राजनीति की रंगभूमि-4:कल्याण सिंह ने बाबरी मस्जिद बचाने का वादा किया, गिरने पर तिहाड़ गए; लिखकर दिया- कारसेवकों पर गोली नहीं चलेगी

राजनीति में कुछ नेता इतिहास बना देते हैं और कुछ खुद इतिहास पुरुष बन जाते हैं। खेत की मिट्टी ने निकला एक किसान का बेटा सत्ता के शिखर पर पहुंच गया। एक नेता, जिसकी पहचान सीधे बोलने वाले और फैसलों पर अडिग रहने वाले राजनेता की रही, नाम है कल्याण सिंह। ‘राजनीति की रंगभूमि’ में आज कहानी उस नेता की, जिसने ‘मंडल-कमंडल’ की राजनीति साधकर यूपी में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। उतार-चढ़ाव आए, रास्ते बदले, लेकिन कल्याण सिंह की पहचान हमेशा बनी रही… साल 1991
11 अशोक रोड, नई दिल्ली शाम ढल चुकी थी, लेकिन भाजपा दफ्तर में सियासी हलचल तेज थी। उत्तर प्रदेश में पहली बार भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला था। ये सिर्फ चुनावी जीत नहीं, बल्कि समूचे भारत की राजनीति में एक बड़ा मोड़ था। पार्टी दफ्तर के कमरे में देर रात तक बैठक चल रही थी। ये जश्न नहीं, सत्ता और जिम्मेदारी तय करने का वक्त था। एक नेता ने धीमी आवाज में कहा- “ये जीत साधारण नहीं। यूपी में पहली बार पूर्ण बहुमत मिला है।” दूसरे ने तुरंत जोड़ा- “हमें सिर्फ सरकार नहीं बनानी है, सामाजिक संदेश भी देना है।” बैठक में भाजपा के सभी सीनियर नेता मौजूद थे। लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी। यूपी भाजपा के अध्यक्ष कल्याण सिंह भी कमरे में थे। चेहरा शांत, नजर नीचे। एक नेता ने जोशी की तरफ देखकर कहा- “सवाल ये है कि सीएम किसे बनाया जाए?” एक पल के लिए खामोशी छा गई। फिर किसी ने मंडल कमीशन का जिक्र छेड़ दिया। “मंडल के बाद यूपी बदल चुका है। जाति, वर्ग, अगड़ा-पिछड़ा सब नई जगह खड़े हैं।” दूसरी ओर से आवाज आई- “मंदिर आंदोलन भी आगे बढ़ाना है। बदले समीकरणों में ये सब आसान नहीं होगा।” तभी किसी ने कहा- “जिम्मेदारी उसी को दी जानी चाहिए, जिसे जनता पहले ही स्वीकार कर चुकी है।” कई निगाहें एक साथ कल्याण सिंह पर टिक गईं, लेकिन वो अब भी शांत थे। तभी कुर्सी खिसकने की आवाज आई। अटल बिहारी वाजपेयी खड़े हो गए। कमरे में अचानक सन्नाटा गहरा गया। अटल जी मुस्कुराए और टेबल पर रखे मिठाई के डिब्बे की तरफ बढ़े। एक लड्डू उठाया और कल्याण सिंह के पास पहुंचे। कल्याण सिंह ने खड़े होने की कोशिश की। अटल जी बोले- “बैठे रहिए।” उन्होंने अपने हाथ से लड्डू आगे बढ़ाया, मुस्कुराकर कहा- “बधाई हो।” कल्याण सिंह एक पल के लिए ठिठक गए, फिर लड्डू खाया। न कोई प्रस्ताव रखा गया, न वोटिंग हुई। एक लड्डू ने सब साफ कर दिया। संदेश स्पष्ट था, उत्तर प्रदेश की कमान अब किसके हाथ में जाने वाली है। कुछ ही दिन बाद, 24 जून 1991 को लखनऊ राजभवन में कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री की शपथ ली। राजभवन का गांधी सभागार भरा हुआ था। शपथ के बाद कल्याण सिंह ने हाथ जोड़कर कहा- “ये सिर्फ पद नहीं, जिम्मेदारी है।” सत्ता के गलियारों में सुगबुगाहट होने लगी थी- “आज से यूपी की राजनीति नई दिशा में जाएगी।” कुछ ही घंटों में ये दिखने भी लगा। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह शपथ लेने के बाद पूरे मंत्रिमंडल समेत अयोध्या पहुंच गए। एक मंत्री ने धीरे से पूछा- “इतनी जल्दी अयोध्या जाना जरूरी है?” कल्याण सिंह बोले- “जिस संकल्प पर सरकार बनी है, वो याद दिलाना जरूरी है।” अयोध्या पहुंचते ही एक साधु ने कहा- “अब मंदिर का रास्ता साफ है।” कल्याण सिंह बोले- “कानून के दायरे में रहकर जो होगा, वही होगा।” दिन बीतने लगे। गांव कस्बों में सभाएं तेज हो गईं। दीवारों पर पोस्टर दिखने लगे- “कारसेवा रुकी, तो बेकार सेवा शुरू होगी।” मीटिंगों में एक ही बात गूंजती थी। “1990 में जो अधूरा रह गया, उसे अब पूरा करना है।” 1992 की जुलाई आ गई। अयोध्या समेत पूरे देश में हलचल तेज हो गई थी। विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने 9 जुलाई को चबूतरा बनाने के लिए कारसेवा शुरू कर दी। मामला गरमाता जा रहा था। 15 जुलाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्काल कारसेवा रोकने का आदेश कर दिया। साधु-संत अड़ गए, बोले- “हम नहीं रुकेंगे। ये धर्म का प्रश्न है।” VHP प्रमुख अशोक सिंघल को विश्वास दिलाया गया कि प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव खुद मामले को देखेंगे। तीन महीने में बातचीत करके मुद्दे का हल निकाला जाएगा। तमाम मान-मनौव्वल के बाद 26 जुलाई को कारसेवा रोक दी गई। बातचीत शुरू हुई, लेकिन हिंदूवादी नेता सरकार पर आरोप लगा रहे थे- “हर बैठक में बात बदल जाती है।” देखते-देखते तीन महीने बीत गए, अक्टूबर आ गया। अशोक सिंघल ने साफ कह दिया- “6 दिसंबर से अयोध्या में फिर कारसेवा शुरू होगी।” अब पीछे हटने का सवाल ही नहीं था। माहौल इतना गरमा गया कि दिल्ली तक हलचल मच गई। सुप्रीम कोर्ट में जज ने सख्त आवाज में पूछा- “अगर अयोध्या में हिंसा हुई, जिम्मेदारी कौन लेगा?” लखनऊ में खलबली मच गई। सचिवालय में अधिकारियों के दिमाग में बस एक ही सवाल गूंज रहा था। “कोर्ट में क्या जवाब दिया जाए…?” कल्याण सिंह ने धीरे से कहा- “जो भी होगा, इतिहास में लिखा जाएगा।” 28 नवंबर, 1992 कल्याण सिंह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा पेश किया। सरकार के वकील ने कहा- “बाबरी मस्जिद को कुछ नहीं होगा। हम इसकी पूरी गारंटी लेते हैं।” कोर्ट ने कागज पढ़ा। एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर जज की आवाज गूंजी- “सरकार गारंटी ले रही है तो ठीक है…।” फिर कड़क आवाज में एक चेतावनी- “बाबरी मस्जिद की सुरक्षा की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की होगी। एक पत्थर भी गिरा, तो जवाबदेही होगी।” उधर, कारसेवा को लेकर VHP को रोकने या कम से कम उसकी दिशा मोड़ने की कोशिशें चलती रहीं। बातचीत का सहारा लिया गया, आश्वासन दिए गए। फिर भी कोई फायदा नहीं हुआ। 3 दिसंबर से ही हजारों कारसेवकों का हुजूम अयोध्या पहुंचने लगा। 5 दिसंबर तक भाजपा-VHP के लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल, मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार जैसे नेता अयोध्या पहुंच चुके थे। 6 दिसंबर, सुबह ठीक 7:30 बजे। 5 कालीदास मार्ग, लखनऊ। मुख्यमंत्री आवास के गेस्ट रूम में खामोशी थी। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के चेहरे पर बेचैनी साफ नजर आ रही थी। वो अखबार पलटते हुए बुदबुदाए- “हर पन्ने पर अयोध्या है। कारसेवकों की भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही।” फिर अपने पीए की तरफ देखा और बोले- “फैजाबाद डीएम से बात कराइए।” फोन लगते ही कल्याण सिंह ने सीधे पूछा- “हालात कैसे हैं?” डीएम बोले- “सर, स्थिति कंट्रोल में है। आप चिंता मत कीजिए।” फोन कट गया। कल्याण सिंह ने गहरी सांस ली। धीरे से कहा- “कंट्रोल में है, लेकिन दिल नहीं मान रहा।” घड़ी पर नजर गई। 10 बज चुके थे। इतने में दरवाजा खुला। स्वास्थ्य मंत्री सूर्यप्रताप शाही कमरे में दाखिल हुए- “नमस्कार भाईसाब…” उनके साथ राजस्व राज्य मंत्री बालेश्वर त्यागी भी आए थे। उन्हें देखते ही कल्याण सिंह बोले- “आइए, ऊपर चलते हैं। थोड़ी खुली जगह में बात करेंगे।” तीनों पहली मंजिल पर बने टिनशेड में बैठ गए। दिसंबर की हल्की धूप थी। सूर्यप्रताप ने कहा- “भीड़ उम्मीद से ज्यादा है।” कल्याण सिंह बोले- “सुबह से ही खबरें परेशान कर रही हैं।” बातचीत चल ही रही थी कि दो अन्य मंत्री राजेंद्र गुप्ता और लालजी टंडन भी आ पहुंचे। गुप्ता ने CM को देखते ही कहा- “भाईसाब, गंभीर खबरें आ रही हैं।” लालजी टंडन ने धीमी आवाज में कहा- “सुना है कुछ कारसेवक गुंबद पर चढ़ गए हैं।” एक पल को सब चुप हो गए। कल्याण सिंह उठ खड़े हुए। “पुख्ता खबर है या अफवाह?” राजेंद्र गुप्ता बोले- “पूरी तरह कंफर्म नहीं है।” कल्याण सिंह ने चारों ओर देखा। फिर बोले- “यहां फोन नहीं है। चलिए नीचे चलते हैं।” सब तेजी से नीचे के मेन हॉल में आ गए। तुरंत फैजाबाद एडीएम को फोन लगाने के लिए कहा। उधर से आवाज आई- “जी सर।” मुख्यमंत्री ने पूछा- “क्या गुंबद पर चढ़ने की खबर सही है?” एडीएम बोले- “सर, अभी कुछ ठीक से पता नहीं चल पा रहा।” फोन रखते ही दूसरा फोन बजा। एक अधिकारी ने कंफर्म किया- “सर, कई जगह से तोड़फोड़ की खबरें आ रही हैं।” कमरे का माहौल भारी हो गया। कल्याण सिंह ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा- “मतलब स्थिति हाथ से फिसल रही है।” तभी एक और फोन आया। पीए ने फोन उठाया और बोला- “भाईसाब, अटल जी का फोन है।” कल्याण सिंह ने फोन लिया। उधर से अटल जी की गंभीर आवाज आई- “कल्याण सिंह जी, खबरें ठीक नहीं हैं। कोई भी कदम बहुत संभलकर उठाइएगा।” कुछ देर बात हुई और फोन कट गया। कुछ देर बाद फिर घंटी बजी। कल्याण सिंह ने खुद फोन उठाया। उधर से लालकृष्ण आडवाणी की आवाज आई- “जमीनी हालात पर नजर बनाए रखिए।” फोन कटा तो कमरे में सन्नाटा छा गया। बाहर मंत्रियों और विधायकों की आवाजाही बढ़ चुकी थी। अंदर फैसलों का बोझ और भारी होता जा रहा था। हर फोन के साथ कमरे की हवा और तल्ख हो रही थी, जैसे इतिहास करवट लेने वाला हो। उधर, अयोध्या में कारसेवकों की भीड़ उग्र होती जा रही थी। कुछ लोग बाबरी मस्जिद के ऊपर चढ़ गए। उनके हाथों में हथौड़े, कुदालें, लोहे की रॉड थीं। प्रदेश के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) एसएन त्रिपाठी को इसकी खबर मिली तो तुरंत CM आवास पहुंचे। चेहरे पर बेचैनी थी, लेकिन उन्हें कमरे के बाहर ही रोक लिया गया। वे बोले- “मुझे मुख्यमंत्री जी से तुरंत मिलना है।” उन्हें थोड़ी देर रुकने के लिए कहा गया। कुछ देर बाद कल्याण सिंह से उनकी मुलाकात हुई। कमरे का माहौल बोझिल था। त्रिपाठी ने बोलना शुरू किया तो उनकी आवाज में घबराहट साफ झलक रही थी- “सर, कारसेवक बेकाबू हो चुके हैं। हालात कंट्रोल से बाहर हैं, मुझे अयोध्या जाना है। हवाई जहाज चाहिए।” पलभर चुप रहकर कल्याण सिंह बोले- “जैसी खबरें आ रही हैं, मुझे नहीं लगता कि वहां जाकर कोई ठोस कार्रवाई हो सकेगी। मेरा सुझाव है, आप यहीं से निर्देश दें।” इसी बीच गृह सचिव और मुख्य सचिव भी पहुंच चुके थे। अब बारी फैसले की थी। अधिकारियों ने एक-एक करके सुझाव देने शुरू किए। DGP त्रिपाठी ने साफ कहा- “हालात बहुत बिगड़ चुके हैं। फायरिंग करनी होगी।” कल्याण सिंह चुपचाप सुनते रहे। DGP ने जैसे ही ये बात कही उन्होंने सख्त आवाज में कहा- “गोली नहीं चलेगी।” कमरे में सन्नाटा छा गया। थोड़ा रुककर उन्होंने कहा- “कागज-पेन लेकर आइए। बाद में कोई परेशानी न हो, इसलिए लिखित आदेश लीजिए।” गृह सचिव बाहर गए। कुछ देर बाद एक फाइल लेकर लौटे। कल्याण सिंह ने फाइल खोली, पेन उठाया साइन कर दिए। कागज पर साफ लिखा था- “गोली चलाए बिना भीड़ को काबू करने के लिए जो जरूरी हो, किया जाए।” फैसला हो चुका था। अब बहस की कोई जगह नहीं थी। इसके बाद सभी अधिकारी उस फैसले को लागू करने के लिए निकल गए, जो इतिहास का हिस्सा बनने वाला था। दोपहर करीब 1 बजे एक बार फिर फोन की घंटी बजी। पीए ने फोन उठाया। उधर से सख्त और भारी आवाज आई- “एसबी चव्हाण बोल रहा हूं। तुरंत मुख्यमंत्री जी से बात कराइए।” दिल्ली से गृह मंत्री शंकरराव चव्हाण ने खुद फोन किया था। कुछ ही देर में टेलीफोन कल्याण सिंह के हाथ में था। चव्हाण ने तीखे लहजे में सवाल किया- “सीएम साब, प्रदेश में क्या चल रहा है?” कल्याण सिंह शांत आवाज में कहा- “क्या हुआ सर…?” कल्याण सिंह के इस जवाब से आवाज और ऊंची हो गई। उधर से आवाज आई- “हमारे पास सूचना है कि कारसेवक मस्जिद के गुंबद पर चढ़ गए हैं। आपके पास क्या सूचना है?” फोन के इस सिरे पर एक पल की चुप्पी छा जाती है, फिर कल्याण सिंह ने कहा- “मेरे पास एक कदम आगे की सूचना है। कारसेवक गुंबद पर चढ़ चुके हैं और गुंबद तोड़ना शुरू कर दिया है।” इतना सुनते ही चव्हाण लगभग झल्ला पड़े- “तो आपने अब-तक कार्रवाई क्यों नहीं की?” कल्याण सिंह ने साफ आवाज में कहा- “चव्हाण साब, मेरी ये बात रिकॉर्ड कर लीजिए। रामभक्तों पर गोली नहीं चलाऊंगा, गोली नहीं चलाऊंगा, गोली नहीं चलाऊंगा।” कुछ देर बाद खबर मिली कि कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद का एक गुंबद गिरा दिया है। ये सुनते ही कमरे में सन्नाटा छा गया। उस समय लालजी टंडन समेत कई मंत्री और भाजपा नेता मौजूद थे। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह गुस्से से उबल रहे थे। उन्हें लग रहा था कि बड़े नेताओं ने उनसे बहुत सी बातें छिपाए रखीं। उधर, अयोध्या में पहला गुंबद गिरते ही हालात अचानक बदल गए थे। लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल, मुरली मनोहर जोशी और तमाम बड़े नेता कारसेवा वाली जगह से विनय कटियार के घर पहुंच चुके थे। वहां आगे की रणनीति पर चर्चा शुरू हो चुकी थी। तभी फोन की घंटी बजी। कल्याण सिंह ने लालकृष्ण आडवाणी से बात करने के लिए फोन किया था। कल्याण सिंह बोले- “आडवाणी जी, मेरे साथ धोखा हुआ है। अगर ये सब पहले से तय था, तो मुझे अंधेरे में क्यों रखा गया?” आडवाणी ने जवाब दिया- “नहीं, ऐसा कुछ पहले से तय नहीं था।” कल्याण सिंह- “मैं इस्तीफा देने जा रहा हूं। ये सब मेरी जानकारी के बगैर हुआ है।” आडवाणी ने समझाया- “नहीं, अभी इस्तीफा मत दीजिए। अगर ऐसा किया तो केंद्र राष्ट्रपति शासन लगा देगा। केंद्रीय बल मोर्चा संभाल लेंगे। थोड़ा वक्त निकालिए, हालात संभलने दीजिए।” फोन कट गया, लेकिन कल्याण सिंह की नाराजगी कम नहीं हुई थी। उनके मन में वही सवाल घूम रहा था। “अगर सब अचानक हुआ, तो बड़े नेता इतनी जल्दी वहां से क्यों निकल गए?” “अगर ये पहले से तय था, तो मुझे क्यों नहीं बताया गया?” कल्याण सिंह ने इस्तीफा देने का मन बना लिया था। कमरे में फिर चर्चा शुरू हुई। फिर भी एक कठिन सवाल खड़ा था, इस्तीफा देने के लिए पत्र में कारण क्या लिखा जाए? बातचीत के बीच किसी ने कहा- “लिख दीजिए, हम सुरक्षा नहीं कर पाए।” तभी राज्यमंत्री बालेश्वर त्यागी बोले- “आगे हालात क्या हों, कोई नहीं जानता। मेरी राय है, इस्तीफे में कोई कारण न लिखा जाए।” वो पेशे से वकील थे। उनकी ये बात सबको ठीक लगी। कल्याण सिंह ने अपना राइटिंग पैड मंगवाया और अपने हाथ से इस्तीफा लिखा। साइन कर ही रहे थे कि खबर आई, तीसरा गुंबद भी गिर चुका है। शाम करीब साढ़े पांच बजे। कल्याण सिंह पूरी कैबिनेट के साथ राजभवन पहुंचे और राज्यपाल बी. सत्यनारायण रेड्डी को इस्तीफा सौंपा दिया। बाहर पत्रकार इंतजार कर रहे थे। ‘पूर्व CM’ बाहर आए तो सवाल उछला- “राज्यपाल से क्या बात हुई?” कल्याण सिंह ने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप गाड़ी में बैठे और CM आवास की ओर रवाना हो गए। कुछ देर बाद खबर आई, केंद्र ने कल्याण सिंह सरकार बर्खास्त करके प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया है। 8 दिसंबर को कल्याण सिंह प्रेस के सामने आए। उन्होंने कहा- “जिस मकसद से ये सरकार बनी थी, वो पूरा हुआ। मंदिर के लिए ऐसी एक नहीं, कई सरकारों को ठोकर मारने को तैयार हूं।” आवाज में कोई पछतावा नहीं था। उन्होंने साफ कहा- “मेरे ऊपर केस करो, जेल भेजो। किसी और को दोषी मत ठहराओ।” यहीं से समर्थकों में उनकी छवि ‘हिंदू हृदय सम्राट’ की बन गई। कुछ दिन बाद मोहम्मद असलम नाम के एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। आरोप लगाया कि तब की कल्याण सिंह सरकार ने कोर्ट के आदेश की अवहेलना की और गंभीर लापरवाही बरती। मामले की सुनवाई चली और 24 अक्टूबर, 1994 को कोर्ट ने अपना फैसला आया। “पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अयोध्या मामले में कोर्ट की अवमानना की थी।” उन्हें एक दिन की जेल और 20 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई। आदेश आ चुका था। अब सवाल था, आदेश लागू कौन करेगा…? सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार एलसी भादू ने दिल्ली पुलिस के DCP (डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस) एचपीएस वर्क को बुलाया। रजिस्ट्रार ने कहा- “कोर्ट का ऑर्डर है, गिरफ्तारी तुरंत होनी चाहिए।” DCP ने शालीनता से जवाब दिया- “माफ कीजिए सर, ये मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं है।” रजिस्ट्रार ने भौंहें सिकोड़ीं, पलभर सोचा, फिर हां में सिर हिला दिया। अब तिलक रोड थाने के SHO (स्टेशन हाउस ऑफिसर) को बुलाया गया। रजिस्ट्रार भादू ने आदेश थमाया- “कल्याण सिंह को गिरफ्तार कीजिए, तुरंत…। SHO ने टीम तैयार की और सरदार पटेल रोड पर यूपी भवन की ओर बढ़ चले। वहीं से कल्याण सिंह की गिरफ्तारी हुई और उन्हें तिहाड़ जेल ले जाया गया। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। उस समय किरण बेदी तिहाड़ जेल की महानिदेशक थीं। उनके सामने एक व्यावहारिक और अहम सवाल था- एक दिन की जेल का मतलब क्या है? किरण बेदी ने सुप्रीम कोर्ट से गाइडेंस मांगी। कोर्ट का जवाब छोटा और सख्त था- “आप जेल मैनुअल पढ़िए…।” जेल मैनुअल के मुताबिक कल्याण सिंह को अगली सुबह तक जेल में रखा गया। इसी के साथ वो दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में दर्ज हो गया। *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल *** रेफरेंस किताब- युद्ध में अयोध्या – हेमंत शर्मा | जो भुला न सका – बालेश्वर त्यागी | जो याद रहा – बालेश्वर त्यागी सीनियर जर्नलिस्ट- ब्रजेश शुक्ला, राजेंद्र कुमार कल्याण सिंह के साथी- बालेश्वर त्यागी (पूर्व राज्य मंत्री), श्याम नंदन सिंह (पूर्व MLC) कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। ———————————————————– सीरीज की ये स्टोरीज भी पढ़ें… कारसेवकों पर गोली चलवाई तो लोगों ने कार पर थूका, पिछड़ों के मसीहा मुलायम की कहानी उत्तर प्रदेश की मिट्टी ने सिर्फ फसलें नहीं, फौलादी नेता भी पैदा किए हैं। उन्हीं में एक नाम है मुलायम सिंह यादव। पिता की सीख थी- ‘उड़ नहीं सकते तो दौड़ो, दौड़ नहीं सकते तो चलो, चल नहीं सकते तो रेंगो, लेकिन रुको नहीं।’ पूरी स्टोरी पढ़ें… ‘कच्ची छोरी’ ने खींची मुलायम की कुर्सी, 12 घंटे में ऐसे बदली UP की सियासत राजनीति में कई दिन ऐसे होते हैं, जो दशकों का भविष्य तय कर देते हैं। ये कहानी उस दौर की है, जब सत्ता साझेदारी नहीं, सौदेबाजी पर टिकी थी। एक तरफ मुलायम सिंह सत्ता को सीढ़ी मान रहे थे, दूसरी तरफ कांशीराम 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