देश में यूपी में सबसे ज्यादा डॉल्फिन:2025 में सबसे ज्यादा मौत, यूपी में 6 महीने में 4 डॉल्फिन की लाश मिली

देश में डॉल्फिन की कुल आबादी की यूपी में (2397) 40 प्रतिशत से ज्यादा पाई जाती है। लेकिन अब कानपुर में 20 साल फ़ीमेल डॉल्फिन की मौत होने के बाद आने वाली नस्ल पर खतरा मंडरा रहा है। हालांकि अधिकतर डॉल्फिन की मौत की पोस्टमार्टम होने के बाद भी मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो पाता है। मिर्जापुर (गडोली धाम) में 4 अगस्त, गाजीपुर (जमनिया) 23 दिसंबर, कानपुर में 2 जनवरी और रायबरेली में एक नहर में 8 जनवरी को एक नहर में मृत अवस्था में एक डॉल्फिन मिली थी। यूपी में गंगा, यमुना, चम्बल, घाघरा, राप्ती और गेरुआ जैसी नदियों में डॉल्फिन पाई जाती है। साल 2023 में यूपी सरकार ने डॉल्फिन को राज्य जलीय जीव घोषित किया है। साल 2020-23 में मेरठ और बुलंदशहर के बीच 4 डॉल्फिन मृतक पाई गई थी। हाल ही में कानपुर से 75 किमी की दूरी पर स्थित कन्नौज (दाईपुर) में 5 जून को एक डॉल्फिन का वीडियो सामने आया था। गंगा प्रहरी की जागरूकता के बाद डॉल्फिन को छोड़ा गया था। अब समझते है यूपी में डॉल्फिन की मौत का क्या कारण है डॉल्फिन मैन ऑफ इंडिया आर के सिन्हा के मुताबिक कानपुर में गंगा नदी बहुत ही पॉल्यूटेड है, क्योंकि डॉल्फिन साफ जल में रहना पसंद करती है। लेकिन कानपुर में डॉल्फिन दिखाई दी ये एक बड़ी बात है। मछुआरों के द्वारा प्लास्टिक के जाल लगाए जाते है, जर्जर होने के बाद इनके अवशेष नदी में रह जाते है। इन पर रोक होनी चाहिए। गंगा के अंदर पाई जाने वाली डॉल्फिन जिसको गंगेय डॉल्फिन कहते है। इस डॉल्फिन के आँखों में लेंस नहीं पाया जाता है। या यूं कहें ये अंधी होती है, ये सिंसेनिटि से अपने शिकार को पहचानती है। जब छोटी मछलियां ही पोल्यूटेड होंगी तो डॉल्फिन के लिए खाने में दिक्कत आएगी। सबसे पहले डॉल्फिन को असम सरकार ने साल 2007 में राज्य जलीय जीव घोषित किया था। हालांकि अभी तक किसी भी डॉल्फिन की नेचुरल डेथ होना सामने नहीं आया है। डॉल्फिन 10 साल के बाद में प्रजनन करने के लिए तैयार होती है। एक डॉल्फिन को एक दिन में खाने के लिए 10 सेमी की मछली चाहिए होती है। एक मछली एक दिन में 5 से 6 किलो छोटी मछली खाती है। डॉल्फिन नदी में रहने के लिए घुमावदार स्थान, जहां पानी का बहाव कम होता है। या यूं कहें नदी के किनारों पर पाई जाती है, जिससे इसको शिकार करने में ज्यादा परेशानी न हो। साल 2009 में मनमोहन सरकार के द्वारा डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित करवाया था। कानपुर में गंगा नदी है गंदी कानपुर में मृत अवस्था में मछली मिलना बड़ी बात है, कानपुर में गंगा नदी बहुत ही गंदी है। डॉल्फिन को बचाने के लिए हमको नदियों को साफ करना होगा, नदियों में पानी की पर्याप्त उपलब्धता होनी चाहिए। मछुआरों के द्वारा जो प्लास्टिक का जाल डाला जातय है, ये गलत है। अगर गंगा में ज्यादा रसायन है तो ये इनके जीवन पर इफेक्ट डालता है। घाघरा, चम्बल, राप्ती, गंगा और यमुना में जो डॉल्फिन पाई जाती है इसको गांगेय डॉल्फिन कहते है। प्रदूषण, बांध और आधारभूत संरचना से डॉल्फिन को खतरा डॉल्फिन को स्वस्थ नदी का सूचक माना जाता ह। वे नदी इकोसिस्टम के लिए अंब्रेला प्रजाति की तरह हैं। लेकिन देश की नदियां सीवेज, रासायनिक अपशिष्ट और कचरे के चलते मर रही हैं। डॉलफिन भी इसका शिकार हो रही हैं। दरअसल, देश में प्रदूषित नदियों की संख्या बढ़ती जा रही है। संसद में दिए गए एक जवाब के मुताबिक 2015 में 302 के मुकाबले प्रदूषित नदियों की संख्या 2018 में बढ़कर 350 हो गई। एमी फ्रेंकेल ने मीडिया से बातचीत में बताया ,“एशिया में प्लास्टिक प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। यह डॉल्फिन के लिए प्रमुख खतरा है। लुप्तप्राय प्रजातियों में 36 फीसदी के प्लास्टिक कचरे में फंसने और उलझने का खतरा है।“ कानपुर की फीमेल डॉल्फिन का लीवर काला निकला कानपुर में तैनात जिला वन अधिकारी दिव्या ने दैनिक भास्कर को बताती है कानपुर में मृत पाई गई डॉल्फिन फ़ीमेल थी। जिसकी उम्र 16 वर्ष के आसपास थी। मौत का कारण नेचुरल माना जा रहा है। हालांकि जो उसका लीवर था, वह ब्लैक था। पोस्टमॉर्टम होने के बाद डॉल्फिन के ऑर्गन का सैंपल लेकर IVRI भेजा गया है। मौत सटीक कारण जानने के लिए रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। इसके बाद ही कुछ बताया जा सकता है। डॉल्फिन के अंदर से कोई भी प्लास्टिक अवषेस नहीं मिला है। डॉल्फिन की औसतन उम्र 30 साल होती है। डॉल्फिन ने अपनी औसत आयु से पहले ही दम तोड़ दिया था। गाजीपुर के जिला वन अधिकारी अजीत प्रताप सिंह ने बताया हमारे यहां जो डॉल्फिन मिली थी। वह एक व्यस्क मेल डॉल्फिन था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डॉल्फिन की दम घुटने से मौत होने का कारण सामने आया है। रायबरेली में मिली डॉल्फिन की उम्र करीब 8 साल और वजन 70 किलो के आसपास था। कानपुर चिड़ियाघर मे डॉल्फिन का पोस्टमार्टम किया गया। डॉ. नसीम के मुताबिक किडनी लीवर जैसे सभी अंग सही काम कर रहे थे। शरीर के बाहरी अंग पर कोई भी चोट का निशान नहीं पाया गया है। सेंपल कलेक्ट करके अधिक जांच के लिए बरेली भेजा गया है, जिसकी बाद मौत का सही कारण पता चल पाएगा। डॉल्फिन के बारे में क्या यह आप जानते हैं?
इससे पहले चार साल में चार डॉल्फिन की मौत
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WWI) ने भारत की नदियों में डॉल्फिन की संख्या जानने के लिए साल–2024 में सर्वे किया। 3 मार्च 2025 को केंद्र सरकार ने इसके आंकड़े जारी किए। गंगा नदी में डॉल्फिन की संख्या 6324 पाई गई। जबकि बिजनौर से नरौरा बैराज तक इनकी संख्या 52 दर्ज की गई। 2023 में ये संख्या 50 थी। यानि बीते एक साल में दो डाल्फिन बढ़ी हैं। साल–2020 से 2024 तक मेरठ और बुलंदशहर जिले में चार डॉल्फिन की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में इनकी मौत का कारण आज तक स्पष्ट नहीं हुआ है। डाल्फिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट
3 डॉक्टर ने चिड़ियाघर में डॉल्फिन का पोस्टमॉर्टम किया। डॉक्टर के मुताबिक, डॉल्फिन व्यस्क थी। मौत का कारण नेचुरल माना जा रहा है।
हांलाकि डॉक्टर ने अंदेशा जाहिर किया है कि पानी जहरीला होने की वजह से भी उसकी मौत हो सकती है। जाजमऊ स्थित गंगा में पानी के सैंपल प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड से लेने के लिए बोला गया है।
वहीं, पोस्टमॉर्टम डॉल्फिन के ऑर्गन का सैंपल लेकर IVRI भेजा गया है। मौत के सटीक कारण के लिए रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। गंगा में मिली मृत डॉल्फिन फीमेल थी और उसकी उम्र 20 वर्ष है। डॉल्फिन की औसतन उम्र 30 साल होती है। ऐसे में कहा जा सकता है, कि डॉल्फिन ने अपनी औसत आयु से पहले ही दम तोड़ दिया। खतरनाक केमिकल से डॉल्फिन पर संकट
गंगा में जीवों पर संकट की कई वजह दिखाई देती हैं। भारतीय वन्य जीव संस्थान के एक हालिया सर्वे में पता चला है कि गंगेय डॉल्फिन जिन छोटी मछलियों का शिकार करती हैं, वो मछलियां खतरनाक केमिकल के संपर्क में हैं। इस तरह ये केमिकल डॉल्फिन के पेट में पहुंच रहा है। बीते चार साल में मेरठ और बुलंदशहर में चार डॉल्फिन की संदिग्ध हालात में मौत हो चुकी है। आज तक इनकी मौत की सही वजह पता नहीं चल सकी। इसके अलावा बिजनौर से लेकर मेरठ, बुलंदशहर और आगे तक गंगा के खादर इलाके में जो फसल उगती है, उसमें केमिकल का प्रयोग होता है। ये केमिकल पानी के सहारे बहकर गंगा में पहुंच जाते हैं। इससे भी जलीय जीवों को खतरा रहता है।