया। पुलिस ने अगला सवाल किया- “मर्डर के वक्त पीयूष वहीं था?” अवधेश ने जवाब दिया- “नहीं साब वो फोन पर ज्योति की चीखें सुन रहा था। सब उसी की प्लानिंग थी।” केस की एक-एक कड़ी पुलिस के सामने थी। वारदात में इस्तेमाल बाइक बरामद हुई। सोनू और रेनू के खून से सने कपड़े मिले। मॉल की CCTV फुटेज में रेनू और आशीष चाकू खरीदते दिखे। आखिर में हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू भी बरामद हो गया। अब सिर्फ बयान नहीं, सबूतों की मजबूत चेन भी पुलिस के पास थी। बारी दोषियों को सजा दिलाने की थी। सवाल, बहस और सबूतों की परतें… तब कहीं 8 साल बाद इंसाफ की तारीख आई। 21 अक्टूबर, 2021 को अदालत ने फैसला सुनाया। अपर सेशन जज अजय कुमार त्रिपाठी ने सभी 6 आरोपियों यानी पीयूष, मनीषा, उसका ड्राइवर अवधेश, उसके साथी रेनू उर्फ अखिलेश कनौजिया, सोनू कश्यप और आशीष कश्यप को उम्रकैद की सजा सुनाई। मामला यहां खत्म नहीं हुआ। फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने केस को नए सिरे से परखा। लंबी सुनवाई के बाद 8 दिसंबर, 2024 को हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने मनीषा के अलावा सभी को उम्रकैद की सजा सुनाई। मनीषा केस से बरी हो गई। कोर्ट ने कहा कि मनीषा के साजिश में शामिल होने के पुख्ता सबूत नहीं हैं। *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल *** रेफरेंस जर्नलिस्ट- अनुराग अग्रवाल, हैदर नकवी भास्कर टीम ने सीनियर जर्नलिस्ट्स और केस से जुड़े जानकारों से बात करने के बाद सभी कड़ियों को जोड़कर ये स्टोरी लिखी है। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है। ———————————————————– सीरीज की ये स्टोरी भी पढ़ें… खूनी शादी- 1:हथौड़े से पति का सिर फोड़ा, बेटा जागा तो गला दबा दिया; मर्डर से पहले और बाद प्रेमी के साथ सोई 1 जनवरी 2016 की सुबह, गोरखपुर। एक औरत लगातार दरवाजा पीट रही थी। घर में रेनोवेशन का काम चल रहा था। आवाज मजदूरों तक पहुंची तो उन्होंने दरवाजा खोला। औरत गुस्से में पैर पटकते हुए, बगल के कमरे में गई। दरवाजा खोलते ही उसके होश उड़ गए। बिस्तर पर पति और 4 साल के बेटे की लाशें पड़ी थीं। पूरी स्टोरी पढ़ें…