कैसरगंज के पूर्व सांसद, भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह…। तीन दशक तक अवध के राजनीतिक अखाड़े में राजनीति के सबसे ताकतवर पहलवान रहे बृजभूषण शरण सिंह और उनके समर्थकों को नाम के आगे पूर्व लगना अच्छा नहीं लगता। यही वजह है कि नेताजी ने अवध में बढ़ती राजनीतिक चुनौतियों, सरकार और संगठन में कम होते वजूद को वर्चस्व में बदलने के लिए अपने जन्मदिन पर आठ दिवसीय राष्ट्रकथा का भव्य आयोजन किया। गोंडा-अयोध्या के बॉर्डर पर नंदनी निकेतनम् में राष्ट्रकथा के मंच पर रोज राजनीतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और कला जगत की हस्तियों ने शिरकत की। रोजाना हजारों लोग और समर्थक भी पहुंचे। बृजभूषण की राष्ट्रकथा में कौन-कौन शामिल हुआ? राष्ट्रकथा का सियासी संदेश क्या है? राजनीति के जानकारों की नजर में आयोजन क्यों और कितना सफल रहा? कुश्ती संघ में लगे आरोपों से लेकर बृजभूषण से जुड़ी हर कंट्रोवर्सी इस बार संडे बिग स्टोरी में पढ़िए… राष्ट्रकथा में देश भर से आए मंत्री-नेता
राष्ट्रकथा में यूपी ही नहीं, देश के अन्य कई राज्यों के मंत्री, नेताओं के साथ खेल और सांस्कृतिक जगत की हस्तियां शामिल हुईं। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही, नगर विकास एवं ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा, उद्यान एवं कृषि निर्यात मंत्री दिनेश प्रताप सिंह भी पहुंचे। बहराइच के सांसद आनंद गोंड, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी, पूर्व मंत्री रमापति राम शास्त्री, एमएलसी एवं एमपी भाजपा के प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह पहुंचे। इनके अलावा विधायक बावन सिंह, भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष कामेश्वर सिंह, विधायक एवं पूर्व मंत्री पलटू राम, सभाकुंवर कुशवाहा, राकेश सिंह, गौरव वर्मा, राम निवास वर्मा, अरुणवीर सिंह, दद्न मिश्रा, अजय सिंह हरैया, सुशांत सिंह, सुभाष त्रिपाठी, अनुपमा जायसवाल, एमएलसी अवधेश सिंह और एमएलसी अन्नपूर्णा सिंह राष्ट्रकथा में शामिल हुईं। सरकार और संगठन ने बनाई दूरी बृजभूषण शरण सिंह की राष्ट्रकथा से प्रदेश की योगी सरकार और भाजपा ने दूरी बनाए रखी। सीएम योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी और प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह का राष्ट्रकथा में नहीं पहुंचे। यह गोंडा से लखनऊ और लखनऊ से दिल्ली तक के सत्ता और शासन के गलियारों में चर्चा का विषय बना। इतना ही नहीं, गोंडा से सांसद और केंद्रीय मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह भी राष्ट्रकथा में नहीं पहुंचे। सीएम योगी के भरोसेमंद और करीबी वित्त मंत्री सुरेश खन्ना, जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, एमएसएमई मंत्री राकेश सचान, पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह, परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह, गन्ना मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण, पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह, आईटी मंत्री सुनील शर्मा, महिला कल्याण मंत्री बेबीरानी मौर्य, औद्योगिक विकास मंत्री नंदगोपाल गुप्ता नंदी भी नहीं पहुंचे। वहीं, भाजपा के अवध क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्यक्ष कमलेश मिश्र, अवध के प्रभारी एवं प्रदेश महामंत्री संजय राय सहित भाजपा के अधिकांश प्रदेश पदाधिकारी भी नहीं पहुंचे। कई हस्तियों को नहीं बुलाया
बृजभूषण शरण सिंह के करीबी बताते हैं कि नेताजी ने राष्ट्रकथा में कई बड़े मंत्रियों और राजनेताओं को आमंत्रित ही नहीं किया। नेताजी को आभास था कि कौन उनके बुलावे पर आएंगे और कौन नहीं आएंगे? इसे ध्यान में रखकर ही आमंत्रण पत्र भेजे गए और फोन किए गए। जानिए आयोजन के सियासी मायने क्या? दबदबा दिखाने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बृजभूषण शरण सिंह ने राष्ट्रकथा के जरिए अपना राजनीतिक दबदबा दिखाने की कोशिश की है। वे संदेश देना चाहते थे कि देवीपाटन मंडल और अयोध्या मंडल में उनका दबदबा था, दबदबा है और रहेगा। इस दबदबे के बूते वह आगामी पंचायत चुनाव और विधानसभा चुनाव तक में अपना राजनीतिक वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं। जिससे उनके परिवार के सदस्यों के साथ करीबियों को टिकट मिलने में कोई दिक्कत नहीं हो। वरिष्ठ पत्रकार त्रियुग नारायण तिवारी कहते हैं- बृजभूषण सिंह राष्ट्रकथा के बहाने खुद को अवध का सबसे बड़ा नेता के रूप में स्थापित करने की मंशा थी। लेकिन, जिस तरीके से भाजपा के लोग इस कथा से बचते हुए दिखे इससे ये मंशा तो पूरी नहीं हुई। बेटा सीएम योगी को आमंत्रित करने गया था। लेकिन, वहां से शुभकामना संदेश ही पहुंचा। सीएम और दोनों डिप्टी सीएम सहित कई मंत्री नहीं पहुंचे। राष्ट्रकथा से पहले सियासी संदेश…अखिलेश की तारीफ के मायने
बृजभूषण शरण सिंह और उनके सांसद बेटे करण भूषण सिंह ने राष्ट्रकथा से पहले ही सियासी संदेश दे दिया था। करण भूषण ने कहा कि 2029 में वे और उनके पिता बृजभूषण शरण सिंह दोनों लोकसभा जाएंगे। बृजभूषण ने उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि लोकसभा से अपमान के साथ वह निकले हैं। इसलिए एक बार सम्मान के साथ फिर लोकसभा में जाएंगे। उन्होंने कहा कि 2029 में वे और करण भूषण दोनों लोकसभा में जाएंगे। भाजपा टिकट देगी तो अच्छा है, नहीं तो फिर भी जाएंगे। वहीं, राष्ट्रकथा के दौरान बृजभूषण ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की तारीफ की। उन्होंने कहा कि वह अखिलेश यादव का अहसान नहीं भूल सकते। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बयान से बृजभूषण ने सपा में अपना दरवाजा खुला रखने और मजबूत विकल्प उनके पास होने का भी संदेश दिया है। कीर्तिवर्धन के बढ़ते कद से चिंतित
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि देवीपाटन मंडल में अब तक बृजभूषण का सबसे अधिक राजनीतिक वर्चस्व रहा है। वह 1991 में पहली बार गोंडा से सांसद चुने गए। 1999 में गोंडा, 2004 में बलरामपुर से सांसद चुने गए। 2009 में सपा के टिकट पर कैसरगंज से सांसद चुने गए। 2014 में फिर भाजपा में शामिल होने के बाद कैसरगंज से सांसद चुने गए। 2019 में भी जीत मिली। 6 बार सांसद रहने के बाद भी वह कभी केंद्र में मंत्री नहीं बन सके। वहीं, उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले कीर्तिवर्धन सिंह मोदी सरकार 3.0 में मंत्री बनाए गए हैं। कीर्तिवर्धन के मंत्री बनने और सीएम योगी से अदावत के चलते क्षेत्र में उनकी राजनीतिक पकड़ कुछ ढीली पड़ रही है। देवीपाटन मंडल के कुछ विधायक अब उनके दबाव और दबदबे से मुक्त हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- इस राष्ट्रकथा बहाने चुनाव से पहले बृजभूषण सिंह ने शक्ति प्रदर्शन किया है। जिस तरीके से कुश्ती संघ के अघ्यक्ष पद से उन्हें हटना पड़ा था। इस मामले को लेकर भाजपा हाईकमान भी नाराज रहा। इस आयोजन के जरिए उन्होंने उन सभी को जवाब दे दिए हैं कि उनकी लोकप्रियता में कहीं से भी कोई कमी नहीं आई। इस आयोजन में जिस तरीके से देश भर से उनके प्रशंसक और समर्थक पहुंचे, उससे भी साफ रहा कि उनका कद राष्ट्रीय नेता का है। उन्होंने इस आयोजन के मंच से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। चुनौती दी है कि वे हर हाल में चुनाव लड़ेंगे। बृजभूषण बीच-बीच में अखिलेश की भी तारीफ कर देते हैं। मतलब, उन्होंने उधर भी रास्ते खोल रखे हैं। पहले भी दबदबा दिखाते रहे हैं बृजभूषण ———————- ये खबर भी पढ़ें… यूपी में 80 लाख वोटरों को नहीं ढूंढ सके BLO, बिहार जैसा ट्रेंड तो 42 लाख नाम और जुड़ेंगे उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बाद वोटरों की जारी की गई सूची में 2.89 करोड़ के नाम कट गए। इनमें करीब 46.23 लाख मृत और 25.47 लाख डुप्लीकेट वोटर थे। 1.29 करोड़ मतलब 8.40% वोटर स्थायी रूप से दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके हैं। जबकि, 79.52 लाख मतदाता अनट्रेसेबल रहे। पढ़ें पूरी खबर
राष्ट्रकथा में यूपी ही नहीं, देश के अन्य कई राज्यों के मंत्री, नेताओं के साथ खेल और सांस्कृतिक जगत की हस्तियां शामिल हुईं। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही, नगर विकास एवं ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा, उद्यान एवं कृषि निर्यात मंत्री दिनेश प्रताप सिंह भी पहुंचे। बहराइच के सांसद आनंद गोंड, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी, पूर्व मंत्री रमापति राम शास्त्री, एमएलसी एवं एमपी भाजपा के प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह पहुंचे। इनके अलावा विधायक बावन सिंह, भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष कामेश्वर सिंह, विधायक एवं पूर्व मंत्री पलटू राम, सभाकुंवर कुशवाहा, राकेश सिंह, गौरव वर्मा, राम निवास वर्मा, अरुणवीर सिंह, दद्न मिश्रा, अजय सिंह हरैया, सुशांत सिंह, सुभाष त्रिपाठी, अनुपमा जायसवाल, एमएलसी अवधेश सिंह और एमएलसी अन्नपूर्णा सिंह राष्ट्रकथा में शामिल हुईं। सरकार और संगठन ने बनाई दूरी बृजभूषण शरण सिंह की राष्ट्रकथा से प्रदेश की योगी सरकार और भाजपा ने दूरी बनाए रखी। सीएम योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी और प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह का राष्ट्रकथा में नहीं पहुंचे। यह गोंडा से लखनऊ और लखनऊ से दिल्ली तक के सत्ता और शासन के गलियारों में चर्चा का विषय बना। इतना ही नहीं, गोंडा से सांसद और केंद्रीय मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह भी राष्ट्रकथा में नहीं पहुंचे। सीएम योगी के भरोसेमंद और करीबी वित्त मंत्री सुरेश खन्ना, जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, एमएसएमई मंत्री राकेश सचान, पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह, परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह, गन्ना मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण, पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह, आईटी मंत्री सुनील शर्मा, महिला कल्याण मंत्री बेबीरानी मौर्य, औद्योगिक विकास मंत्री नंदगोपाल गुप्ता नंदी भी नहीं पहुंचे। वहीं, भाजपा के अवध क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्यक्ष कमलेश मिश्र, अवध के प्रभारी एवं प्रदेश महामंत्री संजय राय सहित भाजपा के अधिकांश प्रदेश पदाधिकारी भी नहीं पहुंचे। कई हस्तियों को नहीं बुलाया
बृजभूषण शरण सिंह के करीबी बताते हैं कि नेताजी ने राष्ट्रकथा में कई बड़े मंत्रियों और राजनेताओं को आमंत्रित ही नहीं किया। नेताजी को आभास था कि कौन उनके बुलावे पर आएंगे और कौन नहीं आएंगे? इसे ध्यान में रखकर ही आमंत्रण पत्र भेजे गए और फोन किए गए। जानिए आयोजन के सियासी मायने क्या? दबदबा दिखाने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बृजभूषण शरण सिंह ने राष्ट्रकथा के जरिए अपना राजनीतिक दबदबा दिखाने की कोशिश की है। वे संदेश देना चाहते थे कि देवीपाटन मंडल और अयोध्या मंडल में उनका दबदबा था, दबदबा है और रहेगा। इस दबदबे के बूते वह आगामी पंचायत चुनाव और विधानसभा चुनाव तक में अपना राजनीतिक वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं। जिससे उनके परिवार के सदस्यों के साथ करीबियों को टिकट मिलने में कोई दिक्कत नहीं हो। वरिष्ठ पत्रकार त्रियुग नारायण तिवारी कहते हैं- बृजभूषण सिंह राष्ट्रकथा के बहाने खुद को अवध का सबसे बड़ा नेता के रूप में स्थापित करने की मंशा थी। लेकिन, जिस तरीके से भाजपा के लोग इस कथा से बचते हुए दिखे इससे ये मंशा तो पूरी नहीं हुई। बेटा सीएम योगी को आमंत्रित करने गया था। लेकिन, वहां से शुभकामना संदेश ही पहुंचा। सीएम और दोनों डिप्टी सीएम सहित कई मंत्री नहीं पहुंचे। राष्ट्रकथा से पहले सियासी संदेश…अखिलेश की तारीफ के मायने
बृजभूषण शरण सिंह और उनके सांसद बेटे करण भूषण सिंह ने राष्ट्रकथा से पहले ही सियासी संदेश दे दिया था। करण भूषण ने कहा कि 2029 में वे और उनके पिता बृजभूषण शरण सिंह दोनों लोकसभा जाएंगे। बृजभूषण ने उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि लोकसभा से अपमान के साथ वह निकले हैं। इसलिए एक बार सम्मान के साथ फिर लोकसभा में जाएंगे। उन्होंने कहा कि 2029 में वे और करण भूषण दोनों लोकसभा में जाएंगे। भाजपा टिकट देगी तो अच्छा है, नहीं तो फिर भी जाएंगे। वहीं, राष्ट्रकथा के दौरान बृजभूषण ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की तारीफ की। उन्होंने कहा कि वह अखिलेश यादव का अहसान नहीं भूल सकते। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बयान से बृजभूषण ने सपा में अपना दरवाजा खुला रखने और मजबूत विकल्प उनके पास होने का भी संदेश दिया है। कीर्तिवर्धन के बढ़ते कद से चिंतित
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि देवीपाटन मंडल में अब तक बृजभूषण का सबसे अधिक राजनीतिक वर्चस्व रहा है। वह 1991 में पहली बार गोंडा से सांसद चुने गए। 1999 में गोंडा, 2004 में बलरामपुर से सांसद चुने गए। 2009 में सपा के टिकट पर कैसरगंज से सांसद चुने गए। 2014 में फिर भाजपा में शामिल होने के बाद कैसरगंज से सांसद चुने गए। 2019 में भी जीत मिली। 6 बार सांसद रहने के बाद भी वह कभी केंद्र में मंत्री नहीं बन सके। वहीं, उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले कीर्तिवर्धन सिंह मोदी सरकार 3.0 में मंत्री बनाए गए हैं। कीर्तिवर्धन के मंत्री बनने और सीएम योगी से अदावत के चलते क्षेत्र में उनकी राजनीतिक पकड़ कुछ ढीली पड़ रही है। देवीपाटन मंडल के कुछ विधायक अब उनके दबाव और दबदबे से मुक्त हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- इस राष्ट्रकथा बहाने चुनाव से पहले बृजभूषण सिंह ने शक्ति प्रदर्शन किया है। जिस तरीके से कुश्ती संघ के अघ्यक्ष पद से उन्हें हटना पड़ा था। इस मामले को लेकर भाजपा हाईकमान भी नाराज रहा। इस आयोजन के जरिए उन्होंने उन सभी को जवाब दे दिए हैं कि उनकी लोकप्रियता में कहीं से भी कोई कमी नहीं आई। इस आयोजन में जिस तरीके से देश भर से उनके प्रशंसक और समर्थक पहुंचे, उससे भी साफ रहा कि उनका कद राष्ट्रीय नेता का है। उन्होंने इस आयोजन के मंच से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। चुनौती दी है कि वे हर हाल में चुनाव लड़ेंगे। बृजभूषण बीच-बीच में अखिलेश की भी तारीफ कर देते हैं। मतलब, उन्होंने उधर भी रास्ते खोल रखे हैं। पहले भी दबदबा दिखाते रहे हैं बृजभूषण ———————- ये खबर भी पढ़ें… यूपी में 80 लाख वोटरों को नहीं ढूंढ सके BLO, बिहार जैसा ट्रेंड तो 42 लाख नाम और जुड़ेंगे उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बाद वोटरों की जारी की गई सूची में 2.89 करोड़ के नाम कट गए। इनमें करीब 46.23 लाख मृत और 25.47 लाख डुप्लीकेट वोटर थे। 1.29 करोड़ मतलब 8.40% वोटर स्थायी रूप से दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके हैं। जबकि, 79.52 लाख मतदाता अनट्रेसेबल रहे। पढ़ें पूरी खबर