यूपी में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा–सपा के बीच एक और प्रतिष्ठा की जंग होने जा रही है। तीन महत्वपूर्ण सीटें मऊ की घोसी, सोनभद्र की दुद्धी और बरेली की फरीदपुर सीट विधायकों के निधन के बाद खाली हुई हैं। इन सीटों पर अप्रैल–मई तक पश्चिम बंगाल चुनाव के साथ उप-चुनाव की संभावना है। खास बात यह है कि घोसी और दुद्धी ऐसी सीटें हैं, जहां एक ही कार्यकाल (5 साल) में दूसरी बार उप-चुनाव कराना पड़ रहा है। दोनों ही सीटों पर पिछली बार सपा का कब्जा था, जबकि फरीदपुर भाजपा जीती थी। सियासत के जानकार मानते हैं कि ये उप चुनाव न सिर्फ स्थानीय स्तर पर जातीय समीकरणों को परखेंगे, बल्कि पूरे प्रदेश की सियासत पर असर डाल सकते हैं। आइए विस्तार से समझते हैं इन तीनों सीटों की कहानी, विधायकों के निधन की पृष्ठभूमि, जातीय गणित और संभावित दावेदारों का पूरा विश्लेषण… जातीय समीकरण और दलों की रणनीति: किसका पलड़ा भारी? घोसी विधानसभा : एक ही टर्म में दूसरी बार उप चुनाव मऊ जिले की घोसी विधानसभा सोनभद्र की दुद्धी के साथ राजनीतिक इतिहास में एक अनोखा रिकॉर्ड बनाने जा रही है। दोनों ही सीटों पर विधानसभा के एक ही कार्यकाल में दूसरी बार उपचुनाव होगा। घोसी में पिछली बार 2023 में सपा विधायक दारा सिंह चौहान के इस्तीफे के बाद उप चुनाव हुआ था। दारा सिंह चौहान सपा छोड़कर भाजपा में शामिल होकर मंत्री बन गए थे। लेकिन, उप चुनाव का रिजल्ट आया तो सपा के सुधाकर सिंह ने 42 हजार 759 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी। अब सुधाकर सिंह के 20 नवंबर 2025 को निधन के बाद फिर से सीट खाली हो गई है। कैसे हुई थी मौत: सुधाकर सिंह की मौत की वजह काफी दुखद रही। 17 नवंबर को दिल्ली में माफिया मुख्तार अंसारी के बेटे उमर अंसारी की शादी समारोह में शामिल हुए। 18 नवंबर को घर लौटते ही तबीयत बिगड़ी। लखनऊ के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराए गए। 20 नवंबर को उन्होंने अंतिम सांस ली। अखिलेश यादव खुद अस्पताल पहुंचे और परिवार को ढांढस बंधाया। यहां भावुक दृश्य देखने को मिला जब सुधाकर के बेटे सुजीत सिंह अखिलेश के पैर पकड़कर रोते दिखे। कौन हो सकता है दावेदार?
सपा यहां सहानुभूति बटोरने के लिए घोसी विधायक सुधाकर सिंह के छोटे बेटे सुजीत सिंह का नाम घोषित कर चुकी है। वह घोसी के दो बार ब्लॉक प्रमुख रहे हैं। जबकि भाजपा से पूर्व विधायक विजय राजभर दावेदार हैं। उप चुनाव हार चुके मंत्री दारा सिंह चौहान एमएलसी बन चुके हैं। भाजपा उन्हें उतारकर फिर जोखिम लेना नहीं चाहेगी। इस सीट पर ओबीसी वोटर निर्णायक हैं। विजय के जरिए भाजपा राजभर तो मंत्री दारा सिंह और फागू चौहान के प्रभाव से चौहान वोटरों को साध सकती है। दुद्धी: आदिवासी नेता विजय सिंह गोंड के निधन से दूसरी बार उपचुनाव सोनभद्र की दुद्धी (आरक्षित) सीट पर भी एक ही टर्म में दूसरी बार उपचुनाव होगा। 8 जनवरी 2026 को विजय सिंह गोंड (71 वर्ष) का लखनऊ PGI में निधन हो गया। विजय सिंह गोंड आदिवासी राजनीति के दिग्गज थे। 8 बार विधायक रहे। 1980 और 1985 में कांग्रेस से जीते, लेकिन 1989 में निर्दलीय लड़े और अपने गुरु रामप्यारे पनिका को हराकर इतिहास रचा। बाद में जनता दल, सपा से जुड़े। 2022 में भाजपा जीती, लेकिन विधायक रामदुलार गोंड की रेप केस में सजा से सीट खाली हुई थी। 2024 उपचुनाव में विजय सिंह ने भाजपा के श्रवण गोंड को हराया था। अब उनके निधन से एक ही टर्म में फिर उप चुनाव होगा। कैसे हुई थी मौत: विजय सिंह करीब एक साल से बीमार चल रहे थे। उनकी दोनों किडनियां खराब हो गई थीं। दो महीने से लखनऊ PGI में इलाज चल रहा था। उनके निधन की खबर पाकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव लखनऊ PGI पहुंचे थे और पीड़ित परिवार को सांत्वना देते हुए कहा था कि ‘उन्होंने हमेशा आदिवासियों की सेवा की। इसलिए जनता ने उन्हें हर बार सेवा का मौका दिया।’ कौन हो सकता है दावेदार?
सपा ने दुद्धी सीट पर भी सहानुभूति कार्ड खेलते हुए विजय सिंह गोंड के परिवार को ही टिकट देने का संकेत दिया है। सपा यहां से उनके छोटे बेटे नरेंद्र प्रताप सिंह को टिकट दे सकती है। नरेंद्र ही पिता का पूरा मैनेजमेंट उनके रहते संभाल रहे थे। वे राजनीतिक रूप से सक्रिय भी हैं। विजय सिंह के तीन बेटों में सबसे बड़े वीरेंद्र प्रताप सिंह बाराबंकी में सिविल जज है। मंझले बेटे सुरेंद्र प्रताप सिंह जल निगम में इंजीनियर की नौकरी छोड़ चुके हैं। यदि उनकी राजनीतिक इच्छा जागृत होती है, तो विवाद टालने के लिए सपा विजय सिंह की पत्नी कृष्णा सिंह को उतार सकती है। वहीं, भाजपा उप चुनाव में विजय सिंह गोंड को चुनौती देने वाले श्रवण कुमार पर ही दांव लगाने की तैयारी में है। फरीदपुर: ‘चेंज की सीट’ पर डॉ. श्याम बिहारी ने तोड़ा था रिकॉर्ड बरेली की फरीदपुर (सुरक्षित) सीट से भाजपा विधायक डॉ. श्याम बिहारी लाल का 2 जनवरी, 2026 को निधन हो गया। यह सीट ‘चेंज की सीट’ कही जाती है। इस सीट पर कोई विधायक लगातार दो बार नहीं जीत पाता था। लेकिन श्याम बिहारी ने 2017 और 2022 में यह परंपरा तोड़ी। वर्तमान में वे बरेली की महात्मा ज्योतिबा फूले रोहिलखंड यूनिवर्सिटी में प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष थे। इसके अलावा वे पांचाल संग्रहालय के निदेशक भी थे और गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, नोएडा के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सदस्य थे। उन्होंने अपने सियासी सफर की शुरुआत ABVP से की थी। उनके निधन से अब इस सीट पर उप चुनाव होगा। कैसे हुई थी मौत: 60 साल के डॉ. श्याम बिहारी को 2007 में पहला हार्ट अटैक पड़ा था। दिल्ली के अपोलो अस्पताल में बाईपास सर्जरी हुई थी। तब से इलाज चल रहा था। 2 जनवरी को उन्हें दूसरा अटैक उस समय पड़ा, जब वे पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह की मीटिंग में मौजूद थे। अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी। लोग उन्हें अस्पताल ले गए। जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। 1 जनवरी को भी उन्होंने अपना जन्मदिन मनाया था। कौन हो सकता है दावेदार?
डॉ. श्याम बिहारी के निधन के अगले ही दिन सीएम योगी परिवार को सांत्वना देने बरेली पहुंचे। डॉ श्याम बिहारी की पत्नी मंजू लता बेसिक शिक्षा विभाग में टीचर हैं। बड़ी बेटी शिल्पा ग्वाल, कैंटोनमेंट बोर्ड रक्षा में संपदा अधिकारी है। छोटी बेटी शिवानी ग्वाल, मुंबई RBI में कार्यरत हैं। 26 वर्षीय बेटा ईशान ग्वाल दिल्ली में UPSC की तैयारी कर रहा है। पार्टी सहानुभूति बटोरने के लिए पत्नी या बेटे पर भी दांव खेल सकती है। हालांकि वहां से एबीवीपी के अध्यक्ष जवाहर लाल भी दावा ठोक रहे हैं। जबकि सपा अपने पूर्व विधायक विजय पाल सिंह को फिर से मैदान में उतार सकती है। तीनों सीटों के उप चुनाव परिणाम का कितना असर?
विधानसभा 2027 से पहले प्रदेश में तीन सीटों का उप चुनाव काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। त्रिस्तरीय पंचायत और 11 एमएलसी सीटों के अलावा तीन विधानसभा क्षेत्रों में जीत दर्ज करने वाली पार्टी का मनोबल काफी बढ़ जाएगा। यही कारण है कि सपा–भाजपा के लिए ये चुनाव सत्ता की सेमीफाइनल की तरह होंगे। इसे जीत कर वे एक–दूसरे पर मनोवैज्ञानिक बढ़त लेना चाहेंगे। हालांकि वरिष्ठ पत्रकार मनीष मिश्रा की राय इससे जुदा है। वे साफ कहते हैं कि किसी भी प्रदेश का उप चुनाव पूरी तरह से प्रशासनिक तंत्र का माना जाता है। 2024 में प्रदेश में 9 सीटों के उप चुनाव में ये दिख भी चुका है। भाजपा ने मुरादाबाद की कुंदरकी जैसी मुस्लिम बहुल सीट जीत लिया था। जिस सीट पर आजादी से लेकर आज तक भाजपा को उतने वोट नहीं मिले थे, जितने की उसे मार्जिन मिली थी। प्रदेश में जिसकी सरकार होती है, उप चुनाव में अक्सर वही जीतती है। 2027 के विधानसभा चुनाव का आकलन इसके परिणाम से नहीं लगाया जा सकता है। हां भाजपा जरूर तीनों उप चुनाव जीतकर अपनी संख्या बल में इजाफा करना चाहेगी। 18वीं विधानसभा के कार्यकाल में निधन से 5 उप चुनाव हो चुके विधानसभा के मौजूदा कार्यकाल में अब तक आकस्मिक निधन से 8 सीटें रिक्त हो चुकी हैं। पूर्व में रिक्त 5 सीटों पर उप चुनाव हो चुका है। तीन पर अप्रैल–मई में संभावित है। पूर्व की पांच सीटों में तीन पर भाजपा, 1 पर अपना दल तो एक पर सपा का कब्जा था। छानबे की सीट अपना दल के विधायक राहुल कोल के निधन से रिक्त हुई थी। अपना दल ने उनकी पत्नी रिंकी कोल को प्रत्याशी बनाया और वह चुनाव जीत गईं। लखनऊ पूर्व से विधायक रहे आशुतोष टंडन के निधन के बाद भाजपा ने उप चुनाव में पार्टी के वरिष्ठ नेता ओपी श्रीवास्तव पर दांव लगाया था, जो सफल रहा। इसी तरह गैंसड़ी सीट से सपा के डॉ. शिव प्रताप यादव के निधन से उप चुनाव हुआ था। तब सपा ने उनके बेटे राकेश यादव को प्रत्याशी बनाया था। राकेश ने सहानुभूति के बलबूते ये सीट जीत ली। मतलब साफ है कि निधन वाली सीटों पर सहानुभूति फैक्टर अधिक चला। अब दोनों ही पार्टी इसी रणनीति पर आगे बढ़ने की जुगत में दिख रही हैं। जबकि इसी रणनीति के बलबूते भाजपा ने गोला गोकर्णनाथ सीट जीती थी। भाजपा के इस सीट से विधायक अरविंद गिरि के निधन के बाद उप चुनाव में पार्टी ने उनके बेटे अमन गिरि को प्रत्याशी बनाया था। ददरौला सीट से भाजपा विधायक रहे मानवेंद्र सिंह के निधन के बाद पार्टी ने यहां से उनके बेटे अरविंद सिंह को प्रत्याशी बनाया और वे भी जीतने में सफल रहे। ——————– ये खबर भी पढ़ें- योगी की सीट पर 13% वोट कटे:SIR से मुश्किल में भाजपा, गांव से ज्यादा शहरी सीटों पर बदले समीकरण यूप में SIR की ड्राफ्ट सूची 6 जनवरी को जारी हो चुकी है। प्रदेश में औसतन 18.70 फीसदी वोट कटे हैं। सबसे ज्यादा शहरी सीटों के राजनीतिक समीकरण गड़बड़ाए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि शहरी सीटों पर SIR के बाद सबसे मुश्किल में भाजपा होगी। 106 शहरी सीटों में 84 पर भाजपा तो 2 पर सहयोगी दलों का कब्जा है। पढ़े पूरी खबर…
सपा यहां सहानुभूति बटोरने के लिए घोसी विधायक सुधाकर सिंह के छोटे बेटे सुजीत सिंह का नाम घोषित कर चुकी है। वह घोसी के दो बार ब्लॉक प्रमुख रहे हैं। जबकि भाजपा से पूर्व विधायक विजय राजभर दावेदार हैं। उप चुनाव हार चुके मंत्री दारा सिंह चौहान एमएलसी बन चुके हैं। भाजपा उन्हें उतारकर फिर जोखिम लेना नहीं चाहेगी। इस सीट पर ओबीसी वोटर निर्णायक हैं। विजय के जरिए भाजपा राजभर तो मंत्री दारा सिंह और फागू चौहान के प्रभाव से चौहान वोटरों को साध सकती है। दुद्धी: आदिवासी नेता विजय सिंह गोंड के निधन से दूसरी बार उपचुनाव सोनभद्र की दुद्धी (आरक्षित) सीट पर भी एक ही टर्म में दूसरी बार उपचुनाव होगा। 8 जनवरी 2026 को विजय सिंह गोंड (71 वर्ष) का लखनऊ PGI में निधन हो गया। विजय सिंह गोंड आदिवासी राजनीति के दिग्गज थे। 8 बार विधायक रहे। 1980 और 1985 में कांग्रेस से जीते, लेकिन 1989 में निर्दलीय लड़े और अपने गुरु रामप्यारे पनिका को हराकर इतिहास रचा। बाद में जनता दल, सपा से जुड़े। 2022 में भाजपा जीती, लेकिन विधायक रामदुलार गोंड की रेप केस में सजा से सीट खाली हुई थी। 2024 उपचुनाव में विजय सिंह ने भाजपा के श्रवण गोंड को हराया था। अब उनके निधन से एक ही टर्म में फिर उप चुनाव होगा। कैसे हुई थी मौत: विजय सिंह करीब एक साल से बीमार चल रहे थे। उनकी दोनों किडनियां खराब हो गई थीं। दो महीने से लखनऊ PGI में इलाज चल रहा था। उनके निधन की खबर पाकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव लखनऊ PGI पहुंचे थे और पीड़ित परिवार को सांत्वना देते हुए कहा था कि ‘उन्होंने हमेशा आदिवासियों की सेवा की। इसलिए जनता ने उन्हें हर बार सेवा का मौका दिया।’ कौन हो सकता है दावेदार?
सपा ने दुद्धी सीट पर भी सहानुभूति कार्ड खेलते हुए विजय सिंह गोंड के परिवार को ही टिकट देने का संकेत दिया है। सपा यहां से उनके छोटे बेटे नरेंद्र प्रताप सिंह को टिकट दे सकती है। नरेंद्र ही पिता का पूरा मैनेजमेंट उनके रहते संभाल रहे थे। वे राजनीतिक रूप से सक्रिय भी हैं। विजय सिंह के तीन बेटों में सबसे बड़े वीरेंद्र प्रताप सिंह बाराबंकी में सिविल जज है। मंझले बेटे सुरेंद्र प्रताप सिंह जल निगम में इंजीनियर की नौकरी छोड़ चुके हैं। यदि उनकी राजनीतिक इच्छा जागृत होती है, तो विवाद टालने के लिए सपा विजय सिंह की पत्नी कृष्णा सिंह को उतार सकती है। वहीं, भाजपा उप चुनाव में विजय सिंह गोंड को चुनौती देने वाले श्रवण कुमार पर ही दांव लगाने की तैयारी में है। फरीदपुर: ‘चेंज की सीट’ पर डॉ. श्याम बिहारी ने तोड़ा था रिकॉर्ड बरेली की फरीदपुर (सुरक्षित) सीट से भाजपा विधायक डॉ. श्याम बिहारी लाल का 2 जनवरी, 2026 को निधन हो गया। यह सीट ‘चेंज की सीट’ कही जाती है। इस सीट पर कोई विधायक लगातार दो बार नहीं जीत पाता था। लेकिन श्याम बिहारी ने 2017 और 2022 में यह परंपरा तोड़ी। वर्तमान में वे बरेली की महात्मा ज्योतिबा फूले रोहिलखंड यूनिवर्सिटी में प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष थे। इसके अलावा वे पांचाल संग्रहालय के निदेशक भी थे और गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, नोएडा के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सदस्य थे। उन्होंने अपने सियासी सफर की शुरुआत ABVP से की थी। उनके निधन से अब इस सीट पर उप चुनाव होगा। कैसे हुई थी मौत: 60 साल के डॉ. श्याम बिहारी को 2007 में पहला हार्ट अटैक पड़ा था। दिल्ली के अपोलो अस्पताल में बाईपास सर्जरी हुई थी। तब से इलाज चल रहा था। 2 जनवरी को उन्हें दूसरा अटैक उस समय पड़ा, जब वे पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह की मीटिंग में मौजूद थे। अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी। लोग उन्हें अस्पताल ले गए। जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। 1 जनवरी को भी उन्होंने अपना जन्मदिन मनाया था। कौन हो सकता है दावेदार?
डॉ. श्याम बिहारी के निधन के अगले ही दिन सीएम योगी परिवार को सांत्वना देने बरेली पहुंचे। डॉ श्याम बिहारी की पत्नी मंजू लता बेसिक शिक्षा विभाग में टीचर हैं। बड़ी बेटी शिल्पा ग्वाल, कैंटोनमेंट बोर्ड रक्षा में संपदा अधिकारी है। छोटी बेटी शिवानी ग्वाल, मुंबई RBI में कार्यरत हैं। 26 वर्षीय बेटा ईशान ग्वाल दिल्ली में UPSC की तैयारी कर रहा है। पार्टी सहानुभूति बटोरने के लिए पत्नी या बेटे पर भी दांव खेल सकती है। हालांकि वहां से एबीवीपी के अध्यक्ष जवाहर लाल भी दावा ठोक रहे हैं। जबकि सपा अपने पूर्व विधायक विजय पाल सिंह को फिर से मैदान में उतार सकती है। तीनों सीटों के उप चुनाव परिणाम का कितना असर?
विधानसभा 2027 से पहले प्रदेश में तीन सीटों का उप चुनाव काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। त्रिस्तरीय पंचायत और 11 एमएलसी सीटों के अलावा तीन विधानसभा क्षेत्रों में जीत दर्ज करने वाली पार्टी का मनोबल काफी बढ़ जाएगा। यही कारण है कि सपा–भाजपा के लिए ये चुनाव सत्ता की सेमीफाइनल की तरह होंगे। इसे जीत कर वे एक–दूसरे पर मनोवैज्ञानिक बढ़त लेना चाहेंगे। हालांकि वरिष्ठ पत्रकार मनीष मिश्रा की राय इससे जुदा है। वे साफ कहते हैं कि किसी भी प्रदेश का उप चुनाव पूरी तरह से प्रशासनिक तंत्र का माना जाता है। 2024 में प्रदेश में 9 सीटों के उप चुनाव में ये दिख भी चुका है। भाजपा ने मुरादाबाद की कुंदरकी जैसी मुस्लिम बहुल सीट जीत लिया था। जिस सीट पर आजादी से लेकर आज तक भाजपा को उतने वोट नहीं मिले थे, जितने की उसे मार्जिन मिली थी। प्रदेश में जिसकी सरकार होती है, उप चुनाव में अक्सर वही जीतती है। 2027 के विधानसभा चुनाव का आकलन इसके परिणाम से नहीं लगाया जा सकता है। हां भाजपा जरूर तीनों उप चुनाव जीतकर अपनी संख्या बल में इजाफा करना चाहेगी। 18वीं विधानसभा के कार्यकाल में निधन से 5 उप चुनाव हो चुके विधानसभा के मौजूदा कार्यकाल में अब तक आकस्मिक निधन से 8 सीटें रिक्त हो चुकी हैं। पूर्व में रिक्त 5 सीटों पर उप चुनाव हो चुका है। तीन पर अप्रैल–मई में संभावित है। पूर्व की पांच सीटों में तीन पर भाजपा, 1 पर अपना दल तो एक पर सपा का कब्जा था। छानबे की सीट अपना दल के विधायक राहुल कोल के निधन से रिक्त हुई थी। अपना दल ने उनकी पत्नी रिंकी कोल को प्रत्याशी बनाया और वह चुनाव जीत गईं। लखनऊ पूर्व से विधायक रहे आशुतोष टंडन के निधन के बाद भाजपा ने उप चुनाव में पार्टी के वरिष्ठ नेता ओपी श्रीवास्तव पर दांव लगाया था, जो सफल रहा। इसी तरह गैंसड़ी सीट से सपा के डॉ. शिव प्रताप यादव के निधन से उप चुनाव हुआ था। तब सपा ने उनके बेटे राकेश यादव को प्रत्याशी बनाया था। राकेश ने सहानुभूति के बलबूते ये सीट जीत ली। मतलब साफ है कि निधन वाली सीटों पर सहानुभूति फैक्टर अधिक चला। अब दोनों ही पार्टी इसी रणनीति पर आगे बढ़ने की जुगत में दिख रही हैं। जबकि इसी रणनीति के बलबूते भाजपा ने गोला गोकर्णनाथ सीट जीती थी। भाजपा के इस सीट से विधायक अरविंद गिरि के निधन के बाद उप चुनाव में पार्टी ने उनके बेटे अमन गिरि को प्रत्याशी बनाया था। ददरौला सीट से भाजपा विधायक रहे मानवेंद्र सिंह के निधन के बाद पार्टी ने यहां से उनके बेटे अरविंद सिंह को प्रत्याशी बनाया और वे भी जीतने में सफल रहे। ——————– ये खबर भी पढ़ें- योगी की सीट पर 13% वोट कटे:SIR से मुश्किल में भाजपा, गांव से ज्यादा शहरी सीटों पर बदले समीकरण यूप में SIR की ड्राफ्ट सूची 6 जनवरी को जारी हो चुकी है। प्रदेश में औसतन 18.70 फीसदी वोट कटे हैं। सबसे ज्यादा शहरी सीटों के राजनीतिक समीकरण गड़बड़ाए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि शहरी सीटों पर SIR के बाद सबसे मुश्किल में भाजपा होगी। 106 शहरी सीटों में 84 पर भाजपा तो 2 पर सहयोगी दलों का कब्जा है। पढ़े पूरी खबर…