‘राजनाथ हम सब में बड़े’…:यूपी में क्षत्रिय राजनीति के समीकरण क्या? बृजभूषण ने क्यों राजा भैया के पिता को बताया आदर्श

उत्तर प्रदेश में कुटुंब परिवार की बैठक। फिर ब्राह्मण विधायकों का सहभोज। और अब अवध में राष्ट्रकथा। तीनों आयोजन देखने में भले ही अलग-अलग लग रहे। लेकिन, सियासी मकसद सिर्फ एक है कि सत्ता कैसे उनके काबू में रहे? प्रदेश में कई बाहुबली क्षत्रियों में इस बात की होड़ है कि कौन सबसे बड़ा? कभी राजा भैया और बृजभूषण सिंह में तुलना होती है, तो कभी अभय सिंह, ब्रजेश सिंह और धनंजय सिंह की चर्चा। हालांकि, बृजभूषण खुलकर कहते हैं कि इस तरह के बेकार की चर्चा राजपूत समाज को बांटने और कमजोर करने के लिए की जाती है? अभी राजनाथ सिंह बैठे हैं, वो हम सब लोगों से ‘बड़े’ हैं। संडे बिग स्टोरी में पढ़िए यूपी में क्षत्रिय नेताओं को लेकर इतनी सियासत क्यों? राजनीति में वो कितने प्रभावी? यूपी में हर चौथा विधायक ब्राह्मण-ठाकुर
यूपी के मौजूदा विधानसभा में सबसे अधिक 52 ब्राह्मण तो 49 ठाकुर विधायक हैं। इसके बाद कुर्मी, यादव आदि विधायकों की संख्या है। 403 विधायकों में ठाकुर-ब्राह्मण को जोड़ दें, तो 101 विधायक हो जाते हैं। मतलब हर चौथा विधायक ठाकुर या ब्राह्मण है। अब 2027 में विधानसभा चुनाव है। ऐसे में हर जातियों की तरह ठाकुर भी अपनी सियासी ताकत दिखाने में जुटे हैं। इसकी शुरुआत क्षत्रियों के बाहुबली नेताओं को एकजुट करने के प्रयास से हो रही। यूपी में तीसरा सबसे बड़ा जाति समूह क्षत्रिय
यूपी की राजनीति को जाति से अलग करके नहीं समझा जा सकता। यहां जब भी चुनाव होते हैं, तो जाति का फैक्टर सबसे ऊपर रहता है। चुनावी सफलता के लिए राजनीतिक दल इसी फैक्टर के इर्द-गिर्द अपनी चुनावी बिसात बिछाते हैं। यूपी की जातियों में ब्राह्मण सबसे बड़ा वोटबैंक है। प्रदेश में 9 से 11 प्रतिशत ब्राह्मण हैं। दूसरे नंबर पर यादव की आबादी 8 से 9 प्रतिशत और तीसरे नंबर पर क्षत्रियों की आबादी 7 से 8 प्रतिशत है। बावजूद चुनावी परिणामों में अक्सर क्षत्रिय विधायकों की संख्या ठीक-ठाक रहती है। मौजूदा विधानसभा की बात करें, तो 52 ब्राह्मण विधायकों के बाद 49 क्षत्रिय विधायक हैं। जबकि यादव विधायकों की संख्या कुर्मी विधायकों के बाद चौथे नंबर पर है। यूपी में 70-80 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां क्षत्रिय वोट बैंक 10 से 20 प्रतिशत है। इसमें पूर्वी यूपी के गोरखपुर, गोंडा, अयोध्या, बलिया, आजमगढ़, मिर्जापुर, सोनभद्र, बुंदेलखंड के जालौन, हमीरपुर, पश्चिम में मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, गाजियाबाद, बुलंदशहर जैसे जिले शामिल हैं। वहीं, लोकसभा की 20 सीटों पर क्षत्रिय प्रभावी हैं। क्षत्रिय नेताओं को लेकर यूपी की सियासत में क्या चल रहा
यूपी के मानसून सत्र में एक लंबे अर्से बार अलग-अलग दल के 40 क्षत्रिय विधायक एक होटल में एक साथ बैठे। ये एकजुटता कुटुंब परिवार के नाम पर हुई। इसमें राजपूत समाज की दशा-दिशा पर चर्चा हुई। बाद में सभी विधायकों को भगवान श्रीराम की मूर्ति, महाराणा प्रताप की तस्वीर और पीतल का त्रिशूल भेंट दिया गया। इसके बाद सूबे में कोडीन कफ सिरप का प्रकरण सामने आया। इसमें जौनपुर के बाहुबली धनंजय सिंह के कुछ करीबियों की गिरफ्तारी हुई। इसको लेकर धनंजय सिंह का नाम खूब उछाला गया। फिर उनके खिलाफ अभय सिंह के बयानों को खूब तूल दिया गया। नए साल में गोंडा के बाहुबली नेता बृजभूषण सिंह ने अपने जन्मदिन के अवसर पर राष्ट्रकथा का आयोजन कराया। इस कथा के माध्यम से बृजभूषण सिंह ने अपना दबदबा दिखाया। इन चर्चाओं के बीच बृजभूषण सिंह का एक वीडियो सामने आया, जिसमें वह राजा भैया से उनकी तुलना किए जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए दिख रहे हैं। बृजभूषण सिंह अपनी बात रामचरित मानस की चौपाई–’जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत देखी तिन तैसी’ के साथ शुरू करते हुए कहते हैं- सोशल मीडिया पर एक पोस्ट देखकर बड़ा दुख हुआ। इसमें लिखा था कि राजा भैया क्षत्रियों के बड़े नेता हैं या बृजभूषण सिंह? तो मैं स्पष्ट कर दूं कि जो लोग राजा भैया का इतिहास जानना चाहते हैं, वे पहले उनके पिता महाराज उदय सिंह का इतिहास पढ़ें। वो संघर्ष के प्रतीक हैं और मैं उनको अपना आदर्श मानता हूं। राजा भैया उनके पुत्र हैं। उम्र के नाते वो मेरे छोटे भाई हैं और मेरे बच्चों के दोस्त भी हैं। कृपया ऐसी बकवास मत कीजिए। इससे पहले अभय सिंह बड़े कि धनंजय सिंह? इसमें मिलता क्या है आपको कि कौन बड़ा है, कौन छोटा? कृपया हाथ जोड़कर कहता हूं कि किसी के बारे में ऐसी टिप्पणी मत करो। राष्ट्रकथा जोड़ने के लिए थी, तोड़ने के लिए नहीं। चलो हम बोलते हैं, राजा भैया बड़े हैं। क्या दिक्कत है तुमको? अभी राजनाथ सिंह बैठे हैं, वो हम सब लोगों से बड़े हैं। आप समाज को बांटने का काम मत करें। आप झगड़ा लगाने का काम मत करें। क्या क्षत्रिय विधायक एकजुट हो रहे
इन सब कवायदों ने यूपी की सियासत में एक चर्चा छेड़ दी कि क्या क्षत्रिय विधायक और नेता अपनी कटुता दूर कर एकजुट होने का प्रयास कर रहे? वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- क्षत्रिय विधायक कभी एकजुट नहीं हो सकते। हर क्षत्रिय विधायक खुद को दूसरे से श्रेष्ठ समझता है। अगर ऐसा नहीं होता तो क्या कारण था कि क्षत्रिय विधायकों की एकजुट बैठक 35 साल बाद हुई। इससे पहले 80 के दशक में कांग्रेस में रहते हुए जगदंबिका पाल ने ऐसी बैठक बुलाई थी। तब लखनऊ में क्लार्क अवध होटल में सारे दलों के क्षत्रिय विधायक शामिल हुए थे। वैसे भी क्षत्रिय कभी एक पार्टी के साथ बंधकर कभी नहीं रहा। कांग्रेस के समय उनके साथ थे, फिर वीपी सिंह के समय जनता दल के हो गए। बाद में सपा उनका ठिकाना बना। अब मौजूदा समय में बीजेपी में सबसे अधिक क्षत्रिय विधायक हैं। एकमात्र बसपा ऐसी पार्टी रही, जहां क्षत्रिय कभी बहुतायत संख्या में नहीं जुड़े। लेकिन, कई क्षत्रिय विधायक बसपा से जीते तो उनकी जीत में क्षत्रिय वोटरों की भी भूमिका थी। राजा भैया के प्रकरण से क्षत्रियों की एक नाराजगी बसपा के साथ बनी रही। 2022 में भाजपा ने सबसे अधिक क्षत्रियों को दिया था टिकट
क्षत्रियों को 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सबसे अधिक टिकट दिया था। एक कारण ये भी है कि क्षत्रिय सबसे अधिक 43 विधायक भाजपा से जीत कर सदन पहुंचे। भाजपा ने 71 प्रत्याशी उतारे थे। जबकि सपा ने 23 और बसपा ने 28 क्षत्रियों को ही प्रत्याशी बनाया था। लोकनीत-सीएसडीएस सर्वे के मुताबिक, 2022 में भाजपा को क्षत्रियों का 87 प्रतिशत वोट मिला था। दूसरे नंबर पर सपा थी, जिसे 7 प्रतिशत समर्थन क्षत्रियों का मिला था। यूपी में कब-कब क्षत्रियों के बड़े नेता रहे
यूपी के पूर्वांचल से आने वाले गाजीपुर के विश्वनाथ प्रताप सिंह और बलिया के चंद्रशेखर सिंह देश के प्रधानमंत्री बने। विश्वनाथ प्रताप सिंह तो यूपी में कांग्रेस से सीएम भी रहे। इससे पहले गोरखपुर से आने वाले वीर बहादुर सिंह कांग्रेस के सीएम थे। तीनों नेताओं की खासियत के बारे में वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं- कभी भी इन नेताओं ने जाति की राजनीति नहीं की। वीर बहादुर सिंह अगड़ों के साथ पिछड़ों में काफी लोकप्रिय रहे। इसी तरह चंद्रशेखर की पूरी राजनीति ही खाटी समाजवादी रही। वे भी अगड़ों के साथ पिछड़ों, दलितों और मुस्लिमों में भी उतने ही लोकप्रिय थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह के बारे में तो सर्वविदित है कि मंडल कमीशन लागू करके इस देश में पिछड़ों को हक देने वाले वही थे। जब वे यूपी के पहली बार सीएम बने तो अधिकांश लोग उन्हें जानते तक नहीं थे। उनकी तब यही पहचान थी कि वे अमेठी के संजय सिंह के चचिया ससुर हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह वीपी सिंह के बारे में कहते हैं- उन्होंने मंडल कमीशन लागू न किया होता तो रामविलास पासवान, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव सहित देश में कई पिछड़े नेता कभी भी अपनी अलग पहचान नहीं बना पाते। 90 के दशक से राजनीति में सक्रिय भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह भी पूर्वांचल से ही आते हैं। वह भी क्षत्रिय हैं, लेकिन कभी जाति की राजनीति नहीं की। राजनाथ सिंह सभी वर्गों में लोकप्रिय हैं। शरद प्रधान कहते हैं कि राजनाथ सिंह पर कभी भी ठाकुर वाद का ठप्पा नहीं लगा। और न ही यूपी के पूरे क्षत्रियों ने कभी उनको अपना एक मात्र सर्वमान्य नेता ही स्वीकार किया। जाति के वोटबैंक से उस समाज के नेता को कितना फायदा
प्रदेश की 70 से 80 विधानसभा सीटों पर क्षत्रियों का वोटबैंक 10 से 20 प्रतिशत के बीच है। सवाल उठता है कि क्या जाति के वोटबैंक से समाज के नेताओं को भी फायदा मिलता है? इसका जवाब वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन शाही देते हैं। कहते हैं- सिर्फ एक जाति के भरोसे कोई नेता कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह जीत नहीं सकता। क्षत्रियों की आबादी किसी भी सीट पर 20 प्रतिशत से अधिक नहीं है। मतलब 80 प्रतिशत आबादी दूसरी जातियों की है। तो बहुमत कहां है? जाति का फैक्टर इतना ही मजबूत होता तो सपा के अखिलेश यादव क्यों एमवाई फैक्टर से पीडीए की ओर चले गए। क्योंकि उन्हें समझ में आ गया कि बिना सर्वसमाज के वोटबैंक को साधे कोई सत्ता नहीं मिलने वाली है। कई बार देखने में मिला है कि एक ही सीट पर दो क्षत्रिय प्रत्याशी बने, तो जो दबंग रहा, उसके पीछे क्षत्रिय समाज चला गया। 2007 में इसी तरह बसपा सत्ता में आई तो कहा गया कि सतीश मिश्रा के जरिए उसने ब्राह्मण वोटबैंक को साधा। सतीश मिश्रा आज भी बसपा के साथ हैं। बसपा भी वही है। उसने कभी ब्राह्मणों के खिलाफ कोई काम भी नहीं किया, फिर क्यों सत्ता से बाहर हो गई? दरअसल, लोग कामयाबी की व्याख्या अपनी सुविधा और फायदे के लिए करते हैं। जबकि सच्चाई ये है कि हर बार सत्ता में आने वाली पार्टी को जब सर्वसमाज के अधिकांश वोट मिले, तब ही उसे सफलता मिली है। बृजभूषण ने जिसे आदर्श बताया, उनका क्या है इतिहास
बृजभूषण सिंह ने राजा भैया से तुलना किए जाने पर उनके पिता राजा उदय प्रताप सिंह को अपना आदर्श बताया। साथ में ये भी कहा कि उनका इतिहास जानना चाहिए। आखिर क्या है राजा उदय प्रताप सिंह का इतिहास? वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- संविधान के मुताबिक राजे-रजवाड़े तो नहीं रहे। लेकिन, आज भी कुंडा में उदय प्रताप सिंह को लोग आदर से राजा साहेब या बाबा साहेब कहकर ही पुकारते हैं। 1933 में जन्मे उदय प्रताप सिंह को उनके चाचा बजरंग बहादुर सिंह ने गोद लिया था। राजा बजरंग बहादुर सिंह स्वतंत्रता सेनानी रहे। स्वतंत्रता के बाद वे पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के संस्थापक और कुलपति रहे। बाद में हिमाचल प्रदेश के दूसरे उपराज्यपाल भी रहे। पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ उनकी अच्छी बनती थी। उनकी पत्नी रानी गिरिजा देवी इंदिरा गांधी से काफी नजदीक थीं। हालांकि, उनके बाद राजा बने उदय प्रताप सिंह कांग्रेस की बजाय विहिप और संघ के अधिक करीब रहे। उन्होंने दोनों संस्थाओं को अपनी कई संपत्तियां दान में दी हैं। यूपी में प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबंध लगवाने का श्रेय राजा उदय प्रताप सिंह को जाता है। उन्होंने पर्यावरण बचाने के लिए प्रकृति नामक संस्था बनाई है। कई स्कूलों-कॉलेजों के संस्थापक, संरक्षक भी हैं। इंदिरा गांधी जब देश की पीएम बनी, तो राजा उदय प्रताप सिंह ने भदरी को भारत का स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया था। इसके बाद प्रधानमंत्री को मजबूरन कुंडा में सैन्य दल भेजना पड़ा था। बाद में जब 2002 में मायावती यूपी की सीएम बनीं, तो पोटा के तहत राजा भैया और बाद में उनके पिता उदय प्रताप सिंह को जेल भिजवा दिया था। लगभग एक साल उन्हें जेल में रहना पड़ा था। तब उनकी उम्र 70 साल थी। पूरे प्रदेश के क्षत्रिय उनके पक्ष में एकजुट हुए थे। ——————– ये खबर भी पढ़ें यूपी के CM योगी अब शेरों वाली कुर्सी पर बैठेंगे, केदारनाथ से लाई गई भगवा गद्दी यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब शेरों वाली कुर्सी पर बैठेंगे। कुर्सी बेहद खास है। केदारनाथ प्रोजेक्ट में बची देवदार की लकड़ियों से कुर्सी बनाई गई है। इसमें उत्तराखंड के मंदिरों में बनी नक्काशी की झलक है। इससे सुगंधित खुशबू भी निकलती है। मतलब- जहां रखी जाएगी, वहां महकेगी। पूरी खबर पढ़ें…