अगस्त 2021, करीब चार साल पुराने मामले की DNA रिपोर्ट अब जाकर सामने आई थी। इसके बाद जो पता चला, उसे जानकर पुलिस भी हैरान रह गई। 2018 के उस रोज जो सिरकटी लाश मिली थी, वो राकेश की नहीं थी। परिवार ने जिसे बेटा जानकर अंतिम संस्कार किया, वो अभी जिंदा था और एक बड़ी साजिश में शामिल था। खूनी शादी के चौथे एपिसोड में आज अलीगढ़ के राकेश और रत्नेश की कहानी। पुलिसवाली के प्यार में अंधे बाप ने दो मासूम बच्चों और पत्नी का गला घोंट दिया। फिर खुद की मौत का नाटक रचकर गायब हो गया। 4 साल बाद एक कॉल से पकड़ा गया… साल 2012, अलीगढ़ का नौगवां गांव। दोपहर का वक्त। यूपी पुलिस से रिटायर्ड बनवारीलाल के घर कुछ अलग हलचल थी। बड़ा बेटा राकेश आंगन में बैठा किसी काम में लगा था। तभी बाहर वाले कमरे से पिता की आवाज आई- “राकेश… अंदर आओ। घर के सब लोग बैठे हैं।” राकेश उठा और कमरे में चला गया। मां, पिता, छोटा भाई राजीव और दो-चार रिश्तेदार पहले से बैठे थे। माहौल में अजीब सी औपचारिकता थी। बनवारीलाल ने बिना किसी भूमिका के सीधे कहा- “तुम्हारी शादी तय कर दी है। लड़की घरेलू है, संस्कारी है। लोग एटा के रहने वाले हैं।” सभी खुश थे, लेकिन राकेश ने कोई रिएक्शन नहीं दिया। मां ने पूछा- “कोई परेशानी तो नहीं है तुम्हें?” राकेश फिर भी चुप रहा। उसने नजरें झुका लीं, फिर अचानक उठकर बाहर चला गया। कुछ देर बाद छोटा भाई राजीव उसके पीछे गया। उसने राकेश के कंधे पर हाथ रखकर पूछा- “क्या हुआ?” राकेश ने गहरी सांस ली और कहा- “तू जानता है, मैं रूबी को चाहता हूं। उसी से शादी करूंगा।” राजीव वापस कमरे में गया और पूरी बात बता दी। बनवारीलाल का चेहरा तमतमा उठा। वो गुस्से में खड़े हुए, लेकिन कुछ बोले नहीं। उस रात घर में चुप्पी पसरी रही। अगले दिन दोपहर में पूरा परिवार खाने बैठा। बनवारीलाल ने थाली रखते हुए कहा- “अब बताओ, उस लड़की में ऐसा क्या है जिसे तुम पसंद करते करते हो और एटा वाली लड़की में क्या कमी है?” राकेश ने पिता की बात सुनी, लेकिन कुछ बोला नहीं। बनवारीलाल ने बात आगे बढ़ाई- “शादी सिर्फ दो लोग नहीं मिलते, दो परिवार जुड़ते हैं। खानदान देखा जाता है। कुंडली मिलती है। दहेज भी मिलता है। तुम्हारी पसंद की लड़की दहेज दे पाएगी?” राकेश ने धीमी आवाज में कहा- “वो पढ़ी-लिखी है। सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही है।” पिता ने तंज कसा- “हमारे पास पैसों की कमी है क्या? नौकरी से घर नहीं चलता। घर चलाने के लिए घरेलू लड़की जरूरी होती है।” कुछ दिन परिवार में ये तकरार चलती रही। आखिरकार राकेश ने घरवालों के दबाव में एटा की रत्नेश से शादी कर ली। शादी धूमधाम से हुई, लेकिन राकेश का मन कहीं और था। रत्नेश ससुराल आई तो उसने एक अनमना पति पाया। बाहर से राकेश सामान्य दिखता था, लेकिन उसका मन किसी और से जुड़ा हुआ था। शादी के बाद भी वो चोरी-छिपे रूबी से मिलता रहा। घरवालों को भी इसका अंदाजा था, लेकिन किसी ने खुलकर कुछ नहीं कहा। 2015-16 आते-आते हालात और उलझ गए। उसी साल रूबी का सिलेक्शन उत्तर प्रदेश पुलिस में हो गया। वो कॉन्स्टेबल बनकर आगरा में तैनात हो गई। इन तीन-चार सालों में रत्नेश दो बार मां बन चुकी थी। पहले बेटा, फिर 2016 में बेटी हुआ। बच्चे होने के बाद भी राकेश नहीं बदला, लेकिन रूबी को ये बात अंदर ही अंदर खटकने लगी। उसे लगने लगा कि राकेश अब उससे दूर हो जाएगा। वो उस पर दबाव बनाने लगी। फोन पर कहती- “तुम्हारी शादी हो गई, बच्चे भी हो गए। तुम आखिर चाहते क्या हो? मैं क्या तुम्हारी रखैल हूं?” राकेश चुप रह जाता। राकेश के चुप्पी साध लेने से रूबी और तमतमा जाती। राकेश ग्रेटर नोएडा की एक पैथोलॉजी में काम करता था। वहीं, चिपियाना बुजुर्ग इलाके में उसका खुद का घर था। दो बच्चे होने के बाद भी जब रूबी और राकेश का मिलना-जुलना बंद नहीं हुआ, तो पिता बनवारीलाल पूरा परिवार लेकर वहीं आकर रहने लगे। इसके बाद से हालात खतरनाक मोड़ लेने लगे। पत्नी रत्नेश को राकेश पर शक होने लगा। एक दिन उसने राकेश से सीधे पूछ लिया- “कौन है वो लड़की? क्या छुपा रहे हो मुझसे?” पहले तो राकेश टालता रहा। जब सवाल बढ़ते गए, तो उसका गुस्सा फूट पड़ा। उसने रत्नेश पर हाथ उठा दिया। ये सब कुछ बच्चों के सामने हुआ। वो रोते हुए बोली- “ये मेरा कसूर है कि मैंने तुम्हारे लिए सब छोड़ दिया?” राकेश बोला- “मैंने तुम्हें कभी पत्नी माना ही नहीं। मेरी शादी जबरदस्ती हुई थी। पापा ने मुझे मजबूर किया था।” रत्नेश ने पूछा- “क्या ये बच्चे भी तुम्हारे पापा के हैं?” बात हद से ज्यादा बढ़ चुकी थी। घरवालों ने किसी तरह दोनों को समझाकर मामला शांत करा दिया। फिर भी रिश्तों में दरार आ ही चुकी थी। पत्नी रत्नेश के सवाल, बात-बात पर उसके ताने राकेश को चुभने लगा था। घर में रोज-रोज के झगड़ों ने उसे परेशान कर दिया था। उधर रूबी का दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा था। एक शाम रूबी ने सीधे पूछा- “साफ-साफ बताओ, तुम मेरे साथ रहना चाहते हो या नहीं?” राकेश कुछ पल चुप रहा, फिर बोला- “हां… सबसे ज्यादा अगर किसी के साथ रहना चाहता हूं, तो तुम्हारे साथ।” रूबी ने कहा- “सबसे ज्यादा… ये कैसे साबित करोगे?” राकेश थकी आवाज में बोला- “अगर कोई पैमाना हो, कोई मीटर हो जिससे नापा जा सके कि मैं तुमसे कितना प्यार करता हूं, तो बता दो।” रूबी की आवाज और ठंडी हो गई। कुछ देर रुककर बोली- “प्यार बातों से नहीं, एक्शन से साबित होता है।” राकेश चौंका- “कैसा एक्शन…?” रूबी ने सीधे कहा- “हमारे रास्ते से रुकावट हटा दो। अपनी पत्नी, अपने बच्चे… सब। तभी हम साथ रह सकते हैं।” ये सुनकर राकेश जैसे पत्थर हो गया। उसने तुरंत फोन काट दिया। उस रात वो सो नहीं पाया। बार-बार बच्चों के चेहरे आंखों के सामने आते रहे। वो खुद से कहता रहा कि ये मुमकिन नहीं है। रूबी ने ये सिर्फ गुस्से में कहा होगा। अगले कुछ दिनों में रूबी ने फिर वो बात दोहराई। राकेश को लगने लगा था कि वो दोनों तरफ से घिर चुका है। एक तरफ घर, बच्चे, जिम्मेदारी और दूसरी तरफ रूबी। फिर वो दिन आया… 14 फरवरी, 2018 दुनिया के लिए वेलेंटाइन डे, लेकिन राकेश के घर में खामोशी थी। दोनों बच्चे सो चुके थे। तीन साल की बेटी मां के पास लेट गई। डेढ़ साल का बेटा भी वहीं सो रहा था। पत्नी रत्नेश बच्चों को सुलाकर कमरे से बाहर आई। राकेश तखत पर लेटा हुआ था। रत्नेश बोली- “खाना रखा है, खा लेना।” राकेश कुछ नहीं बोला। उसका चेहरा बिल्कुल सपाट था। रात गहराती चली गई। पूरा घर सो गया था, राकेश उठकर कमरे में गया। कमरे में हल्की रोशनी थी। कुछ पल बच्चों को देखता रहा। फिर रत्नेश की तरफ बढ़ा और दोनों हाथों से रत्नेश का गला दबाने लगा। रत्नेश नींद में थी। अचानक हमले से कुछ समझ नहीं पाई, बस छटपटाती रही। उसकी आंखें फैलने लगीं। फिर कुछ ही मिनटों में सब शांत हो गया। जोश में राकेश ने पत्नी को मार तो दिया, लेकिन लाश देखकर वो घबरा उठा। उसके हाथ कांप रहे थे। सांस तेज चल रही थी। फिर उसकी नजर बिस्तर की दूसरी तरफ पड़ी। राकेश डर रहा था, लेकिन अभी काम पूरा नहीं हुआ था। सामने डेढ़ साल का बेटा था। राकेश ने उसका भी गला दबाया। फिर बेटी की तरफ बढ़ा। कुछ ही देर में उसने तीन हत्याएं कर दीं। राकेश कुछ देर वहीं बैठा रहा। फिर अचानक उठा और दूसरे कमरे की तरफ गया। वहां उसके मां-बाप और भाई सो रहा था। दरवाजा खटखटाया। पिता बनवारीलाल नींद में थे। वो झुंझलाकर बोले- “इतनी रात को क्या हुआ?” राकेश कुछ बोल नहीं पाया। बस फूट-फूटकर रोने लगा। कुछ देर बाद उसने पूरी बात बता दी। बनवारीलाल के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने दो जोरदार तमाचे जड़ दिए। फिर बोले- “सोचा भी नहीं था, तू यहां तक गिर जाएगा।” आवाज सुनकर मां और छोटा भाई भी जग गया। पूरी बात पता चली तो दोनों सन्न रह गए। राकेश लगातार रोए जा रहा था। थोड़ी देर बातचीत के बाद बनवारीलाल बोले- “अब रोने से कुछ नहीं होगा। जो हो गया, उसे छुपाना होगा।” उन्होंने पुलिस की नौकरी में कई साल बिताए थे। सिस्टम की चाल, जांच की दिशा और छोटी-सी चूक का अंजाम वो अच्छी तरह जानते थे। उसी अनुभव ने फैसला करवा दिया कि सच जमीन के नीचे ही दबा दिया जाए। इसके लिए घर का आंगन चुना गया। यहां बाहरी लोगों का आना-जाना कम था। काम शुरू हुआ, बनवारीलाल पहरे पर थे। राकेश का फावड़ा जमीन में धंसता तो आवाज से पकड़े जाने का डर गहराने लगता। मिट्टी सख्त थी, हाथों में छाले पड़ने लगे, लेकिन रुकना नहीं था। गड्ढा इतना गहरा होना था कि लाशों के सड़ने की बदबू न आए। घंटों मेहनत के बाद जमीन ने तीन लाशों को अपने भीतर लेने लायक जगह दे दी। एक-एक करके तीनों लाशें नीचे उतारी गईं। मिट्टी डालते वक्त हाथ के कांप रहे थे, लेकिन चेहरे पत्थर हो चुके थे। गड्ढा भरते ही ऊपर की जमीन बराबर की गई। ऐसा कोई निशान नहीं छोड़ा गया, जो सवाल खड़ा करे। अगली सुबह राकेश ने ग्रेटर नोएडा के बिसरख थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। वो बोला- “मेरी पत्नी घर से कहीं बाहर गई थी। बच्चों को साथ ले गई थी। वापस नहीं आई।” पुलिस ने सवाल-जवाब किए तो उसने कहा- “घर में अक्सर झगड़ा होता था। मुझे शक है कि वो किसी के साथ चली गई है।” पुलिस ने गुमशुदगी का मामला दर्ज किया। कई लोगों से पूछताछ हुई। पड़ोसियों से सवाल किए गए, लेकिन कोई ठोस सुराग नहीं मिला। मिसिंग का मामला था, इसलिए जांच धीरे-धीरे ठंडी पड़ने लगी। कुछ दिनों बाद फाइल पर धूल जमने लगी। उधर, वो कमरा कुछ दिन बंद रहा। फिर मजदूर बुलाए गए। ऊपर सीमेंट डालकर पक्की फर्श बनवाई गई। जैसे वहां कभी कुछ हुआ ही न हो। लोग आते जाते रहे, कदम उसी फर्श पर पड़ते रहे। नीचे तीन जिंदगियों का सच दबा रहा। मामला तो दब तो गया, लेकिन राकेश को चैन नहीं था। दिन में वो नॉर्मल दिखने की कोशिश करता, मगर रात में ठीक से नींद नहीं आती। पत्नी रत्नेश के पिता ने बेटी के गायब होने में राकेश पर शक जताया था। बार-बार ख्याल आता- ‘कभी सच सामने आ गया तो क्या होगा?’ एक रात उसने पिता से कहा- “अब क्या करूं… कब तक ऐसे घुटकर जीऊंगा? मामला खुल गया तो सब खत्म हो जाएगा।” बनवारीलाल ने उसे देर तक देखा। फिर बोले- “डर से फैसला नहीं होता, दिमाग से होता है। मुझे पता है जांच कैसे चलती है, कहां चूक होती है।” राकेश की मां और भाई राजीव भी वहीं बैठा था। कुछ देर कमरे में सन्नाटा रहा। फिर बनवारीलाल ने कहा- “अगर सबको ये यकीन हो जाए कि तुम मर चुके हो, तो न केस खुलेगा, न कोई पीछा करेगा।” राकेश चौंक कर बोला- “लेकिन… कैसे?” बनवारी ने धीमी आवाज में कहा- “किसी और को तुम्हारी जगह मारना होगा।” कुछ देर चुप्पी रही। फिर राकेश बोला- “मेरा एक दोस्त है… कलुआ। अपने गांव का है। मेरी कद-काठी का है, मेरे जैसा ही दिखता है।” बनवारीलाल ने हां में सिर हिलाया। राकेश ने रूबी को भी इस प्लान में शामिल कर लिया। 25 अप्रैल, 2018 राकेश ने कलुआ को फोन किया, बोला- “चलो यार, कहीं घूमने चलते हैं।” कलुआ खुश हो गया। राकेश ने आगे कहा- “ढोलना के जंगल में बैठे कई दिन हो गए। वहीं पीएंगे।” कलुआ- “भाभी की याद आ रही है?” राकेश ने गहरी सांस ली और बोला- “अब क्या कहूं यार…” कलुआ को लगा कि राकेश पत्नी और बच्चों के गायब होने के बाद दुखी है। साथ मिल-बैठकर उसका मन कुछ हल्का हो जाएगा। राकेश, कलुआ से मिलने गया तो रूबी भी उसके साथ थी। कलुआ चौंक गया, पूछा- “ये कौन है?” राकेश बस मुस्कुरा दिया। तीनों चल दिए, रास्ते में हंसी-मजाक होता रहा। राकेश का गांव अलीगढ़-कासगंज जिलों के बॉर्डर पर था। तीनों गांव से करीब 10 किमी दूर ढोलना के जंगल में पहुंचे। ये इलाका कासगंज में आता है। जंगल के अंदर पहुंचते ही माहौल बदल गया। चारों तरफ सन्नाटा था। कलुआ और रूबी कुछ आगे चल रहे थे। राकेश पहले ही वहां एक जगह पर कुल्हाड़ी छुपा गया था। उसने कुल्हाड़ी उठाई और अचानक पीछे से कलुआ के सिर पर वार किया। कुल्हाड़ी सिर में धंस गई। खून की धार बह निकली। कलुआ जमीन पर गिर पड़ा। राकेश ने दूसरा वार किया। कलुआ खत्म हो चुका था। अब लाश की पहचान बदलने की बारी थी। राकेश पैथोलॉजी लैब में काम करता था। उसे फोरेंसिक की बुनियादी जानकारी थी। उसे पता था कि पुलिस क्या-क्या देखती है। साथ में रूबी भी उसकी मदद कर रही थी। रूबी ने कहा- “कपड़े लाए हो?” राकेश ने हां में सिर हिलाया। दोनों ने मिलकर लाश को राकेश के कपड़े पहना दिए। इसके बाद राकेश ने फिर कुल्हाड़ी उठाई और कलुआ की गर्दन पर वार किया। एक झटके में गर्दन शरीर से अलग हो गई। इस बार ज्यादा खून नहीं गिरा। खून जितना था, सब पहले ही रिस चुका था। फिर दोनों हाथ काटे, ताकि फिंगरप्रिंट न मिलें। हाथ और गर्दन जला दी। इसके बाद रूबी ने कहा- “जहां खून गिरा है, वहां की मिट्टी साफ करनी होगी।” दोनों ने खून से सनी मिट्टी हटाई। सबूत मिटाने के लिए और भी कुछ चीजें कीं। कलुआ का मोबाइल भी तोड़कर जला दिया। अपना आधार कार्ड, LIC के कागजात और कुछ पैसे जेब में डाल दिए। अगली सुबह खबर फैल गई कि जंगल में सिरकटी लाश मिली है। भीड़ इकट्ठा होने लगी, पुलिस पहुंची। लाश की हालत इतनी खराब थी कि पहचान मुश्किल थी। जेब से राकेश का आईडी कार्ड मिला। उसके परिवार को खबर दी गई। उसके गांव में भी लोगों को पता चला। ऐसे में कलुआ के घरवालों को भी चिंता हुई। वो राकेश के साथ ही गया था और अब-तक लौटा नहीं था। राकेश और कलुआ के परिवारवाले मौके पर पहुंचे। एक तरफ राकेश के पिता बनवारीलाल सुबक रहे थे, दूसरी तरफ कलुआ के घरवाले लाश को अपने बेटे कलुआ की बता रहे थे। काफी देर झंझट चलता रहा। चूंकि जेब से राकेश का आधार कार्ड मिला था, इसलिए उसे राकेश की लाश मानकर घरवालों को अंतिम संस्कार के लिए दे दिया गया। फिर भी कलुआ के घरवालों का दावा देखते हुए दोनों परिवारों और लाश के DNA सैंपल लेकर जांच के लिए आगरा भेज दिए गए। राकेश के घरवालों ने उसकी पत्नी रत्नेश के परिवार पर केस कर दिया। आरोप लगाया कि उन्होंने राकेश को मारा है। मामला चलता रहा, लेकिन उलझाऊ सरकारी कार्रवाई के चक्कर में DNA रिपोर्ट काफी महीने नहीं आई। कलुआ के घरवालों ने कई बार थाने जाकर पूछताछ की, लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ गया। कई महीने बीत चुके थे। दुनियावालों के लिए राकेश मर चुका था, लेकिन वो नाम बदलकर अलग-अलग जगह रहने लगा। कभी हरियाणा, कभी पंजाब तो कभी दिल्ली। रूबी से अब भी चोरी-छिपे मिलता था। दोनों जानते थे कि सच अभी पूरी तरह दफन नहीं हुआ है। फिर भी उन्हें भरोसा था कि वक्त के साथ सब खत्म हो जाएगा। करीब साढ़े तीन साल गुजर गए, पुलिस इस मामले को भूल ही गई थी। ये मान लिया गया था कि जंगल में मिली लाश राकेश की ही थी। इसी दौरान जुलाई, 2021 में रोहन प्रमोद बोत्रे बतौर SP (सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस) कासगंज में तैनात हुए ये उनकी पहली पोस्टिंग थी। चार्ज संभालते ही उन्होंने पुराने मामलों की फाइलें मंगवाईं। उन्हीं में से एक राकेश के ‘मर्डर’ की थी। फाइल पलटी तो पता चला लाश की पहचान संदिग्ध होने के बावजूद अब तक DNA रिपोर्ट नहीं आई है। SP बोत्रे ने मीटिंग बुलाई और सभी केस पर बात की। राकेश मामले में उन्होंने पूछा- “जब डीएनए सैंपल लिया गया है, तो रिपोर्ट अब-तक क्यों नहीं आई?” एक अफसर ने कहा- “सर, सैंपल आगरा भेजा गया था। रिपोर्ट आने में देरी हुई, फिर हम लोग दूसरे मामलों में उलझ गए।” बोत्रे कुछ देर चुप रहे, फिर बोले- “ठीक है, मामले को ठीक से दिखवाइए।” कुछ दिन बाद रिपोर्ट आई। लाश का DNA कलुआ के पिता से मैच हुआ। SP बोत्रे ने रिपोर्ट देखी और सीधे सेंट्रल नोएडा के ADCP (एडिशनल डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस) को फोन किया, पूरा मामला समझाया। अब तस्वीर बदल चुकी थी। जांच आगे बढ़ी। पता चला कि राकेश की पत्नी रत्नेश भी गायब है। उसने रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी। रत्नेश के पिता ने राकेश पर शक जताया था। इसके बाद पुलिस भी ज्यादा एक्टिव हो गई। राकेश के पिता से पूछताछ हुई, लेकिन वो कहते रहे- “मुझे कुछ नहीं पता। मेरा बेटा मर चुका है। उसकी पत्नी के घरवालों ने बेटे को मारा है।” लेकिन पुलिस के हाथ लगे सबूत कुछ और ही कह रहे थे। राकेश के पुराने नंबर के कॉल रिकॉर्ड खंगाले गए। पता चला वो एक नंबर पर दिन में कई दफा बात करता था। कई बार बातचीत का टाइम काफी ज्यादा होता था। ये नंबर रूबी का था। रूबी का वो नंबर अब भी एक्टिव था। पुलिस ने वो नंबर ट्रेस करना शुरू किया। इस दौरान रूबी और राकेश के अफेयर के बारे में भी जानकारी मिली। रूबी को हरियाणा के एक नंबर से फोन आता था। कई बार घंटों बातचीत होती है। SP रोहन बोत्रे समझ गए कि हो न हो ये राकेश ही है और हरियाणा में छिपा बैठा है। 31 अगस्त, 2021 एक्शन शुरू हुआ, लोकेशन पर दबिश दी गई और राकेश पकड़ा गया। पूछताछ शुरू हुई। दरोगा- “कलुआ को क्यों मारा…?” राकेश- “मैंने नहीं मारा साब, मैं तो बस भाग गया था यहां से। पत्नी के घरवालों ने इल्जाम लगाया था कि मैंने उसे गायब किया है। पुलिस परेशान कर रही थी, इसलिए मैं भाग गया।” दरोगा- “अच्छा… तो ऐसा है।” ‘तड़ाक…’ राकेश के मुंह पर एक जोरदार थप्पड़ पड़ा। “मा$#%द… पुलिसवालों को चू$% समझता है? तू भाग गया था तो कलुआ की जेब में तेरा आधार कार्ड क्या कर रहा था?” ये सवाल सुनकर राकेश थोड़ा सकपका गया। वो कुछ बोलने की कोशिश कर रहा था- “मैं… वो… ऐसा हुआ न साब…” ‘फटाक…’ पीछे खड़े एक सिपाही ने राकेश की गर्दन पर जोर का हाथ मारा। फिर राकेश के बाल पकड़कर चेहरा ऊपर किया और बोला- “सा$% सब सच उगल दे… वरना ऐसा हाल करूंगा कि रिश्तेदार भी पहचान नहीं पाएंगे।” राकेश फिर चुप रहा। इसके बाद पुलिस ने अपने स्टाइल से पूछताछ शुरू की। कुछ देर बाद राकेश टूट गया। उसने बोलना शुरू किया- “घरवालों ने मेरी शादी जबरदस्ती कराई थी। मैं रूबी से प्यार करता था। शादी के बाद भी हम साथ थे, इसलिए मैंने पत्नी और बच्चों को मार दिया।” “क्या… क्या… क्या…” दरोगा चौंका। “पत्नी और बच्चे… मतलब… तू तो कह रहा था वो किसी और के साथ भाग गई?” राकेश ने आगे बताया- “सब झूठ था… मैंने उन लोगों को मारकर घर में गाड़ दिया था।” कलुआ के मर्डर की परतें खोलते-खोलते एक नए केस की कहानी सामने आ चुकी थी। दरोगा ने सवाल किया- “मार के गाड़ दिया…? तेरे मां-बाप कहां थे उस समय… जब तू ये कांड कर रहा था?” राकेश बोला- “वो लोग साथ ही थे। पापा ने ही जमीन में गाड़ने का आइडिया दिया था।” अब पुलिसवालों का सिर चकराने लगा था। अब-तक कलुआ को मारने की वजह सामने नहीं आई थी। दरोगा ने सिर खुजाते हुए पूछा- “अबे ह#%@ दूसरी के चक्कर में बीवी-बच्चों को खा गया, वो तो समझ आया। फिर दोस्त को क्यों मारा, उसने क्या बिगाड़ा था?” राकेश ने फिर बोलना शुरू किया- “बीवी के घरवाले मुझ पर शक कर रहे थे। पुलिस से भी कह दिया था। मुझे डर था कि सच सामने आ जाएगा। पापा ने आइडिया दिया, लोगों को यकीन हो जाए तो कि तुम मर चुके हो तो पुलिस शांत हो जाएगी।” राकेश बोलते-बोलते अचानक चुप हो गया। कुछ देर शांत बैठा रहा, फिर बोला- “कलुआ मेरी कद-काठी का था, इसलिए उसे मार दिया। सोचा लोगों को लगेगा, मैं मर गया।” राकेश ने सिर पकड़ लिया। वो रोते हुए बोला- “मैं किसी और से प्यार करता था। पत्नी और बच्चों से छुटकारा चाहता था। एक गलती पर दूसरी गलती होती चली गई।” उसने वो जगह भी बताई, जहां पत्नी और बच्चों को दफनाया था। 1 सितंबर, 2021 कासगंज और नोएडा पुलिस की जॉइंट टीम चिपियाना बुजुर्ग इलाके में राकेश के घर पहुंची। मजिस्ट्रेट और फोरेंसिक टीम की मौजूदगी में खुदाई शुरू हुई। कुछ देर बाद जमीन से पहला कंकाल निकला, फिर दूसरा और फिर तीसरा। खुदाई में इस्तेमाल औजार भी घर से ही बरामद हुए। करीब 4 साल बाद सच सबके सामने था। पुलिस ने राकेश, उसकी मां, भाई राजीव और पिता बनवारीलाल के खिलाफ चार्जशीट दायर की। मामला कोर्ट में है और ट्रायल जारी है। *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल *** रेफरेंस जर्नलिस्ट- राहुल ठाकुर, भूपेश प्रताप सिंह, नरेंद्र ठाकुर भास्कर टीम ने सीनियर जर्नलिस्ट्स, पुलिस, पीड़ितों और जानकारों से बात करने के बाद सभी कड़ियों को जोड़कर ये स्टोरी लिखी है। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है। ———————————————————- सीरीज की ये स्टोरीज भी पढ़ें… देवर के प्यार में पागल थी, पति को मारकर घर में दफनाया; सब भूल गए, 4 साल बाद पकड़ी गई अप्रैल 2022, मुनीराज जी. को गाजियाबाद का SSP बनाया गया। चार्ज संभालते ही ऐसे सभी मामलों की फाइलें निकलवाईं, जो अनसुलझे रह गए थे। उन्हीं में एक फाइल निकली चंद्रवीर सिंह की… गुमशुदगी का मामला था। फाइल पढ़ी तो दिमाग की नसें फड़कने लगी। पूरी स्टोरी पढ़ें वो तड़प रही थी और पति फोन पर चीखें सुन रहा था; प्लान परफेक्ट था, एक टी-शर्ट से पकड़ा गया 27 जुलाई 2014, कानपुर। रात के करीब साढ़े बारह बजे थे। एक युवक बदहवास हाल में स्वरूपनगर थाने पहुंचा। आंसू थम नहीं रहे थे। आवाज में हकलाहट थी। उसने बताया- कुछ बाइक सवार उसकी पत्नी को कार समेत उठा ले गए। पूरी स्टोरी पढ़ें…