गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार सुबह खिचड़ी चढ़ाकर मकर संक्रांति की शुरुआत की। गोरक्षपीठाधीश्वर योगी ने मकर संक्रांति पर परंपरागत पूजा की। इसके बाद गोरक्षपीठ और नेपाल नरेश की ओर से भेजी गई खिचड़ी चढ़ाई। परंपरानुसार नेपाल राज परिवार से गोरखनाथ मंदिर में हर साल चढ़ाने के लिए खिचड़ी आती है। फिर आम श्रद्धालुओं का खिचड़ी चढ़ाने का सिलसिला शुरू हुआ। इसी के साथ सवा महीना तक चलने वाले गोरखनाथ मंदिर के खिचड़ी मेला का शुभारंभ किया गया। योगी ने पूजा और खिचड़ी चढ़ाने के बाद मंदिर का भ्रमण भी किया। साथ ही लोगों को मकर संक्रांति पर्व की शुभकामनाएं दी। गोरखनाथ मंदिर में गूंज रहे ढोल-नगाड़े गुरुवार सुबह 4 बजे से ही पूरा मंदिर परिसर ढोल, नगाड़ों से गूंजने लगे हैं। श्रद्धालु गुरु गोरखनाथ के जयकारे लगा रहे हैं। गोरक्ष पीठाधीश्वर के रूप में योगी ने अनुष्ठान और पूजा-पाठ सुबह 4 बजे तक किया है। इसके बाद अलग-अलग शहरों से आए श्रद्धालुओं ने खिचड़ी चढ़ाई। इनमें सबसे अधिक श्रद्धालु नेपाल से आए हैं। श्रद्धालुओं की अधिक संख्या को देखते हुए सोमवार सुबह 4 बजे मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। कपाट खुलते ही गुरु गोरक्षनाथ और हर-महादेव के जयघोष के साथ श्रद्धालुओं का हुजूम मंदिर परिसर में उमड़ पड़ा। ठंड और कोहरे के बावजूद श्रद्धालुओं के गोरखनाथ मंदिर पहुंचने का सिलसिला जारी है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मन्दिर के स्वयंसेवक और पुलिस-प्रशासन के लोग जगह-जगह पर तैनात हैं। उधर, रविवार की रात से ही खिचड़ी मेले की छटा देखने लायक है। अब 3 तस्वीरें देखिए… सुबह 3:40 बजे मंदिर में किया प्रवेश गोरक्षपीठाधीश्वर योगी ने सुबह लगभग 3:40 बजे गोरखनाथ मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश किया। नाथ परंपरा के अनुसार उन्होंने गुरु गोरखनाथ की पूज अर्चना की। गले में लटकी सीटी बजाई और दंडवत होकर प्रणाम किया। उसके बाद गर्भगृह के कपाट बंद कर दिए गए। योगी ने गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाई। उसके बाद नेपाल राज परिवार की ओर से लाई गई खिचड़ी भी अर्पित की। योगी इसके बाद बाहर आ गए और कपाट लोगों के लिए खोल दिए गए। मानो अन्न की हो रही वर्षा
श्रद्धालु थोड़ी दूर से ही गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ा रहे हैं। एक साथ सैकड़ों लोगों की ओर से खिचड़ी (चावल, दाल, तिल आदि) अर्पित करने से मंदिर में मानो अन्न की वर्षा हो रही है। खिचड़ी चढ़ाने के बाद गर्भगृह की परिक्रमा करते हुए श्रद्धालु दूसरी ओर से बाहर निकल रहे हैं। वे मंदिर परिसर में स्थापित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं पर भी पूजा-अर्चना करते देखे जा रहे हैं। खिचड़ी चढ़ाने के लिए नेपाल से बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचे हैं। नेपाल से आए लोगों ने कहा कि यह हमारे देश की वर्षों पुरानी परंपरा है। बाबा गोरखनाथ को उन्होंने अपना आराध्य बताया। श्रद्धालुओं से पूछा हाल, बच्चों के दुलारा
सीएम योगी आदित्यनाथ मंदिर परिसर में भ्रमण करने पहुंचे। उन्होंने श्रद्धालुओं का हाल पूछा और व्यवस्थाओं का जायजा लिया। श्रद्धालुओं के साथ आए बच्चों को उन्होंने दुलारा और चाकलेट भी दिया। उन्होंने व्यवस्था में लगे स्वयं सेवकों एवं प्रशासन के अधिकारियों को निर्देश दिया कि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की दिक्कत न होने पाए। खिचड़ी चढ़ाने के बाद उठाया मेले का लुत्फ
श्रद्धालुओं ने लाइन में लगकर पहले गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी अर्पित की। उसके बाद मंदिर परिसर का भ्रमण किया। भीम सरोवर में नौकायन का मजा लिया। मंदिर परिसर में लगे मेले में जाकर उन्होंने खूब खरीदारी की और मेले का लुत्फ उठाया। मेले में लगी दुकानों पर श्रद्धालुओं की भीड़ नजर आयी। खिचड़ी के अवसर पर लगा यह मेला एक महीने तक चलेगा। जानिए नेपाल राजपरिवार से खिचड़ी आने की परंपरा क्यों शुरू हुई गुरु गोरखनाथ को मकर संक्रांति पर नेपाल राज परिवार की ओर से खिचड़ी चढ़ाई जाती है। इसके पीछे का इतिहास नेपाल के एकीकरण से जुड़ा है। मान्यता है कि राजा के राजमहल के पास ही गुरु गोरक्षनाथ की गुफा थी। उस समय के राजा ने अपने बेटे राजकुमार पृथ्वी नारायण शाह से कहा कि यदि कभी गुफा में जाएं तो वहां के योगी जो भी मांगे, उसे मना मत करें। जिज्ञासावश शाह खेलते हुए वहां पहुंच गए और गुरु ने उनसे दही मांगी। राजकुमार अपने माता-पिता के साथ दही लेकर जब गुरु के पास पहुंचे तो उन्होंने दही का आचमन कर युवराज के अंजुलि में उल्टी कर दी और उसे पीने को कहा। युवराज की अंजुलि से दही उनके पैरों पर गिर गई। लेकिन बालक को निर्दोष मानकर नेपाल के एकीकरण का वरदान गुरु ने दे दिया। बाद में इसी राजकुमार ने नेपाल का एकीकरण किया। तभी से नेपाल नरेश व वहां के लोगों के लिए गुरु गोरखनाथ आराध्य देव हैं। राजपरिवार से खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा भी तभी से शुरू हुई जो आज तक चली आ रही है।
श्रद्धालु थोड़ी दूर से ही गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ा रहे हैं। एक साथ सैकड़ों लोगों की ओर से खिचड़ी (चावल, दाल, तिल आदि) अर्पित करने से मंदिर में मानो अन्न की वर्षा हो रही है। खिचड़ी चढ़ाने के बाद गर्भगृह की परिक्रमा करते हुए श्रद्धालु दूसरी ओर से बाहर निकल रहे हैं। वे मंदिर परिसर में स्थापित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं पर भी पूजा-अर्चना करते देखे जा रहे हैं। खिचड़ी चढ़ाने के लिए नेपाल से बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचे हैं। नेपाल से आए लोगों ने कहा कि यह हमारे देश की वर्षों पुरानी परंपरा है। बाबा गोरखनाथ को उन्होंने अपना आराध्य बताया। श्रद्धालुओं से पूछा हाल, बच्चों के दुलारा
सीएम योगी आदित्यनाथ मंदिर परिसर में भ्रमण करने पहुंचे। उन्होंने श्रद्धालुओं का हाल पूछा और व्यवस्थाओं का जायजा लिया। श्रद्धालुओं के साथ आए बच्चों को उन्होंने दुलारा और चाकलेट भी दिया। उन्होंने व्यवस्था में लगे स्वयं सेवकों एवं प्रशासन के अधिकारियों को निर्देश दिया कि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की दिक्कत न होने पाए। खिचड़ी चढ़ाने के बाद उठाया मेले का लुत्फ
श्रद्धालुओं ने लाइन में लगकर पहले गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी अर्पित की। उसके बाद मंदिर परिसर का भ्रमण किया। भीम सरोवर में नौकायन का मजा लिया। मंदिर परिसर में लगे मेले में जाकर उन्होंने खूब खरीदारी की और मेले का लुत्फ उठाया। मेले में लगी दुकानों पर श्रद्धालुओं की भीड़ नजर आयी। खिचड़ी के अवसर पर लगा यह मेला एक महीने तक चलेगा। जानिए नेपाल राजपरिवार से खिचड़ी आने की परंपरा क्यों शुरू हुई गुरु गोरखनाथ को मकर संक्रांति पर नेपाल राज परिवार की ओर से खिचड़ी चढ़ाई जाती है। इसके पीछे का इतिहास नेपाल के एकीकरण से जुड़ा है। मान्यता है कि राजा के राजमहल के पास ही गुरु गोरक्षनाथ की गुफा थी। उस समय के राजा ने अपने बेटे राजकुमार पृथ्वी नारायण शाह से कहा कि यदि कभी गुफा में जाएं तो वहां के योगी जो भी मांगे, उसे मना मत करें। जिज्ञासावश शाह खेलते हुए वहां पहुंच गए और गुरु ने उनसे दही मांगी। राजकुमार अपने माता-पिता के साथ दही लेकर जब गुरु के पास पहुंचे तो उन्होंने दही का आचमन कर युवराज के अंजुलि में उल्टी कर दी और उसे पीने को कहा। युवराज की अंजुलि से दही उनके पैरों पर गिर गई। लेकिन बालक को निर्दोष मानकर नेपाल के एकीकरण का वरदान गुरु ने दे दिया। बाद में इसी राजकुमार ने नेपाल का एकीकरण किया। तभी से नेपाल नरेश व वहां के लोगों के लिए गुरु गोरखनाथ आराध्य देव हैं। राजपरिवार से खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा भी तभी से शुरू हुई जो आज तक चली आ रही है।